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Tuesday, December 8, 2009

मुंबई ब्लॉगर-बैठकी, बोले तो .......होठों को करके गोल...... सीटी बजा के बोल..... ऑल इज वेल चाचू .....ऑल इज वेल :)

         ब्लॉगर मिलन स्थल की ओर जाते समय जब जंगल-झाडी वाले डेढ किलोमीटर के सडक पर पैदल चल रहा था तो मन में ख्याल आया कि यार ये तो एकदम ही अलग अनुभव है।  ब्लॉगर मिलन और वह भी जंगल में। खूब हंसी ठिठोली होनी चाहिये अब तो।


   याद आया मुझे फिल्म परिचय का वह सीन जब गुस्सैल  प्राण के घर के बच्चों को पढाने आए जितेन्द्र खूब जोर से हंसते हैं और नौकर असरानी कहता हैं कि ये क्या कर रहे हैं.....इतना जोर से मत हंसिये। इस घर में हंसना मना है। मुझे जब हंसना होता है तो मैं तो जंगल की ओर निकल लेता हूँ।


       यह सीन मुझे बरबस याद आता है जब कि टीवी पर छिछोरे चुटकुले सुना हंसी बटोरी जाती है। सोचता हूँ कि असरानी ने कितनी सच बात कही थी कि जब हंसना हो तो जंगल की ओर निकल  लो। और मैं इधर जंगल की ओर ही जा रहा था, ब्लॉगरों की बैठक में।


      कुछ को मैं जानता था, कुछ को नहीं। एक दो दिन पहले कल्पतरू पर विवेक जी ने चार पांच लोगों की सूची दी थी कि फलां फलां लोग आ रहे हैं।  मैने  उन लोगों के ब्लॉग खंगाले इस उद्देश्य से कि आखिर ये लोग लिखते क्या हैं। इनका चिंतन मनन किस तरह का है और उसी दौरान मुझे रश्मि रविजा और आभा जी के ब्लॉग पढने का मौका मिला। इन लोगों के सुघढ लेखन और अच्छी लरजती बातें पढ अच्छा लगा। सूरज प्रकाश जी को पहले से पढता रहा  हूँ, मुंबई टाईगर को भी यदा कदा पढता ही रहता हूँ। सो, कुछ इत्मिनान था कि चलो इन्हीं लोगों से तो मिलना है। कैसी हिचक। लेकिन अचानक विवेक जी ने कहा कि चौदह-पंद्रह लोग आ रहे हैं तो थोडा ठिठक सा गया। कौन  लोग होंगे। कैसे होंगे, थोडा बहुत पढ लेता उनके बारे में तो थोडा कम्फर्ट रहता। पर सोचा, ऐसा भी क्या झिझकना.......चलो मिलते हैं, देखूं तो सही कि वह लोग मेरी तरह ही 'रूक रूक कर बौद्धिक अय्याशी' करते हैं या 'सदाबहार बौद्धिक अय्याश' हैं।
   खैर, घर से बोरिवली तक मुंबई लोकल ट्रेन में गया । ट्रेन में एक व्यक्ति को कुछ अंगरेजी की लिखावट पढते देखा जो कि कापी मे पढ-पढ कर मुस्करा रहा था। थोडा सा ध्यान दिया तो वह किसी स्कूल की कापी थी जिसमें किसी बच्चे की लिखावट थी। मेरे द्वारा इस तरह से उस कापी में झांकते देख वह व्यक्ति खुद ही बताने लगा
  - मेरी लडकी ने लिखा है, पहिली में पढती है।
मैं मुस्करा पडा।............मुस्कराते हुए ही पूछा -  आज तो संडे है, उसकी छुट्टी होगी।
- हां, पण अभी उसको ट्यूसन के लिये छोड के आया। ये बुक उसका मेरे बैग में छूट गया है। अबी काम पे जाता है मै, तो साथ में ये बुक भी इदर ही मेरे साथ रै गया।   
- अच्छा अच्छा।
वह व्यक्ति पुलकित हो फिर उसी बुक के एक एक अक्षर को पढने लगा।

मैं ट्रेन में बैठे बैठे आसपास का जायजा लेने लगा लगा। कहीं पर स्टे ऑन शक्तिवर्धक कैप्सुल का विज्ञापन था तो कही पर रत्न-माणिक और भाग्योदय करने वाले विज्ञापन। लोगों और आस पास के माहौल को देखते ताकते बोरिवली स्टेशन आ गया।
    बोरिवली स्टेशन से तय स्थल की ओर बढ चला। रास्ते में एक जगह रूक कर चाय पी। नेशनल पार्क के भीतर जाने पर कुछ वहां के  आदिवासी महिलाओं एंवं बच्चों  के द्वारा इमली और अमरूद बेचते देखा। अमरूद के बगल में ही नमक की पन्नी भी दिखी। पूछने पर पता चला कि तीन मूर्ति मंदिर डेढ दो किलोमीटर अंदर है और पैदल जाना पडेगा। निजी वाहन हो तो उससे भी जा सकते हैं। अब वहां निजी वाहन कहां तलाशूं. सो, चल पडा ग्यारह नंबर की बस के जरिये पैदल। दोनों ओर हरे हरे पेड, झुरमुट और पक्षियों का कलरव। जी खुश हो गया। कहीं कहीं युवा- बच्चे सडक पर क्रिकेट खेल रहे थे तो कही पर यूँ ही बैठे समय व्यतीत कर रहे थे। कुछ युवा जोडे एक दूसरे के पंजों को आपस में फंसाये चल रहे थे।


      आस पास से गुजर रही कारों के प्रति संशय होता कि क्या पता इनमें भी कोई ब्लॉगर बैठा हो जो तीन मूर्ति की ओर चला जा रहा है। आस पास की हरियाली देखते जैन मंदिर पहुंचा तो याद आया कि सब टीवी पर तारक मेहता का उल्टा चश्मा में जेठालाल की पत्नी दया अक्सर जेठालाल को जय जिनेंन्द्र कह कर ही प्रणाम करती है।



       ऑफिस जाते समय मेरी श्रीमती जी ने जेठालाल की पत्नी दया की देखा-देखी मुझसे भी कई बार यूं ही मुस्कराते हुए जय जिनेन्द्र कह ठिठोली की है। जैन न होते हुए भी मैं हाथ जोड जय जिनेंन्द्र  कह बैठता हूँ। यूं भी कोई भी मंदिर, मस्जिद या चर्च के सामने से गुजरते हुए हाथ सीने की ओर बढ ही जाते हैं चाहे वह किसी भी धर्म के क्यों न हों। यहां भी वही हुआ।  मंदिर के गेट पर पहुचते ही हाथ खुद ब खुद सीने पर श्रद्धावश चले गये। भीतर मंदिर में जाने पर विवेक रस्तोगी जी मिले। परिचय हुआ। तब तक आलोक नंदन जी भी आ गये। बातचीत करते हुए हम लोग जैन मंदिर के हॉल में चले जहां पर की बैठक तय की गई थी। खिडकियां खोली गई। पंखे चलाये गये। और फिर थोडी बातचीत, थोडी सोच मुद्रा, थोडा इधर उधर फोन-फान । और शुरू हुआ धीरे धीरे लोगों का आना। सूरज प्रकाश, अविनाश वाचस्पति, रश्मि रविजा, शमा, फरहीन, रूपेश श्रीवास्तव, अजय , विमल, राज सिंह, शशि सिंह, सभी लोग आते रहे, महफिल जमती रही।

   
    इधर महाबीर जी (मुंबई टाईगर) और विवेक रस्तोगी जी काफी व्यस्त थे। कभी ब्लॉगरो के लिये पानी, कभी चाय, बिस्कुट , समोसे, वगैरह आदि का प्रबंध करते रहे। बीच बीच में समय निकाल कर हम लोगों के बीच भी आ बैठते और पूरी तन्मयता से बातचीत का रस लेते और रह रह कर अपने विचार भी बताते जाते ।
   
     इधर अविनाश वाचस्पति जी काजू ले आये थे और उधर राज सिंह जी ढेर सारी पान की गिलौरीयां ले आये थे। हंसी मजाक के बीच बातचीत का सिलसिला चलता रहा। इसी बीच एडम जी स्केच भी बनाते जा रहे थे।



   सभी ब्लॉगर अपनी बात भी रख रहे थे और रह रह कर बगल में बैठे  ब्लॉगर से कुछ पूछ पुछौवल भी कर ले रहे थे। कुछ बातें जैसे कि यूनिकोड के बारे में चली, तो  कुछ माईक्रोचर्चा ब्लॉगिंग के बौद्धिक अय्याशी होने पर भी चली इसके साथ ही साथ ब्लॉगिंग के खाये पिये अघाया होने जैसी बातों पर भी बातें निकली।  कमेंट में nice या फिर Very Nice लिखकर कमेंट करने वालों  पर भी हल्की फुल्की मजाकिया बात निकली। 
   
      इसी दौरान हंसी मजाक के कई मौके आए। जैसे कि जब राज सिंह जी ने अविनाश वाचस्पति जी से पूछा कि - आप नुक्कड पर तो हो ही, और कहां हो आप।
  अविनाश जी ने फरमाया एक तो पिताजी हैं।
हांय, क्या क्या।
एक तो पिताजी है, और भी ब्लॉग है जैसे कि तेताला ......
अरे भईया मैं पूछ रहा हूँ कि आप नुक्कड के अलावा कहा रहते कहां हो आप तो बता रहे हो कि.....पिताजी हैं..
  इतना सुनना था कि बगल में बैठी फरहीन जी ठठाकर हंस पडीं। दरअसल अविनाश जी अपने ब्लॉग पिताजी के बारे में बताना चाह रहे थे और राज जी उनका पता ठिकाना पूछे जा रहे थे। अब हो गई गफलत :)

