सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, November 30, 2008

देश के हालात पर एक दुकान में हुई चर्चा ( वाकया)


( इस चर्चा में भले ही अश्लील शब्दों का कहीं-कहीं जिक्र आया है, लेकिन इस चर्चा की पकड को समझने के लिये शायद यह जरूरी भी है कि ऐसे शब्दों को जस का तस कुछ ढके छिपे तौर पर सामने रखूँ। उम्मीद है, आप लोग इस चर्चा को सहज ढंग से देखेंगे। )

ओ पैणचो मंत्री लोकी की करदे ने, हुण पता लगिया ।

ओ पता तां पैलां ही सी, पर अद्दे जाके दिसदा पिया वे।

ये वो संवाद थे जो मुंबई के किंग्स सर्कल से सटे पंजाबी कॉलोनी में एक दुकान पर चल रहे थे। तीन लोगों के ये हिंदी-पंजाबी मिश्रित संवाद इतने रोचक थे कि मैने इनकी कुछ बातें अपने अदने नोकिया 2626 पर रिकॉर्ड कर लिया लेकिन अगल बगल उठ रहे ट्रकों और काली-पीली टैक्सियों के उठते शोर के बीच सब कुछ दब गया। अपने एक मित्र के साथ एक दुकान पर कुछ काम से गया था, वहीं पर ये रोचक संवाद सुनने मिले। ये रोचक संवाद जरा आप Text में देखें ।

पहला - ओ साले मंत्री अपणी मां ** रहे सी, पैण चो कर (घर) विच् टांगा विच टांगा डाल के पये होणगे मां दे लौ* ।

दूसरा - उन्ना नु लोकां नाल की मतलब, माचो खुद ते ऐश-उश करांगे पांवै ( भले) इधर पबलिक दे लो* लग जाण।

तीसरा - ओ पैंचो मिडिया वाले वी अपणी मां *** पै ने । एक नू हत्थ नाल खून रिसदा पिया वे ते माचो मु विच्च माइक पा के दस्सदे पये ने - ये देखो कितना खून निकल रहा है - ओ मांचो कून (खून) नहीं निकलेगा ते के चाशनी निकलेगी....... मां दे दीने।

पहला- ओ लौंडा( पकडा गया एक आतंकी) टुटण लगिया वे, ओन्नु चंगी तरह कुटणा चहीदा, पैणचो हुणे टंग नाल बाल नहीं निकलिया, माचो अटैक करन चलिया सी, मां दे दीने नु पुन्न के रखणा चहिदा ए ऐसे लोकां नुं।

दूसरा - ओ बीबीसी वाले आतंकवादीयां नुं टेररिस्ट नहीं बोलदे.....उन्ना नुं गनमैन बोलदे ने ......इन्ना दे तराह ( भारतीय मीडिया की तरह) ढाम-ढूम मूजिक-व्यूजिक ला के चिल्ला के नई बोलदे - आतंकवादी यहाँ अपनी मां चु* रहा है।

( तीनों ने जोरदार ठहाका लगाया)

पहला - ओ तैनु पता ऐ I B वालियां ने उन्नी तरीक नु ( उन्नीस तारीख को) एन्ना नु बोलिया सी कि तुहाडे ताजमहल होटल विच खतरा हैगा। पर ऐ मंत्रीयां नु मां *** नाल फुरसत मिले तां ना।

तीसरा - इस देश दा हुण की होउगा, पता नी यार।

दूसरा - ओ विलासराव, लैके गिया सी रामगोपाल वरमा नुं ......ऐ के तमाशा विखाण वास्ते लै गिया सी के.......नाल अपणे मुंडे नुं वी लै के गिया सी के नां है उसदा.....?

पहला - रीतेश देशमुख....।

दूसरा - हां....रितेश.....के लौड ( जरूरत) पै गई सी ओन्नु लै के जाण दी। हुण के अपणें मुंडे वास्ते लोकेशन वेखण गिया सी कि देख लै बेटा - तैनु इधरे शुटिंग करनी है।

तीसरा - देश दा तमाशा बना के रख दित्ता है होर कुछ नहीं।

अभी ये बातें चल रही थीं कि उन लोगों का ही कोई परिचित एक मोना पंजाबी अपने साथ एक बैग लेकर वहीं से गुजर रहा था। उसे आवाज देकर बुलाते हुए एक ने कहा -

ओए.....बैग वैग लै के कित्थे कोई अटैक उटैक करने जा रिहा है के।

सत श्री अकाल जी।

सत श्री अकाल ( तीनों ने सम्मिलित जवाब दिया)

पास आ जाने पर उस युवक से उन लोगों की बातचीत चल पडी।

कित्थे जा रिहा है।

ओ कल मनजीते दी बर्थडे पार्टी है, उस लई कुछ सामान-सुमून खरीदीया है।

पहला - ओ इधर अटैक-शूटैक हो रिया वे .....ते तुस्सी पार्टी शार्टी कर रहे हो।

( एक हल्की हंसी इन चारों में फैल गई)

उदरों ही आ रिहा वां ( उधर से ही आ रहा हूँ) , लोकी सडकां ते आ गये ने बैनर-शुनर लै के ( लोग सडक पर आ गये हैं, बैनर वैनर लेके )।

