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Sunday, September 28, 2008

टीवी पर मास्टरमाईण्ड शब्द कई बार दिखाने से भडक गये स्कूल के मास्टर लोग (फुरहरी)


चाय की दुकान पर अन्य साथी मास्टरों का गुट जमा देखकर मास्टर दयाराम ने केदारनाथजी से कहा- चलो उस दुकान चलते है, देख रहे हो यहाँ तो जमघट लगा है.....न खुद चाय पियेंगे न दूसरों को पीने देंगे....जो खुद पियो तो इनको भी पिलाओ....। केदारनाथ भी इशारा समझ गये कि ज्यादा खर्चा नहीं करना चाहते मास्टर दयाराम, सो चल पडे नीचे मूड़ी करके मानो उन्होंने इन प्राईमरी के मास्टरों को देखा ही नही है और किसी काम के बारे में कुछ सोचते हुए जा रहे है। बगल में ही मास्टर दयाराम इस तरह चल रहे थे जैसे कोई गंभीर बात सोच रहे हैं और एकांत पसंद हैं। चलते-चलते कुछ दूरी पर शंकर चायवाले की गुमटी आ गई।

और बताओ दयारामजी...क्या हालचाल है - मास्टर केदारनाथ ने कच्ची मिट्टी के बने चबूतरे पर बैठते हुए कहा।

हाल क्या कहें, बस ये कहो कि आजकल रोज टीवी पर मास्टरमाईंण्डवा देखकर दिमाग घूम जाता है।

मास्टरमाईंण्ड ? जरा खुल कर बताओ भाई....।

अरे बताने लायक तो कुछ नहीं है...बस यूं समझिये कि हम प्राईमरी के मास्टरों को रोज टीवी पर गरियाया जाता है रेरी मारकर बुलाया जाता है। कहीं कोई पकडा गया तो कहते है मास्टरमाईंण्ड यही है इस बम के पीछे.....मास्टर माईंण्ड को पकडने के लिये टीमें बनी हैं। एक टीम डिल्ली गई है तो दूसरी कलकतवा गई है तो कोई पंपापुर....... अब बताओ कहां कहां ससूर लोग ढूंढ रहे हैं मास्टरमाईंण्ड को।

लेकिन ये कैसे मान लिया तुमने की वो मास्टरमाईंण्ड शब्द प्राईमरी के मास्टर लोगों को ही कहा जा रहा है - केदारजी ने कुछ माथे पर बल लाते हुए पुछा।

क्यों नही- कभी तुमने सुना है कि कोई सेकंडरी का मास्टर है......जब लोग सेकंडरी को पढाते है तो वो शिक्षक कहलाते है और आगे कक्षा वालों को पढाते हैं तो उन्हें टीचर कहते हैं और आगे बढो तो लेक्चरर, प्रोफेसर.....रीडर......कहाँ तक कहूँ......आप तो खुदै समझदार हैं। केदारनाथजी ने ऐसे सिर हिलाया - जैसे कह रहे हों बस अब कुछ मत कहो मैं समझ गया हूँ ।

तब तक एक आठ-दस साल का लडका कुल्हड में चाय लेकर आ गया.....। चाय का कुल्हड कुछ कच्चा सा रह गया था। एक तरफ चाय ने कुल्हड की बाहरी दीवार गीली कर दी थी, इधर इन लोगों की बातचीत जारी थी....।

मैं तो कहता हूँ एक प्रस्ताव लाया जाय अबकी बार प्राईमरी मास्टरों की मीटींग में.....और कहा जाय कि सभी न्यूज चैनल आज से कोई भी धमाका होने के बाद मास्टर माईंण्ड शब्द का ईस्तेमाल नहीं करेंगे क्योंकि एक तो पहले ही मास्टर लोगों का माईंण्ड प्राईमरी के बच्चे चर जाते हैं और जो माईंड बचा-खुचा रहता है उसे घर जाते है तो पत्नी चरती है कि कुछ टिउसन उसन करिये.....ऐसा कब तक चलेगा......। क्लास में प्रिंसिपल अलग कहते हैं कि मास्टरजी अपनी क्लास को माईंण्ड करिये, अब मास्टर ही तो है कहाँ तक माईंण्ड करें....उपर से ये न्यूज चैनल वाले रट लगाये रहते हैं मास्टर माईंण्ड - मास्टर माईंण्ड।

दयारामजी ने कहा - ये आप ठीक कह रहे हैं.....अबकी मिटींग में यह प्रस्ताव पास होना ही चाहिये।

तबतक कच्चे कुल्हड से चाय की बूंदे एक-एक कर रिसने लगीं, मास्टर दयाराम की धोती पर एक दो बूंदें गिरते ही उन्हें महसूस हुआ चाय गर्म है। फट् से चाय के कुल्हड को दार्शनिक अंदाज मे देखते हुए बोले - आप जानते हो केदारनाथजी कि मैं यहाँ उस दुकान को छोड इस दुकान पर क्यों आया हूँ ?

नहीं।

वो इसलिये कि मैं इस दुकान की चाय पसंद करता हूँ और वो आज साबित हो गया है।

कैसे ?

वो ऐसे कि जिस मिट्टी से ये कुल्हड बना है उस मिट्टी ने अपने में काफी छोटे-छोटे रंध्र बना कर रखा, और जब कुम्हार ने इस कुल्हड को आग में पकाया, उस आग ने भी इन छोटे-छोटे कुल्हड के छेदों को बनाये रखा.........और जब चाय बनी तो उस पानी ने जिसमें की चाय बनी , उसने भी मुझसे मिलने के लिये रास्ता इस कुल्हड में खोज ही लिया।

तो ?

तो ये कि आग, पानी, मिट्टी जब सब हमसे मिलना ही चाह रहे हैं तो हम कब तक बचे रहते, हम भी यहीं आ गये और अब देखो धोती पर चाय की बूंदें कैसे पसर कर आराम कर रही है जैसे उन्हे आज मुझसे मिलकर शांति मिली है।

केदारजी मास्टर दयाराम के इस तर्क से काफी प्रभावित लगे कि आग-पानी और मिट्टी इनको चाय से मिलाने के लिये एक हो गये......अभी बातचीत चल ही रही थी कि शंकर के रेडियो पर शाहरूख खान के एक फिल्म ओम शांति ओम का प्रचार आया

- अगर किसी चीज को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने मे लग जाती है।

मास्टर दयाराम अब भी अपनी कुल्हड को देख मगन हो रहे थे और न जाने क्या-क्या सोचे जा रहे थे- आग....पानी.....मिट्टी....कायनात...मिलन...... उधर मास्टर केदारनाथ सोच रहे थे कि प्रस्ताव का शीर्षक रखा जायगा - मास्टर माईंण्ड ।



- सतीश पंचम

Saturday, September 27, 2008

खेत में भैंस पडी और खदेरन चले मानहानि का मुकदमा करने अपने ही भाई पर वह भी अंबानी भाईयों की देखादेखी (फुरहरी)


खदेरन ने जब से सुना है कि अंबानी भाईयों के बीच दस हजार करोड की मानहानि का केस चल रहा है बेचैन हो गये और अपने भाई सुखरन पर मानहानि का मुकदमा दायर करने की ठानी। मुकदमे से पहले राय-बात के लिये सदरू भगत के यहाँ गये, देखा तो सदरू हुक्के को अपनी खटिया के पाये से टिका कर रख दिये और दोनों पैर खटिया पर उपर करके बैठे हैं।
मुदा अब क्यों मुकदिमा करोगे.....बाँट बखरा तो तुम दोनो भाइयों मे हो ही गया है फिर...- सदरू ने सरपंची अंदाज में कहा।

खदेरन बोले - अरे बाँट-बखरा हो गया तो क्या किसी की मुडी काट लेंगे.......मैं तो मुकदिमा करूँगा.....कि ये हमारे खेत में अपनी भैंस जान कर छोडे हैं, मेरी छीछालेदर करना चाहते है, मैं तो नालिश तक करवाने की सोच रहा हूँ ।

सदरू बोले - अरे पड गई होगी अपने आप ही.....भैंस को क्या पता कि ये तुम्हारा खेत है.....वो तुम्हारा......उस भैंस को तो अब भी यही लग रहा होगा कि दोनों खेतों के मालिक एक ही हैं......वो अपने पुरानी जगह ही चर रही थी........ तो चलो मान मलौवल कर लो......काहे एतना जान दे रहे हैं कि मुकदिमा करोगे.....कोरट कचहरी करोगे। खदेरन फिर भी हाँ छोड न कहने को तैयार ही नही...जिद फान ली कि मुकदिमा करूँगा तो करूँगा.....तब सदरू भगत अपने असली रंग में आए....बोले - तुम्हारी बुध्दि घास चरती है क्या......।

माने ?

