सफेद घर में आपका स्वागत है।

Tuesday, January 6, 2009

केले को लपेट कर रोटी संग खाना, या फिर कभी गुड़ से रोटी चबाना, अच्छा लगता है।


अच्छा लगता है मुझे,
कच्चे आम के टिकोरों से नमक लगाकर खाना,
ककडी-खीरे की नरम बतीया कचर-कचर चबाना।
इलाहाबादी खरबूजे की भीनी-भीनी खुशबू ,
उन पर पडे हरे फांक की ललचाती लकीरें।
अच्छा लगता है मुझे।

आम का पना,
बौराये आम के पेडो से आती अमराई खूशबू के झोंके,
मटर के खेतों से आती छीमीयाही महक ,
अभी-अभी उपलों की आग में से निकले,
चुचके भूने आलूओं को छीलकर
हरी मिर्च और नमक की बुकनी लगाकर खाना,
अच्छा लगता है मुझे

केले को लपेट कर रोटी संग खाना,
या फिर गुड से रोटी चबाना।
भुट्टे पर नमक- नींबू रगड कर,
राह चलते यूँ ही कूचते-चबाना।
अच्छा लगता है मुझे।

लोग तो कहते हैं कि किसी को जानना हो अगर
उसके खाने की आदतों को देखो,
पर अफसोस........
मायानगरी ने मेरी सारी आदतें,
Luxurious शौक में बदल डाली हैं।

- सतीश पंचम

11 comments:

Arvind Mishra said...

कडकडाती ठण्ड में बसंत का अहसास -मजा आ गया !

मुसाफिर जाट said...

सतीश जी नमस्कार,
बढ़िया जी, बीते दिन याद दिला दिए. अब कहाँ वो बात?

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बाजरे की रोटी संग लहुसन की चटनी खाना भी अच्छा लगता है :) बहुत कुछ याद दिला दिया आपने सतीश जी इस रचना के माध्यम से ..सब कुछ कहीं गुम होता जा रहा है

makrand said...

मायानगरी ने मेरी सारी आदतें,
Luxurious शौक में बदल डाली हैं।

sir padke muh me paani aagya
bhi wah
regards

ताऊ रामपुरिया said...

भाई आज तो मजा आगया. आजकल धडल्ले से बाजरे की रोटी खा रहे हैं और ई सुसरे महानगर को तो मारो गोली, जितनी देर महानगरियों के साथ रहो तब तक महानगरी बन जाओ, बाद मे अपन तो वही खीरे, गड और ककडी..भुट्टे चबाने वाले देहाती.

विद्या माता की कसम जो मजा शहर मे रह कर देहाती बनने मे है वो स्वर्ग मे भी नही इस लिये हमने भगवान को कह रक्खा है कि अभी हमारी तरफ़ नजर ऊठा कर भी नही देखे वर्ना हमारी भैंस और लठ्ठ चुप नही बैठेंगे. :)

श्रुति अग्रवाल said...

सर्दियों की गुनगुनी धूप की गुनगनी यादे...इन यादों ने सौंधे देशज खानों की याद दिला दी। अब जीभ ललचाने लगी है..देखें क्या उपाय कर पाते हैं। कुछ नहीं तो डॉ. साहब द्वारा बताई मिस्सी रोटी को ही गुड़ के साथ चबा जीभ को कुछ सांत्वना देंगे।

pallavi trivedi said...

इस सर्दी में आपने क्या बढ़िया बढ़िया चीज़ों की याद दिला दी....और हाँ महानगर में रहे या गाँव में, खाना तो वही चाहिए जो हमें अच्छा लगता है!

राज भाटिय़ा said...

सतीश जी बहुत अच्छी लगी आप की यह कविता, आप ने तो बचपन याद दिला दिया, वेसे मेने यहा भी अभी तक अपने खाने का रंग नही बदला, पक्का भारतीया ढंग ही है अपना.
धन्यवाद

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

बड़ा अच्छा मीनू !!!! पर इकट्ठे ही याद दिला डाला ...... क्या खाएं ....क्या न खाएं ????

वैसे आपके जज्बात समझ पा रहा हूँ!!!


और अब आयें ....मेरी मदद करें

ब्रजेश said...

देसी घी में गुड़ डालकर रोटी के साथ खाना। चाय में डुबाकर बासी रोटी। नमक पयाज के साथ रोटी। वाह सब कुछ याद दिलाने के लिए धनयवाद।

P.N. Subramanian said...

मजा आ गया। कीसे हुए नारियल को गुड की चासनी में घी डाल कर कढाई में धीमी आँच में हल्का फ्राई कर उतार लें। पिसी इलायची डाल सकते हैं। इस पकवान को पराठे में रख कर गोल घुमा लें और गप गप खाये।



फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.