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Saturday, October 25, 2008

भारत ऐक बेंजीन (C6H6)




बेंजीन (C6H6) का नाम सुना होगा आपने- बहुत ही ज्वलनशील पदार्थ है, कहते हैं जब वैज्ञानिक उसकी रासायनिक संरचना का चित्र बनाना चाहते थे तो उसकी संरचना समझ ही नहीं आ रही थी, हर बार कहीं न कहीं कमी रह जाती। ऐक बार केंकुले नाम के वैज्ञानिक ने अर्धनिद्रा मे देखा एक साँप अपने ही पूंछ को निगल रहा है, बस यही वो क्षण था जब केंकुले को बेंजीन की संरचना समझ आ गई और उसने उसे आकार दे दिया- एक ज्वलनशील पदार्थ की संरचना दुनिया के सामने आ गई।

अब भारत की ओर देखा जाय, क्या आप को नहीं लग रहा कि एक साँप अपनी पूँछ को ही खाये जा रहा है, उसकी संरचना और प्रकृति ठीक उस ज्वलनशील पदार्थ बेंजीन की तरह है , इस संरचना को समझने के लिये किसी Day-dream की जरूरत नहीं है। किसी केंकुले नाम के वैज्ञानिक की जरूरत नहीं है...पर सबसे दुखद तो यह है कि हम ऐसी संरचना को समझते बूझते हुए भी अंजान बने हुए हैं और ऐसे एक नहीं हजारों साँप हैं, कोई भाषा के नाम पर जहर उगल रहा है, कोई धर्म परिवर्तन के नाम पर तो कोई अलगाववाद के नाम पर , सभी साँप इस क्रिया कर्म में लगे हैं और सब के सब इतने ज्वलनशील हैं कि सारा देश अब उसकी आँच महसूस कर रहा है।

क्या भारत के संविधान में ऐसे किसी नेवले का प्रावधान नहीं है जो इन ज्वलनशील बेंजीन साँपों की काट बन सकें ।

- सतीश पंचम

Thursday, October 23, 2008

जानना चाहोगे क्यों बिहारी छात्र आगे हैं नौकरीयों में - ये लो, खुद ही देख लो।

लोग सवाल उठा रहे हैं कि सरकारी पदों पर या रेल्वे वगैरह में बिहारी लोग ज्यादा क्यों हैं, क्या बात है कि बिहारी ही ज्यादा नौकरी पाये दिखते हैं, इस मुद्दे पर ज्यों-ज्यों गहराई मे सोचा, त्यों-त्यों कुछ चीजें शीशे की तरह साफ होती गई। दरअसल पहले बिहार की डेमोग्राफिक स्थिति और लोगों के बीच पनपे नौकरी के रूझान को देखा समझा जाय तो आप को खुद-ब-खुद इसका उत्तर मिल जायगा, इसके लिये कोई भी आँकडेबाजी की जरूरत नहीं है।

दरअसल बिहार में कोई मजबूत मेन्युफैक्चरिंग या निर्माण उद्योग पहले से ही नहीं है,झारखंड मे जो कुछ था वह खनन आधारित ही ज्यादा था जिसके दम पर कभी बेस इंडस्ट्री बिहार में बनाने की कोशिश ही नहीं की गई। ऐसे में लोगों को नौकरीयों की उम्मीद सिर्फ सरकारी क्षेत्र से ही थी जिसमें कि जाने से पहले लोगों को प्रतियोगिता परीक्षा देनी जरूरी थी, और यही वो ट्रेंड था जिसने बिहार मे एक प्रतियोगिता परीक्षाओं को एक समानान्तर उद्योग का दर्जा दे दिया, कम्पटीशन पत्रिकाओं की खपत बढने लगी, कोचिंग संस्थाओं की संख्या बढने लगी, लेदेकर ऐसा माहौल बन गया कि लोकगीतों में भी कम्पटीशन का माहौल दिखाई देने लगा। आपको शूल फिल्म के उस गीत की याद होगी जिसमें विलेन बने नेता को एक कैसेट लाकर दिया जाता है , उसके बजाते ही जो बोल निकलते हैं वो होते हैं - M. A. मे लेके एडमिसन....कम्पटीसन.....देता SS......मतलब लोग यहाँ वहाँ जरूर अपने कॉलेज की पढाई पूरने के लिये एडमिशन लेते हैं लेकिन अपना लक्ष्य कम्पटीशन को ही मानते हैं.....कोई पूछता भी है कि आपका लडका क्या करता है तो लोग अक्सर यही बताते हैं कि कम्पटीशन दे रहा है......यानि तैयारी कर रहा है। और सबसे बडी बात तो ये है कि ये प्रतियोगिता परीक्षा मे जिस पद की कामना की जाती है वह हमेशा IAS, IPS, PCS जैसे पदों से ही शुरू होती है। लोगों का ये मानना होता है कि सबसे कडी परीक्षा यानि UPSC को साधो तो सब बाकी प्रतियोगिता परीक्षाएं अपने आप सध जाती हैं.......और काफी हद तक यह बात सच भी है.......छात्र परीक्षा की तैयारी IAS, PCS लेवल की करते हैं....एक साल- दो साल अपने को मांजते रहने के बाद इन छात्रों का स्वाभाविक है कि IQ लेवल कुछ हद तक उपर हो जाता है......लगभग वही सवाल जो UPSC में पूछे जाते हैं......कुछ सरल ढंग से रेल्वे आदि की परीक्षाओं मे भी पूछे जाते हैं......ऐसे मे चयन स्वाभाविक रूप से ऐसे ही छात्रों का होता है जो ऐसे परिवेश को लेकर चलते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या बाकी राज्यों के छात्र कम काबिल हैं या उनमें वह माद्दा ही नहीं है.....नहीं ऐसा नहीं है....बाकी राज्यों के छात्र भी काबिल होते हैं....उनमें माद्दा भी होता है कि कम्पटीशन को भेद सकें.....लेकिन वह छात्र अपने राज्य से बाहर नहीं निकलते......उन्हें जरूरत ही नहीं पडती या पडती भी है तो कम, क्योंकि एक दो बार असफल होने पर वह बैकअप के तौर पर अपने ही राज्य में अन्य निजी/ प्राईवेट नौकरीयों में लग जाते हैं जो कि सरकारी के मुकाबले थोडी आसानी से मिल जाती हैं......फिर वे अपनी नौकरीयों में ऐसा रम जाते हैं कि कम्पटीशन वाली परीक्षाएं लगभग न के बराबर अटेंड करते हैं, जबकि बिहार के छात्र अपने राज्य मे प्राईवेट नौकरीयों तक की कमी के चलते उसी कम्पटीशन वाले माहौल को लेकर चलते हैं। ऐसे मे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि क्यों उन बिहारी छात्रों का ही चयन ज्यादा होता है सरकारी पदों पर। वैसे कई लोग सिफारिश या पहुँच को भी कारण मान सकते हैं लेकिन यह हालत तो हर राज्य मे है, अब हर जगह तो बिहारी ऐसे नहीं हो सकते कि सिफारिश, पहुँच या अन्य गलत तरीकों से ही नौकरी पा लें।