माने गदहा का वो ......ससुर आये हो मुकदिमा और जाजिम बिछाने......अरे तुम्हारी बुध्दि कितनी चलती है ये तो मैं तब ही जान गया था जब तुम दोनो भाईयों में अलगौजी हुई थी.....। अलगौजी के अगले ही दिन तुम अपने नये घर मे रामायण पाठ करवाये थे कि भाई से पिंड छूटा अब तुम नया जीवन सुरू करोगे.....नया परिवार खडा करोगे.......लेकिन बच्चा भूल गये कि रामायन में भाई-भाई का प्यार बताया गया है....मोह-बिछोह बताया गया है कि एक भाई को अपने भाई के साथ कैसे रहना चाहिये और तुम करवा रहे थे रामायण पाठ......आँख के अंधे और नाम कजरौटा सिंह.....।

खदेरन अब भी चुप बैठे सुन रहे थे....उम्मीद नहीं थी कि सदरू इतना भडक जाएंगे।

सदरू ने आगे कहना जारी रखा - अरे तुम जिनको देख सुनकर मुकदिमा करने का मन बनाये हो वह भी तुम्हारी तरह ही है......उस दिन नंदलाल साह के दुकान पर टीवी देख रहा था तो देखा ये धन्ना सेठ दोनों भाई आपस मे अलगौजी करते समय काफी विवाद किये.....सबसे कहे कि हमारा बाँट-बखरा कर दो....हम दोनो भाई साथ नही रहना चाहते तो जानते हो उस समय बगल में कौन खडा होकर ये सब देखताक रहा था ......एक रामकथा बाँचने वाले प्रसिध्द बापू जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हे ईनके परिवार बहुत मानते है, कोई विवाद हो तो उनसे राय लेते है, .....लेकिन ये बापू यह नहीं कह सके कि मैं तो रामकथा बाँचता हूँ....मैं क्यो भाईयों के अलग होने मे मदद करूँ जबकि रामायण मे भाईयों को एक होते बताया गया है......तब सारी रामायणी धरी रह गई थी........तुम आये हो उन धन्ना सेठो का नकल करने।

ईधर सदरू भगत की पत्नी रमदेई अलग भुनभुना रही थी.......आ गये हैं.......अब चलो इनको चाह - पानी पियाओ..........खुद अपने यहाँ झगडा करेंगे और हमारे यहाँ आकर लहरा लगा देंगे चाह दो......तमाखू दो........हे पानी दो.........।

तभी किसी ने कहा - अरे खदेरन तुम्हारी बकरी तुम्हारे भाई के खेत में पड गई है, जल्दी जाओ न अभी बवाल हो जायगा।

सुनते ही खदेरन उठ कर चल दिये कि जल्दी से बकरी को हटा लूँ न अभी मुझपर ही न मानहानि का दावा हो जाय। इधर रमदेई का भुनभुनाना जारी था.......अरे कैसे तो कहा गया है कि कैसे तो मान और कैसे तो न मान। तभी रमदेई की लडकी रतना ने चुपके से भौजी की उंगली टीपते कहा - अम्मा को बोलना भी नहीं आता, कहती है कैसे तो मान और कैसे तो न मान........ यह नहीं कि कहें - मान न मान मैं तेरा मेहमान।

रतना के कहे शब्द शायद खदेरन ने सुन लिये थे.......खदेरन के मुह से बरबस निकला ........ यहाँ भी मानहानि ।

- सतीश पंचम

Wednesday, September 24, 2008

तुम इतना जो टिप्पणीया रहे हो, क्या कोई पोस्ट लिखा है जिसे सबको बता रहे हो। (हँसी-पडक्का)


तुम इतना जो टिप्पणीया रहे हो,

क्या कोई पोस्ट लिखा जो सबको बता रहे हो।

लंगडी-लूली पोस्ट लिखी बेकार ,
पर मुझे खूब जमा बता रहे हो,

बन जाएंगे लिक्खाड लिखते-लिखते,
ऐसा वहम क्यूं पाले जा रहे हो,

जिन मुद्दों को सबने छोड दिया,
तुम क्यूं उनको छेडे जा रहे हो,

क्या कोई पोस्ट लिखा जो बता रहे हो।

पोस्ट मे लिखते हो खाया मुर्ग-मुसल्लम,
देखा तो दाल भात खा रहे हो

ब्लॉग जगत मे दहाडते हो शेर की तरह,
घर में देखा तुम लात खा रहे हो

टिप्पणीयों का खेल है ब्लॉगिंग,
टिप्पणीयों में ही मात खा रहे हो,

क्या कोई पोस्ट लिखा जो बता रहे हो।
:)
- सतीश पंचम

( कैफी आजमी की नज्म से साभार पैरोडीयाना )

Tuesday, September 23, 2008

एनडीटीवी पर जामिया के वीसी ने ये क्या कह दिया


एनडीटीवी पर रात दस बजे जामिया युनिवर्सिटी के वाईस चांसलर कराहते हुए से कह रहे थे मैं तो अपने उन बच्चों के साथ रहूँगा....उन्हें कानूनी सहायता दूँगा.....एक अभिभावक की तरह मेरा फर्ज बनता है कि मैं अपने युनिवर्सिटी से जुडे बच्चों का साथ दूँ जो आज मुसीबत में फंसे हुए हैं। लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही वीसी कि आज जब वे सारे आतंक के शोहदे स्वीकार कर चुके हैं कि उनका बम विस्फोटों में हाथ था......तो किस बिना पर वीसी ने इतनी बडी बात कह दी......क्या ये विचार रखते समय वीसी ने खुद भी कभी एक बार सोचा था कि इसका अंजाम क्या होगा....युनिवर्सिटी को लोग किस नजरों से देखेंगे..........। जहाँ तक मेरी समझ है.....जब देश किसी गहरे संकट की ओर जा रहा हो तो समझ लेना चाहिये कि किसी पढे लिखे चालाक बुद्धिजीवी ने अपना मुह खोला है या फिर कोई समझदार बुद्धिजीवी अपने काम को करने से जान बूझकर बच रहा है........ऐसा देश के बंटवारे के समय हम देख चुके है। आज फिर वही परिस्थितियां बनती दिख रही हैं.......जम्मू और कश्मीर अलगाव पर तुले ही हैं दूसरी ओर ये तथाकथित मुस्लिम एलीट क्लास इस आग में और घी डाल रहे हैं.......। सरदार पटेल ने बंटवारे पर कहा था कि सिर दर्द से बचने के लिये सिर कटाना हमने बेहतर समझा.......लेकिन मैं ये जानना चाहता हूँ कि अब तो पूरे बदन में आग लगी है.....हर अंग जल रहा है.....दर्द दे रहा है.......कहाँ तक क्या-क्या अंग कटा दें कि दर्द से छुटकारा मिले। तो बात हो रही थी वीसी के दिये बयान की.......आप यकीन मानिये....इस बयान की खनक हमें अगले कई सालों तक सुनाई पडेगी क्यों कि बोलने के लिये भले वीसी बोले हों लेकिन असल में यह कुछ लोगों की मानसिकता बोल रही थी कि चाहे कुछ हो जाय हम इस देश के लोगों से अपना विरोधाभास जारी रखेंगे। यह मानसिकता हांलाकि बहुत कम लोगों में है लेकिन देर-सबेर यह अपना असर दिखा कर रहेगी और दिखा भी रही है.......आखिर आज किसी पढे लिखे बुद्धिजीवी ने अपना मुह फिर खोला है।

- सतीश पंचम

Monday, September 22, 2008

बाँस के बने अंडरवियर से हैरान देहात !


     सामुज यादव ने जब से सुना है कि बाँस के बने अंडरवियर बाजार में आ गये हैं तब से सोच रहे हैं कि लोग उसे पहनते कैसे होंगे.....चुभता तो होगा ही....बाँस जो ठहरा। आम के पेड के नीचे बैठे रहर की सीखचों से खाँची (टोकरी) बनाते सामुज के मन में रह-रह कर यह सवाल आ रहा था....कहें तो कहें किससे.....सभी अपने काम में व्यस्त....कडेदीन अपने खेतों में रहर बो रहे हैं......फिरतू चमार आज रामलखन केवट के यहाँ जुताई कर रहे हैं......मन की बात कहूँ तो कहूँ किससे ? तभी साईकिल से आते मास्टर लालराम प्रजापति दिखाई पडे। दूर से ही सामुज बोले - "अरे कहाँ जान दे रहे हैं ई भरी दुपहरीया में ?....क्या करेंगे इतना रूपया कमाकर ?"

    सामुज की बात को अपने से बातचीत का न्योता समझ मास्टर अपनी साईकिल सीधे आम के पेड के नीचे ले आये। साईकिल से उतरते हुए कहा......"अरे तुम्हारी तरह आम के पेड के नीचे बैठ खाँची बनाने जैसा आरामदेह काम थोडे है कि बस हाथ और मुँह चलाते रहो बाकी सब काम होते रहे"

"अरे तो आप भी तो वही करते हैं - मुँह - हाथ चलाते हैं.....कोई लडका सैतानी किया तो बस हाथ की कौन कहे कभी-कभी पैर भी चलाने लगते हैं" - सामुज ने हँसते हुए कहा।

मास्टर सिर्फ सिर हिलाकर हँसते रहे और साथ ही साथ साईकिल को पेड के तने से सटा कर खडा भी कर दिया।

  सामुज ने धीरे-धीरे बात को मोडते आखिर पूछ ही लिया - "अच्छा ये बताओ मास्टर - कि लोग बाँस की बनी अंडरवियर कैसे पहनते होंगे ?"

 "बाँस की बनी अंडरवियर ?" मास्टर के मन में जिज्ञासा जगी कि ये क्या कह रहे हैं सामुज यादव, भला बाँस का भी अंडरवियर होता है कभी...पूछ ही लिया....."ये किसने कह दिया तुमसे कि बाँस का अंडरवियर होता है?"