सडक ते आणा ही है यार, बंबे दी पब्लिक चूतिया थोडे है.....सैण दी वी लीमट हुंदी ए ( सहने की भी लिमीट होती है)।

यह बातचीत और लंबी चली होगी। लेकिन इधर मैं अपने मित्र के काम निपट जाने पर दुकान से निकल आया....... जब कि इच्छा थी की अभी और इन लोगों की बातचीत सुनूं।



- सतीश पंचम

( ये वो गुस्सा है जो गालीयों की शक्ल में आम लोगों के बीच से फूट रहा है, हमारे नेताओं के लिये, हमारे कर्णधारों के लिये, अब भी वक्त है कि वो समय से चेत जाएं,वरना जनता जानती है कि अपना गुस्सा किस तरह निकालना है)


Thursday, November 27, 2008

आतंकवाद की जडों में मट्ठा डालने में देर हो गई है।


मुंबई के आतंकी घटना के मूल में हमारा भ्रष्ट राजनैतिक इतिहास रहा है। आडवाणी को आज कहते सुना कि ये 1993 का ही Continuation है, लेकिन आडवाणी शायद भूल गये कि 1993 की जड में वही राममंदिर था जिसके दम पर उन्होंने सरकारी सुख भोगा था। और आगे बढें तो उस राममंदिर के मूल में हिंदू-मुस्लिम फसाद था जो आजादी के वक्त बहुत कुछ हमारे राजनितिज्ञों की दूरदृष्टि में कमी की वजह से पनपा था। फसाद के जड में यदि शुरूवात में ही मट्ठा डाल दिया जाता तो ये आतंकवाद का विषवृक्ष पनपने न पाता।
रही बात अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद की, तो वह भी इसी तरह के जैसे मसलों की उपज है। बस उसके जडों में मट्ठा डालने में देर हो गई है। अब ये आतंकवाद का वृक्ष कब तक फले-फूलेगा, समझ नहीं आ रहा।

- सतीश पंचम


( मुंम्बई में रहते हुए गेटवे ऑफ इंडिया कई बार जा चुका हूँ , लेकिन अब वहाँ कर्फ्यू सा माहौल है, बगल में ही ताज घायल है....कभी टैगोर ने आगरा के ताजमहल के बारे में कहा था वक्त के गाल पर ठिठके आँसू......आज यह आँसू लोग मुंबई के ताज में देख रहे हैं)



Wednesday, November 26, 2008

राम-नाम जपने का एक नया साधन


मुंबई की लोकल ट्रेन में अक्सर कुछ लोगों को माला जपते हुए देखता हूँ। हाथ में एक कपडे की थैली बाँधे, उसी के भीतर माला फेरते लोग अपने में ही मस्त होते हैं, कोई परिचित दिख भी जाता है तो अपने जप को जारी रखते हुए हाथ जय हो की मुद्रा में उठ भर जाते हैं और फिर वही जप शुरू । ऐसा कई बार लोकल ट्रेन में देखा है। लेकिन कल एक शख्स के हाथ में माला की बजाय Hand Tally Counter देखा। वह शख्स लगातार एक विशेष क्रम में उस काउंटर को दबाते जा रहा था और अपने इष्टदेव का नाम जप रहा था।

देखकर थोडा अचरज हुआ कि अब तक तो सिर्फ लोगों को तुलसी की माला या रूद्राक्ष आदि की ही माला लेकर जाप करते देखा था, लेकिन ये तो पूरी तरह का आधुनिकता से लबरेज नये किस्म का नाम जपने वाला साधन है। लोग बस अपने काउंटर को अंगुली से दबाते रहें और सारा आँकडा सामने दर्ज होता रहे। कुछ अलग सा लगा।
मैने इसके पहले किसी के हाथ में Hand Tally counter को परेल के Big Bazaar में गेट पर खडे सुरक्षाकर्मियों के पास देखा था। जैसे ही कोई व्यक्ति Entrance गेट से अंदर जाता, उस गेट वाला कर्मचारी खट से वह हैंड काउंटर दबा देता। इसी तरह Exit गेट पर भी जब कोई बाहर निकलता तो वहाँ भी काउंटर ऐसे ही दबा कर संख्या निर्धारित की जाती कि कितने लोग अंदर गये और कितने बाहर गये।

उस शख्स द्वारा बटन दबाकर नाम जपने की क्रिया देख मुझे कबीर वाणी भी अचानक ही याद आ गई -

मनका फेरत जुग गया, गया न मन का फेर ।
कर का मनका छाडि दे , मन का मनका फेर।।

खैर ये तो दुनियादारी की बातें हैं, आजकल तो लोग इंटरनेट के जरिये Online दर्शन कर प्रसाद तक पा लेते हैं, ट्रेन में ही कहीं-कहीं तो लोगों को नाम जपने के लिये एक विशेष प्रकार की डायरी भी लिखते देखा हैं जिसमें कि कई आयताकार खानों में अपने इष्टदेव का नाम लिखा जाता हैं।

मैंने पोस्ट लिखने से पहले थोडी छानबीन की तो पता चला कि यह काउंटर कीडें-मकौडों को गिनने, जानवर , पेड गिनने, सर्वे आदि के लिये बनाये गये थे। कुछ जगह गोदामों में सामान की काउंटिग वगैरह के लिये भी इसका इस्तेमाल बताया गया है। लेकिन उनके बनाये इस काउंटर का उपयोग राम-नाम जपने में होगा यह शायद इस काउंटर को बनाने वालों ने भी न सोचा हो ।
- सतीश पंचम