दूसरी बात ये आरोप लग रहे हैं कि रेल्वे ने अपने विज्ञापन महाराष्ट्र के स्थानीय भाषा के समाचार पत्रों मे नहीं दिये जिससे कि यहाँ के लोगों को पता चल सके कि ऐसी कोई वेकेंसी निकली है। तो मैं ये कहना चाहूँगा कि ऐसे विज्ञापन कहीं निकले या न निकले, रोजगार समाचार या Employment News मे तो निकलता ही है, जिसे कि यहाँ और अन्य राज्यों मे कम ही पढा जाता है क्योंकि जब निजी क्षेत्र की जहाँ बहार हो वहाँ सरकारी क्षेत्र की कौन पूछे जिसके मिलने को अब सपना मानने लगे है लोग, यही कारण है कि जो रोजगार समाचार बिहार आदि राज्यों मे खूब मन से पढा जाता है, और लगभग हर न्यूज स्टॉल पर आसानी से मिल जाता है, वही अखबार मुंम्बई जैसे शहर मे लेने के लिये यहाँ- वहाँ ढूँढना पडता है क्योंकि उसकी यहाँ ज्यादा माँग नहीं है। वहाँ बिहार मे हालत तो ये हो जाती है कि लोग निजी तौर पर साइक्लोस्टाईल्ड फॉर्म दस रूपये में लिफाफे सहित जगह-जगह दुकानों पर बेचते हैं जबकि यहाँ मुम्बई मे वह केवल रेल्वे स्टेशनों पर ही उपलब्ध हो पाता है। ऐसे में आप सहज रूप से अंदाजा लगा सकते हैं कि बिहार और मुम्बई या देश के अन्य राज्यों के बीच Competitive Exams का माहौल कैसा है और किन लोगों का ज्यादा चयन हो सकता है।

उधर उत्तर प्रदेश मे भी कमोबेश हालत लगभग यही है लेकिन वहाँ कुछ हद तक निजी क्षेत्र की उपलब्धता के चलते Competitive Exams के प्रति माहौल बिहार के मुकाबले कुछ हद तक सीमित सा लगता है, या माहौल है भी तो उस हद तक जोश और जज्बे को बरकरार नहीं रख पाता जो बिहार के छात्र अपनी नौकरीयों की जरूरतों के कारण बनाये रखते हैं,और ऐसे मे जबकि लोकगीत तक Competition मुद्दे पर बनने लगे तो आप समझ सकते हैं कि वस्तुस्थिति क्या है।

- सतीश पंचम
( मैं खुद उत्तर प्रदेश से हूँ....लेकिन बहुत हद तक इस माहौल से परिचित होने के कारण ही बिहार के बारे में यह पोस्ट लिख रहा हूँ , यदि कहीं मेरी जानकारी मे त्रुटि हो तो कृपया जरूर बता दें)

Sunday, October 19, 2008

पुतिन की कुतिया से परेशान भारत का देहात (हास्य)


सदरू भगत चाहते हैं कि रमदेई के शरीर में भी वह GPS नेविगेशन यंत्र लगा दिया जाय जिसे कि रूसी पुतिन ने अपने कुतिया के गलेवाले पट्टे पर लगाया था, ताकि पता चल सके, उस कुतिया की तरह रमदेई कहाँ-कहाँ जाती है, किसकी किसकी चुगलखोरी करती है, क्या क्या करती है।