   सामुज ने फट से वो अखबारी कागज निकालकर दिखाया जो हवा से उडते-खिसकते उसी पेड के नीचे आ पहुँचा था जहाँ वो खाँची बना रहे थे- लिखा था - "लंदन में बाँस के रेशों से बनी इकोफ्रेंडली अंडरवियर बनी है जो कि लगभग तीस पाउंड की है....."। मास्टर ने पहले तो उस धूल-धूसरित कागज को ध्यान से देखा.....फिर कुछ सोचने की मुद्रा बनाई और कहा - "इकोफ्रेडली माने - पर्यावरण का मित्र.....तीस पाउंड माने केतना होता है कि......एक गुडे अस्सी माने अस्सी गुडे तीस....माने चौबीस सौ.....यानि अढाई हजार का अंडरवियर.........। हाँ तो सामुज वो अंडरवियर अढाई हजार का है और उससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचता......यही लिखा है इस कागज पर...."।

"तो क्या हम लोग जो पहनते हैं उससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है क्या......ये नई बात सुन रहा हूँ......"।

 मास्टर भी सोच में पड गये कि बात तो ठीक ही पूछी है.......वो जो सन्नी देओल आकर कहता है......चड्डी पहन कर चलो और न जाने क्या-क्या तो ईसका मतलब सब पर्यावरण के खिलाफ ही बोल रहा है क्या, कहीं ये अमीरों के चोंचले तो नहीं हैं।

सामुज बोले - "अरे अढाई हजार की चड्डी कौन पहने......और फिर हम तो वो हैं कि पट्टेदार नीली चड्डी पहनते है..........शकील मिंया की दर्जियाने में दस रूपये में सिला ली......नाप ओप का झंझट नहीं........सालों से जानते है कि मेरा साईज क्या है.....पहनने में भी आसान, खुला और हवादार"।

 मास्टर बोले - "अब खुला और हवादार का बखान मत करो मेरे सामने......उस दिन देख रहा था यहीं इसी पेड के नीचे तुम्हारी आंख लग गई थी......तुम्हारी धोती जरा सा बगल में क्या खसकी......गाँव के लडकों को मानों कोई खेलने का सामान मिल गया........सब तुम्हारी खुले मोहडे वाली चड्डी में देख-देख हँस रहे थे और तुम बेफिक्र सो रहे थे। लडके छोटे-छोटे पत्थर तुम्हारे उस खुले स्थान पर फेंक रहे थे। वो खदेरन का लडका दग्गू एक पतली लकडी से तुम्हारे चड्डी में कोंच न लगाता तो तुम उठते भी नहीं, सोये ही रहते"।

 सामुज ने हँसते हुए कहा - "अरे तो लडके हैं अब शरारत नहीं करेंगे तो कब करेंगे। और जहाँ तक पर्यावरण प्रेमी की बात है तो मैं तो खुले और हवादार में होना पसंद करूँगा वही सबसे ज्यादा ठीक लग रहा है"।

    "तो इस मायने में तो वो अंगरेज लोग ज्यादा ही पर्यावरण प्रेमी होंगे जो चाहे समुदर हो या नदी फट से ओपन हो जाते हैं" - मास्टर ने हँसते हुए ही कहा। तभी झिंगुरी सिर पर बोझा लिये आते दिखे.......मास्टर ने कहा-  "वो देखो कितना बडा पर्यावरण प्रेमी आ रहा है.......आज तक कभी इसने धोती के अंदर चड्डी नहीं पहनी.......अढाई हजार की कौन कहे अढाई रूपये का भी खर्चा नहीं है इस पर्यावरण प्रेम में......न रहे बाँस और न बजे बाँसुरी" :)


- सतीश पंचम

Saturday, September 20, 2008

मुंबई लोकल में दिखा ऐक संताप (रेल वाकया)


कल लोकल ट्रेन में दो लडकों की बातचीत चल रही थी....किसी तीसरे के बारे में.....अरे वो तो कोसी रीवर की तरह है...किधर भी बहता है......जिधर नहीं बहने का उधर भी बहता है.....। सुनकर मेरी जिज्ञासा बढ गई ........ आखिर कोसी के रौद्र रूप को उदाहरण बनाया जा रहा था......तभी एक ने कहा- साला कभी संगीता के पीछे पडता है कभी मनीषा के पीछे......और कभी तो रिया को भी चाय-बी पिलाते रहता है। साले को किसके पीछे पडने का येईच नहीं मालूम। उन लोगों की बातचीत सुनकर आप भी समझ गये होंगे कि आखिर बातचीत की धार किस तरफ चल रही थी । तब तक दूसरे ने कहा - अरे उसको मैं बोला - सीधे से एक को पकड....शादी बना डाल.....लेकिन येडे को अकल नहीं माँ के दीने को.....। और दोनों हंसने लगे.....लग रहा था वही हैं.....दूसरों के होने न होने से उन्हें कोई फर्क नही पडता.....। अभी ये सिलसिला चल ही रहा था कि टिकट चेकर आ गया.....इधर ईन दोनों का हँसना-खिलखिलाना चल ही रहा था। टीसी ने टिकट मांगा तो दोंनों ने आराम से अपने अपने पैंट की पिछली जेब में हाथ डाल कर पर्स निकाला और उसमें रखे मन्थली पास को आगे किया। टीसी ने एक नजर उनके पास पर डाली और आगे बढ गया। दोनों वापस अपनी उसी मुद्रा में आ गये.....कोसी की धारा अब भी उनके मुख से बीच-बीच मे फूट पडती । उनके हँसी-ठिठोली को जारी देख एक बूढा पास आया और बोला....तमारे को कोसी नाम में मज्जा लगता ऐ......उधर ईतना लोग का घर बार गिरेला है अन तमे मज्जा आवी ने....शेम ऑन यू डीकरा.......अरे कबी तो सिरियस होने का.....। बूढे का इस तरह बोलना कुछ ऐसा असर कर गया कि दोनों चुप हो गये और लोग उत्सुक हो देखने लगे कि देखें आगे क्या बोलता है बूढा। लेकिन वो बूढा कुछ नहीं बोला। उठकर ईन लोगों के पास आ जाने के कारण अब उस बूढे की सीट पर कोई दूसरा बैठ गया था। बूढा वहीं पास ही एक जगह खडा रहा। अब जो शख्स उस बूढे की सीट पर बैठ गया था वह उठा और उसने कहा - अंकल बैठ जाओ......। लेकिन बूढा बाहर की ओर देखता रहा....रेल अपनी उसी रफ्तार से जा रही थी......। अगला स्टेशन आया....और बूढा उतर गया। तभी उन दोनों छोकरों में से एक बोला......लगता है सरक गएला है........। दूसरा बोला - देख ना यार.....कुछ जान पेचान नहीं.....तू कौन.......मैं कौन.......खाली पीली आ के सुना डाला। अगले स्टेशन पर वो दोनों भी उतर गये.....और मैं सोचता रहा......उस बूढे के बारे में जो बिहार में आई बाढ की त्रासदी पर मजाक बर्दाश्त न कर सका.....उन लडकों के शब्द अब भी कानों में गूँज रहे थे........लगता है सरक गएला है।



- सतीश पंचम

Thursday, September 18, 2008

टीवी पर दिखे टोटके से परेशान बूधन महतो (फुरहरी)


आम के पेड के नीचे बैठे बूधन महतो अपनी जाँघ पर सुतली को बर(मरोड) रहे थे जिस्से रस्सी बना सकें, कि तभी खदेरन और झिंगुरी हल बैल लेकर जाते हुए दिखे..... इतनी दोपहरीया में ई लोग कहाँ जोताई करने जा रहे हैं जबकि गर्म लूह और तपिश के मारे बाहर मुँह निकालने में पतँग पडी है। बूधन महतो ने दूर से ही पूछा - कहाँ जा रहे हो जोडी-पाडी मिलकर। पेड की छाँह देख पास आते झिंगुरी ने कहा- देख नहीं रहे हो....हल-बैल लेकर जा रहे हैं तो खेत में ही जा रहे हैं......कहीं कोई ईनार-कुआँ खोदने थोडे जा रहे हैं....हल लेकर। अरे तो कोई टैम होता है हल जोतने का.........सभी किसान लोग सुबह ठंडे-ठंडे जोत लेते हैं कि बैलों को भी आराम रहे....औऱ खुद भी बीमार होने से बचें.......नहीं तो सीत-घाम .......ठंडी-गर्मी......मार डालेगी कि जीने देगी.......आये हो बडे हल जोतुआ - बूधन महतो ने कुछ नाराजगी भरे स्वर ने कहा। खदेरन ने कहा - टैम देखकर ही तो जोताई करने निकले हैं.....अभी-अभी राहु खतम हुआ है.....सो चल पडे हल बैल लेकर। राहु खतम हो गया है.....कब.....कैसे......अभी कल ही तो साईकिल से अपने मामा के यहाँ जा रहा था- बूधन महतो ने कुछ अचरज भरे स्वर में कहा। झिंगुरी बोले - अरे उ राहुला बनिया नहीं.......आप को तो केवल राहुल नाम के बनिये का पता है सो लगे हो राहु ......राहु जपने.........राहु माने गिरह....नछत्र वाला राहु.....उ राहु जब होता है तो कोई ढंग का काम नहीं करना चाहिये....देख नहीं रहे.....बडे बडे नेता लोग भी अब राहु को बचा कर चलते हैं......पाटी का कारकरम हो तो उसे भी जोतखी और ओझा-सोखा से समय ज्ञान लेकर करते है। बूधन महतो बोले - समय ज्ञान लेकर ......इ कौन नया परपंच है भाई। ........आज तक तो नहीं सुना था। झिंगुरी ने कहा - अरे कैसे सुनोगे.....खुद तो कभी टीबी-फीबी देखते नहीं हो.......अरे बंगलोर नाम का कोई जगह है जहाँ भाजपा पाटी का कोई कारकरम है......सब लोग बता रहे हैं कि टोटका-ओटका खुब हुआ है......मँच की दिसा बदल दी गई है.........झँडे मे कमल का रंग पीला कर दिया है और समय को ध्यान मे रखकर कहा गया कि कौन कब बोलेगा.......कौन कब बोलेगा। अब खदेरन ने मोर्चा संभालते हुए कहा - अरे जब ऐतना बडमनई लोग समय दिसा का ईतना ख्याल रखते है तो हम लोगों को तो रखना ही चाहिये.......क्या कहते हो । बूधन महतो ने मुस्की मारते कहा - जहाँ तक समय दिसा की बात कर रहे हो तो एक बात जान लो......हम आजतक केवल दिसा उसा का ख्याल किये हैं तो केवल दिसा मैदान के समय........और सच कहूँ तो तुम भी ईस खटकरम मे काहें अपना बखत खराब कर रहे हो........अरे ई कुल टीम-टाम......गिरह.......नछत्र उन लोगन के लिये है जिनके पास कौनो काम नहीं है......जिनके पास बहुत टाईम ओईम है, उनके लिये है...........तुम लोग कहाँ इन लोगों के चक्कर मे पड रहे हो। कल को कहेंगे कि समय ठीक नहीं है.......फलाना नछत्र चल रहा है........बोवाई चार दिन बाद करो तो क्या तुम उनका कहा करोगे कि अपना काम करोगे... बरखा-बूनी तो कौनो टैम-टूम देखकर तो नहीं बरसेंगे, ...........लडिका - बच्चा कल जब रोटी मांगेगे.....तब क्या कहोगे कि नछत्र ठीक नहीं था ईसलिये समय पर बोवाई न हो सकी, अरे जाओ......सुकर मनाओ कि अभी थोडा ही गदहा खेत खाया है.....कल को बाढ राहत का सामान भी गिरह-नछत्र देख कर बंटेगा .....खदेरन और झिंगुरी केवल सिर हिलाने का काम कर रहे थे कि तभी कोई राही अपनी साईकिल पर जाता दिखाई दिया,धूप और लू से बचने के लिय़े अपने सिर और मुँह को कपडों से कसकर बाँधे हुए, बगल में रेडियो लटकाए अपने में ही मगन वह राही चला जा रहा था......रेडियो पर कोई फिल्मी गीत बज रहा था.... तोहे राहु लागे बैरी, मुस्काये है जी जलायके......। खदेरन ने झिंगुरी से कहा....तो क्या कहते हो....चलें वापस....हल लेकर घर से आ रहा था तो दग्गू की माई भी कुछ ऐसा ही गा रही थी..... मोरा गोरा अंग लेई ले :)