  खैर, अविनाश जी ने एक रोचक बात बताई कि उन्हें ब्लॉगिंग के जरिये मोबाईल सस्ते में कैसे मिला। दरअसल, कहीं उन्होंने जानना चाहा कि कौन सा मोबाईल लूं तो ठीक रहेगा और इसी क्रम में उन्हे मोबाईल के फीचर के बारे में जानने का मौका मिला। इसी दौरान एक ऐसे शख्स ने मोबाईल बेचना चाहा क्योंकि  कैमरा मोबाईल उसके ऑफिस में अलाउ नहीं था। चालू हालत में वह मोबाईल उन्हें सस्ते में मिल गया।  लोगों से जानकांरी और जरूरतों को बांटने का जरिया कैसे बना ब्लॉगिंग यह इसका उदाहरण ही है।
     
      सूरज प्रकाश जी ने भी अपने अनुभव बांटे कि कैसे वह एक्सीडेंट का शिकार हुए और कुछ ही घंटों में मित्रों के ब्लॉग के जरिये यह बात सबको पता चल गई। यही नहीं, 28 लोगों ने रक्तदान के लिये आगे भी आए।
      
      तो इसी तरह की बातें साझा हुई हैं मुबई की ब्लॉगर-बैठकी में। यह एक तरह से गेट टुगेदर ही था। एजेंडा जानबूझ कर तय नहीं किया गया था कि पहले सब एक दूसरे को जान पहचान लें तो बात आगे बढेगी। बीच में समय निकाल मैं मंदिर के भीतरी हिस्से में चला गया। कुछ फोटो आदि खींची। मोबाईल के जरिये ही फोटो खींच रहा था सो जैसे तैसे धुंधली-धूसर तस्वीरें खींच-खांच कर वापस आया तो यहां चला-चली की बेला थी।
   मैं भी आलोक नंदन जी के साथ चल पडा स्टेशन की ओर..........। 


- सतीश पंचम 
 



Saturday, December 5, 2009

फाफामउ वाली पतोह




    अपने गाँव जाते समय रास्ते में पडने वाले इस 'फाफामउ' नामक स्थान से मैं आकर्षित हूँ। इसका नाम फाफामउ कैसे पडा यह तो नहीं पता, लेकिन कल ही मुंबई की लोकल ट्रेन में एक फाफामउ वाले शख्स से मुलाकात हुई थी जो अपने गाँव जा रहा था अपनी बिटिया के लिये विवाह हेतु लडका देखने ।  उन से हुई बातचीत के दौरान ही यह पोस्ट मुझे याद आ गई जो मैंने कुछ समय पहले लिखी थी। फिलहाल  छिपुली में रखे नये गुड और एक लोटे पानी के साथ यह पोस्ट पुनर्प्रकाशित है  :)

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   अचार बनाते समय रमदेई ने फाफामऊ वाली पतोह को तनिक हाथ धोकर ही  अचार छूने-छाने को क्या कह दिया, फाफामऊ वाली तो आज उधान हो गई है। रह-रहकर अपना काम करते समय सामने आ जाती है और तीखे व्यंगबाण छोडती है -


कुछ काम तो है नहीं, बस राबडी देवी की तरह तर्जनी अंगुरी उठा कर लहकारे रहेंगी कि, छू-छा मत करो.....हाथ धो लो.....हुँह, जैसे हम कोई छूतिहर हैं, बेटा को हमसे बियाहे बेला नहीं देखा था कि साफ सुथरी हैं कि नहीं, आज आई हैं हमें सफाई दिखाने।

रमदेई भी क्या करें, जब तक जांगर था अपने हाथ की कर-खा लेती थी, अब तो जब खुद की देह ढल गई है तब औरों को क्या दोस दे। सदरू अलग इस रोज-रोज की किच-किच से परेशान रहते थे। खैर, जैसे तैसे दिन बीत रहे थे, यह मानकर संतोख कर लेते कि, जहाँ चार बासन होंगे वहाँ पर आपस में बजेंगे ही। सदरू यही सब सोचते अपने दरवाजे पर बैठे हुए थे।

उधर फाफामऊ वाली पतोहू आँगन में एक बोरा बीछा कर उस पर बैठ अपने छोटे लडके को उबटन लगा रही थी। उबटन साडी में न लग जाय इसलिये घुटनों तक साडी को उपर भींच लिया था, दोनों पैरों को सामने की ओर रखकर, उसके उपर बच्चे को लिटाकर उबटन मलते हुए तो फाफामऊ वाली को कोई नहीं कह सकता कि यह झगडालू है, उस समय तो लगता है कि ये सिर्फ एक माँ है जो अपने बेटे को उबटन लगा कर, मल-ओलकर साफ सुथरा कर रही है। इधर बेटा अपनी मां को देखकर ओठों से लार के बुलबुले बनाता अपनी बुद् बुबद् .....बद्....की अलग ही ध्वनि निकाले जा रहा था। तभी दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई।

कौन.....बिमला....आओ आओ।

अरे क्या बेटवा को उबटन लगा रही हो......और देखो तो कैसे मस्त होकर उबटन लगवाये जा रहा है......बिलकुल मेरे सकलदीप की तरह।

सकलदीप की तरह, हुँह आई है बडी जोड मिलाने वाली......कहाँ मेरा लल्ला और कहाँ इसका नाक चुआता सकलदीप। मन ही मन भुनभुनाते हुए पतोहू ने कहा - अम्मा उधर रसोई में हैं।

फाफामऊ वाली के इस तेवर से बिमला समझ गई आज लगता है खटपट हुई है घर में। फिर भी थोडा सा माहौल को सहज करने की कोशिश करते हुए कहा - अरे हैं तो हैं, क्या हो गया, क्या मैं तुमसे ही मिलने नहीं आ सकती..........आई बडी अम्मा वाली।

पतोहू को अब जाकर थोडा महसूस हुआ कुछ गलत हो गया है.......भला क्या जरूरत बाहर वालों के सामने अपना थूथन फुलाये रखने की। संभलते हुए बोली - अरे नहीं, उबटन से मेरा हाथ खराब है न सो मैंने सोचा कोई लेने देने में तुम्हें अनकुस न लगे, तभी अम्मा की ओर बताया था। बैठो-बैठो, और कहो - क्या हाल है घर ओर का।

बिमला को अब दिलासा हुई कि चलो अभी थोडा ही गदहा खेत खाया है। बैठने के लिये लकडी की छोटी पीढी को अपनी ओर खींचती हुई बिमला ने अपने घर की बिपदा बयान करनी शुरू की। अरे क्या कहूँ बहिन - मेरी सास तो एकदम आजकल भगतिन हो गई है, कहती है बरतन ठीक से माँजो, तनिक साफ-सफाई का ख्याल करो....... हाथ धो-धाकर ही अचार छुओ।

फाफामऊ वाली का जी धक् से हो गया - हाथ धो-धाकर ही अचार छुओ........ये क्या कह रही है। यही बात तो आज के झगडे की जड बना है। और ये बडकी सहुआईन वही कह रही हैं जो मेरी सास ने कहा। अरे अभी सुन लें तो मेरे घर में फिर महाभारत मच जाय। सोचेंगी न समझेंगी बस, यही कहेंगी कि ऐसे घर-फोरनियों के ही कारन सब घर बिगडते जा रहे हैं। खुद कुछ काम न करेंगी और दूसरों के घर काम बिगाडने चल देंगी। पतोहू ने सोचा अब कोई दूसरी बात करू नहीं तो ये अपना रूदन लेकर बैठी रहेगी और सुनना मुझे पडेगा।

अच्छा सकलदीप कैसा है

वो तो ठीक है, उसको क्या होगा.....जो होगा मेरी अम्मा को ही होगा.......उसे देखकर कहती हैं कि कितना खाता है रे घोडमुंहा.....पेट है कि मडार।

इधर पतोहू सोच में पड गई - फिर वही सास की बात, अभी अम्मा रसोई में सुन ले तो हाथ में जलती लुक्की लेकर दौडेंगी। इसे अब सीधे-सीधे दूसरी बात करने के लिये कहूँ वही ठीक होगा।

अच्छा अब दूसरी बात करो, क्या वही पुरानी-धुरानी लेकर बैठी हो.....और सुनाओ......छुटकी का क्या हाल है।

पुरान-धुरान बात.......... बिमला को अब भी पतोहू के असली मंतव्य का पता न चल रहा था कि किसी तरह बात सास से हटकर किसी और मुद्दे पर आ जाय लेकिन वह माने तब न। कुढते हुए बोली - अरे इसे पुरान-धुरान बात कह रही हो......ये तो अब पुराना होने से रहा......रोज ही ऐसी और कई बातें नये ढंग से मेरे घर में होती हैं, वो तो मैं हूँ जो संभाल ले जाती हूँ......मेरी सास का चले तो........।

बिमला की बात अधूरी रह गई......रसोई से बाहर निकलते रमदेई ने कहा - ए सकलदीप के माई,.... तनिक हाथ लगा दो तो छत पर सूखते मकई को उतार लूँ।