घर मे सदरू भगत आ तो गये लेकिन तय नहीं कर पा रहे थे कि चर्चा कहाँ से शुरू करें। तब तक रमदेई खुद ही ओसार मे आते हुए बोली -
आ गये नेताई छाँट कर, काम न धाम बस इसके यहाँ बैठो, उसके यहाँ बैठो....बस यही काम रह गया है इ बुढौती मे।

अरे तो क्या तेरे आस पास बैठ कर रखवाली करता रहूँ.....बडी आई पूछताछ करने वाली। अरे मैं भी जानता हूँ तू कहाँ-कहाँ जाती है। कभी हरखू के यहाँ जाएगी वहाँ उसकी पतोहू से बतकूचन करेगी, कभी मटरू के यहाँ जाएगी वहाँ चार-बात करेगी, औरतों का तो काम ही यही है......जहाँ चार जनी मिल गई तो बस न घर का ख्याल न बेटे पतोहू की चिंता......भैंस धोने-धाने  के बाद अभी भी धूप मे खडी है......ये नहीं कि उसे छाँव में लाकर बाँध दे......बस कभी उसके यहाँ तो कभी उसके यहाँ ।

रमदेई ने सदरू भगत का ये रूप देखा तो दंग रह गई, आज फिर कहीं से गाँजे का दम लगा लिया लगता है।

संभलकर बोलीं - क्या कहते हो, आज लगता है फिर से कहीं बैठकी हुई है।

बैठकी की बात करती है, ठहर तेरे सरीर मे भी GPS सिसटम न लगवा दिया तो कहना, तू कहाँ जाती है क्या करती है सब पता चलेगा।


क्या.....क्या......क्या लगा दोगे तो क्या होगा.....ई जीपीस फीपीस क्या बक रहे हो.......लगता है कुछ ज्यादा चढा ली है आज।

अरे जीपीएस एक मसीन है जो किसी के सरीर पर लगा दो तो पता चलता है कि वह कहाँ गया है, किधर है....सब पता चलता है। उ पुतिनवा है न, उसने अपने कुतिया मे वह जीपीएस लगाया है, वह कुतिया जहाँ जाती है पता चलते रहता है कि अब कहाँ जा रही है, क्या कर रही है।

तो मैं कुतिया हूँ.....ठहरो तुम्हारे जीपीएस को तुम्हारे ठौर मे न पहुँचा दिया तो कहना - कहते हुए रमदेई सामने पडे सिलबट्टे को उठाने को झुकी ही थी कि सदरू भगत चले भाग। एक बार जो भागना शुरू किया तो फिर पीछे मुडकर नहीं देखा। आगे आगे सदरू भगत, पीछे पीछे रमदेई।

तभी रास्ते मे लल्ली चौधरी मिल गये - भागते हुए सदरू से पूछा - अरे क्या हो गया कहाँ भागे जा रहे हो ?

सदरू ने भागते-भागते ही कहा -  भाग चलो नहीं तो आज खैर नहीं।

क्यों क्या हुआ ?

GPS प्रणाली   फेल हो चुकी है और वह परीक्षण स्थल से छूटकर सीधे यहीं आ रही है :)

 


- सतीश पंचम

Saturday, October 18, 2008

उपवास के नाम पर ऑफिस में नंगे पैर (विश्लेषण)


क्या कभी अपने ऑफिस मे नंगे पैर गये हैं आप, नहीं न.......लेकिन यहाँ मुम्बई में यह हुआ है और ऐक दो नहीं...कई लोग अपने ऑफिस नंगे पैर पहुँचे। हुआ यूँ कि अंधेरी स्टेशन पर उतरते ही किसी महिला की गाली देती हुई चीख सुनाई दी।

मेल्या....मुडद्या......दिसत नाई का ( मुर्दे.....दिख नहीं रहा क्या )

थोडा ध्यान दिया तो पता चला कि वह महिला नंगे पैर थी और किसी का जूता उसके पैरों पर पड गया था। पल भर में सारा मामला समझ मे आ गया कि आज बहुत सी महिलायें करवा चौथ का वृत रखने के कारण अपने ऑफिस नंगे पैर पहुँचती हैं।

ऐसा अक्सर नवरात्र के समय भी कई बार देखने मे आया कि कई महिलायें बिना चप्पल पहनें अपने ऑफिस पहुँची और बॉस के पूछने पर खिलखिलाते हुए बताती - वो मेरा आज उपवास है न। अब दिन भर क्लाएंट्स आते रहे.....मिस वृतादेवी को देखते और जिज्ञासावश पूछ लेते - क्यों क्या बात है, आज Bare foot, नंगे पैर। तब फिर वही जवाब - आज मेरा उपवास है न।

दिन भर मे न जाने कितनी बार लोगों को वह ये जवाब देते रहीं और धीरे-धीरे ऐसे लगने लगा जैसे कि उनका उपवास मे नंगे पैर ऑफिस आना ही एक उपवास की जरूरी विधि है जिसे बिना पूरा किये उपवास अधूरा रह जायेगा। शाम की चाय के वक्त जहाँ लोग दिन भर शेयर मार्केट की बातों पर जूझते रहे.......तो वहीं इनकी सहेलियाँ उनके उपवास पर मगन रहीं। कॉफी वेंडिंग मशीन अच्छी भली काम कर रही थी पर अचानक ही बंद पड गई, तब वृतादेवी की सहेलियों ने ही कहा - (ध्यान रहे पुरूषों ने नहीं) - लगता है आज इस कॉफी वेंडिग मशीन का भी उपवास है।