- सतीश पंचम

Tuesday, September 16, 2008

चिखुरी की बहू और गृहमंत्री के कपडे (फुलकारी)


चिखुरी की पतोहू ने एक साडी क्या बदल कर पहनी, सास कह रही थी क्या खुद को गृहमंत्री समझती है जो बार-बार कपडे बदल रही है। चिखुरी को भी बडा अजीब लग रहा था कि आखिर जब घर में ही है तो बार-बार कपडे बदलने का क्या तुक......ईधर चिखुरी का बेटा सोभई अलग नाराज कि एक साडी ही तो बदल कर पहनी है, उसमें इतना बवाल करने की क्या जरूरत है, लोग गृहमंत्री होने का ताना अलग दे रहे हैं। लेकिन हाय रे कौवा-मझान, पतोहू के बारे में कोई नहीं सोच रहा कि वो क्या सोच रही है, उसके मन में क्या चल रहा है......सब उसी को कह रहे हैं कि क्यों गृहमंत्री के तरह बार-बार कपडे बदल रही है, यह नहीं देखते कि झिंगुरी की पतोहू दिन में चार बार सीसा-कंघी लेकर दरवाजे पर जा बैठती है, ओठलाली लगाती है, रह-रहकर एक नरम रूई जैसी गद्दी से गले पर पौडर की फुहार करती है, उसे कोई कुछ नहीं कहता, सब उसे ही क्यों कह रहे है.......वो रामदीन की बिटिया.......ब्याह हो गया......पति बाहर देस कमा रहा है......लेकिन खुद नैहर में टीप-टाप से रहती है.....क्या मजाल जो एक दिन बिना ओठलाली लगाये दिख जाय, बिसाती आता है चूडी-कंघा लेकर तो घंटो मोल-भाव करेगी, यह कितने का.....वह कितने का.....हँस-हँसकर उससे बतियाएगी.....चूडी लेगी तो उसमें भी चार घंटा लगा देगी......वह सब किसी को नहीं दीख रहा है.....और वो फाफामऊ वाली छोटकी पतोहू.....दिन मे चार बार कहेगी कि मुन्ना ने गीला कर दिया इसलिये कपडे बदल रही हूँ......कह लो......मैं भी कभी यही कहकर मन की अहक पूरी करती थी, आज बच्चे बडे हो गये तो क्या.....अपनी साध पूरी करने के लिये मैं बच्चों के नाम का सहारा क्यों लूँ.....मैं तो खुलेआम दिन मे चार बार कपडे बदलूँगी....देखती हूँ कोई क्या कहता है......अरे यही तो दिन है मेरे, अब न पहनूँगी तो कब पहनूँगी......बुढौती में गृहमंत्री कपडे बार-बार बदलकर पहन सकते हैं तो मैं क्यों नहीं, आखिर मैं भी तो आज न सही कभी तो सास-ससुर के बाद गृहमंत्री बनूँगी ही.....तब आज ही क्यों न अहक पूरी कर लूँ.....फिर कल को क्या पता सरकार ही बदल जाय.....और गृह मंत्रालय छिन जाय, छोटा देवर भी तो आजकल अपने माँ-बाप का दुलारा बना फिर रहा है। अभी पतोहू यह सब सोच ही रही थी कि पतोहू के बडे बेटे ने आकर कहा - अम्मा भूख लगी है....खाना दो। पतोहू के मन मे तूफान मचा था और इधर ये नासपीटा खाना मांग रहा है.....भभककर कहा - क्या खाना-खाना लगा रखा है.....अभी तो दिया था ईतनी जल्दी भूख लग गई......पेट है कि मडार.....भरता ही नहीं है। बेटा अवाक्.....कहे तो क्या कहे.......सुबह को खाया था......अब जाकर शाम को माँग रहा है......उसपर भी दुर-दुर हो रही है......कहा - कहाँ अम्मा, सुबह दिया था......उसके बाद नहीं......। बाहर चिखुरी बैठे सुन रहे थे.....कहा - कैसे देगी.....कपडे बदलने से फुरसत मिले तब न........अरे जब ईसका बाप मेरे यहाँ रिस्ता लेकर आया था.....तभी मना कर दिया होता तो काहे को ईतना भोगना पडता........गृहमंत्री बनी फिर रही है........। सास क्यों चुप रहती......वह भी मैदान मे कूद पडी - अरे गृहमंत्री भी ईतने तेजी से कपडे नहीं बदलते जितना तेजी से ये छछन्न करती है......अभी कोई साडी वाला बिसाती आ जाय तो देखो......एक पैर पर दौडी चली जाय.....यहाँ लडका भूख से मर रहा है उसकी फिकर नहीं है.......इंतजार कर रही है बिहार के उस नेता की तरह .......फीता काट कर घाटन करे तब जाकर भोजन दे......कुलअच्छिनी कहीं की। अभी यह सब चल ही रहा था कि बाहर बर्फ गोले वाला आया.......बेटे ने खाना छोड बर्फ का गोला लेने की दौड लगाई......ईधर चिखुरी को किसी ने आकर कहा......सरपंच बुलाये है.....कोटा पर मिट्टी का तेल आया है जल्दी पहूँचो नही खत्म हो जायगा......सास ने सुनते ही दौड लगाई कि वह मिट्टी के तेल वाला डब्बा ढूँढ लूँ........नहीं मिलते-मिलते तेल ही न खत्म हो जाय........उधर पतोहू मन ही मन कह रही थी..........अब तक तो आराम से दिन मे एक दो साडी बदल लेती थी ......कोई कुछ कहता भी था तो दूसरे को लगाकर कहता......अब तो खुलेआम कह देते हैं........क्यों गृहमंत्री की तरह बार-बार कपडे बदल रही हो, गृहमंत्री भी तो जितेन्द्र की तरह सफेद जूते पहन कर ईठलाते रहते हैं......हाय ये बुढापा जो न कराये.......बार-बार कपडे बदलो, कंघी करो, सफेद जूते पहनों....लोग मर रहे हों तो अपनी साध पूरी करो कि मैं तो साफ सुथरा रहना पसंद करता हूँ.....अरे बात गाँधी की करोगे लेकिन भूल जाते हो कि उन्होंने एक धोती के सिवा कुछ और पहनना ईसलिये स्वीकार नहीं किया कि मेरे देश के लोगों को कपडा नहीं मिल पा रहा तो मैं क्यों ढेर सारा कपडा पहनूँ....अब कभी गाँधी की मूर्ति के आगे से गुजरना तो मन में यह जरूर सोचना कि वह आदमी सिर्फ धोती क्यों पहने है....लेकिन तुम जैसे लोगों में अब सोचने की शक्ति ही कहाँ रही....सारी शक्ति तो कपडों की खूबी में समाई है.....लानत है तुम जैसे लोगों पर...........और आखरी बात सुन लो.....दो अक्टूबर नजदीक ही है....हम सभी देखना चाहेंगे....कि तुम उस दिन गांधीजी की प्रतिमा पर जब सभी सांसदों के साथ फूल मालाएं अर्पण करोंगे तो उस समय तुम्हारे मन में क्या चल रहा होगा.......तुम्हारे हावभाव कैसे होंगे.....दो अक्टूबर...नजदीक ही है।