Thursday, November 20, 2008

आप जब भी नाई से बाल कटवाएंगे, शायद इस पोस्ट को याद करेंगे (हास्य-वाकया )


क्या कभी नाई से बाल कटवाते समय आपको हँसी आई है। अगर कभी हँसी आती भी है तो लोग अपने ओंठों को बरबस दबाकर हँसी रोकने का प्रयास करते हैं ताकि हिलने- डुलने से उस्तरे से कान न कट जाए। कुछ ऐसा ही वाकया गाँव में एक बार हुआ था जब घुमन्तू नाई ने मेरे बाल काटना शुरू किया। यहाँ आपको बता दूँ कि, घुमन्तू नाई वह नाई होता है जो घूम-घूमकर बढे बाल वाले लोगों को ढूंढता है, और कहीं छाँह वगैरह देखकर वहाँ बैठाकर उनके बाल काटता है।

तो हुआ यूँ कि नाई अपने उस्तरे से मेरी 'कलम'/'खत' ठीक कर रहा था कि तभी बगल से एक भैंस भागती हुई निकली, उसके पीछे उसकी पूँछ पकडे एक आदमी भाग रहा था, साथ ही साथ गाली भी देते जा रहा था - छिनारी, जाएगी वहीं गेनू के भैंसे के पास, इस गाँव के भैंसों से रांण का जी नहीं भरता।

एक तो वह आदमी भैंस की पूँछ पकडे भाग रहा था, दूजे उसकी गाली कुछ विशेषणों से जुडी थी.....जिसकी बैकग्राउंड हिस्टरी यह थी कि गेनू के भैंसे ने जब कभी इस भैंस को गाभिन ( गर्भ धारण) करवाया, हमेशा पाडा ( Male child) ही हुआ, और दुधारू पशुओं में विशेषत: भैंस आदि में Male Child होना अर्थात पाडा पैदा होना आर्थिक दृष्टि से ठीक नहीं माना जाता। लोग दूध वगैरह के लिये ही ऐसे पशु पालते हैं, उस दूध को बेचकर कुछ अर्थलाभ करते हैं, ऐसे में यदि पाडा हो तो नुकसान होता है, इसलिये वह आदमी अपनी भैंस को गेनू के भैंस के पास जाने से रोक रहा था और भैंस थी कि फिल्मी हिरोईन की तरह विद्रोह पर उतारू थी। आगे-आगे भैंस भागे , पीछे-पीछे उसकी पूँछ पकडे वह आदमी। खैर, जैसे तैसे अपनी हँसी को जब्त किया और अपने बाल कटवा कर बाद में जो थोडी बहुत हँसी बची थी, उसी को फेंटता रहा। सोच रहा था कि, मनुष्य तो मनुष्य यहाँ तो जानवरों पर भी रोक टोक है कि वह किससे संबंध बनाये, और किससे नहीं। आस पास के लोग अभी तक हँस कर दोहरे हो रहे थे ।

अभी हाल ही में फणीश्वरनाथ रेणु जी के आत्मसंस्मरण पढ रहा था, तो मुझे उनकी लिखी बातों से वह बाल कटवाते समय आई हँसी याद आ गई।

फणीश्वरनाथ जी लिखते हैं -

मुझे याद है, खूब धूमधाम के साथ मेरा मुंडन संस्कार हुआ था। लेकिन , उस हँसी-खुशी के दिन मैं दिन-भर रोता रहा था - बलिदान के छपागल की तरह !...मुंडन के कई महीने बाद पहली बार अपने गाँव के नाई ने मेरी ऐसी हजामत बनाई कि उसके बाद नाई और कैंची और खूर यानी अस्तुरा के नाम सुनते ही मैं घर छोडकर - गाँव से बाहर किसी पेड की डाली पर जा बैठता। ...मेरे गाँव का बूढा...... भैलाल हजाम........उसके मुँह और नाक से निकलने वाली दुर्गन्ध को किसी तरह बर्दाश्त किया जा सकता था - सिर झुकाकर । मगर, उसकी कैंची एक बाल को काटती और हजारों को जड से उखाडती थी। और वह हाईड्रोसील माने उसका फोता .....इस कदर बढा हुआ था कि गाँव में कई भैलालों में वह अँडिया भैलाल के नाम से प्रसिध्द था । ............ सिर पर भैलाल की कैंची का अत्याचार सहन करना आसान था मगर सिर झुकाकर हँसी को जब्त करना बहुत मुश्किल । और भैलाल के इस वर्धित-अंग पर हँसने की मनाही थी । हमें डराया गया था कि हँसनेवाले का भी वैसा ही हो जाएगा । अत पहली हजामत के बाद से ही भैलाल की परछाई देखकर ही भाग खडा होता । तीन चार महीने बाद कभी पकडा जाता । दो-तीन आदमी हाथ-पैर पकड कर मुझे बेकाबू कर देते । कभी-कभी जमीन पर पटक भी देते । भैलाल की कैंची के साथ मेरे मुंह से असंख्य अश्लील गालियाँ , आँख से घडों आँसू, नाक से महीनों की जमी हुई सर्दी .....।