यहाँ एक बात देखने मे आई है कि सडक पर नंगे पैर चलना भी एक प्रकार से गंदगी को अपने साथ बटोरते चलना है। लोग सडक पर थूकते हैं...खंखारते है.....और भी न जाने कितनी गंदगियां पडी होती हैं जो हमें अपने से लपेटे मे ले लेती हैं। चप्पल या जूता पहनने से कम से कम वह गंदगी हमारे शरीर को तो न छू पाएगी। और यदि छूती भी है तो उस चप्पल और जूते को जिसे कि हम मंदिर के बाहर ही उतार देते हैं.....ताकि साफ पैरों से प्रसन्न भाव से भगवान के मंदिर मे दर्शन कर सकें।

नंगे पैर सारे दिन रहकर जब मंदिर जाएंगे तो उसी गंदे जूतेनुमा पैर को लेकर ही जाएंगे, क्या तब हमारी आस्था और प्रगाढ होगी, क्या तब ही हम अपने को बडा भक्त मानेंगे। मैं लोगों की आस्था पर प्रश्न नहीं उठा रहा पर कहीं तो कुछ है जो कचोट रहा है कि ऐसे उपवास विधि का क्या तुक जो किसी का पैर पड जाने भर से गाली देने को तैयार हो। उस अंधेरी स्टेशनवाली महिला का रोष देख कर तो लगता है कि उसका उपवास निर्बाध होता यदि वह चप्पल या इसी तरह की कोई चीज पहने होती, तब शायद उसे उस शख्स को गाली देने की जरूरत ही न पडती जिसका पैर गलती से उसके पैरों पर आ गया था।

- सतीश पंचम


( इस लेख को लिखते समय कुछ असमंजस मे हूँ..... क्योंकि ज्ञानजी और सुरेश चिपलूनकरजी के ब्लॉग पर पढ चुका हूँ कि हिंदू धर्म के उपर कुछ लिखने से आपको बेकार मे ही अटेंशन मिलता है.....याकि लोग ज्यादा जानते हैं, उसी असमंजस भरी परिस्थ्तियों मे ये पोस्ट लिख रहा हूँ...यदि किसी की भावनाये मेरे इस लेख से आहत हों तो मैं आप लोगों से क्षमा चाहता हूँ)

Tuesday, October 14, 2008

मानो तो वादी नहीं तो आतंकवादी


अभी ऐक आतंकवादीजी रास्ते मे मिल गये - मैने पूछ लिया - कहाँ जा रहे हो ?

मौसियाने जा रहा हूँ।

मतलब ?

अरे यार अपने खाला के घर जा रहा हूँ, कुछ बम-वम फोडना है कि नहीं।

मैने कहा यार समझ नहीं आ रहा कि ये तेरा कौन सा मौसीयाना है।

तो बोला - अरे हमारी माँ कई बहने हैं, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भारत.......सब अपुन की माँ की बहने है, तो क्या है कि अपनी एक माँ को छोड बाकी अपुन की मौसी लगेंगी। तो अभी जा रहा हूँ....मौसीयाने बम फोडने। तूम आते हो तो चलो।

मैं सकपका गया.....मैने कहा - यार मैने ये तो सुना था कि आतंकवादीयों ने यहाँ अपनी खाला का घर समझ रखा है, लेकिन नहीं जानता था कि....इतनी शिद्दत से तुम इसे अपनी खाला का घर मान बैठे हो।

मानना क्या है - मानों तो वादी नहीं तो आतंकवादी।

वादी मतलब ?

वादी शब्द बहुत सारे बोरबचन का पर्यायवाची शब्द है - जैसे उदारवादी,समतावादी,समाजवादी,संघर्षवादी,जनवादी,राष्ट्रवादी।

तो तुम्हें ये सब बोरबचन लग रहे हैं।

नहीं बोरबचन तो अपने गुरू श्री लादेन को लगता था, मुझे तो ये वादी वाले शब्दों से लगता है कि कहीं लोकतंत्र के हसींन वादीयों मे घूम रहा हूँ। कोई कुछ बोलने वाला नहीं, कोई कुछ कहने वाला नहीं। कभी कोई बाटला-फाटला जैसी मुठभेड हो जाय तो हमारे हमदर्द भी यहीं से निकल आते हैं ये कहते हुए कि हमें मुठभेड पर शक है। लोकतंत्र मे ये वादी शब्द कितना अच्छा लगता है सुनने मे है न।
मैं सोच मे पड गया - सचमुच आजकल ये इतने सारे लोकतंत्र के पवित्र नामों वाले वाद जैसे राष्ट्रवाद, समाजवाद,जनवाद आदि उन्होंने अपना अर्थ और महत्व किस तरह खोया है, और उस अर्थ को खोने मे हमारे ही लोगों का कितना बडा हाथ है, चाहे वह अमर सिंह जैसे बकबकीया नेता हों या फिर कोई और हो,फिर इतने सारे आतंकवादीयों को ये देश आतंक के लिये हसीन वादी क्यों न नजर आये।

- सतीश पंचम

Sunday, October 12, 2008

सफेद घर : कभी ऐसे भी सोचो, कि किसी के सोचने पर सोचना आए (Micropost)