फाफामऊ वाली पतोहू समझ गई........ अम्मा जान गई हैं कि मैं बात टाल रही हूँ और ये बतफोरनी मुझसे बार-बार सास-बेसास करे जा रही है, उसे चुप कराने के लिये ही अम्मा ने अपने काम में उसको लगा दिया है। ये बतफोरनी काम में लगी रहेगी और बात बदल जायगी। आज पहली बार अपनी सास पर मन ही मन गर्व हो रहा था फाफामऊ वाली को.....झगडा और झगडे की जड को कैसे ढंका-तोपा जाता है यह कोई रमदेई अम्मा से सीखे।

उधर सदरू आँगन से बाहर बैठे अपने बडे पोते बड्डन के साथ खेल रहे थे - बड्डन ने दो चुंबक अपने हाथ में लेकर उन्हें चिपकाने की कोशिश कर रहा था। दोनों चुंबकों के समान ध्रुवों के N-N पोल को जोडता, लेकिन वो दूर भागते....जैसे ही N- S पोल को जोडता, वह चिपक जाते। सदरू यह सब बडे मगन होकर देख रहे थे - उन्हें लग रहा था - सकलदीप की माई बिमला और मेरी पतोहू इस N-N पोल की तरह हैं, जितना ही सास का नाम लेकर सकलदीप की माई चिपकने की कोशिश करती, पतोहू उतनी ही जोर लगाकर बात बदलने की कोशिश करती है। जैसे ही रमदेई और सकलदीप की माई का संवाद चला, विरोधी ध्रूव जुड गये, N-S पोल की तरह। जरूरी नहीं कि आपस में विचार मिलते हो तो घनिष्ठता बढे ही......इसका उल्टा भी हो सकता है, ठीक चुंबक की तरह।

        उधर छत के उपर से रमदेई सूखी मकई कि चेंगारी भर कर पकडा रही थी,सकलदीप की माई बिमला नीचे खडी अपने दोनों हाथों से चेंगारी थाम रही थी। तभी चुंबक से खेलते हुए पोते ने कहा - दद्दा ये देखो....एक चुंबक उपर है, उससे चिपका दूसरा नीचे से लटक रहा है, गिरता भी नहीं। सदरू ने देखा....उपर वाले चुंबक का N पोल, नीचे वाले चुंबक के S पोल से जुडा था ।

- सतीश पंचम


Thursday, December 3, 2009

जब ब्लॉगर होने के कारण शादी न हो सके और जुडने वाला रिश्ता तोड दिया जाय......

 यदि आपने शोले देखी हो तो उसमें एक विशेष सीन है कि जब अमिताभ बच्चन बसंती और धर्मेंद्र की शादी की बात करने बसंती की मौसी के यहां जा बैठते हैं और लगते हैं अपने दोस्त का गुणगान करने। यह गुणगान कम और अवगुणगान ज्यादा होता है। यह पोस्ट उसी सीन से प्रेरित हो लिखी गई है। 
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   -अरे बेटा बस इतना समझ लो कि घर में जवान बेटी सीने पर पत्थर के सिल की तरह है। बसंती का ब्याह हो जाय तो चैन की सांस लूँ।


   - हां सच कहा मौसी, बडा बोझ है आप पर


   - लेकिन बेटा, इस बोझ को तो कोई कुँएं में यूं ही फेक तो नहीं देता न। बुरा नहीं मानना, इतना तो पूछना ही पडता है कि लडके का खानदान क्या है उसके लच्छन कैसे हैं कमाता कितना है।

-         कमाने का तो ये है मौसी कि एक बार बीवी बच्चों की जिम्मेदारी समझने लगेगा तो ढंग से कमाने भी लगेगा।

-         तो क्या अभी कुछ भी नहीं कमाता

-         नहीं नहीं ये मैंने कब कहा मौसी, कमाता है लेकिन अब रोज रोज तो आदमी गुगल एड सेंस से तो नहीं कमा सकता ना..... तो कभी कभी गँवा भी देता है ।

-         गँवा देता है से मतलब, क्या कोई जुआरी है


-         नहीं नहीं मौसी, ये मैंने कब....... कहा लेकिन मौसी ब्लॉगिंग चीज ही है ऐसी कि अब मैं आपको क्या बताउं।


-         तो क्या ब्लॉगिंग का लती है.... नशेडी है।


-         छी छी छी मौसी, वो और नशेडी......ना ना ...अरे वो तो बहुत अच्छा और नेक इंसान है। लेकिन मौसी एक बार जब कम्पूटर पर बैठ जाय तो फिर अच्छे बुरे का कहां होश रहता है, जो मन में आता है लिखता है, टिपियाता है, जिसको मन आए गरियाता है। अब कोई किसी का हाथ तो पकड नहीं सकता ना।

-         ठीक कहते हो बेटा, ब्लॉगिंग का नशेडी वो, लती वो, उलूल जूलूल टिपियाये गरियाये वो.....लेकिन उसमें उसका कोई दोष नहीं है।

-         मौसी, आप तो मेरे दोस्त को गलत समझ रही हैं। वो तो इतना सीधा और भोला है कि आप तो बस बसंती की शादी उससे करके देखिये...ये ब्लॉगिंग और नेट वगैरह की आदत तो दो दिन में छूट जाएगी।

-         अरे बेटा, मुझ बुढिया को समझा रहे हो। ये ब्ल़ॉगिंग और इंटरनेट वगैरह की आदत आज तक किसी की छूटी है जो अब छूट जाएगी।

-         मौसी, आप मेरे दोस्त को नहीं जानती। विश्वास किजिये, वो इस तरह का इंसान नहीं है। एक बार शादी हो गई तो वो नेट और ब्लॉगिंग के जरिये अपनी बौद्धिक अय्याशीयां बंद कर देगा।

-         हाय हाय, बस यही एक कमी बाकी रह गई थी। क्या बहुत अय्याश किस्म का है।

-         तो इसमें कौन सी बुरी बात है मौसी, इस तरह की अय्याशियां तो बडे बडे उंचे लोग तक करते हैं. बडे बडे सेमिनार वगैरह में इसी तरह की अय्याशियां ही तो चलती हैं। और इस तरह की बौद्धिक अय्याशी करने वाले लोग अक्सर पढे लिखे और उंचे खानदान से ही होते हैं।

-         अच्छा तो बेटा ये भी बताते जाओ कि ये तुम्हारे गुनवान दोस्त किस खानदान से हैं।

-          बस मौसी खानदान का पता चलते ही आप को सबसे पहले बताउंगा। फिलहाल तो इसे अनानिमस ही समझिये।

-         एक बात की दाद दूँगी बेटा कि भले ही सौ बुराईयां हैं तुम्हारे  दोस्त में लेकिन तुम्हारे मुंह  से उसके लिये तारीफ ही निकलती है।

-         अब क्या बताउं मौसी, ब्लॉगरों का दिल ही कुछ ऐसा होता है। तो मैं ये रिश्ता पक्का समझूँ।

-         पक्का, अरे मर जाउंगी लेकिन मैं अपनी बिटिया का ब्याह एक ब्लॉगर से कत्तई नहीं करने वाली जो कि अपने बीवी बच्चों को छोड दीन दुनिया से जुडने की ललक में बौद्धिक अय्याशियां करता फिरे। मुझे ये रिश्ता मंजूर नहीं।


-         क्या बताउं मौसी, नहीं जानता था कि ब्लॉगिंग से लोग कुँवारे रह जाते है वरना अब तक तो देश की आबादी की समस्या हल हो गई होती औऱ सरकार खुद ही ब्लॉगर अनुसंधान संस्थानों की स्थापना करती फिरती। खैर, चलता हूँ। आपकी बात सुनकर मेरा ब्लॉगर दोस्त कहीं टंकी  न ढूँढ रहा हो :)  

- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां अंबानी भाईयों की इमारतों पर हेलीपैड बनवाने का विरोध आसपास के लोग कर रहे हैं और अब नौसेना उसे सुरक्षा के लिहाज से रिजेक्ट करने की ठान रही है। 


समय - वही, जब दो हेलीकॉप्टर आपस में बातें कर रहे हों कि यार हमारी हालत तो भिखारियों से भी गई गुजरी हो गई है, कम्बख्त कोई हमें अपने घर के पास पल भर रूकने भी नहीं देता :)  

Thursday, November 26, 2009

मुंबई के रेडलाईट एरिया फॉकलैंड रोड से गुजरते हुए

हाल ही में मुंबई के ऐसे इलाके से होकर गुजरा हूँ जो वैश्याओं के इलाके के रूप में जाना   जाता है.....फॉकलैंड रोड ......जहां के अनुभव और जन-जीवन को कई बार लोगों ने फिल्मों में छन छन कर देखा है। दरअसल मुझे मुंबई के सी.पी.टैंक इलाके में स्थित हिंदी ग्रंथ कार्यालय जाना था। यहां मैं पहले भी हो आया हूँ, अपनी बेजोड किताबों के भंडार से पटी यह दुकान अपने आप में अंग्रेजीवाद के बीच हिंदी का अजूबा ही कही जाएगी।
   जिस बस से मैं वहाँ गया था, और वह जिन रास्तों से होकर गुजरी उसकी तो एक अलग  कहानी है। हर रास्ते का नाम अपने आप में अजीम रहा, आंबेडकर मार्ग, मौलाना आजाद मार्ग, मिर्जा गालिब मार्ग,कस्तुरबा गाँधी चौक....। खैर, बात हो रही थी रेडलाईट इलाके की। यह इलाका जिस रोड पर है उस रोड का नाम भी अजब गजब था। अक्सर होता यह है कि दुकानदार अपने दुकान पर साईन बोर्ड के साथ नीचे छोटे आकार में दुकान के नंबर के साथ, पूरा पता भी लिखते हैं। तो, यहां कोई उसे अपनी दुकान पर फाल्कन रोड लिखता, कोई फोकलैंड रोड लिखता, तो कोई सीधे ही फॉक** लिख अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता। ये वह है जो कि अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है।
  