यूँ तो यह पोस्ट बाल कटवाते समय हँसी को केंट्रोल करने पर है लेकिन कई और क्रियाकलाप भी हैं जब आपको हँसी रोकनी पडेगी, जैसे दाँत निकलवाते समय Dentist के पास,कचहरी में गवाही देते समय जज के पास, और सबसे बढकर किसी के मरने पर शोक सभा में....वरना आप जानते हैं, अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती.....फिर चाहे वह हँसी किसी स्वर्गवासी पर हो या भैलाल हजाम के फोते पर।


- सतीश पंचम

( संस्मरण अंश - रेणु जी के लेख 'अथ बालकाण्डम्' से साभार- रेणु की हास्य व्यंग्य कहानियाँ , वाणी प्रकाशन, सम्पादक भारत यायावर)


Sunday, November 16, 2008

ब्लॉग, साहित्य या लेख लिखने के लिये पूरा कच्चा माल इस Website में है


उत्तर प्रदेश के जिलेवार लोकवाणी वेबसाईट्स एक तरह से साहित्य के लिये कच्चे माल की तरह है, जिसे यदि कोई चाहे तो पढकर ढंग का एक उम्दा उपन्यास लिख सकता है। कई बातें, कई शिकायतें ठेठ देहाती भाषा में ही लिखी गई हैं, मसलन - मेरी खेत की मेड पर पत्थर नसब करवाते समय लेखपाल ने जमीन लालता प्रसाद की ओर दाब दी है.......

मुझे बिला वजह (बिना वजह) दबंगई का शिकार होना पड रहा है....

मेरी मडैया में बकरी लाकर बाँध देते हैं......

मेरी साईकिल को जानबूझकर पंक्चर किया गया......

कोटेदार सीनाजोरी करता है, कोटे पर आया मिट्टी का तेल नहीं मिलने पाता....पहिले ही बिलेक कर देता है......

प्रार्थी कन्या विद्या धन हेतु पात्र है किंतु साजिशन गाँव के परधान और दबंग लोगों ने मिलकर लेखपाल द्वारा हमारे पिताजी की आय ज्यादा दिखा दी और हम अपात्र घोषित की गयीं है.....

ऐक जगह तो अजीब शिकायत देखने मिली -

दरखास है कि प्रार्थी ने उर्वरक व बीज ऋण लिया था, उक्त ऋण की वसूली हेतु अमीन श्री XXXX पुत्र श्री XXXXX, ग्राम XXXX, मौजा XXXXX, तहसील XXXXX मेरी अनुपस्थिती में मेरे घर आये, उस वक्त प्रार्थी घर पर नहीं था, प्रार्थी का लडका था, उसी से अमीन पूछताछ किये और चले गये......शाम को दुबारा आये और वही मेरा लडका मिला तब वे मेरे दरवाजे पर रखी गई कुल्हाडी स्वंय उठा ले गये और चार बोरा गेहूँ, चावल लगभग 50 किलो, सरसों लगभग 50 किलो, मटर लगभग 20 किलो, जो लगभग.......एक साईकिल, 2000 ईंट तामडा, बांस की दो टोकरी, तथा एक बैग ........मेरे सगे भाई श्री ........के यहाँ रखवा दिये । जब मैं दूसरे दिन घर आया तो सारी बातों की जानकारी हुई, तब अमीन के घर गया पूछा तो कहा पहले सब बकाया रू0 जमा कर दिजिए.....तब मुझसे बात करिये, मैं तब घर आ गया और अगले दिन ......प्रदेश चला गया.....मेरा लडका सब बकाया धीरे-धीरे जमा कर दिया लेकिन मेरा सामान आज तक वापस नहीं मिला......अतः श्रीमानजी से प्रार्थना है कि प्रार्थी का सामान वापस दिलाया जाय.........।

दूसरे एक रोचक शिकायत में तो और भी चीजें हैं मसलन,

प्रार्थी को दौरान सर्वे वोटर लिस्ट मृत घोषित किया गया जिससे प्रार्थी मत देने के अधिकार से वंचित रह गया है, जबकि प्रार्थी बहयात ( + जीवित) है और दौरान चुनाव अंतर्गत धारा 107 /116 CRPC जमानत भी दिनांक XXMarch2007 को कराया है । प्रार्थी के गाँव के चन्द मुखालफीन द्वारा इस प्रकरण का कृत्य किया गया है जो अवैधानिक है । इस प्रकरण की जाँच होकर दोषी कर्मचारी को सजा दिया जाना आवषुक( आवश्यक) है । प्रार्थी किसान है और सदैव घर पर ही रहता है। इसकी जाँच नितान्त आवषुक है, क्योंकि मृतक घोषित होने पर प्रार्थी मताधिकार से वंचित किया गया है।

उपर लिखे Application letter की भाषा को आप देखेंगे तो इसमें आपको बहुत कुछ समझ में आएगा, इसमें संस्कृत के शब्दों के अलावा उर्दू का भी इस्तेमाल किया गया है, कुछ ठेठ खडी बोली जैसे आवषुक को देखकर लगता है कि कहीं गाँव देहात की कचहरी में कोई फर्रा पढ रहा है......और जिस संदर्भ में यह लेटर लिखा गया है वह भी काफी मजेदार है कि प्रार्थी अपना मताधिकार उपयोग करने के लिये जिवित रहना चाहता है, इस लिये वह अपनी CRPC के अंतर्गत किये गये किसी अपराध वगैरह में जमानत भी पा चुका है ...........यानि Full Proof, मय सबूत कि मैंने आपराधिक मामले में जमानत पाई है, इसलिये मैं जिंदा हूँ :)