जंगल के बीच वीरान जगह पर कहीं एक हिरनी ने एक बच्चे को जन्म दिया , जन्मते ही बच्चे पर जमीं पतली झिल्लीदार चीज को हिरनी ने चाट चाट कर अलग कर दिया। बच्चा अब भी लडखडाता रहा,उठने की कोशिश करता रहा पर उठ नहीं पा रहा था। तभी अचानक जाने कैसे बच्चे के पैरों में हल्की ताकत सी आ गई , थोडा ईधर-उधर लडखडाने के बाद बच्चे ने अपना मुँह हिरनी के थनों के पास ले जाकर लगा दिया और शुरू किया पीना अपने माँ के थनों को।

मैं सोचता रहा - किसने बताया उस अभी-अभी जन्मे बच्चे को कि तुम अपना मुँह वहीं ले जाना, जहाँ पर थन है, वहाँ तुम्हें दूध मिलेगा।

किसने बताया होगा उसे।


- सतीश पंचम

Sunday, October 5, 2008

ये है एक अच्छे ब्लॉग की जरूरी खुबियाँ जिन्हें आप अपने ब्लॉग में जरूर देखना चाहेंगे।


एक अच्छे और Standard ब्लॉग की क्या-क्या खुबियाँ होती हैं ये आप लोग जरूर जानना चाहेंगे। आईये देखते हैं आप के ब्लॉग में ये खुबियाँ क्यों और कैसे होनी चाहिये।

1- पेज जल्दी लोड हो - यह किसी ब्लॉग की पहली शर्त है कि वह जल्दी लोड हो और विसिटर को ज्यादा समय ना लगे। यह समस्या भारत जैसे देश जहाँ कि नेट कनेक्टिविटी ईतनी तेज नहीं है, और गंभीर हो जाती है, और जहाँ डायल-अप कनेक्शन हो वहाँ की आप कल्पना कर सकते हैं। पेज लोडिंग के बारे में कुछ चीजों पर हमारा नियंत्रण नहीं हो सकता है और अगर हो भी तो काफी खर्चीला साबित होता है जैसे कि - प्रोसेसर की क्षमता और सर्वर की उपलब्धता। प्रोसेसर की क्षमता धीरे धीरे घटती रहती है और जिसका असर लोडिंग पर और हमारे कम्प्यूटर के और क्रियाकलापों पर पडना लाजिमी है। आप ने ध्यान दिया होगा कि नये पीसी पर तो तेज काम होता है लेकिन एकाध साल गुजरते ही कुछ कमिया देखने मे आने लगती है जैसे हैंक हो जाना या कहीं स्लो डेटा प्रोसेस करना आदि ये सब कम्प्यूटर के अन्य अन्य पारट्स के अलावा प्रोसेसर की क्षमता मे आई कमी के कारण होता है। अब रोज-रोज तो प्रोसेसर बदलने से रहा सो इस पर ध्यान दें।

जहां तक सर्वर की उपलब्धता की बात है वह भी हमारे हाथ मे न के बराबर है, बढते ब्लॉग संख्या, वेबसाईट्स के ईस दौर मे आगे भी सर्वर पर लोड बढने ही वाला है सो हमे अभी से अपने ब्लॉग्स या वेबसाईट्स को ऐसा बनाकर रखना होगा जिससे कि आगे कभी हमारे पेज लोड होने मे ज्यादा समय न लगे। सर्वर पर लोड बढाने वाली चीजों मे बडी ईमेज फाईल्स, heavy data , आदि का मुख्य रोल होता है। सो कोशिश करें कि बडे ईमेज या फाईल्स को अपने वेब पेज या ब्लॉग पर न रहने दे या रखे भी तो उन्हें पहले ही अपने पीसी पर छोटा आकार देकर pixels आदि कम कर दे और तब अपलोड करें।

इसके अलावा Unnecessary Widgets को भी न रहने दे जो कि बिना मतलब के ज्यादा उपयोगी न होते हुए भी वक्त खाते हैं।

ज्यादा चटकदार और आकर्षण के चक्कर में कहीं-कहीं ब्लॉग पर Flash का भी उपयोग किया जा रहा है जो यदि जरूरी न हो तो हटा दें।

ध्यान रखें कि कोई अगर आपकी लेखन शैली को पहले से जानता है, Dedicated visitor है या आप से प्रभावित है तो वह जरूर आपके ब्लॉग के लोड होने मे लगे वक्त को सहन कर लेगा लेकिन जो First Time Visitor है उसके पास इतना धैर्य नहीं होता कि आपको पढने के लिये इतना वक्त लगाये। सो चुनाव आपके हाथ मे है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच जुडना चाहेगे या फिर अपने कुछ परिचित बलॉगर्स के बीच ही रहना जोकि ब्लॉगजगत और आपके लेखन के लिये उचित नहीं प्रतीत होता।