    मेरी  बस जैसे ही रेडलाईट एरिया से होकर गुजरने को हुई, बस में बैठे सभी लोगों की नजरें बाहर की ओर टंग गईं। सडक के दोनो ओर वैश्याएं विभिन्न ढंग से ग्राहकों को अपनी ओर लुभाने की कोशिश कर रही थीं। कोई पान खाए दांत चिआरे ग्राहक को बुला रही थी तो कोई अपनी शेवन आर्मपिट को दिखाने के लिये  अपनी बाहों को बार बार उठा अपने खुले बालों को बाँधने का उपक्रम कर रही थी। किसी किसी जगह पर दो से चार वैश्याएं झुंड बनाकर बैठी थीं। उनके बैठने के तरीके अलग अलग थे। कोई साडी के पल्लों को  एक विशेष रूप से रख  ग्राहक बटोरती तो कोई स्लीवलेस पहने कँखौरियों को दिखाने को तत्पर दिखी तो कोई  यूँ ही हँसी ठिठोली करती हुई। कुछ ग्राहक वैश्याओं से मोलभाव भी करते दिखे।  
    
          ट्रैफिक स्लो होने के कारण बस में बैठे लोग इन नजारों को जम कर देख ताक रहे थे।F M पर सदाबहार गाने बज रहे थे।   वहीं, बाहर सडक पर कई लोग जो दलाल टाईप लग रहे थे, रूमाल को गर्दन में कॉलर के किनारे लपेटे.....मुंह में पान दबाये, हाथ की तर्जनी उंगली से चूने की परत खरोंचे हुए ग्राहकों को फांसने की फिराक में लगे। इन्हें देख गुलजार का लिखा कमीने फिल्म का गीत सटीक लगा.....सौदा करे सहेली का, सर पर तेल चमेली का ..........कि आया....कि आया भौंरा आया रे....गुनगुन करता आया रे..........

             इन्हीं सब नजारों के बीच से बस गुजरती हुई अपने गंतव्य कस्तूरबा गाँधी चौक पहुँची। पास ही की लेन में हिंदी गृंथ कार्यालय वाली दुकान थी। दुकान में घुसने पर पिछले नजारों से अलग दुनिया दिखी। कहीं पर अज्ञेय दिखे तो कहीं प्रेमचंद, एक ओर 'गुनाहों का देवता' सजी थी, तो एक ओर 'सारा आकाश'। वहीं, फणीश्वरनाथ रेणु के 'मैला आंचल' के बगल में 'चरित्रहीन' भी लगी थी। कहीं पर मैत्रेयी पुष्पा की 'इदन्नमम' दिखी तो कहीं पर चित्रा मुदगल की 'आँवा'। बगल में ही 'वेद-पुराणों की मिमांसा' भी दिख गई। इन ढेर सारी क्लासिक रचनाओं और सरस्वती के भंडार को वैश्यालयों से कुछ ही फर्लॉंग की दूरी पर स्थित होने से  मैं सोच में पड गया कि क्या ही अजीब स्थिति है। एक ओर सरस्वती जी का भवन हैं तो पास ही में नरक भोगती महिलाओं का इलाका, जो न जाने किस पाप की गठरी को ढो रही हैं। एक ओर ज्ञानदायिनी भवनिका और दूसरी ओर चंद चहल-कदम ही दूर स्त्रीयों के नारकीय ठीये।  अजब मेल है।
 
    तभी मेरे जहन में फिल्म 'अमर प्रेम' का वह दृश्य कौंध गया जिसमें दुर्गा मूर्तियों की स्थापना के लिये वैश्याओं के घर की देहरी से मिट्टी लेने की प्रथा को दिखाया गया है। फिल्म में मूर्तिकार   से कोई प्रश्न करता है कि दुर्गा जी तो पवित्र हैं, फिर उनकी स्थापना के लिये इन बदनाम जगह वालियों के देहरी की मिट्टी क्यों ली जाती है ? तब मुर्तिकार कहता है कि इन लोगों के यहां की मिट्टी बहुत पवित्र होती है। प्रथानुसार, बिना इस जगह की मिट्टी लगाये दुर्गा जी की मूर्ति स्थापना नहीं की जाती।
      कैसा संजोग है, कि सरस्वती जी और दुर्गा जी का। एक शक्ती दायिनी हैं तो दूसरी ज्ञानदायिनी। जैसे दुर्गा जी को बदनाम गलियों की मिट्टी से स्पर्श पूजन की परंपरा है, वैसे ही शायद साहित्यिक कृतियों के रूप में सरस्वतीजी भी  बदनाम गली की देहरी को  छूती दिख रही हैं। न जाने कितनी उच्च स्तर की साहित्यिक कृतियां इन बदनाम गलीयों की बदौलत ही लिखी जा चुकी हैं। वैश्याओं की देहरी फिर अपनी मिट्टी का मान रखने में कामयाब रही लगती है।

        फणीश्वरनाथ रेणु की 'जूलूस' लेकर लौटते समय फिर वही दृश्य दिखे। ट्रैफिक और भी स्लो हो गया था। गहराती शाम देख वैश्याओं की संख्या और भी बढ आई थी। दलाल और ग्राहक सभी जैसे इसी वक्त को पाने में बेताब थे, मानों शाम कोई उत्सव लिये आ रही हो।  तभी मेरी नजर वैश्याओं के बीच बैठी एक बेहद सुंदर स्त्री पर पडी। शक्ल से वह कहीं से भी वैश्या नहीं लग रही थी. चेहरे पर मासूमियत, साडी के किनारों को उंगलियों में लपेटती खोलती और एक उहापोह को जी रही वह स्त्री अभी इस बाजार में नई लग रही थी। कुछ ग्राहक उसकी ओर ज्यादा ही आकर्षित से लग रहे थे। मेरे मन  में विचार उठा कि आखिर किस परिस्थिती के कारण उसे इस नरक में आने  की नौबत आन पडी होगी। इतनी खूबसूरत स्त्री को क्या कोई वर नहीं मिला होगा। मेरी लेखकीय जिज्ञासा जाग उठी। मन ने कहा........ यदि यहां की हर स्त्री से उसकी कहानी पता की जाय तो हर एक की कहानी अपने आप में एक मानवीय त्रासदियों की बानगी होगी। न जाने किन किन परिस्थितियों में यह स्त्रीयां यहां आ पहुँची हैं। कोई बंगाल से है, कोई तमिलनाडु से है तो कोई नेपाल से है। हर एक की कहानी अलग अलग है, पर परिणाम एक ही। हर एक पर कहानी लिखी जा सकती है।  

       तभी मुझे अमरकांत रचित 'इन्हीं हथियारों से' उपन्यास की लाईनें याद आ गईं जिसमें कोठा मालकिन अपने यहां की लौंडी को ग्राहकों से सावधान रहने के लिये ताकीद देती  है, कि इन  ग्राहकों को कभी अपने दिल की बात नहीं बतानी चाहिये। और न तो कभी दिल  देना चाहिये। यहां जो आते हैं सभी अपने मतलब से आते हैं। इन ग्राहकों में शराबी, जुआरी, लोभी, दलाल, कवि, लेखक सभी तो होते हैं। इनके चक्कर में नहीं फंसना चाहिये।

      अब समझ में आया कि कवियों और लेखकों को क्यों अमरकांत जी ने जुआरियों, शराबीयों और लोभियों की कोटि में रखा था। वैश्यालयों से कवियों और लेखकों को अपनी लेखकीय नायिका के चरित्र ढूँढने में सहायता जो मिलती थी।
  
        इन्हीं सब बातों को सोचते हुए बस जाने कब वैश्याओ के इस बदनाम इलाके को छोड मौलाना आजाद रोड पर गई थी। मैं सोच में था। कैसी विडंबना है कि एक ओर भारत के पहले शिक्षामंत्री मौलाना आजाद के नाम सडक है वहीं दूसरी ओर साहित्य सरिता........... इन दोनों के बीच में शिक्षा व्यवस्था को मुँह चिढाता लेदर करेंसी का ठीया।

  उधर एफ एम चैनल पर गानों के बदले अब मुख्य  समाचार पढे जा रहे थे। बराक ओबामा से प्रधानमंत्री की मुलाकात .........सुरक्षा व्यवस्था पर गहन चिंतन.. ......  राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने आज सुखोई विमान उडाया..........