Example -

http://jaunpur.nic.in/lokvani/

http://allahabad.nic.in/lokvani/



दूसरे जिले का नाम देखने के लिये जिलेवार लिंक में बदलाव कर Defaulters list पर क्लिक करें उसके बाद संबंधित अधिकारी या शिकायत संख्या पर क्लिक करें। कई जिलों में शिकायतों की संख्या जब ज्यादा होती है तो पेज खुलने में थोडा सा ज्यादा समय लगता है, लेकिन एक बार आप पढना शुरू करेंगे तो गाँव-देहात में चल रहे जमीनी हकीकत को देख पाएंगे, कि वहाँ के झगडे किस प्रकार के हैं, वहाँ के लोग किस तरह आपस में व्यवहारिक हैं, उनके मनमुटाव का मुद्दा क्या है, एक तरह से पूरा रिसर्च मैटेरियल ही समझें।

मेरे विचार से यदि किसी समाज या प्रदेश को देखना-परखना या समझना हो तो पहले उन लोगों के आपसी झगडों को, उनके बीच होने वाली अनबन को ध्यान से देखा पढा जाय, जीवन के सभी रस उसमें मिल जाते हैं, चाहे वह करूण रस हो, हास्य रस हो, या फिर रौद्र, हर एक रस इन्हीं झगडों में मिल जाता है। प्रश्न यही है कि हम ऐसी बातों को, ऐसे मनमुटाव को किस नजर से देखते हैं।




- सतीश पंचम


Saturday, November 15, 2008

कतरन झूठ न बोले

हाल ही में New York Times में एक लेख छपा था जिसमें भारतीयों के बढते वर्चस्व को लेकर एक महत्वपूर्ण बात कही गई, कि भारतीय बच्चे अमरीकीयों के लिये एक नये किस्म की चुनौती बनते जा रहे हैं। मेरे पास इस लेख की कतरन एक E-Mail के जरिये आई है, आप भी जरूर उस कतरन को देखें।

- सतीश पंचम




"When we were young kids growing up in America, we were
Told to eat our vegetables at dinner and not leave them.
Mothers said, think of the starving children in India
And finish the dinner.'


And now I tell my children:
'Finish your homework. Think of the children in India
Who would make you starve, if you don't.'?"

ग्लोबल मंदी को हास्य के जरिये बताती चंद लाईनें - चाचा कैसे हो :)


एक E-mail के जरिये प्राप्त यह चंद पंक्तियाँ, ग्लोबल मंदी की सारी हकीकत हास्य के जरिये बता रही हैं।


चाचा कैसे हो ?

अब क्या बताउं,

बडा बेटा Share Broker है,

दूसरा बेटा Jet Airways में है

तीसरा बेटा Investment Banking में और

चौथा Software क्षेत्र में है......
'
'
'
सबसे छोटा पानवाला है..........बस वही घर चला रहा है।

Thursday, November 13, 2008

लोक-लाज के कारण छुट्टी का कारण बताते शर्म जो आ गई ( वाकया)


क्या कभी ऐसा भी हुआ हैं कि लोक-लाज के कारण छुट्टी का कारण आप नहीं बताना चाहते। ऐसा ही एक वाकया जानकर मैं थोडा अचंभित हुआ हूँ। दरअसल बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने में कई महिलाओं की आपस में मित्रता स्कूल के प्रांगण में यूं ही बन जाती है, उनमें बतकूचन भी खूब होता है, कभी बच्चों को लेने स्कूल जल्दी पहुँच गईं तो बतकूचन का दौर लंबा भी हो जाता है, हास-परिहास का दौर तो चलते ही रहता है।

अभी हाल ही में श्रीमतीजी ने एक इसी तरह की महिला की बात बताई जोकि स्कूल में अपने छोटे बच्चे को लेने आती हैं, उस महिला की उम्र लगभग चालीस-पैंतालीस के आसपास होगी। बातचीत के दौर में पता चला कि उन महिला की एक बडी बेटी है जिसकी अभी जल्दी ही अगले महीने शादी होने वाली है, इस कारण अपने बच्चे को, जो कि पहली कक्षा में पढता है, शादी के दौरान अपने साथ गाँव ले जाना है । लेकिन मुसीबत ये है कि छुट्टी मांगे तो कैसे, टीचर सोचेगी कि इनकी बेटी की शादी होने जा रही है और लडका पहली कक्षा में पढ रहा है, इतनी उम्र में ये सब ?