2- कम से कम नेविगेशन रखें - याद रखें आप के ब्लॉग पर आनेवाले लोग किसी ब्लॉग एग्रीगेटर या फीड के जरिये ही ज्यादा आते हैं, सीधे आपके ब्लॉग पर आने वालों की संख्या कम होती है या होती भी है तो परिचित ब्लॉगरों की। सो अपने ब्लॉग पर Unnecessary hyperlinks न रखें जिससे कि user का ध्यान न बंट पाये । User को किसी भी पेज पर आने जाने मे असुविधा या ज्यादा ढूंढना न पडे इसका ध्यान रखना भी जरूरी है। परिचित ब्लॉगर रास्ता ढूँढ लेगे लेकिन उनका क्या जो पहली बार आ रहे हैं। सो ईस बात का हर मामले मे ख्याल रखें की ब्लॉग पर कोई भी चीज रखते या लिंक देते समय First Visitor आपके अवचेतन मन मे होना चाहिये।

3- अच्छे Content को हमेशा पेज के साईडबार मे उपर की तरफ रखें। ऐसा करने के लिये कुछ Psychology का उपयोग किया जा सकता है कि जब आप दुकान में कोई कपडा खरीदने जाते हैं तो अच्छे कपडे या ध्यान खींचने वाले कपडे दुकानदार शो-केस मे सजा कर रखता है और उसे देखकर ही आप अंदाजा लगाते हैं कि क्या कुछ हो सकता है दुकान मे। इसके अलावा एक बात और देखने मे आती है कि जो कपडा आपको पहली नजर मे दिखता है या अचानक भा जाता है उसके बाद दुकानवाला कोई भी कपडा दिखाता है तो वह कम जंचता है। बस यही Psychology यहाँ भी उपयोग मे लाई जा सकती है। पहले उन Contents को रखें जो लगे कि वास्तव मे अच्छे हैं या बाँटने लायक हैं, बाद में अन्य सभी पोस्ट्स।

आप लोगों को अचरज हो सकता है कि ये क्या कोई दुकानदारी है जो शो-केस वगैरह की बाते हो रही हैं.......नहीं यह कोई दुकानदारी नहीं है लेकिन एक प्रकार से अपने आपको और अपने ब्लॉग को प्रस्तुत करने का तरीका भर है। याद रखें आपका ब्लॉग आपको ही पेश कर रहा है चाहे वह विचारों के जरिये हो या फिर Contents के जरिये।

4- Scrolling - अपने ब्लॉग लेआउट मे स्क्रीन साईज / page size का ख्याल रखें। वह स्क्रीन से बाहर न जाने पाये। याद रखें कि Web मे कई प्रकार के सर्वमान्य नियम खुद-ब-खुद माने जाते हैं कि Horizontal Scrolling की बजाये Vertical scrolling को तवज्जो देनी चाहिये। Horizontal Scrolling से User/ Visitor का ध्यान बंटता है जो उचित नहीं है।

5- Content - ऐक मुख्य बात का भी ध्यान रखें कि आपके Contents अच्छे और रोचक हों। कुछ भी आँय-बाँय लिखने से केवल अपने मन को संतुष्टि मिलती है लेकिन वह खोखली न हो इसका भी ख्याल रखें। अगर लिखना ही है अपने मन का तो एक डम्मी ब्लॉग बना सकते हैं जिसे कि आप और केवल आप ही देख सकते हैं। सेटिंग्स के जरिये उसे सर्च इंजिनों की नजरों से दूर भी रख सकते हैं। गुगल ने शायद ऐसे आयँ-बाकीयों की चाहत पहले ही भाँप ली थी सो यह ऑप्शन सेटिंग्स में ऱखा गया है कि आप अपने तक ही ब्लॉग सीमित रखें।

ऐसा नहीं है कि मैं सिर्फ लोकलुभावन या गुडी-गुडी लिखने को कह रहा हूँ......वरन एक ढंग का लिखने को कह रहा हूँ जो विचार-विमर्श या कहें मुद्दे को सामने रख सके ऐसे लेखन को कह रहा हूँ।

इसी खूबी का ईस्तेमाल आप एक Test Blog बनाने मे कर सकते हैं जहाँ आप रंगो आदि का या Widgets आदि की टेस्टिंग कर सकते है कि क्या ये वाकई मेरे Published Blog पर अच्छा लगेगा या नहीं।

6- Uniquness - आपके ब्लॉग मे वो Uniqueness क्षमता होनी चाहिये जिसे Visitors आसानी से पहचान सकें या दूसरे शब्दों मे कहे तो याद रख सकें जैसे कि पेज कलर या फिर Focussed contents जैसे कोई व्यंग्य पर Focussed हो या फिर कोई Technique पर या कोई कहानी, कविता आदि पर।

अब इतना सब पढने के बाद आप कहेगे भाई आप तो Standardization के नाम पर न जाने कौन से अफलातूनी दुनिया के ब्लॉग लिखने को कह रहे हैं तो मेरा मानना है कि हर कोई ब्लॉग अपने आप मे संपूर्ण होता है, बस पैमाने अलग हो सकते हैं....कोई तकनीक के मामले मे तो कोई कहानी, कविता या विचार के मामले में, सो बिना हिचक बस लिखते रहें, सटीकता खुद-ब-खुद आने लगती है। (अभी मैं भी उस सटीकता को खोज रहा हूँ.....ससुरी न जाने कहाँ खुशहाली बाँटते फिर रही है :)