-         सतीश पंचम

Tuesday, November 17, 2009

फोडा जी, जरा कोने में आईये.....आप को एक बात पब्लिक में प्राईवेट होकर बतानी है :)

       हजारों-करोडों के माल असबाब की बरामदगी के बाद फोडा जी, जब आप  ने   यह कहा कि आपके खिलाफ साजिश की जा रही है।  कोई आपको परेशान कर रहा है। तो आपके इस अप्रतिम सच को देख मैं द्रवित हो गया और मैंने भी अब ठान लिया है कि मैं भी आपकी तरह  मन की बात सच सच सब लोगों को बता दूँ। और  पहला सच यही है कि वो शख्स मैं ही हूँ जो आपको लगातार परेशान कर रहा है। आपकी जो पंपापुर वाली प्रॉपर्टी छापे में पकडी गई है , उसे मैंने ही बताया था कि वह आपकी ब्लैक की कमाई है। और वो जो रजाईपुर की मसहरी वाली के नाम अकाउंट पकडा गया है , वो मैंने ही आयकर वालों को बताया था। फोडा जी आप सच कह रहे हैं कि कोई आपको परेशान कर रहा है। मैं अपने इस अपराध के लिये क्षमा चाहता हूँ।

          नहीं नहीं, मुझे रोकिये मत.....आज मुझे कह लेने दिजिये। आपके अप्रतिम सच से मैं सचमुच बहुत द्रवित हूँ। हाँ, तो मैं कह रहा था कि वह जो चिल्लेमिंयां की खदान  है न, उस पर रजिस्ट्री मैंने ही आपके नाम की करवा दी थी। करोडों की बात थी, तो मैंने सोचा था कि आपके नाम कर दूंगा तो आप जल्दी पकड में आ जाओगे, क्योंकि मंत्री बनने के पहले तक आपकी औकात एक लुंगी और बनियान पहन चप्पल फटकारते आदमी की ही थी। अचानक करोडों की खदान आपके नाम हो जाय तो समझा जा सकता है कि आपने कुछ हेराफेरी की होगी। इसलिये मैंने खदान की रजिस्ट्री आपके नाम कर दी थी। इसके लिये मैं मेरी अर्थी उठने तक क्षमाप्रार्थी हूँ। अर्थी उठने से याद आया कि आप तो सुबह देर से उठते थे क्योंकि आप खदानों के ठेके आदि के लिये ओवर टाईम भी करते थे। बताओ भला, ऐसे कर्मठ और वस्तुनिष्ठ प्रतिभा को मैं यूँ ही फंसाने की जुगत में था।


         फोडा जी, आई एम वैरी वैरी सॉरी.......आपको मैंने फंसाने की कोशिश की। अब मैं चाहता हूँ कि ये जो सब आय कर जायकर वाले हैं उनको भी आप यह सच बता दिजिये कि वह शख्स मैं ही हूँ जो आपको फंसा रहा था। आपके खिलाफ साजिश कर रहा था। आप मुझ पर जरा भी रहम न करें और सारी बातें खुल कर बताएं कि कैसे मैंने अपनी सपत्ति आपके नाम कर दी केवल इसलिये कि आप फंस जाएं। फोडा जी, आप संकोच न करें, उन्हें खुलकर बताएं की वह सारी संपत्ति मेरी है जो आपके नाम पर पकडी गई है। मैं जो चाहे सजा भुगतने के लिये तैयार हूँ। और हां, आप उन सारी संपत्तियों को निसंकोच मेरे नाम कर दिजिये। कहा गया है कि पाप की चीज को ज्यादा देर अपने पास नहीं रखना चाहिये। मैं पहले आपका विरोधी था, लेकिन आपकी सच्चाई को देख कर मैं यह पाप का बोझ आप पर लदने नहीं दूँगा। एक पैर पर खडा रहूँगा लेकिन आपको पाप के लांछन से मुक्त करके रहूँगा। इसके  लिये मुझे सरकार चाहे जो सजा दे, मैं तैयार हूँ। लुंगी, चड्ढी और गमझा सब मैंने पहले से ही झोले में रख लिया है। कंघी भी रख ही लेता हूँ। सुना है कि जेल में शेविंग क्रीम वगैरह नहीं होती, केवल पानी लगाकर ही शेव करना पडता है तो पामोलीव वाला शेविंग क्रीम भी ले ही लेता हूँ। तौलिया लूँ कि न लूँ इसी उलझन में हूँ क्योंकि लुंगी होने से तौलिये का भी काम हो जाता है, तो नाहक बोझ क्यों लेकर चलूँ। वैसे भी ये पाप का बोझ तो मेरे साथ है ही, अब और कितना बोझ लादकर चलूँ।
 
     रास्ते में चकचोन्हर वकील बाबू के यहां होकर चलियेगा। क्या है कि मेरे सभी माल असबाब की रख रखाव वही करते हैं, तो जो कुछ मैंने आपके नाम रजिस्ट्री किया है, उसे चकचोन्हर बाबू के हाथों ही मेरे नाम कर दिजिये। लगे हाथ यह काम भी हो जाय तो अच्छा है।

       चलिये, मेरे जेल जाने का वक्त हो रहा है, वैसे भी जल्दीयै लौटना भी तो होगा। किसी को बेबात फंसाने की सजा इतनी लंबी तो होती नहीं कि पूरी उमर जेल में ही बितानी पडे। और बित्ते भर की सजा पर गज भर का लाभ मिल रहा हो तो ऐसी सजा कौन न झेलना चाहेगा। तो, ऐसा किजिये कि आप जरा मेरा यह झोला पकडिये, मैं जरा छोटई की महतारी को ढाँढस बंधा आउं। उ भी बहुत दुखी थी कि मेरी वजह से फोडा जी सांसत में हैं। यह जानकर तो वह और दखी थी कि आपके नाम जो तमाम चार पांच हजार करोड की जो संपत्ति है वह असल में मेरी है। मुझे तो छोटई की माई ने बहुत दुत्कारा। कह रही थी कि जरा भी इंसानियत बची है मुझमें तो जाकर तुरंत आपसे माफी के  साथ साथ माल असबाब मांग लूँ ताकि आप और सांसत में न पडें।
 
      वो जो 640 करोड मिला है न उ महानगरीया में, तो उसमें से ही आप अपने लिये एक ठो चुडीदार पाजामा कुर्ता सिलवा लिजियेगा, लल्लन टेलर के यहां जाईयेगा तो वह अच्छा सिलकर देता है। बस उससे हमारा नाम भर बता दिजियेगा। आप का कपडा अच्छा सिलकर देगा। कपडा चुराएगा नहीं।
 
     तो चलूँ, जेल वाली दीवार मेरा इंतजार कर रही है। क्या कहूँ, आपसे बिछडते हुए बहुत दुख हो रहा है। सोचता हूँ कि आप भी साथ होते तो ये दुखियारे दिन जल्दी ही कट जाते। फिलहाल तो बकरे कटवाईये ताकि ईश्वर की अनुकंपा बनी रहे।  फोडा जी, ...........कहा थोडा....... समझना ज्यादा.......और क्या कहूँ, आप तो खुद समझदार हैं। ईश्वर से आपके लिये सुख की कामना करता हूँ। चलिये फिर मुलाकात होगी। कहा गया है कि सज्जन व्यक्ति ही सज्जनता का सम्मान करता है। आप जैसा सज्जन व्यक्ति तो इस संसार में ढूँढे न मिलेगा।

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   अरे, ये लाईट को क्या हो गया। सज्जन ढूँढने की बात कर रहा हूँ और यहां अक्षर तक ढूँढने पड रहे हैं। उफ्फ, इस देश का कुछ नहीं हो सकता । ढंग से व्यंग्य भी लिखना हो तो एकाध किलो तेल जनरेटर को अर्पण करना पडता है।

        अच्छा फोडा जी, गुड नाईट एंड शब्बा खैर। फिर मिलेंगे। 'नीड का निर्माण फिर' वाली कविता हम लोग दुबारा पढेंगे और हां, निर्माण से याद आया कि वो जो लतमारगंज में  अवैध निर्माण चल रहा है, उसे भी मैंने ही आपके नाम से कर रखा है, कोई पूछे तो मेरा नाम बता दिजिएगा :)




- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर अदृश्य  कन्वेयर बेल्ट के जरिये 640 करोड रूपयों की खोखा  ढुलाई झारखंड से महाराष्ट्र तक  हुई है।

समय - वही, जब कन्वेयर बेल्ट में लगने वाली एक घिरनी बगल वाली घिरनी से कहती है कि ऐसा भी क्या कमाना कि ढोने के लिये कन्वेयर बेल्ट लगे। सुनकर दूसरी घिरनी कहे, जानती नहीं क्या बहन......... पैसे में बहुत वजन होता है :)

( य़ह व्यंग्य आज की राजनीति पर है जो केवल चेहरे दर चेहरे  बदलती है, कर्म नही   - सतीश पंचम  )

Sunday, November 1, 2009

क्या हिंदी पट्टी के पत्रकारों के वजह से देश में हिंदी प्रदेशों की गलत छवि बन रही है ?

      मेरा मानना है कि हिंदी पट्टी के मीडिया कर्मी ज्यादा संख्या में होने से एक प्रकार की मुसीबत सी हो रही है। एक इमेज सी बनती जा रही है यू पी बिहार के बारे में कि ये लोग ऐसे होते हैं..वैसे होते हैं। रहने का ढंग नहीं जानते है आदि...आदि...।

       अब इसे मैं एक प्रकार का दुर्भाग्य ही मानूंगा कि हिंदी पट्टी के ज्यादातर लोग नेशनल न्यूज चैनलों में हैं। अक्सर न्यूज जब भी बिहार के बारे में चलाई जाती है तो एक दरिद्रता का वरक लपेट कर पेश की जाती है। लेकिन बार बार इन्ही प्रदेशों से खबरे दिखाये जाने पर एक प्रकार की नेगेटिव इमेज बनना लाजिमी है।

     सवाल यह उठता है कि क्यों कैमरा हिमाचल को फोकस नहीं कर पाता....क्यों कैमरा तमिलनाडु या उडीसा को फोकस नहीं कर पाता। क्या देश के बाकी इलाके अपने खान पान और साडी-मीनाकारी-पच्चीकारी वगैरह दिखाने के लिये ही बने हैं। क्या बाकी जगह कैमरा यही बताने के लिये है कि कन्याकुमारी का यह पेय फेमस है, केरल की यह कला उत्तम है……क्या वहां खबरें नहीं होती….वहां मर्डर या अपराध नहीं होते ? क्या वहां कोई अप्रिय घटना नहीं घटती ?

