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Tuesday, January 6, 2009

हरे दोने में बटुरी पलँगतोड मिठाई ( चापुड-चुपुड पोस्ट)



गुलरी की माई आज गला फाड कर बोल रही है - रे गुलरी, वहाँ कहाँ जा रही है फलाने का चिहन देखने। कब से कह रही हूँ दूर रह घरघूमनी से, लेकिन मजाल है जो माने। कल ही समझाया था कि सहरीया बोली बोल रही है, थोडा होसियार रहना........ई बटलोईया जात, बात माने तब न।

गूलरी को क्या, सहरीया बोली हो या गंवई बोली, उसे का ? कौनो चुमौनी लेना है ? बाकि एक बात है, चार दिन में एक बार दतुअन करती है सरीफेवाली, तिसपर नहायेगी भी हफता में एक बार। चम्पई रंग पाने का गुमान है सरीफेवाली को। कह रही थी पानी भरते समय..... मैं क्यों नहाउँ रोज-रोज.......मैं तो गोरी हूँ न। खपसूरत तो एतनी हूँ कि कोई सहर वाली क्या पैंट पहन कर खपसूरती करेगी मेरे सामने। लाली-पौडर इसनो तो मुझे लगाने का जरूरतै नहीं है। खुदै लालम लाल हूँ।

आह रे लालम लाल वाली.....कमाता है न उसका लाल वाला, तभी........नहीं तो देखती केतना लाल बात बोल कर निकल लेती। - भुनभुनाते हुए गुलरी की माई ने अपने आँगन से ही भुनुर-भुनूर बोली बोलते कहा।

बगल से जा रही खोचरन की माई ने कहा - कह लो खूब जी भर कर, कहने से कोई लजाये तब न, तूम कहते थक जाओगी पर मजाल है जो सरीफेवाली को बात लगे।

अरे लगेगा कैसे, रोज देखती हूँ बाजार से पलँगतोड मिठाई ले आता है इसका लाल वाला। कल ही तो बता रहे थे गुलरी के बाबू........इसका लाल वाला बाजार के मीठावाले को कह रहा था तनिक हरे-हरे दोने में मिठाई बाँधना, सूखे दोने से चुरूर-मुरूर आवाज होती है। आहि रे पलँगतोड मिठाई। अबकी बार गुलरी की माई ने पलँगतोड जरा गला तोडकर कहा।

बहुत देर से सुन रही थी सरीफेवाली। रहा नहीं जा रहा था। लेकिन क्या करे, उसके घरवाले ने कसम जो जोड दी थी - किसी से झगरा-रगरा मत करना। अगल-बगल सब जलते हैं तो जलें, लेकिन बात पर बात मत बोलना। सरीफेवाली को अपने लालवाला पर बडा गुमान था बाकि, एक ही कमी थी - हमेसा गाँव के लोगों से दब कर रहता है, कभी कोई बोले तो मुडी नीचे कर निकल जाता है, कहता है क्या करें झगरा-रगरा करके। यही सब करते रहें तो डूटी पर पहुँच न पायेंगे, आफिसर अलग गपोडेगा एक घंटा खडा करके। झगरा-रगरा .........हुँह।

एही तरह गुलरी की माई का भिनभिनाना रोज का है, सरीफेवाली का झाडू-बरतन भी रोज का ही होता है.....ठीक वैसे ही जैसे सूरूज चन्दा अपने टैम पर आते है, रूकते है, चले जाते हैं। आज भी सूरूज चन्दा आयेंगे। साँझ हो गई है, लेकिन सूरूज चंदा अभी नहीं आये हैं, क्या बात है। रोज तो आ जाते हैं, आज क्या हो गया......न गुलरी के बाबू आये न सरीफे का लालवाला । गुलरी की माई टाँड के पास खडी होकर रास्ता देख रही थी। उधर से सरीफेवाली भी आँगन में बैठकर रहर साफ कर रही थी, रहर में न जाने क्यों सिटके आज नहीं दिख रहे थे, रोज तो बहुत मिलते थे सिटके-कंकड।

तभी सूरूज चंदा आते दिख गये। अरे, ये क्या......गुलरी के बाबू के हाथ में कोई झोला है का। और वो लालवाला डूटीधारी......उसके हाथ में तो रोजै रहता है। पलँगतोड मिठा......गुलरी की माई को याद आ गया अचानक।

घर के पास आते ही सूरूज-चंदा अपने-अपने बथान की ओर चले आये।.........आये तो आये, ये गुलरी के बाबू क्या ले आये हैं - लौंगलता मिठाई। का बात है। और उधर क्या लाया होगा लालवाली का खसम - गुलरी की माई सोचे जा रही थी।

दोना तो हरा है, सूखे दोने में ले आते लाज लगती होगी गुलरी के बाबू को - चुरूर-मुरूर।

क्या लाया वो सरीफेवाली का लालवाला।

क्या लाया होगा सोचो ? गुलरी के बाबू ने पास झुकते हुए पूछा ।

मैं का जानूँ......तुम ही थे बाजार में कि मैं , बडे आये मुझे पूछने वाले ।

अरे तो पूछ काहे रही हो, ले आया होगा कुछ....... तुम्हें क्या ? डाह तो भगवान ने औरतों के नछत्रे में लिख भेजा है।

गुलरी अपने हाथ में लौगलता लेकर दिखा रही थी, देख माई मिठाई के बीच में खोंसा लवंग..... बिलकुल सरीफेवाली के नाक में लगी फोंफी की तरह।