अंतत: माईक्रो फुल्कारी

फिलहाल गुगल पर बढते सर्वर लोड और पोस्ट की घटती लोडिंग स्पीड को देखते हुए मैं चाहूँगा कि मेरा घर गुगल के Office के बगल मे हो और कोई पोस्ट लिखने के बाद जब अपने गैलरी मे खडे होकर आवाज लगाउं तो वहाँ से किसी की आवाज आनी चाहिये ......... हाँ, पोस्ट पहुँच गई है :D

- सतीश पंचम

Saturday, October 4, 2008

दिन में चार बार पतनी को गले लगाने की चाहत में सदरू भगत (हँसी-मजाक)


जब से सदरू भगत ने खबर सुनी है कि दिन में चार बार पत्नी को गले लगाने से जीवन खुशहाल रहता है, तब से तो जैसे उनके पैर जमीन पर नहीं पड रहे, चल तो रहे थे लेकिन सोचते थे कितनी जल्दी पहुँच जाउं कि गले मिलने को हो। मन ही मन सोचे जा रहे थे कि जब रमदेई मुझे हुक्का पकडायेगी तब गले मिल लूँगा, जब खाना परोसेगी तो फिर गले मिल लूँगा, थोडी देर मे जब बर्तन ओर्तन मांज लेगी तो फिर लिपट लूँगा और फिर होते-होते जब सांझ को मेरे पैर दबायेगी तो फिर क्या कहना, तब तो वो विज्ञानी लोग भी क्या लिपटें होंगे जो ये बताये हैं कि दिन मे चार बार पतनी से गले मिलने से जीवन सुखी होता है ......कुल मिलाकर चार बार ही तो गले मिलना है.......अगर ईतना करने से जीवन खुशहाल हो जाय तो क्या कहना। अभी यह सोचे चले जा रहे थे कि रास्ते में झिंगुरी यादव मिल गये।

कहाँ जा रहे हो उडन दस्ता बने हुए।

अरे कुछ नही बस ये जानो कि आज मुझे पंख लग गये है। आज नहीं बोलूँगा........कल मिलना तो बताउंगा।

ईधर झिंगुरी को लगा आज सदरू जरूर सहदेव कोईरी के यहां गये होंगे.......गांजा का असर दिख रहा है......लगता है खूब बैठकी हुई है आज।

हाँफते-डाफते सदरू किसी तरह घर पहुंचे, देखा पतोहू बाहर बैठी अपने पैरों में लाल रंग लगा रही है.....मौका ताडकर भीतर घर में घुस गये। रमदेई कोठार में से गुड निकाल कर ला रही थी कि कुछ मीठा बनाया जाय। तब तक सदरू को सामने देख पूछ बैठी - क्यों क्या बात है.....ईतना हाँफ क्यों रहे हो।

सदरू ने किसी तरह अपनी साँसों को नियंत्रित करते कहा - आज तुझे खुस्स कर दूंगा।

खुस्स करोगे........क्या आज फिर गांजा पीकर आये हो जो टनमना रहे हो।

अरे नहीं रमदेई....पहिले गले मिल तब बताउं.......कहते हुए सदरू आगे बढे।

हां.......हां .......हां ......अरे क्या आज गांजे के साथ चिलम भी गटक लिया क्या जो जवान की तरह घुटूर - घुटूर गोडे जा रहे हो।

अरे आज कुछ न बोल रमदेई, बस आ जा गले लग जा.........जीवन खुस्सहाल हो जाई।

अब रमदेई को पक्का यकीन हो गया कि ये सदरू भगत के मुंह से गाँजा बोल रहा है।

अच्छा तो गले मिलने का नया सौक पाला है.......रहो, अभी तुम्हारा गले मिलौवल ठीक करती हूँ........कहते हुए रमदेई ने बगल में रखे धान कूटने वाले मूसल को उठा लिया और ईस तरह खडी हो गई मानो कह रही हो - बढो आगे.......देखूँ कितनी जवानी छाई है तुममें।




अब सदरू सोच में पड गये कि ये तो कुछ और ही हो रहा है। संभलकर बोले - अरे विज्ञानी लोग बोले हैं कि दिन में चार बार पतनी को गले लगाने से खुस्सहाली मिलती है, तभी मैं आया हूँ तुझे खुस्स करने और तू है कि ले धनकूटनी मूसल मुझी पर टूट पडना चाहती है।

अरे कौन विज्ञानी है जरा मैं भी देखूं उस मुंहझौंसे को........घोडा के फोडा नहीं तो.......वो कह दिया ये सुन लिये......जरा दिखा दो तो कौन गांव का है वो विज्ञानी-ध्यानी.......आये जरा......न गोबर में चुपड कर झाडू से निहाल कर दिया तो कहना........आये हैं गियानी-विगिआनी की बात लेकर। अरे ईतनी ही खुस्सहाली मिलती गले मिलने से तो वो किरपासंकर सबसे जियादे खुस्स होता.....जो रात दिन अपनी मेहरीया को ले घर में घुसा रहता है, ये भी नहीं देखता कि सब लोग यहाँ महजूद हैं......बस्स ........लप्प से घर में घुस गया.......मेहरीया भी वैसी ही है......न उसको सरम न उसको लाज।

सदरू को लगा रमदेई तो ठीक कहती है......अगर गले मिलने से ही सबको खुसहाली मिले तो कोई काम क्यों करे......सब अपनी अपनी मेहरारू को ले गले मिलते रहें और खुश होते रहें।