        कभी रूट लेवल पर काम करते हुए कैमरे का फोकस एडजस्ट किया जाय तो देश में दिखाने के लिये बहुत कुछ है। लेकिन हिंदी पट्टी के होने के कारण पत्रकार भी अपने क्षेत्र से हट नहीं पाते और बार बार घोल-घाल कर वही सब दिखाते रहते हैं। यह इमेज ही है जिसके कारण हिंदीभाषी अक्सर अपमानित होने को अभिशप्त होते जा रहे हैं। उधर राजू श्रीवास्तव जैसों के गंवई चुटकुले भी हिंदी पट्टी को एक लंठ मान पेश किये जाते हैं। जब कोई इन प्रदेशों से कहीं नौकरी आदि के लिये जाता है तो उसे अन्य समस्याओं के अलावा एक नेगेटिव छवि को लेकर भी चलना पडता है।

नेगेटिव इमेज बनने का एक उदाहरण और ।

         जब सुबह टीवी ऑन करो तो सबसे पहले गुडगांव या नोयडा की खबर होती है कि वहां फलां ट्रक लुढक गया या फलां एक्सिडेंट हो गया या कि फलां जगह वारदात हुई है। अब चूँकि नोयडा या गुडगांव का रास्ता मिडिया वालों के रास्ते में पडता है तो सुबह सुबह न्यूज चलनी शुरू हो जाती है औऱ वह भी ब्रेकिंग न्यूज का ठप्पा लगाये।  तो इमेज ये बन रही है कि नोयडा-गुडगांव काफी असुरक्षित है...जबकि लोग यह नहीं सोच पाते कि आखिर सुबह सुबह न्यूज पहले वहीं की क्यों फ्लैश होती है।

     मैं पत्रकारिता से नहीं जुडा हूँ, न ही मैं कभी गुडगांव या नोयडा गया हूँ। लेकिन जिस तरह से चींटियों की कतार देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां चींटियों का घर होगा और उसके कतार की दिशा में ही कोई मीठा या खाने योग्य सामग्री है तो उसी आधार पर कह रहा हूँ कि मीडिया तंत्र का जमावडा एक गुच्छे के रूप में जरूर नोयडा या गुडगांव के आसपास है। आधुनिक शब्दावली में इसे ही हब कहा जाता है। चींटियो की कतार अपने आवागमन से सुबह छह बजे खुद ही लाईव हो जाती है :)

      यूं तो हर गली या मुहल्ले में मीडिया वाले मिल जाएंगे लेकिन नेशनल लेवल पर कोई तुरंता प्रसारक या OB Van उनके लिये शायद उस हद तक उपलब्ध न हो। अगर हो भी तो इतना दबाव तो नहीं ही होगा कि कोई नई खबर जल्दी फ्लैश करो...... जबकि हब होने से गुडगांव या नोयडा इस मामले में प्रसारण कर देते हैं। इन मुद्दों पर थोडा सा ध्यान भर देने की जरूरत है। बाकी चीजें तो खुद ब खुद समझ आ जाएंगी।

     और अंत में शरद जोशी के लापतागंज की तर्ज पर मीडिया के बारे में अपने शब्दों में कहूं तो

-   यहां सब बिज्जी हैं..... थोडा सा ध्यान दिया जाय तो बिज्जीपन नजर आ जाता है कि कितने बिज्जी है :)


( यह लेख मैने रवीश जी की एक पोस्ट में जो टिप्पणी दी थी उस पर आधारित है । इस मुद्दे पर चर्चा, प्रतिक्रिया आदि को जानने के लिये रवीश जी के ब्लॉग में जाया जा सकता है । मैं यहां व्यक्तिगत होकर पोस्ट नहीं लिख रहा हूँ बल्कि इस पोस्ट को समस्त नेशनल ( ? )  हिंदी पट्टी के पत्रकारों के लिये  ही समझा जाय । रवीश जी के बोलने बताने के तौर तरीकों को मैं भी काफी पसंद करता हूँ, लेकिन कहीं न कहीं यह मुद्दा रह रह कर मन में  करक रहा था, सो पोस्ट के रूप में लिख रहा हूँ  )

 - सतीश पंचम

Saturday, October 24, 2009

बुद्धि और विवेक का गूढ अंतर......है या नहीं है..... है....बहुत है।

      मुंबई में मेरे कॉलेज के दिनों में मेरी मनोविज्ञान की कक्षा में एक दिन लेक्चरर ने प्रश्न पूछा था कि बताओ बुद्धि और विवेक में क्या अंतर है ?  What is the difference between Intelligence and Wisdom ? सुनकर लगा कि ये क्या बात हुई। दोनों तो एक ही चीज है। पर कुछ लडकों ने शायद इस बारे में पहले से पढ रखा था या जानते थे कि बुद्धि और विवेक में क्या अंतर है। एक दो ने खडे होकर बताना शुरू किया तो लगा कि हां, वाकई गजब का डिफरेंस है दोनों में। बाद में लेक्चरर महोदय ने एक कहानी बता कर इस बात को स्पष्ट किया था।

       कहानी के अनुसार एक व्यापारी था। अपने चार बच्चों को लेकर वह कहीं जा रहा था। रास्ते में एक नदी पडी। नदी को पार करने के लिये कोई साधन न देख व्यापारी ने उस पार जाने के लिये अपनी बुद्धि लगाई और नदी की गहराई नापना शुरू कर दिया ताकि बच्चों समेत वह नदी पार कर सके। नापने के लिये उसने एक लकडी ली और नदी की धार में घुस गया। एक जगह लकडी से गहराई नापा तो वह सबसे छोटे लडके के बराबर गहरा था। आगे एक जगह लकडी नदी मे डालकर गहराई नापा तो वह स्थान बडे लडके के उंचाई के बराबर गहरा था। कुछ और नापा तो गहराई एक दो फीट से ज्यादा नहीं थी। यानि सबसे छोटे लडके के कमर और घुटने तक। व्यापारी ने और दो चार जगह लकडी डुबा डुबाकर पानी की गहराई नापी। नदी से बाहर आकर व्यापारी ने उस लकडी से नापी गई गहराईयों का average निकाला। इसके बाद व्यापारी ने अपना और अपने बच्चों की उंचाई नाप कर उसका Average निकाल दिया। बच्चों और उसकी खुद की उंचाई का औसत नदी की गहराई से ज्यादा था। सो व्यापारी ने मान लिया कि बच्चे यदि नदी में उतरते भी हैं तो नहीं डूबेंगे क्योंकि नदी की गहराई बच्चों की औसत लंबाई से कम है।


व्यापारी ने अपने बच्चों को नदी में उतार दिया और उस पार चलने का आदेश दिया। लेकिन व्यापारी के देखते ही देखते उसके बच्चे नदी मे डूब गये। व्यापारी ने बाहर आकर सोचा कि ये कैसे हो गया ? उसने औसत तो ठीक ही निकाला था। बुद्धि तो लगाई थी। तभी अचानक व्यापारी को भान हुआ कि उसने गणना करने में बुद्धि तो लगाई लेकिन उस गणना को मानने या न मानने का विवेक नहीं लगाया। यदि विवेक लगाया होता तो उसके बच्चे न डूबते।


                       बकौल विवेकी राय, यही हाल हमारे अर्थशास्त्रज्ञों और निति नियंताओं का भी है। वो गणना करके यह मानते ही नहीं कि महंगाई बढी है। उनके गणनानुसार मुद्रा स्फिति निगेटिव है। सभी आंकडे महंगाई के काबू में होने की बात कह रहे होते हैं । गौर से देखा जाय तो इन नीति निर्माताओ का भी हाल उसी व्यापारी की तरह है जो गणना करके औसत आदि निकाल कर अपने को बुद्धि वाला मानता था। यहां हमारे मंत्री -अफसर भी उसी की तरह विवेक नहीं लगा रहे हैं। उन्हें कौन समझाये कि सरकारी बाबूओं द्वारा उपलब्ध आंकडे तो उस लकडी की तरह हैं जिससे व्यापारी ने बुद्धि लगाकर नदी की गहराई नापी थी। लकडी ने कहीं दाल नापी, कही पर शक्कर, एक जगह भूसा नापा, एक जगह आलू तो कहीं बिना कुछ नापे ही आंकडे भर दिये। यहां ध्यान देने की बात है कि सरकारी रौबदाब में लकदक आंकडेबाजी की लकडी वैसी की वैसी ही रही। न घटी न बढी, लेकिन जीवनरूपी  नदी तल की गहराई जरूर कम ज्यादा होती रही।


      ऐसे में तमाम तरह की आंकडेबाजी के चक्कर में देश की अधिकतर जनता तमाम परेशानीयों से जूझते हुए  आंकडों के  बहाव में  डूब ही जाये तो आश्चर्य कैसा ? 