- सतीश पंचम

Monday, September 15, 2008

शर्तिया ईलाज से परेशान सदरू भगत (हँसी-पडक्का)


अरे क्या तुम्हारा दीदा फूट गया था जो ई पूरे घर को नासपीटे बिज्ञापन से रंगा बैठे हो, चार दिन नैहर क्या गई ....घर को रसलील्ला अखाडा बना दिया - रमदेई ने सदरू भगत से कहा। सदरू कहें तो क्या कहें, चार अच्छर पढ लिये होते तो आज ये दिन न देखना पडता, कम्बख्तों ने बिज्ञापन भी छापा है तो शर्तिया ईलाज वाला.....गुप्त रोग, नामर्दी, स्वप्नदोष, श्वेत प्रदर और न जाने क्या-क्या पढकर सुना रहा था बासदेव का लडका, कह रहा था कोई डॉक्टर खान का बिज्ञापन है जो रोग-ओग का ईलाज करते हैं। उन्हें तभी ईन्कार कर देना चाहिये था जब वो घर के दीवाल पर बिज्ञापन छापने वाले रंग रोगन लेकर आये थे, कह सकते थे कि हम अपने घर पर ईस तरह का बिज्ञापन नहीं लगने देगे, बहू-बेटियों का घर है, लेकिन हाय रे अपढ बुढापा, पूछने पर इतना बताया कि दवा वाला, डॉक्टर वाला विज्ञापन है, आप का घर सडक के पास ही है सो उस घर की दीवाल पर बिज्ञापन छापेंगे बदले में सौ-पचास दे भी देगे, बाहर से घर भी रंगा देंगे सो भी आपको सुभीता हो जायेगा, जब से घर बनवाये हो लगता है कभी चूना छोड कोई दूसरा रंग नहीं लगाया, अब हम लगा देंगे। ले दे कर एक दिन मे रंग पुता गया, दूसरे दिन लिख उख कर काम खतम, सौ रूपये मिले सो अलग, लेकिन क्या जानते थे कि ये जी का बवाल बो रहे हैं, सोचे थे लाल तेल या काढा-ओढा का बिज्ञापन होगा, लेकिन ये तो शीघ्रपतन, स्वप्नदोष और नामर्दी वाला बिज्ञापन है । ईधर रामदेई पूरे उफान पर थी, क्या बडी बहू और क्या छोटी बहू सबकी खबर ले रही थी, घर न हुआ चकचोन्हरों का अड्डा हो गया, जो आता है घर की ओर ताक कर हँसता है.....हँसेंगे नहीं जब हँसने लायक काम किये हैं तो......वो रामजस खटिक ऐक आदमी को रस्ता बता रहा था कि सीधे चले जाईये, वहीं बगल मे एक शीघ्रपतन वाला घर आयेगा, बस वहीं से मुड जाईयेगा......नासपीटा......बोली बोल रहा था.......खुद के घर की बहुरिया भले यहाँ वहाँ लपर-झपर करे लेकिन दूसरे के घर का नाम रखने मे ये आगे रहेंगे......हँसो और बोलो......ईस घर के लोग ही जब हँसाने के लिये जोर लगाये हों तो और हँसो। तभी बडी बहू बाँस के झुरमुटों की आड से आती दिखी , साथ मे ननद रतना भी थी। कहाँ से आ रही हो दोनों जनीं - रमदेई ने उसी रौ मे पूछा। रमदेई की फुफकारती आवाज से दोनों समझ गयीं कि आज अम्मा उधान हुई है....कहीं कुछ बोली तो चढ बैठेंगी.....रतना ने ही कहा - भौजी का पेट दुख रहा है.......दवाई लेने गई थी। रमदेई कडकते बोली, अरे तो उसी नासपीटे डाकटर से ही ले लेती जिसका नाम घर पर चफना लाई हो....ये नहीं कि रोक-छेंक लगाती कि ऐसा बिज्ञापन नहीं लगने देंगे.....बस कोई आये चाहे घर ही लूटकर चला जाय लेकिन मजाल है जो इस घर के लोग चूँ तक बोले.....। लोगों की भीड बढती जा रही थी, हर कोई किसी न किसी बहाने इसी ओर चला आ रहा था, सब को मानों ऐक ही साथ काम निकल आया......कोई दुकान जा रहा था तो कोई खेत देखने , किसी को तो अपनी भैंस ही नहीं मिल रही थी, जाने चरते-चरते कहाँ चली गई.........लेकिन खोजने वाला रमदेई के यहाँ जरूर देखता चला......देखो आज सब कोई देख लो कि ई शीघ्रपतनौआ घर कैसा होता है। कान खुजाते रमदू कोईरी बोले - मुदा हम तो समझे कोई टक्टर-ओक्टर का या बिस्कुट-उस्कुट का बिज्ञापन छापने आये हैं....ईसलिये मैं तो कुछ न बोला....दो दिन घर से फुरसत ही न पाया, आज देखा तो ये हाल है.....। इधर सदरू भगत मन ही मन कह रहे थे - खूब हाँक लो बच्चा, तुम भी तो वहीं थे जब वो लोग कलाकारी कर रहे थे....अब कैसे गाय बन गये हो। लल्ली चौधरी बोले - अरे तो क्या हो गया जो ईतना बावेला मचाये हो.......घर को रंग-ओंग दिया, जितना कीडा-उडा होगा सब मर गया होगा, सौ रूपया मिला सो अलग, अब क्या डॉक्टर अपना घर ही उठा कर दे दे। रमदेई लिहाज करती थी लल्ली चौधरी का - एक तो गाँव के बडमनई, दूसरे दूर के रिश्ते मे बहनोई.......धीमे-धीमे ही भुनुर-भुनुर करती बोली - ये और आये हैं आग लगाने - अरे ईतना ही चाव है कीडा मरन्नी का तो अपने घर ई बिज्ञापन रंगा लेते......घर के कीडा के साथ , दिमाग का कीडा भी मर जाता......आये हैं साफा बाँधकर । रामराज ड्राईवर जो हरदम अपने साथ रेडियो लेकर चला करते थे वह भी आ गये थे बवाल सुनकर, रेडियो अब भी उनका बज ही रहा था........तुलबुल परियोजना पर भारत पाकिस्तान वार्ता शीघ्र शुरू होने की संभावना प्रधानमंत्री ने व्यक्त की है। कल एक जीप के खड्ड मे गिर जाने से राजमार्ग संख्या 10 पर हादसा हुआ......। ईधर रामदेई का भी समाचार जारी था.......आग लगे ई बुढौती में.....न चूल्हा न चक्की केकरे आगे बक्की......। तभी रेडियो पर संदेश प्रसारित हुआ.....सुरक्षित यौन संबंधों हेतु कंडोम का ईस्तेमाल करें.....कंडोम है जहाँ, समझदारी है वहाँ। सुनकर सभी को जैसे लगा यह विज्ञापन रमदेई के लिये ही था.....सभी मुंह दबाकर हँस रहे थे उधर सदरू भगत सोच रहे थे क्या कहा जाय......ससुर मैं तो किसी ओर में नहीं हो रहा हूँ......ईधर ये बुढिया जान खा रही है, उधर ये सब लबाडी-सबाडी.....आज खुब तमासा लगा है दरवाजे पर....ये रमदेई जो न कराये सो कम है.....। तब तक लल्ली चौधरी खंखार कर बोले - ऐसा है सदरू महराज कि आज जमाना बदल गया है, अब वो लाज लिहाज वाला जमाना रहा नहीं........सो तुम लोग कहाँ अपने प्राण बचाते फिरोगे.....एक काम करो.....जाकर चूना लो और पोत दो दीवाल पर पूरी दीवाल ही सफेद हो जाय , सौ रूपया मिल ही गया है.....जब वो रंग-रोगन वाले औ लिखने वाले डॉक्टर पूछें तो कह देना कि - क्या बतायें डॉक्टर साहब, हमारी दीवाल को लगता है श्वेत प्रदर हो गया है.......ईसलिये सफेद -सफेद लग रही है.....अब आप ही कुछ करें और जल्दी करें......वरना कोई और शर्तिया डॉक्टर आकर न लिख जाय.....सफेद दागों का शर्तिया ईलाज।

- सतीश पंचम

Saturday, September 13, 2008

ये अपने बाप बदल रहे हैं (फुलकारी)


