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Friday, January 16, 2009

बसावन, कल्लू और मेरी गठरी ( भेंट-अकवार पोस्ट)


एक नॉस्टॉल्जिक गठरी बाँधे हुए मैं जौनपुर जा रहा हूँ। मेरी इस गठरी में ढेरों पँखुडीयाँ हैं, कुछ काँटे हैं, और बहुत से डंठल। एक काँटेवाला घर है गाँव का, सुबह होते ही उस घर से झगडे की आवाजें आती है। घर की औरते मुँह बाद में धोती हैं, पहले झगडा करके आपस में एक दूसरे की आवाज नाप लेती हैं। शायद ये कोई गंवई नुस्खा हो।

एक सांवले देह की पँखुडी है, जिसे अपने पैतृक गाँव में घर से कुछ दूर, कभी रहते देखा था। अपने शुरूवाती दिनों में उसे ससुराल वाले अपना नहीं रहे थे। एक दिन जबर्दस्ती जा बैठी घर में, जड जमा ली। आज लाखों की कोठी खडी है दिल्ली में। जो कभी दुत्कारते थे, आज आछो-आछो किये हैं, सास भी, ससुर भी। शायद पैरों का खम ठोककर घर में जमना शुभ माना गया है।

एक डंठल घर भी है, न खाने वाले, न बनाने वाले बस एक खंडहर, गाय-भैंसे शायद उसे अपना बथान मानती हैं।

एक रजा मिंयाँ भी हैं। नाम तो उनका असीर है पर उनके बार-बार बंबई भागने को लेकर गाँववालों ने उनका नाम रजाबेसन ( रिजर्वेशन ) रख दिया। हर वक्त पगहा तुडाये रहते है बंबई जाने के लिये।

एक विधायक जी हैं। दूध बेचते हैं। लोग विधायक इसलिये कहते हैं क्योंकि एक बार सपा वाला बैनर कहीं से खींच-खांचकर ले आये थे। अगले दिन बेचन दर्जी से अपने लिये मोहडे वाली चड्ढी सिलवा लिये। अमर सिंह मय साईकिल विधायक जी के नितंम्बों पर विराजमान थे। कम्बख्त साईकिल मोहडे पर थी।

एक और ओकील (वकील) हैं। कहीं जो झगडा हुआ तो वहाँ ये वकालत करने हाजिर। बडे बडे वकीलों को तो ये कुछ समझते ही नहीं। घरों में महिलाओं के झगडे होते हैं तो किसी मजबूत पार्टी का पक्ष लेगे, धीरे-धीरे कमजोर की ओर ढुलक जाएंगे और फिर अरे भई........पहले एक चाह पिलाओ....ये सब तो होता ही रहेगा। इनकी पत्नी भी शायद मनाती है, कहीं झगडा क्यों नहीं होता आजकल।

डंठलों के साथ कुछ गुलर के फल-फूल हैं। खोलो तो ज्यादातर में कीडे नुमा परत ही नजर आती है। तने पर खुरपा जमा दो तो दूध देते देर नहीं लगती। एक दिन बाजार में बात ही बात किसी से झगडा मोल ले बैठे, सामने वाला मजबूत था। दब गये, दबते-दबते उसे चाय-पान कराने के अलावा रिक्शे में बिठाकर विदा भी कर आये। पूछने पर इतना ही बोले- जाकी रही भावना जैसी।..........गूलर के फूल।

नॉस्टॉल्जिक गठरी में एक रूपये वाली बसावन की चाय है, तीन रूपये वाली कल्लू के गोल-गप्पे । चार रूपये वाली जित्तू के चाट-पकौडे। बगल में ही लौंगलता वाली मिठाई, एक खाने पर दूसरी के लिये ललचता मन।

सोचता हूँ थोडी धूप भी इस गठरी में बाँधता चलूँ .......... नरम...गुनगुनी धूप।



- सतीश पंचम

( फिलहाल पंद्रह दिन के लिये अपने पैतृक निवास जौनपुर में जा रहा हूँ........याद कर रहे हैं - बसावन, कल्लू...... और मेरी गठरी)


10 comments:

Udan Tashtari said...

ले चल बबुआ अपनी गठरी..और अपने हिस्से की वो सहेजी यादें, एक टुकड़ा आकाश और मुट्ठी भर धूप.

खूब तबीयत से जौनपुर घूमिये..रीचार्ज होईये और वापस आईये हमारे बीच.

याद रखना--गलियाँ और दीवारें भी याद कर रहीं हैं, बस, बोलती कुछ नहीं.

अनेक शुभकामनाऐं.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

उम्मीद है कि इस नॉस्टैल्जिया के बाद जौनपुर से लौटकर कुछ ताजे अनुभव भी बाँटेंगे। ...वैसे आपके जौनपुर प्रवास के दौरान हमारी इलाहाबाद में मुलाकात तो हो ही सकती है। पड़ोस जो ठहरा। माघ मेला में तो आएंगे ही?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

घर बिताने वाले दिन मुबारक हों। वापसी में हाल लेकर आएँ हमें बताएँ।

ताऊ रामपुरिया said...

गांव के भरपुर आनन्द लिजिये और वापसी के लिये जौनपुरिया किस्से नोट करते रहियेगा.

कहीं पर सदरू भगत और रमदेई मिल जायें तो उनको हमरा रामराम बोल दिजियेगा.

Amit said...

ghar par khub enjoy kijiye....

रंजना [रंजू भाटिया] said...

वापसी पर कुछ नया ही पढने को मिलेगा यह जानते हैं हम :) वह वहां की वापसी गठरी में बंधा होगा .इन्तजार रहेगा उसको पढने का

Mired Mirage said...

बहुत बढ़िया, अपनी गठरी खोलकर हमें भी समें झाँकने देने के लिए धन्यवाद। यादों की गठरियाँ प्रायः सबके मन प्रसन्न ही कर देती हैं।
घुघूती बासूती

Gyan Dutt Pandey said...

अमर सिंह मय साईकिल विधायक जी के नितंम्बों पर विराजमान थे। कम्बख्त साईकिल मोहडे पर थी।
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भैया, ई बिधायक जी का नेकर पहने फोटो चाहिये। अपने मोबाइल का प्रयोग कर खीचियेगा। पर वह कच्छा अब तक बचा होगा बिधायक जी का! :)

सतीश पंचम said...

ज्ञान जी,आपने अनुमान सही लगाया। उस विधायक के कच्छे का बचे होना मायावती के राज में मुश्किल ही है। सुना है उस दूध वाले की पत्नी बडी झगडखराज है। कपडे धोते वक्त मुझे लगता है जरूर कुछ न कुछ अमर सिंह को कह ही देती होगी - इहै निमहुरा महंगाई बढाये बा .......छपाक....छपाक.....ए चंदईया, तनिक लबेदा लियाव रे....छपाक....छपाक न जाने कितने लबेदे खाये होंगे नाहक ही अमर सिंह जी ने। सुना है कल कोई प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे सिर पर पट्टी बाँधे हुए कि मायावती राज में लाठी से पिटाई हुई है......अब समझ में आया वह तो विधायकजी( दूधवाले) की मेहरारू का कमाल था....छपाक...छपाक :)

अवाम said...

बहुत ही सुंदर. भाई साहब अपने तो घर की याद दिला दी.

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