पहले तो मैं भी माजरा नहीं समझ पाया कि आखिर इसमें लाज की क्या बात है, कइयों के बच्चे शादी के काफी दिनों बाद होते हैं तो इसमें असमंजस कैसा.....लेकिन फिर पता चला कि अभी उनकी कुल पाँच बेटियां है, लडके के इंतजार में एक के बाद एक लडकियां होती गई और जब बडी उम्र में छठे पर लडका हुआ तो जाकर खुशी का ठिकाना न रहा, लेकिन यह खुशी यह असमंजस भी ले आएगी, ऐसा उन्होंने न सोचा था।

बातचीत के दौर में अन्य महिलाओं ने हंसते हुए उस महिला को सलाह भी दी कि ,बता दो सही कारण, इसमें इतना शर्माने की क्या बात है, लेकिन उन लोगों की मित्रवत हंसी भी उस लाज को ढंक न सकी और अंत में एक दूसरे उपाय के तहत बात बनाते हुए कारण दिया गया कि घर में किसी और की शादी पड गई है इसलिये जाना पड रहा है।

खैर, अभी तक यह पता चला है कि बच्चे को स्कूल से ले जाने की छुट्टी मिल गई है औऱ वह महिला अब तक स्कूल में अन्य महिलाओं के बीच बतकूचन का मुद्दा बनी हुई है, खुद भी हास-परिहास में शामिल यह कहते हुए कि - इतनी उम्र में....यह सब :)



- सतीश पंचम

Tuesday, November 11, 2008

सदरू भगत और उनके पोते


रमदेई ने नमक के डिब्बे में देखा तो नमक नहीं था, अब क्या हो....उधर सदरू हुक्के को चारपाई के पाये से टिकाकर रख दिये थे जो उनके अब भोजन तैयार होने पर लाने का इशारा था। इधर रमदेई अलग सोच में थी, इस नमक को भी अभी खत्म होना था.....ये बच्चे भी तो नहीं दिख रहे जाने कहाँ चले गये, किससे मंगाउं। तब तक बडी बहू का लडका बड्डन दिख गया।

ए बड्डन, जा नंदलाल साह के यहाँ से नमक लेकर आ।

अभी रमदेई ने अपनी बात पूरी भी न की थी कि जाने कहाँ से छोटी बहू का लडका छुट्टन आ पहुँचा।

पैसे दो, हम ले आते हैं नमक।

बड्डन को अचानक छुट्टन के इस तरह आ जाने से अपने अरमानों पर पानी फिरता लगा। नमक लाने के बहाने जो पैसे मिलते हैं वह अक्सर एक दो रूपये जयादा ही मिलते हैं, न जाने नमक का दाम ही बढ गया हो। अब जो एक दो रूपये अलग मिलते थे उस पर कोई अलग कब्जा कर ले यह बड्डन कत्तई न मानेगा। दौडकर पास आता बोला- अरे तू क्यों जाएगा नमक लाने, दादी ने मुझे कहा है नमक लाने तो मैं ही जाउंगा, तू नहीं।

छुट्टन भी अड गया - मैं पहले पहुँचा, इसलिये मैं ही नमक ले आउंगा.......छुट्टन ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, जैसे बड्डन के इस दुनिया में अपने से पहले पहुँच जाने का प्रतिकार कर रहा हो।

नहीं, दादी ने मुझे कहा है सो नमक मैं ही लाउंगा।

दोनो के बीच विवाद बढता जा रहा था कि नमक कौन लाये, आखिर उपर की कमाई का सवाल था जो नमक मंगाने के बतौर मिलते। सदरू अलग सोच में पडे थे, कितने सेवाभावी पोते हैं......सेवा करने के लिये आपस में लड रहे हैं।

रमदेई से और न देखा गया - डांटते हुई बोली - तुम लोग क्या आपस में ही लड खप रहे हो, आज से पहले तो कभी इतनी सेवा के लिये तुम लोगों में मारपीट होते न देखा था।

अब सदरू ने खंखारते हुए गला साफ किया, बोले- इन दोनों की लडाई देखकर मुझे तो आजकल के नेताओं की याद आ रही है।

वो कैसे ?

वो ऐसे कि - आजकल चुनाव के लिये पार्टी दफ्तरों में टिकट पाने के लिये नेता लोग आपस में ही मारपीट कर रहे हैं.....क्या भाजपा, क्या काँग्रेस.....सब पार्टी ऑफिस में वही हाल है। हर कोई जनता की सेवा करना चाहता है, और मजे की बात तो यह है कि आपस में इतनी जोर से लडते हैं कि लगता है किसी दुश्मन से लड रहे हैं।

इस लडाई में एक दूसरे की कार पहले तोडी जाती है - माने कारसेवा और फिर नंबर आता है गमले का।

गमला क्यूँ ?

गमला इसलिये क्योंकि जो टिकट पा गया है वह दूसरे के लिये गम लाता है माने गमला।
अब जो टिकट नहीं पाया है वह अपना गम उस को देना चाहता है जिसे टिकट मिल गया है यानि मेरा गम ले - फिर गमला निशाना बनता है। इस गम ले और गम ला के चक्कर मे पार्टी ऑफिस के सारे गमले टूट जाते हैं.....वह भी सिर्फ सेवा के नाम पर, जैसे ये दोनों आपस में सेवा के लिये लड रहे हैं।

अभी ये गमले और गमला की चर्चा चल ही रही थी कि, दोनों लडके आपसे में लडते हुए बगल में पडे चारे के लिये रखी घास की टोकरी से जा टकराये और पूरी घास जमीन पर गिर गई ।

सदरू ने हँसते हुए कहा - लगता है ऐसे ही होते हैं ग्रास रूट लेवल के कार्यकर्ता.....जमीन से जुडे हुए....जिस घास को जमीन से उखाड कर लाया था, उसी को फिर जमीन पर गिरा आये......वाह रे बांके सेवक और धन्य है तुम्हारी सेवा।

घास गिर जाने से दोनों पोते आपस मे समझ गये कि अब रमदेई दादी छोडेगी नही, जरूर पीटेगी। दोनों ने आव देखा न ताव, चले भाग....अब दोनों के भागने में भी होड लगी थी।
लेकिन मूल समस्या अब तक ज्यों की त्यों बनी थी - नमक कौन लायेगा ?