कल देखा सडक के किनारे एक बैनर लगा था जिसके उपर किसी नेता के पिताजी की मृत्यु पर शोक जताया गया था, शोक जताने वालों मे इलाके के कार्पोरेटर से लेकर तमाम छोटे -छोटे छुटभैयों की तस्वीरे थी, वो केबल वाला भी था जो इलाके में केबल कनेक्शन देने और काटने में बडी फुर्ती दिखाता था, इलाके का दूधवाला भी था मुछों की मुस्कान बिखेरता, एक और शख्स जिसे नाम और काम से तो नहीं जानता पर उसे एक बार चंदा मांगने को लेकर हुए एक झगडे में कहीं देखा था, उस वक्त वो चंदा न देने वाले को गाली दे रहा था और कुछ उसके साथी उसे छोड.....जाने दे कहकर अलग हटा कर ले जा रहे थे...लेकिन वो था कि माँ....बहन एक करने पर तुला था। ऐसे ही तमाम लोगों की तस्वीरें थी। और हाँ विशेष बात तो बताना भूल गया....वह है उस बैनर का रंग, आजकल जहाँ तडक भडक वाले बैनर लगाने का रिवाज है, वहीं यह शोक संदेश वाला बैनर श्वेत-श्याम यानि सफेद-काले में बना था, ईसी बहाने मुझे पता चला कि शोक संदेश वाले बैनर ऐसे होते हैं। खैर, बात हो रही थी नेता के पिताजी की, देखा तो उन पिताजी को भी सफेद-काले में छापा था, सिर पर देहाती पगडी, आँखों पर काला चश्मा.....लगा कि आज ये नेता पिता को काले-सफेद में रंगकर यह इतने सारे परपुत्र शायद बता देना चाहते हैं कि आपने एक पुत्र जन्मा लेकिन जाने किस तरह कि आज तक आपका वह नेता पुत्र काला-सफेद कर रहा है.....बस यूँ समझिये कि हम आपको उसी रंग में रंगकर श्रध्दांजली देना चाहते है। उधर बैनर लगवाते समय केबल वाला सोच रहा होगा.....आप मेरे पिता क्यो न हुए.....दूसरे इलाके भी मेरे कब्जे में होते.......दूधवाला सोचता......आप महान हैं जो ऐसा बेटा पैदा किया......हम सब उनकी ही अनुकम्पा पर जीवित है.........पार्टी का कोई कार्यक्रम हो....चाय- दूध का ऑर्डर मेरे यहाँ ही देते हैं, बिल जरूर डबल-टिबल बनवाते है.......पार्टी फंड को भी खर्च करने का कोई रास्ता चाहिये ही न, वह रस्ता मेरे यहाँ से ले जानेवाले ये नेता आपके ही पुत्र हैं.... MBA वाले भी आजकल हम जैसे चायवाले दूधवालों पर रिसर्च कर रहे हैं, एसे मे मैं भी कुछ Management के फंडे जानता हूँ.....जैसे किसी भी समस्या पर एक फंडा है कि Find the Root Cause of the problem, सो मैने जाना कि...आप न होते तो आपके ये नेता बेटे न होते और ये आपके बेटा न होते तो वह खर्च और बिल का रस्ता न होता.......सो मूल रूप से आप ही Root cause हैं, इस लिहाज से हम लोगों की श्रध्दांजली स्वीकार करें। ईधर मैं सोच मे पड गया था कि क्या कभी इन लोगों ने अपने पिता के मरने पर कभी शोक जताने के लिये इस तरह सार्वजनिक रूप से बैनर लगाया था.....शायद नहीं , करेंगे भी नहीं, क्योंकि ईनका बस चले तो खुद का बाप बदलने में भी पीछे नहीं रहेंगे, शोक करने की तो बाद की बात है।

Wednesday, September 10, 2008

खेत की मेड और प्रलय चर्चा (फुरहरी)


खेत की मेड पर रामधन पाल और झिंगुरी यादव के बीच उस मशीन की देसी ढंग से जमकर चर्चा हो रही थी जिससे प्रलय आने की संभावना है। झिंगुरी ने मेड पर उकडूँ बैठे हुए कहा - अब देखिये पालजी .... ई जो बुधई अपने खेत की सीमा दिखाने के लिये लेखपाल से पत्थर नसब करवाये हैं, अब वो किस काम का रहा....प्रलय आने के बाद.... क्या पत्थर..... क्या पानी, सब बराबर। पाल ने हुमकते हुए कहा - सही कह रहे हो भईया......अब जब प्रलय आ ही जायेगी तो क्या करेंगे कानूनगो.......क्या करेंगे लेखपाल और क्या करेंगे तहसीलदार.........सब के सब देखना वहीं टंगे मिलेंगे - बरम बाबा के पास। तभी दोनों ने देखा पंडित केवडा प्रसाद जल्दी-जल्दी कहीं जा रहे हैं, झिंगुरी ने भेदिया मुस्की मारते हुए कहा - जब से ई प्रलय मशीन के बारे में टीवी पर दिखाया जाने लगा है, पंडित जी की तो बन आई है....हर कोई को कथा सुनाते फिर रहे हैं और खूब बटोर रहे हैं दान-दक्षिणा। यहाँ तक कि दूसरी जाति की पतोहू लाने के लिये जाति बाहर किये गये संकठा के यहाँ भी कथा बाँच आये हैं, कह रहे थे- परासचित कर लो दान ओन देकर, सब चलता है.......हमहूँ सोच रहे हैं चन्नन टीका लगा के एक पोथी बगल में दबा के पंडित बन जांय। रामधन पाल ने कुछ रूक कर कहा - अरे तुम कहाँ रंगा सियार बनने की बात कर रहे हो, रंगे सियार तो बने हैं अपने टीवी वाले, ससुरे जान खा गये हैं कि प्रलय मशीन आ गई है, बन गई है.....और बलेक होल न जाने क्या-क्या बनाएगी, अरे हम पूछते हैं.....जब प्रलय की तुमको ईतनी ही असंका होती तो अपना कैमरा-कुमरा छोड-छाडकर पहले ही भाग खडे होते, ईहाँ बताने के लिये थोडी रूके होते कि भागो मशीन चालू हो गई है, प्रलय आ गई है.......अरे धाय-धाय कहे जा रहे हैं कि प्रलय मशीन दुनिया की सबसे बडी मशीन है, ये है,वो है..........हम तो कहते हैं कि सबसे बडी मशीन कौनो अगर है तो वह है आदमी का पेट, न जाने कितने सालों तक उसे भरा जा रहा है, लेकिन मजाल है जो कभी भरा हो.......खेत के खेत उसी पेट में चले जा रहे हैं, बाग-बगइचा, हल फाल और न जाने क्या-क्या उसी पेट में समा गया, लेकिन कहीं कोई उस मशीन की चर्चा नहीं कर रहा है। इतने मे चिखुरी गोसाईं आते दिखे........ईन दोनो को खेत की मेड पर बैठकर चर्चा करते देख उन्हीं के पास बढ आये......कहो चिखुरी दादा कहाँ से - पाल ने दूर से ही पूछ लिया। चिखुरी ने पास आते कहा- बस यहीं नंदलाल साह की दुकान से आ रहा हूँ , जरा बैलों के लिये पगहा लेने गय़ा था, कल रात गोलूआ बरधा पगहा तुडा लिया था.......वहाँ नंदलाल साह के यहाँ गया तो क्या देखता हूँ कि फिरतु चमार, बिजेलाल कोंहार और जियालाल प्रधान टीबी पर प्रलय मशीन देखने में जुटे है.......मुझे देखते ही नंदलाल साह बोले.....अरे चिखुरी क्यों नाहक बैल बेचारे के लिये पगहा-उगहा का इंतजाम कर रहे हो.......देख नहीं रहे प्रलय आ रही है......छोड दो बैल को , जाए चरे खाये जो एक दो दिन का खाना बदा हो उस बैल के भाग में.........हम तो साफ बोल गये.....अरे ईतना ही प्रलय का डर है तो तुम क्यों नही अपने दुकान का सामान सेत में ही सबको बांट देते.....बिल्कुल फोकट..... तो जानते हो क्या कहा नंदलाल साह ने........कहा - हम तो बांट दें......लेकिन सब लोग नहीं लेंगे.......सब कह रहे हैं मरते बखत कौन एहसान लेकर मरे कि फोकट में सामान पाकर मरे है। झिंगुरी यादव ने कहा - अच्छा....तो नंदलाल साह भी आजकल बोली-ठोली बोलना सीख लिये हैं......लगता है दुकान अच्छी चल रही है....... पैसा मिल रहा हो तो सब की बोली बदल जाती है......चाहे टीवी चैनल हो या नंदलाल साह। तभी किसी ने कहा - अरे झिंगुरी चाचा.......गेनु लाला की भैंस आपके पोखरे वाले खेत में पड गई है.....जल्दी जाईये नहीं तो सारा खेत सफाचट् हो जायगा। झिंगुरी ने आव देखा न ताव झट भैंस को अपने खेत से बाहर निकालने दौड पडे, जाते जाते कहने लगे - हमारे लिये तो भईया अब ये भैंस ही प्रलय है, न पहूँचू तो अभी आधा खेत चर-चुर के साफ कर दे, रामधन पाल भी उठकर चल दिये कि जाकर खेत से चरी काट लाएं, चिखुरी दादा भी चल पडे कि बैलों को पगहा बाँध दूँ.........रह गया वो खेत की मेड पर नसब किया हुआ पत्थर........बिल्कुल शांत......मानो कह रहा हो......मैं प्रलय से ही जन्मा हूँ........प्रलय को देखकर............सबको सीमाएं बता रहा हूँ कि वो तुम्हारा खेत है......वो तुम्हारा.......लेकिन किसी को यदि उसकी सीमा नहीं बता पा रहा हूँ तो वह है मीडिया........न जाने उसकी सीमा होती भी है या नहीं।

- सतीश पंचम

Saturday, September 6, 2008

ईनके पिताजी घाटन किये थे - चाकू भाला लेकर


बाढ राहत केंद्र में मधेपुरा के बोदर ने अपनी टांग खुजाते हुए कहा - ससुर पेट चुरूर मुरूर कर रहा है, कुछ बांट ओंट नही रहे हैं। सहरसा से आये रामलवट यादव ने कहा - जी तो हमारा भी ठीक नहीं है......आज चार दिन हो गया पेट में एक दाना नहीं गया है, जाने का कर रहे हैं ई राहत उहत वाले कि अभी तक किसी को अंदर केंद्र में जाने ही नहीं दे रहे। इतने में शोर हुआ कि नेताजी आय गये हैं - अब सब कोई अपना पत्तल - कुल्हड, गिलास- उलास संभाल लिजियेगा, कोई किसी को धक्का उक्का न दे, और हाँ जैसे ही नेताजी फीता काटें तो सब लोग ताली जरूर बजाइयेगा।