(  विशेष :  अर्थशास्त्रियों की आंकडेबाजी से संबंधित संदर्भ विवेकी राय ( गाजीपुर) द्वारा उनकी किसी किताब  में एक जगह दिया गया है जो कि मेरे पैतृक निवास जौनपुर में छूट गई है।  इस से संबंधित अर्थशास्त्र का संदर्भ देने का श्रेय विवेकी राय जी को ही है। मैं तो बस उसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।   )


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे एक परेशान शहर की संज्ञा दी जाने लगी है।

समय - वही, जब नक्शे पर एक निशान लगा कर चीनी अफसर कहता है...  अब नक्शे छापने वाली मशीनों को फिर से ऑर्डर देना पडेगा.....कागज कंपनी में फोन लगाओ तो........।

Tuesday, October 13, 2009

लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर


छप्पन भोग लगते हैं तुम्हें
गुडहल गेंदे के फूल फबते हैं तुम्हें
लोगों के हूजूम पूजते हैं तुम्हें
 
ऐसे स्थल को छोड क्यों कर निकलोगे बाहर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 
तभी तो,
हर घर में दुग्ध पीते दिख जाते हो
कभी शाक-सब्जी में भी नजर आते हो
बारिश की बूँदों से छपछपा उठी
सूखी दीवाल पर भी दिख जाते हो
 
गदगद हो काई लगी दीवाल को पुजवाकर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 
कब तक यूँ ही भरमाओगे
इत्र फुलेल की छिडक से
कब तक नथुनों को नरमाओगे
भूखे लोगों से हर दिन
कब तक अर्ध्य अर्पण कराओगे
अरे कभी तो तुम लजाओगे
 
क्या लजाना इतना भी है दुश्कर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 
लोगों कहते हैं कि तुम कण कण में हो
नदी, पर्वत, नभ, जल में हो
बस, आज मुझे इतना बता दो
वो गुडहल का फूल सूखा क्यों
कण पराग का रूठा क्यों
जो पडा था तुम्हारे ही गले में
 
जवाब अभी नहीं  तो  दो कुछ ठहरकर
सांझ-गोधुलि या फिर पहर कर
 
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां ओट ( वोट )  पड रहे हैं जिसकी ओट लेकर बडे बडे काम करने का मंसूबा बांधा जायेगा।

समय - वही, जब मंसूबा बांधते समय एक ओर से रस्सी खुल जाय और मंसूबा सोच रहा हो कि अब मैं खुद को कैसे बांधूं : )


**** पंकज मिश्र जी द्वारा टिप्पणी में इस मंदिर के बारे में पूछे जाने पर थोडी बहुत जानकारी ये रही***** यह मंदिर जौनपुर मे है। ध्यान से देखेंगे तो इसके गर्भगृह के बाहर कुछ लोग बैठे या सोये हुए हैं। ये लोग अकारण नहीं सोये हैं। 
दरअसल जौनपुर में शिक्षामित्रों के ट्रेनिंग के दौरान जब महिलाएं ट्रेनिंग कक्ष में ट्रेनिंग ले रही होती हैं, उस वक्त उनके पति पास ही के मंदिर में शरण लेते हैं, बच्चा संभाले हुए या खुद को संभाले हुए। ट्रेनिंग छूटने पर शाम होते ही अपनी अपनी फटफटीया पर लेकर निकल पडते हैं घर को। इस जगह की Exact location तो नहीं पता पर कहीं ब्लॉक वगैरह के आसपास ही है । 


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Monday, October 5, 2009

जब एक साल पहले 'विमान के ऑटोपायलट मोड' वाली मेरी लिखी पोस्ट के कुछ अंश विमान में वाकई घट गये ।


    अभी हाल ही में पता चला कि एक विमान में छेडछाड को लेकर हंगामा हुआ और विमान को दोनों पायलट ऑटोपायलट मोड में रख दिये ।  इसी ऑटोपायलट वाले मुद्दे को लेकर मैंने जो पोस्ट लिखी थी उसमें एक जगह कॉकपिट में हुई हल्की छेडछाड का भी जिक्र था। मुझे क्या पता था कि एक साल बाद वही सब घटित हो सकता है। लिजिये पेश है वह पोस्ट.....

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       नितिन के कदम खुदबखुद Pilot Rest-Room की ओर बढे जा रहे थे, कमबख्त इस बंगलोर वाली Flight ने परेशान कर रखा है , एक नजर घड़ी की तरफ़ डाली - ओह.... Its 4.00 am.....damm, I hate this timing. जब सभी लोग सो रहे होते हैं रात एक बजे , कमबख्त तभी इस Flight को attend करो , साले ये भी तो नही कह सकते की एक spare Pilot रखें, cost saving .......Bullshit.... मन ही मन नितिन कुढ़ता हुआ Pilot Rest Room मे दाखिल हुआ। सोफे पर धम्म से गिरते हुए जैसे उसे लगा अब यहीं सो जाऊं तो अच्छा रहे, तभी Rest Room attendent कृपाल सिंघ ने दरवाजा खटखटाया , May I sir, ............ya Come come, न चाहते हुए भी नितिन को बोलना ही पड़ा , इस वक्त वो किसी से बोलना नहीं चाहता था लेकिन एक कृपाल ही तो था जो रोज उसी की तरह नाईट ड्यूटी करता , और गाहे बगाहे जब उसे नाईट ड्यूटी से खीज होने लगती तो कृपाल को देख कर जैसे उसे अहसास होता की वो अकेला नहीं है, हालांकि Co-Pilot सुधीर साथ होता है लेकिन उसके साथ कितनी देर बात की जाय, बंगलोर से मुंबई तक तो लगभग रोज ही वो दोनों साथ साथ होते हैं और बातें भी तो वही पायलटों वाली , Poor Visibility, Hang-on, Hang-Off, one point Landing , Two Point Landing, कमबख्त इसके सिवा ज्यादा हँसी मजाक भी तो नहीं कर पाते , अभी उस दिन Air-Hostess मीना चटर्जी को सिर्फ़ Hi Kitty ही तो कहा था .  Flying Manager मिश्रा ने छूटते ही कह दिया , see , I don't want any escalations, Please behave properly in Cockpit, Your voice details are with us........no more to say.  साला जैसे उसे cockpit की इन्ही बातों को सुनने के लिए रखा है।

सुधीर साब नहीं आए - कृपाल ने पानी का ग्लास और नमकीन रखते हुए पूछा।

नहीं, उसके कोई गेस्ट मिल गए हैं , उनसे मिल कर बाद मे आएगा- अनमने होकर नितिन ने जवाब दिया ।

चाय ले आऊं ?

नहीं , आज मूड नहीं है । तुम जाओ , अभी थोड़ा सोना चाहता हूँ ।

जी अच्छा, - कहकर कृपाल वापस चला गया।

      पानी पीकर नितिन की नजर टेबल पर पड़ी aviation Magazines पर पड़ी, - कहीं Airspace है, तो कहीं Flying ढकी है, उसके बगल मे ही Wings दिख रही है , उसने ज्यादा इधर उधर न देखते हुए सोफे पर ही सो जाने का उपक्रम किया , पैर फैलाकर उसने आँखें बंद कर लीं , लेकिन कमबख्त नींद को क्या हो गया , वो भी नहीं आ रही अब, सामने पड़े Rest Bed पर नजर पड़ी , नितिन ने उठकर उसी पर सो जाना चाहा, पानी और नमकीन वैसे ही पड़े रहे, जैसे उन्हें पता हो की उन्हें कोई छूने वाला नहीं है- इतना वो भी जानते हैं।

     Bed पर पड़ने के बाद नितिन ने आँखें बंद कर सोना चाहा , लेकिन बहूत देर तक आँखें बंद करने के बाद भी नींद नहीं आई, कभी - कभी ऐसा भी होता है की जिस चीज की जब जरूरत होती है, वो अचानक मिल जाए तो उस चीज की वैल्यु ख़त्म सी हो जाती है। वह चीज जब तक सामने नहीं होती , लगता है , यही सबसे जरूरी चीज है।

अब........

     अब क्या करूँ, ये अचानक नींद को क्या हो गया, अभी तक तो साली जैसे बदन तोड़ रही थी- नितिन जैसे मन ही मन बुदबुदाया। Bed के बगल मे पड़े न्यूज़ पेपर पर हाथ बढाया ..... सोये सोये ही खबरें अनमने सी देखने लगा , Nuclear deal issue गर्म था , एक जगह आरुशी हेमराज की खबरें बतायी गयी थीं, मुह का स्वाद जैसे कड़वा हो गया, एक मर्डर क्या हुआ पूरा मिडिया पीछे पड़ गया, तभी एक जगह नजर पड़ी- विमान मे पायलट सो गए , पूरी ख़बर मे दिलचस्पी बढ़ गयी, एक तो वैसे भी उसके पेशे से जुड़ी ख़बर थी, ऊपर से ये जिस तरह से हेडिंग लिखी गयी थी , उससे उसकी दिलचस्पी और बढ़ गयी, पूरी ख़बर को एक साँस मे पढ़ डाला, विमान Autopilot पर रख कर पायलटों के सो जाने की ख़बर थी की किस तरह विमान मे कई सौ यात्री थे और पायलट थे की सोये हुए थे, एक बार फ़िर नितिन को लगा मुह का स्वाद बिगड़ गया है, उठ कर बैठ गया, कुछ देर यूँ ही bed पर बैठने के बाद , उसने सोचा चाय पी जाय, बगल मे लगे काल बेल को बजाया, थोडी देर मे कृपाल वापस दरवाजे पर-

yes Sir?