तभी बाहर लल्ली चौधरी की शरारत भरी आवाज आई - अरे भगत कहाँ हो.....अंदर घर में क्या कर रहे हो भाई........एतना कौन अरजेंटी आ गया।

रमदेई ने कहा - हाय राम ये कहाँ से आ गये साफा बाँधकर, फट् से बाहर निकलते कहा - अरजेंटी का तो ऐसा है चौधरीजी कि आज ये खुस्सहाली बाँट रहे हैं।

खुस्सहाली बाँट रहे हैं......तनिक हमको भी बाँटो भगत......अरे ऐसी कौन सी खुशहाली बाँट रहे हो कि रमदेई को ही बाँटोगे।

तभी सदरू भी बाहर निकल आये और लगभग चहकते हुए कहा - तुम्हे खुसी बाँटने का अभी बखत नहीं आया लल्ली........जिस दिन बखत आयेगा बता दूँगा....लेकिन एक बात है लल्ली भाई।

क्या ?

वो ये कि आज भी हमारी पतनी को समझ नहीं है कि विज्ञान क्या होता है.....खोज क्या होती है.......और उसके दम खुसहाली कैसे मिलती है।

लल्ली की कुछ समझ में न आ रहा था कि ये सदरू क्या आंय-बांय बके जा रहे हैं.....फिर भी सिर हिलाकर हुँकारी भरी जैसे सब समझ रहे हों।

तभी सदरू ने देखा पतोहू नहीं दिख रही है......अभी आया तब तो पैरों मे आलता वगैरह लगा रही थी।

पूछा - फाफामउ वाली नहीं दिख रही है, अभी जब आया तो यहीं थी।

लल्ली ने कहा- अरे अभी मैं आया तो देखा तुम्हारा बडा लडका रामलाल अपने दक्खिन वाले घर मे जा रहा था.......बहू भी पीछे-पीछे पानी लेकर गई थी......क्या हुआ जो ईतना पूछ ओछ रहे हो।

नहीं कुछ नहीं ऐसे ही पूछ रहा था.......वैसे लगता है आजकल की नई पीढी विज्ञानी लोगों की बात जरा जल्दी मान जाती है......है कि नहीं रामदेई.....।

इधर रामदेई को लगा जैसे उसे ही लगाकर यह बात कही गई है, बोली - हाँ हाँ.....बडे आये नई पीढी की वकालत करने.......अरे वो तो कम से कम खुस्सहाली बाँट रहे हैं मिलजुलकर......लेकिन तुमसे तो वो भी नहीं हुआ......जरा सा मूसल क्या देखा.....लगे बगलें झांकने........ईतना भी नहीं जानते कि सब लोगों का खुसहाली बांटने का तरीका होता है......कोई गले मिलकर खुसहाली बांटता है तो कोई मूसल लेकर........और जो मूसल लेकर खुसहाली बांटता है.....उसकी खुसहाली उ गियानी विगियानी लोगों की खुसी से कहीं ज्यादा होती है।

वो कैसे ?

वो ऐसे कि गले तो सब मिल लेते हैं......मूसल कोई-कोई को खाने मिलता है.......समझे कि बुलाउं कोई गियानी-विगियानी को।

लल्ली चौधरी को अब भी पल्ले नहीं पड रह था कि आखिर य़े किस मुद्दे पर बातचीत चल रही है, सो समझ लिया यहां से हट जाउं वही ठीक रहेगा, सो खंखारते हुए बोले- ठीक है भाई आप लोग खुसहाली बांटो, मैं तो चला अपनी भैंस ढूढने....न जाने कहाँ खुसहाली बाँटते फिर रही है।

लल्ली के जाते ही सदरू लपक कर रमदेई के पास पहुँचे - हाँ तो क्या कह रही थी तू कि मूसल खाने में खुसहाली मिलती है......सच।

अरे अब भी नहीं समझे का.......हम तो राजी थीं खुसहाली बाँटने.......तुम ही भाग आये मूसल की मार के डर से।

तो क्या वो तेरा मूसल उठा कर मेरी ओर झपटना सब नाटक था ?

हाय दईया.......अब तो लगता है सचमुच कोई गियानी-विगियानी बुलाना पडेगा जो ईनको मूसल वाली खुसी समझाये।

बगैर मुसल का डर दिखाये राजी हो जाती तो तुम ही कहते बडी उस तरह की हो.....।

ईधर सदरू लपक लिये रमदेई की ओर यह कहते.........जियो रे मेरी करेजाकाटू .

उधर धान कूटने वाला मूसल जमीन पर फेके जाने के बाद थोडी देर ढुलकता रहा और फिर न्यूटन के गुरूत्वाकर्षण बल से खुद एक ओर स्थिर हो पडा रहा मानो कह रहा हो - ये है न्यूटन का भाई ओल्डटन :)



- सतीश पंचम

Thursday, October 2, 2008

सूटेड बूटेड गृहमंत्री जब गाँधीजी को फूल अर्पित करेंगे।


आज वह मंजर देखने लायक होगा जब बार-बार कपडे बदलने वाले सूटेड-बूटेड गृहमंत्री, सिर्फ धोती पहनने वाले गांधीजी को श्रध्दा सुमन अर्पित कर रहे होंगे .....देखना चाहता हूँ कि उनके मन मे उस वक्त क्या चल रहा होगा ।



- सतीश पंचम

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