रामलवट समझ गये कि क्या होने वाला है.......मन ही मन बोले.......अरे तोरी बहिन क भकभेलरू ले जाय........ससुर अबहीं घाटन करेंगे तब जाकर दाल ओल बंटेगा। बोदर की समझ में न आया कि आखिर ये फीता-कटन्नी क्यों हो रही है, और हो रही है तो नेता ही क्यों काट-कूट रहा है.......आज तक तो न सुना था कि कभी बडे लोग कोई गत का काम किये हों। रामलवट यादव के कान के पास मुंह ले जाकर बोला - ई फीता उता काहे काट रहा है? और काट रहा है तो दाल ओल उसके काटने के बाद ही मिलेगा ऐसा क्यूँ , क्या फीता काट कर उसी दाल में डालेगा क्या। रामलवट ने बोदर की बात पर हल्के से मुस्कराते हुए कहा - अरे तुम नहीं जानते- ये घाटन नेता हैं, हर जगह कैंची लेकर चलते हैं, जहां देखते हैं कोई नया काम हो रहा है, फट से घाटन करने के लिये फीता काट देते हैं। बगल में खडे लालराज कोईरी जो थोडा पढे जान पडते थे, बोले - अरे भाई घाटन नहीं, उदघाटन कहो। रामलवट ने लालराज की बात को फटाक से खतम करने की ईच्छा से कहा - हाँ वही....वही घाटन । ईधर लालराज सोच में पड गये कि ये निरा चुघ्घड तो नहीं है क्या...........बता रहा हूँ उदघाटन तो कह रहा है हाँ वही घाटन....लालराज ने चुप रह जाना ठीक समझा।

रामलवट जारी थे........तो ऐसा है कि चाहे कैसा भी काम हो, यहां तक कि सौचालय भी खुलवाना हो तो ये घाटन नेता से ही खुलवाये जाते हैं, इधर फीता काटा उधर नया काम सुरू। बोदर को अजीब लगा.....ये क्या कि लोग एक तो पहले से ही परेशान हैं....बाढ....पानी....बरखा-बुन्नी से, उपर से ये घाटन महाराज और तुले हुऐ हैं कि पहले फीता काटेंगे तभी सबको भोजन मिलेगा। बोदर ने गाली देते हुए कहा - मालूम पडता है ऐनके बाप जब ईनको पैदा कर रहे थे तो हाथ में चाकू भाला लिये हुए थे......ससुर क नाती.....आये हैं घाटन करने......अरे पूछो ये भी कौनो बात हुई कि लोग भूख से बेहाल हैं.....आंते कुलबुला रही हैं, ठीक से खडे नहीं रहा जा रहा और ये नेता लोग होटिल से खा पीकर अच्छे से चले हैं कि अब तनिक ईत्मिनान से बाढ राहत केंद्र का उदघाटन किया जाय.......अरे जा घोडा क सार.......कबहूँ तुम पर भी पडेगी......इतना अनेत कर रहे हो तो समझ लो कि उपर वाला भी जब तोहार रसलील्ला खतम करेगा तो फीता काट कर ही करेगा।

तभी नेताजी ने भाषण देना शुरू किया - भाईयो....जब बच्चा जन्म लेता है तो उसके नाभी का फीता काटने के लिये दाई आती है.......बस आप मुझे वह दाई समझ लेना कि जो ये फीता काटकर कुछ सहयोग दे रहा हूँ, आप लोग नाराज न होना.....बात ये है कि ईस तरह फीता काटने से मीडिया और आप लोगों के द्वारा सब को पता चलता है कि यहाँ बाढ राहत सेन्टर खुल गया है ईसलिये हम ये फीता काटन किये हैं वरना हम तो ये न करते.......।इतने में भीड का धैर्य जवाब देने लगा ...... किसी ने चिल्ला कर कहा - अरे ये फीताक्रमी को हटाओ यार...... बहुत पढे हैं बिज्ञान में फीताक्रमी.....गोलक्रमी......सभी ससुरे कीडे होते हैं पेट के........ये भी एक पेट का ही कीडा है जो हमें भूखा रख रहा है......।

इधर लालराज ने मन ही मन कहा - शरीर को तो पेट के कीडे वाले रोग से मुक्ति मिल जाती है लेकिन इस फीताधिराज से जाने कब मुक्ति मिलेगी जो हमारे मरने में भी सहयोग करना चाहता है...............फीता काट कर ।

- सतीश पंचम

*फीताक्रमी = Ribbon Worm (पेट का एक प्रकार का कीडा)

Friday, September 5, 2008

चिठीया हो तो हर कोई बांचे....हीरामन भाय (फुलकारी)



जब से न्यूक्लीयर डील की एक चिट्ठी पर बवाल मचा है, हीरामन गाये जा रहे हैं.... चिठिया हो तो हर कोई बांचे, भाग ना बांचे कोई,.....करमवा बैरी हो गई हमार.....और लोग हैं कि बोली-ठोली बोलने से बाज नहीं आ रहे हैं.....पहले ही चेता दिया था कि द ग्रेट भारत नौटंकी के बारे में सब लोग हाथ में गंगा उठा कर कसम खा लेना कि कोई कहीं चर्चा न करे लेकिन लालमोहर जो न कराये सो कम है। कहा था कि देस मुलुक की जनाना नहीं है कि लटपट बात सुन कर चुप रह जाय, ई न्यूक्लीयर डील पच्छिम की है पच्छिम की, आखिर उस पछाही न्यक्लीयर डील ने एक चिट्ठी से भेद खोल दिया, अब लो अपना मुह ले के बैठे रहो। और वो पलटा....कह रहा है चिट्ठी के बारे में जब से जानकारी मिली है.....हम बहुत दुविधा में है......अरे तब नहीं जानते थे जब समर्थन करने संसद के कुएं (Well) में कूदे थे......आज आये हैं दुविधा देखाने......जा रे जमाना।

इधर हीरामन अपने बैलों पर गुस्सा उतार रहे हैं........कान चुनिया कर बात सुनने से रस्ता नहीं कटेगा.......जल्दी- जल्दी पैर बढाओ......और हां .....खाओ कसम की आज के बाद कभी न्यूक्लीयर डील की लदनी नहीं लादोगे।

भाय लोगन, अब देखते हैं कि ये कसम आगे-आगे क्या गुल खिलाती है...........जा रे जमाना।

- सतीश पंचम


यह अगाही पोस्ट मेरी पिछली पोस्ट फिल्म तीसरी कसम और न्यूक्लीयर डील की पछांही पोस्ट है। :D

Wednesday, September 3, 2008

फिल्म तीसरी कसम और न्यूक्लीयर डील (फुलकारी)



हीरामन अपनी चार साल पुरानी टप्पर गाड़ी मे न्युक्लीअर डील को लिए चले आ रहे हैं , रस्ते मे कोई गाँववाला मिल जाता है और पूछता है - कहाँ जा रहे हो भाई। हीरामन ने कहा - छ्त्तापूर - पचीरा । ई छ्त्तापुर - पचीरा कहाँ पड़ता है । अरे कहीं भी पड़े , तुम्हे उससे क्या, इस गाँव के लोग बहुत सवाल - जवाब करते हैं, देहाती भुच्च कहीं के - हिरामन ने कुढ़ते हुए कहा । वैसे आप लोगों को बता दूँ की हिरामन को सभी लोग हीरे से तुलना करते हैं कि अरे ये आदमी तो हिरा है हिरा , देखा नहीं , जब बाघ को यहाँ से वहां ले जाने कि बारी आई तो सभी गाडीवानों ने इनकार कर दिया कि हम नहीं ले जायेंगे बाघ - फाग , तब यही हीरामन था जिसने आगे बढ़ कर सभी गाडीवानों कि लाज रख ली, आज भी लोग उन्हें हीरे जैसे मन वाला कहते हैं।