- सतीश पंचम

Sunday, November 9, 2008

एनडीटीवी के अंग्रेजी प्रोग्राम 'जस्ट बुक्स' की तरह हिंदी किताबों पर कोई प्रोग्राम क्यों नहीं


NDTV के अन्य चैनलों जैसे NDTV 24x7 या NDTV GOOD TIMES पर आपने एक प्रोग्राम देखा होगा JUST BOOKS, जिसमें काफी अच्छे तरीके से अंग्रेजी किताबों के बारे में बताया जाता है, लेखकों के Interviews दिखाये जाते हैं कि कैसे उन्होंने ये किताब लिखी, किताब की खासियत क्या है, लोगों की उनकी किताब के बारे में प्रतिक्रिया कैसी है। लेकिन अफसोस यह JUST BOOKS सिर्फ अंग्रेजी की किताबों के बारे में बताता है, हिंदी में NDTV के पास ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं है जो हिंदी किताबों के बारे में बताये।

कुछ दिनों पहले मैने कहीं किसी चैनल पर एक चर्चा देखी दी जिसमें बताया गया था कि जिस तरह अंग्रेजी किताबों को प्रचार मिलता है, उस तरह की मीडिया कवरेज हिंदी किताबों को नहीं मिलती। यह बात मुझे काफी हद तक सच लग रही है। आपने गौर किया होगा कि अरविंद अडीगा के बुकर जीतने के बाद सारा मिडिया एक सुर से White tiger के बारे मे बोलने लगा, लेकिन वही मिडिया किसी हिंदी किताब को भारतीय पुरस्कार मिलने पर चूँ तक नहीं करता। अभी कुछ महीने पहले अमरकांत जी की किताब 'इन्हीं हथियारों से' थोडी बहुत चर्चा मे आई थी, वह भी साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिलने के बाद, लेकिन जब मै बडे से बडे बुकसेलर के पास गया तो पाया कि उन्हें तो इस लेखक के बारे मे ज्यादा मालूम ही नहीं है। खैर, ये तो हालत है साहित्य पुरस्कार विजेता एक लेखक की हमारे समाज में।

जहाँ तक मेरा अनुमान है यदि कोई चैनल इस बारे में पहल करता है, ऐसा कोई प्रोग्राम बनाता है जो कि हिंदी के किताबों के बारे मे परिचर्चा आयोजित करे या हिंदी लेखकों के बारे मे बताये, तो संभव है उस चैनल को एक अलग पहचान मिल सकती है जोकि साँप, मदारी, जादू टोना जैसे प्रोग्राम दिखाने से लाख गुना अच्छी पहचान है। ऐसे में नया दर्शक वर्ग भी जुड सकता है जो ऐसे बेहूदा प्रोग्रामों से तंग आकर चैनल बदलने पर मजबूर है।

उम्मीद है चैनल्स इस ओर भी सोचेंगे और ऐक नया दर्शक वर्ग अपने से जोडने मे कामयाब होंगे।



क्या आज के चलताउ साँप,मदारी,बंदर, ज्योतिषी वगैरह के प्रोग्रामों को जहाँ रोज दो दो घंटे तक चैनलों पर समय दिया जाता है, तो वहाँ हफ्ते में ही सिर्फ आधे घंटे का भी प्रोग्राम हिंदी साहित्य पर नहीं बन सकता ?


- सतीश पंचम

Saturday, November 1, 2008

प्रदीप बिहारीजी की सशक्त रचना 'उजास'


धार्मिक स्थानों पर स्नान करती महिलाओं को, उनके उघडे तन को कुछ लोग रसभरी निगाहों से देखने के इच्छुक होते हैं और अपने इसी प्रयोजन से वह घाट और घटोली तक छान मारते हैं कि कहीं कोई महिला उघडी हुई दिख जाय। जब ऐसे लोग उन महिलाओं को निहारते हैं तो महिलाओं के घरवाले सबकुछ जानते समझते हुए भी कुछ कह नहीं पाते, ऐक यह भावना भी होती है कि कहीं झगडा-टंटा करने से धार्मिक कार्य मे विघ्न न पड जाय, लेकिन उनके अंदर ही अंदर मन बेचैन जरूर रहता है कि कम्बख्त मेरे घर की मरजाद को घूर रहा है और मैं कुछ कह नहीं पा रहा।

इस मुद्दे पर हाल ही में लेखक प्रदीप बिहारी की कहानी उजास पढी, जो कि छठ पूजा के दौरान होने वाले ऐसे ही क्रियाकलापों पर आधारित है। काफी अच्छी और सशक्त लेखनी का परिचय दिया है प्रदीपजी ने।

कहानी का साराँश कुछ इस प्रकार है कि -

रामभूषण बाबू के दोनों बेटों की शादी हो गई थी, लेकिन दोनों के कोई बच्चा नहीं था, सो रामभूषण बाबू की पत्नी ने मनौती मांगी थी कि यदि उन्हे पोता हुआ तो छठ पूजा के दौरान वह अपने आँचल पर नटुआ( नचनिया) नचवाएंगी। कुछ समय बाद बहू के पैर भारी हुए, पर इससे पहले कि पोता हो, रामभूषण बाबू की पत्नी चल बसी।