चुपचाप खा ले न तेरी सरीफेवाली और तूँ.....दोनों को भरसांय मे झोंक दूंगी, बडी आयी नाक का लवंग निहारने - गुलरी की माई को जैसे कुछ बाकी याद हो आया था, नाक का लवंग ।

कपडे उतारते हुए गुलरी के बाबू बोले - दवाई ले आया है सरीफेवाली का रजुला........ कहता था जबसे बच्चा नहीं हो जाता घर काटने को दौडता है......तुम्हारी गुलरी को देख कर मन ललचाता है कि मईया बिन्नेसरी कब दया करेंगी हम पर । कह रहा था, उसी सरीफेवाली के लिये रोज कुछ न कुछ अंगुर, मेवा, मिठाई जो बन पडे ले आता हूँ। पर असर पडे तब न। कह रहा था, तुम्हारा भाग जोरदार है जो बिना लवँगलता-पलंगतोड खाये चानी सी बिटिया पा गये हो।

गुलरी की माई को लौंगलता अचानक कुछ ज्यादे मीठा लगने लगा। कोख पर दोख नही, यही क्या कम है ।

अगले दिन सुबह अरहर के बने झाडू से बुहार लगाती सरीफेवाली सूखे दोनों को एक ओर टटेर रही थी, कोई देख न ले। सुरूज चंदा चले गये थे। आँचल में छुपा कर माई कुछ लिये जा रही है सरीफेवाली के यहाँ - गुलरी ने सामने आ गये बालों की ओट से कनखहीये देख कर जान लिया।

वापसी में गुलरी की माई कुछ टनमन चल रही थी। हाँ गुलरी सच ही कह रही थी........ सरीफेवाली के नाक का लौंग तो सचमुच लौंगलता में खोंसे गये लौंग की तरह दिखता है। वैसे है सरीफेवाली सीधी, लौंगलता ले नहीं रही थी, कह रही थी दीदी मेरे यहाँ कौन है जो खायेगा, ले जाओ। अरे मैं कहूँ तू जो है, खा लेना चभककर, गुलरीया आये तो थोडा सीखा पढा दिया करना, लडकी जात......जाने मेरे जैसी भगवन्ती माँ पाये या न पाये।

उधर सरीफेवाली हाथ झाडकर हरे दोनों में पडे लौंगलता को निहार रही थी, कुछ सोच भी रही है शायद......... आज जरूर नहाउंगी, गोरी हूँ तो क्या हुआ, हूँ तो घर-जवार की ही, फिर काहे गुमान। नीम के पेड से दतुअन टूटने की आवाज आई - चट्-चटाक ।

- सतीश पंचम


(* पलँगतोड मिठाई - एक प्रकार की मिल्क केक जैसी मिठाई, जो मुझे जौनपुर के एक दो दुकानों पर देखने को मिली है। इसके बारे में सुना है कि नवविवाहित दुल्हा अपनी दुल्हन को सबकी नजरों से चुराकर खिलाता है, उसे खुश करता है या ऐसा ही कुछ :) हरे दोने का इस्तेमाल इसलिये की हरे होने से आवाज कम होती है नहीं तो चुरूर-मुरूर बोलता है( लोग जान नहीं जाएंगे - आज दुलहिन ने पलँगतोड मिठाई खाई है :)


*बटलोईया जात - बटलोई / बटुली यानि की खाना पकाने के बर्तन के आसपास केंद्रित जीवन धोना, पकाना, माँजना.... जिसे साधारणतः स्त्री जाति से संबंधित शब्द कहा सुना जाता है। देहात में यह बटलोईया जाति कहकर एक प्रकार से नारीसूचक शब्द मैंने कई साल पहले राह चलते एक महिला के मुँह से सुना था जो अपनी बेटी को ताना मार रही थी, आज उसे यहाँ प्रयोग कर रहा हूँ।


*चापुड-चुपुड पोस्ट - यह नामकरण मैं पहली बार किसी पोस्ट के लिये दे रहा हूँ। अक्सर लोगों का मानना है कि कोई चीज खाते वक्त आवाज नहीं करनी चाहिये, असभ्यता होती है। लेकिन मेरा मानना है कि जो बात चापुड-चुपुड की आवाज करते हुए खाने में है वह जबान बंद कर मुँह डोलाने में नहीं। इस तरह खाने से खाने वाला, खाने का असली स्वाद पाता है :) यह पोस्ट भी कुछ उसी तरह की बजर देहात की तरह धूसर कहानी है जो एक तरह का चापुड-चुपुड अंश लिये हुए है :)



- Satish Pancham

6 comments:

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

बहुत अच्छा लग!!!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आपके लिखे लफ्ज़ एक चित्र से मन को जोड़ देते हैं ..और सब सामने जैसे घटित होता दीखता है ..बढ़िया चापुड-चुपुड पोस्ट

RAJIV MAHESHWARI said...

ये पलँगतोड मिठाई तो बडे काम की चीज है जी .......

ताऊ रामपुरिया said...

इस चापुड-चुपुड पोस्ट को हमने तो खूब चटकारे ले लेकर खाया..मेरा मतलब है, पढा है. विद्यामाता की कसम घणा आनन्द आया.

रामराम.

Gyan Dutt Pandey said...

बड़ी भोजनार्थक पोस्ट है। हम तो चापुड चुपुड़ नहीं करते पर यह पढ़ मन हो रहा है!

Rohit Tripathi said...

खपसूरत तो एतनी हूँ कि कोई सहर वाली क्या पैंट पहन कर खपसूरती करेगी मेरे सामने

ha ha :-)) thodi lambi post thi lekin maza aaya padhne mein :-)

Rohit Tripathi

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