कृपाल एक चाय लाना।

जी- कहकर कृपाल चला गया।

    नितिन फ़िर सोच मे डूब गया, - क्या होता अगर Autopilot Mode मे ही कोई accident वगैरह हो जाता। ऐसा नहीं है की नितिन ने प्लेन Autopilot मे न रखा हो, लेकिन कितनी देर, सिर्फ़ कुछ मिनट तक जब लगता की यहाँ ज्यादा कुछ Handle करने को नहीं है, और फ़िर CoPilot भी तो होता है, लेकिन यहाँ तो दोनों ही सो गए थे । सोचते हुए नितिन को News की headlines याद आई - गुर्जर आन्दोलन से rail सेवा बंद, सिखों ने बाबा राम रहीम के वजह से बंद किया, Jammu  बंद , अमरनाथ श्राइन बोर्ड से जमीन वापस ली गयी, मुंबई मे बाहरी- भीतरी के नाम पर हंगामा मचा है , लोगों को परेशान किया जा रहा है की तुम नॉर्थ वाले हो या कहाँ के ...............

     तभी नितिन ने सोचा - ये देश भी तो Autopilot पर है - कोई देखने वाला नहीं, कोई बोलने वाला नहीं - ऐसे मे कोई Accident हो जाए तो .......लेकिन accident तो उस विमान मे भी नहीं हुआ था , तो क्या देश सचमुच Autopilot पर है ?

* * * * *********

  उस समय  कमेंन्टस देते समय  ज्ञानदत्त जी ने एक बात कही थी कि -  सचमुच देश आटो पाइलट पर है। पिछले महीने गुर्जर आन्दोलन में गाडियां बन्द रहीं, पर आज पिछले महीने के बारे में विवरण लिखते समय कई प्लस पॉइण्ट हैं जो लिखे जा सकते हैं।






       
        अब जब एक साल से ज्यादा का वक्त गुजर गया है इस पोस्ट को लिखे, तो अब तो ढेरों प्वॉंइंट्स हैं.....एक तो यही जीता जागता मामला आ भिडा है......छेडछाड + ऑटोपायलट मोड वाला ।


      हांलाकि यह पोस्ट मैंने Short Story के रूप में लिखा था, लेकिन नहीं जानता था कि कभी इस तरह की छेडछाड वाली घटना कॉकपिट में वाकई घट सकती है।  फिलहाल ऐसी परिस्थ्ति में प्लेन को ऑटोपायलट मोड पर रख यदि दोनो ही पायलट कॉकपिट से बाहर आ गये ,  ऐसे में यदि कॉकपिट के दरवाजे  का ऑटोलॉक फिचर काम कर गया होता तो प्लेन को बचाना मुश्किल था, क्योंकि तब दोनों में से एक भी पायलट विमान की लैंडिंग कराने के लिये डैशबोर्ड तक नहीं पहुंच पाता। 

- Satish Pancham

स्थान - वही, जहां पर पिछले चौबीस घंटे से ज्यादा रिमझिम- रिमझिम बारीश हो रही है।

समय - वही, जब दोनो पायलटों को लगे कि अब विमान को ऑटोपायलट मोड पर रख थोडा यात्रियों की तरफ चला जाय तफरीह करने....... इस विश्वास के साथ कि कॉकपिट का ऑटोलॉक फीचर तो कब का लॉक है  :)

Monday, September 28, 2009

शैलेन्द्र जी के बारे में एक पुस्तक प्रकाशित हो रही है। कुछ जानकारी यदि देना चाहें तो दे सकते हैं।

     एक सूचना देना चाहूँगा। सूचना स्व. गीतकार शैलेन्द्र जी से संबंधित है।

         सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र जी के कुछ प्रशंसकों द्वारा उन पर एक पुस्तक प्रकाशन की योजना है। कुछ दुर्लभ सामग्री के साथ पुस्तक में उनसे संबंधित अन्य रचनाओं का भी समावेश हो सके, इसके लिये शैलेन्द्र जी के प्रेमियों से जीवन प्रभात प्रकाशन ने आग्रह किया है कि उनके जीवन के संस्मरण, गीत , कविता आदि नीचे दिये  पते पर भेजने का कष्ट करें। उपयोग के बाद सभी सामग्री वापस की जाएगी।

  शैलेन्द्र जी से संबंधित एक प्रसंग मेरे इसी ब्लॉग पर पब्लिश हुई थी। यदि आप लोगों के पास भी ऐसी ही कुछ बातें हों तो जरूर इस पते पर संपर्क करें।


पता - जीवन प्रभात प्रकाशन,  A 4/1, कृपानगर, मुंबई - 56  फोन नंबर - 9821042840



 प्रसंग जिसे मैंने यहां ब्लॉग पर पब्लिश किया था - ( 11/8/09)


यूँ तो मुंबई के पवई में कार्यालय होने के कारण रोज ही पवई झील के पास से गुजरता हूँ, पर कल अचानक एक विशेष वजह से मुझे ये पवई झील कुछ अलग लगने लगी। वजह भी कुछ खास ही है। दरअसल कल ही मैंने फणीश्वरनाथ रेणु जी के बारे में ‘रेणु रचनावली’ में एक बात पढी है और उसके जरिये पता चला कि ये वही पवई लेक है जिसके किनारे बैठकर फणीश्वरनाथ रेणु और गीतकार शैलेन्द्र जी बहुत रोये थे।

दरअसल फणीश्वरनाथ रेणु जी ने शैलेन्द्र को इसी पवई लेक के किनारे एक बहुत ही करूण गीत सुनाया था । गीत के बोल ग्रामीण अंचलों का भाव लिये थे जिसमें ससुराल में आई लडकी अपने भाई को याद कर रही है। दरअसल जब पहले अक्सर छोटी उम्र में ही विवाह हो जया करता था तब, बिहार के ज्यादातर हिस्सों में नवविवाहित बिटिया को बरसात में होने वाली कीचड मिट्टी से लथपथ होकर ससुराल में काम करने से बचाने के लिये अक्सर बेटिंयों को सावन मास में नैहर बुलवा लिया जाता था ताकि अभी सुकवार, नाजुक बिटियां बरसात में होने वाली कीचकाच से बची रहें। इस ग्रामीण गीत ‘सावन-भादों’ को फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी बहन से सुना था। इस गीत के बोल थे

कासी फूटल कसामल रे दैबा, बाबा मोरा सुधियो न लेल,
बाबा भेल निरमोहिया रे दैबा, भैया के भेजियो न देल..........
...................

कहते है जब भाव प्रबल हों तो भाषा मायने नहीं रखती। यही हुआ।

बकौल फणीश्वरनाथ रेणु जी – तीसरी कसम फिल्म के दौरान शैलेन्दर जी मुझसे ‘महुआ घटवारिन’ की ओरिजनल गीत-कथा सुनना चाहते थे ताकि उसके आधार पर गीत लिख सकें। एक दिन हम ‘पबई-लेक’ के किनारे एक पेड के नीचे जा बैठे। ‘महुआ घटवारिन’ का गीत मुझे पूरा याद नहीं था। इसलिये मैंने छोटी सी भूमिका के साथ बहन से सुना हुआ ‘सावन-भादों’ गीत अपनी भोंडी और मोटी आवाज में गाना शुरू किया। गीत शुरू होते ही शैलंन्द्र की बडी बडी आँखें छलछला आईं। गीत समाप्त होते होते वह फूट फूटकर रोने लगे। गीत गाते समय ही मेरे मन के बाँध में दरारें पड चुकी थीं। शैलेंन्द्र के आँसुओं ने उसे एकदम से तोड दिया। हम दोनों गले लगकर रोने लगे। ननुआँ ( शैलेन्द्र का ड्राईवर) टिफिन कैरियर में घर से हमारा भोजन लेकर लौट चुका था। हम दोनों को इस अवस्था में देखकर कुछ देर ठिठक कर वह एक पेड के पास खडा रहा। इस घटना के कई दिन बाद शैलेन्द्र के ‘रिमझिम’ पहुंचा। वे तपाक से बोले – चलिए, उस कमरे में चलें। आपको एक चीज सुनाउं।

हम उनके शीतताप-नियंत्रित कमरे में गए। उन्होंने मशीन पर टेप लगाया। बोले – आज ही टेक हुआ है। मैंने पूछा – तीसरी कसम ? बोले – नहीं भाई। तीसरी कसम होता तो आपको नहीं ले जाता ? यह बंदिनी का है.....पहले सुनिए तो .

रेकार्ड शुरू हुआ –

अबके बरस भेज भईया को बाबूल
सावन में लिजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरी बचपन की सखियां
दिजो संदेसा भिजाय रे.....
.................
.......
बीते रे जुग कोई चिठिया न पाती
ना कोई नैहर से आए रे...
अबके बरस भेज भईया को बाबूल

कमरे में ‘पबई-लेक’ के किनारे से भी मर्मांतक दृश्य उपस्थित हो गया। हम दोनों हिचकियां लेकर रो रहे थे............................।


आज फिर उसी पवई लेक के किनारे से गुजरा हूँ। कुछ अपनापन सा लगने लगा है। 

( इस घटना की जानकारी –साभार, ‘रेणु रचनावली’, राजकमल प्रकाशन से)

- सतीश पंचम




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