अब पोते के जन्म के कुछ साल बाद रामभूषण बाबू को सबने याद दिलाया कि पत्नी की उस मनौती को बहू पूरा करे जिसमे पोते के जन्म के बाद अपने आँचल पर नटुआ नचवाने की बात थी, वरना जरा भी उंच नीच हुई नहीं कि छठ मईया का प्रकोप सामने होगा। रामभूषण बाबू काफी दुविधा में थे क्योंकि जवान बहू को कोई कैसे हजारों लोगों के सामने बेपर्दा होकर बैठने दे। बात आँचल पर नटुआ के नचाने की थी, लेकिन इस उपक्रम मे बहू को साडी को आधा ही पहनना पडता और इससे जाहिर था कि उसका बदन उघाड हो जाता, लोग मजे ले-लेकर देखेंगे यह सोचकर ही रामभूषण बाबू परेशान थे। खुद की पत्नी जो बूढी थी, यदि वह आँचल पर नचवाती तो ठीक था, लोग उस गंदी नजर से न देखते , लेकिन किसी तरह धार्मिक मनौती भी तो पूरी करनी थी।

काफी अनमने ढंग से वह घाट की ओर चले, रास्ते मे लोगों की बातें सुनकर तकलीफ भी होती रहीं।

कोई कहता- " पहले नटुआ नाचता था बुढिया के आँचल पर, आज नाचेगा युवती के आँचल पर"

वहीं जब नटुआ आ गया तो बहू भी असमंजस मे थी कि इतने लोगों के बीच कैसे नहाये और कैसे अपने आँचल को पसार कर आधा शरीर खुला रखे। ईधर नटुआ को लेकर लोगों मे अलग ही चर्चा थी -

यह बात जानकर कि नटुआ आज यहाँ रूकेगा नहीं और अभी नाच कर कहीं और जाएगा नाचने के लिये तो कुछ लोग कहते हैं - " ठीक है । तो साले को अभिए नचाते-नचाते गां* फार देते हैं।"

अभी ये चर्चाएं सुनाई दे रही थीं कि फिर किसी की आवाज आई -

" आँचल पर नटुआ नाचेगा कैसे ? "

" सो क्यों, घाट पर आँचल पसार देगी और उस पर नटुआ नाचेगा।"

" तब तो देह-दशा साफ- साफ दिखाई पडेगी"

"यही तो मजा है यार"

" आज तो साला नटुआ भी तर जाएगा"

ये सब सुनते-सुनते रामभूषण बाबू ने अपने मानसिक संतुलन को किसी तरह बनाये रखा।

तभी उस पोते ने रामभूषण बाबू को बताया कि लोग नटुआ नाचने से पहले पटाखा फोडने कह रहे हैं। रामभूषण बाबू ने कहा- तो जाओ फोडो पटाखा, पटाखा नहीं है क्या?

पोते ने कहा - पटाखा तो है मगर....

मगर क्या ?

फोडने के लिये पन्नी खोलेंगे तो हिरोईन उघार हो जाएगी।

पोते ने पटाखे के पैकेट के उपर छपे महिला की तस्वीर की ओर इशारा किया। रामभूषण बाबू को लगा कि उनके सामने उनका पोता नहीं दादा खडा है।

उधर नटुआ नाच नहीं रहा था, आँचल के पास खडा था। लोगों ने इस पर भी चुटकी ली - " ईनफिरिएरिटी कॉम्पलेक्स है। इतनी कीमती साडी पर पाँव रखने की हिम्मत नहीं हो रही"

कहानी के अंत में रामभूषण बाबू ने न सिर्फ अपने मानसिक संतुलन को बनाये रखा, बल्कि इस आँचल पर नटुआ नचाने की कुप्रथा के खिलाफ एकाएक विद्रोह भी कर दिया।

इस हिदी मे अनुवाद की गई मैथिली कहानी 'उजास' को पूरा पढने के बाद महसूस होता है कि हमारा क्षेत्रीय साहित्य कितना सुघड है और उसमें कैसे-कैसे सशक्त रचनाकार हैं। प्रदीप बिहारीजी को उनकी इस सशक्त मैथिली रचना के लिये बधाई देता हूँ। यह कहानी पढकर शायद ऐसे लोगों को भी बुध्दि आए जो अपने कुत्सित कार्यों से धार्मिक स्थानों तक को नहीं बख्शते।

- सतीश पंचम

( मैने यह कहानी नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाओं के हिंदी अनुवाद 'मैथिली कथा संचयन' के जरिये बताई है। आप भी यह किताब जरूर पढें। फिलहाल यह 'मैथिली कथा संचयन' मुंम्बई के जीवन प्रभात पुस्तकालय में उपलब्ध है - पता है - जीवन प्रभात पुस्तकालय, A-4 / 1 , Kripa Nagar, Irla Bridge, Mumbai - 56, Phone no. - 022-26716587 । सफेद घर की ओर से ऐसा प्रयास जारी रहेगा जिसके जरिये आप लोगों तक इस तरह की रचनाओं की जानकारी दी जाए।)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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