हाँ तो हीरामन जी नयूक्लीअर डील की लदनी लादे आगे बढे, रास्ते मे बैलों को यानी जनता को रह रह कर तेज चलने के लिए उनकी पूँछ के नीचे पेईना (छड़ी/दुआली) से कोंच लगा देते या खोद- खाद देते जिससे बैल हरहराकर कुछ कदम तेज चलते, लेकिन महंगाई की मार झेल रहे बैल आख़िर कितना तेज चले खैर अभी थोड़ा आगे बढे थे कि देखा एक जगह भीड़ लगी है - एक आदमी जो कोई नेता- फेता लग रहा था , किसी मकान की छत पर चढा है और कुछ बक बक कर रहा है, उसे देखने वालों की भीड़ लगी है और उस भीड़ की वजह से रास्ता जाम है, अब हीरामन टप्पर गाड़ी निकाले तो कैसे निकाले , उस आदमी से कहा - अरे भाई छत से उतर क्यों नहीं जाते, देखते नहीं गाड़ी रुकी हुई है।
उस आदमी ने कहा - अरे छत से क्यों उतरूं, क्या अपनी टप्पर गाडी छत के उपर से ले जाओगे। खैर जैसे तैसे लोगों ने ही रास्ता छोडा और टप्पर गाडी आगे बढी । हीरामन मन में सोचने लगे - वह आदमीबडा लटपटीया मालूम पडता था, मुझे पहले ही उस आदमी से बात नहीं करनी चाहिए थी, सीधे लोगों से कहा होता तो वो खुद ही रास्ता छोड देते।
ईधर बैल फिर अपनी पुरानी चाल पर चलने लगे, हीरामन ने उन्हें अब छडी से मारने के लिए हाथ उठाया ही था कि टप्पर गाडी में पीछे से आवाज आई - मारो मत। धीरे धीरे चलने दो, ईतनी जल्दी क्या है। हीरामन सोचने लगे कि मैं अपने बैलों को मारता हूं तो इस न्यूक्लीयर डील को तकलीफ होती है, कितना भला सोचती है ये डील। और सचमुच ये बैल भी कितना तेज चलें, पहले से ही महंगाई का बोझ ढो रहे हैं, जातिवाद, संप्रदायवाद, उधारवाद और भी न जाने कितने सारे वाद-विवाद झेल रहे हैं मेरे ये बैल। ईस डील के जरिए ये सभी प्रकार के वाद एक झटके में दूर हो जाएंगे। और फिर मुझे लालटेन लेकर चलना भी नहीं पडेगा, सस्ती न्यूक्लीयर उर्जा मिलने से मेरी टप्पर गाडी में भी बल्ब लग जाएगा। इधर रास्ते में हीरामन के साथी लालमोहर और पलटदास (पलटा) भी मिल गए। हीरामन के दोस्तों के नाम फनीश्वरनाथ रेणूजी ने जाने क्या सोचकर लालमोहर और पलटा रख दिया था, कि आज भी उस नाम का असर हैकि लालमोहर अपने नाम के अनुसार लाल रंग को अच्छा समझता है, कम्यूनिस्टों सी बातें करता है। और पलटदास,वो भी कुछ कम नहीं, आज ईधर तो कल उधर, पलटना जारी रखता है, जाने कौन जरूरत पड जाय।तभी तो हीरामन एक जगह कहता भी है - जियो पलटदास.......जियो। ईधर न्यूक्लीयर डील को देख लालमोहर को शंका हुई, पूछा - इस डील की लदनी लादे कहां से चले आ रहे हो,इसके आने से हमारे उन्मुक्त स्वतंत्रता में बाधा होगी, हम ठीक से गा नही पाएंगे कि - उड उड बैठी ई दुकनिया, उड उड बैठी उ दुकनिया......जब हम गाएंगे तो ये डील कहेगी कि उसी को देखकर ये लोग गा रहे हैं, बोली ठोली बोल रहे हैं......ना ना बाबा नाहम तो ये डील नहीं मानेंगे, जिंदगी भर बोली-ठोली कौन सुने..... इसे तुम वहीं छोड आओ जहां से लाए हो।तब हीरामन लालमोहर को समझाने लगे, देखो इसके फलां फलां फायदे हैं, और सबसे बढकर ये हमें पास भी तो दे रही है। पास का नाम सुनकर लालमोहर और पलटा थोडा सतर्क हो गए, पूछा - पास...कैसा पास ।हीरामन ने कहा - अरे कोई अईसा वईसा अठनिया दर्जा वाला पास नहीं, न्यूक्लीयर दर्जा वाला पास।लालमोहर दर्जा का नाम सुनते ही उखड गया, लाल - लाल होते बोला - दर्जा की बात करते हो, यहां हमसभी को एक समान दर्जा की बात करते हैं और तुम एक और दर्जा बढाने की बात करते हो, लानत है तुमपर।अभी ये बातें हो रही थीं कि लालमोहर ने देखा - पलटा कहीं नजर नहीं आ रहा है।अरे ये क्या, पलटा तो उधर डील की चरणसेवा कर रहा है , जाने ईस डील ने कौन सा मंत्र मार दिया है।लालमोहर ने पलटा की बांह पकड कर झकझोरते हुए कहा - तू यार हमेशा यही करता है, जरा सा कुछ हुआ नहीं कि पट से हाथ जोड चरणसेवा करने लगता है, और आज तू सेवा कर रहा है न्यूक्लीयर डील की,तेरा तो उन लोगों जैसा हाल है कि - आज न्यूक्लीयर टेस्ट किया, कल वहीं जाकर उस जमीन से माथे पर तिलक लगा लिया, पता चला अगले दिन माथे पर फोडा हो गया। इधर पलटा मन ही मन सोच रहा था - तूम क्या जानों मैं क्यूं चरणसेवा कर रहा हूं , मेरे घर पर माया का कब्जा हो गया है, मेरे बैल पगहा तोड कर भागे जा रहे है, ले दे कर एक ही सहारा था, सो मायामोह में ढहाया जा रहा है, अब तूम ही बताओ लालमोहर कि, मै कुछ गलत कर रहा हूं।लालमोहर क्या बोले, हीरामन को ही बोलना पडा - अब पलटा तुम एक काम करो, जाकर जरा अपने जानपहचान वाले उस पनवाडी से अपने हरे हरे पान ले आओ,वैसे भी हरा रंग तुम्हें ज्यादा पसंद है,और देखना उस लहसनवा को भी लेते आना। लालमोहर बोला - कौन लहसनवा, उ दलबदलू । हां हां वही - पलटा तपाक से बोला। ईधर ये बातचीत चल ही रही थी कि- लहसनवा खुद ही बोल पडा - ऐ मालिक......लालमोहर बोला - चोप....तू कहां चला आ रहा है बडे लोगों के बीच में। ऐक जोरदार रसीद कर दूंगा, तबियत हरी हो जाएगी। लहसनवा बोला - तबियत हरी हो जाए तो होने दो हरी ....... हम तो हैं ही हरित प्रदेश वाले। तब तक पलटा हरे हरे पान ले आया। पान खाकर हीरामन ने देखा - ई हमरे सफेद कुर्ता पर लाल दाग कैसे लग गया, ईसके पहले तो कभी नहीं लगा था। ईसके पहले तूमने कभी लाल पान भी तो नहीं खाया था, लालमोहर ने हंसते हुए कहा। तभी लालमोहर ने देखा न्यूक्लीयर डील उन चारों की ओर देख रही है। लालमोहर ने चहकते हुए कहा - देख रहे हो कैसे देख रही है ।पलटा - कौन ।लालमोहर - अरे वही.पलटा - किसको लालमोहर - और किसको.......उसे मालूम पड गया है कि मेरा पावर हीरामन से ज्यादा है। ईधर लहसनवा झोला झक्कड उठाने की प्रैक्टिस कर रहा था क्योंकि अक्सर ईस तरह की डील के बाद झोला वगैरह वही उठाता था, उधर हीरामन पलटा के हरे पान चबा रहा था, लाल छींटे अब भी पड रहे थे, तभी सब की नजर सामने चल रही नौटंकी मंच पर एक साथ पडी। मंच पर न्यूक्लीयर डील नाच गा रही थी, बोल थे -पान खाये सईंया हमार..... मलमल के कुर्ते पर छींट लाल लाल.....पान खाये सईंया हमार..... मंच के उपर लगे झालरों के उपर बडे - बडे अक्षरों में लिखा था - द ग्रेट भारत नौटंकी कंपनी ।


- सतीश पंचम

(यह पोस्ट हाल ही में चल रहे न्यूक्लीयर डील के टिकटिम्मा आलोक में पुनर्प्रकाशित की गई है)

Tuesday, September 2, 2008

क्या कभी टीवी पर ये सीन देखा है आपने


बाढ में परोसी जा रही एक लोटा गर्म दाल की छींटे जब एक छोटी बच्ची पर पडी तो वह छनछना कर पीछे हट गई, वहीं पास खडे किसी ने उसे वही लोटा फिर संभाल कर थमाते कहा - ले पकड...पकड ले...और मुझे वर्ल्ड- वार से जुडी वह फिल्म याद आ गई जिसमें गर्म उबले हुए आलू दिये जा रहे थे, लोग एक-एक कर आते जाते और अपने कटोरे में उबले आलू लेकर आगे बढ जाते, कि तभी एक छोटा बच्चा भी कटोरा लेकर आगे आया, और जैसे ही उसके कटोरे में गर्म आलू डाला गया, कुछ गर्म पानी भी उसमें गिर गया जिसके छींटे उस बच्चे के हाथों पर पड गये और वह बच्चा भी ठीक ईस बच्ची की तरह छनछनाकर पीछे हट गया, गर्म आलू और गर्म पानी जमीन पर बिखर गया जिसे लेने आसपास खडे बडे लोग टूट पडे। यहां दोनो घटनाओं में जो चीज अलग दिखी वह थी आस पास खडे लोगों का आचरण। बिहार का वह आदमी जो बच्ची को फिर से गर्म लोटा संभालकर पकडवा रहा था उसके मुकाबले यूरोप के लोग बौने साबित हो रहे थे, यहां आग्रह था तो वहां दुराग्रह, यहां बच्ची को भीड से अलग नहीं कर दिया गया, बल्कि उसे फिर से दाल दी गई।
अब आते हैं असली मुददे पर। बाढ में एक बात जो परेशान कर रही है, वह नेताओं की उलूल-जूलूल हरकतें, कभी लालू कैमरे के सामने एक बच्चे को लेकर हास्य रस गढ रहे हैं तो कभी नीतीश करूण रस की जुगाली। क्या नीतीश को परिस्थितियों को समझने में इतना वक्त लग गया कि दस-बारह दिन तक हाथ पर हाथ धरे सोचते रहे कि क्या करूं..... क्या न करूं। सेना की मदद ली भी तो तब जब बात हाथ से बाहर निकल गई। न कोई प्लान न मैनेजमेंट, सिर्फ जुगाली और जुगाली कि ....बाढ भयावह है.....इससे पहले ऐसा न हुआ था......आदि..आदि।
ऐसी काहिली की मिसाल शायद कम ही मिले कि जब सामने आफत दिख रही हो, तब भी हाथ पर हाथ धरे बैठे सोच रहे हों .... क्या करें....क्या न करें। राज्य सरकार तो राज्य सरकार केंद्र के मंत्री भी ऐसे में मजाक के मूड में लग रहे हैं, कभी एक बच्चे को लेकर तो कभी कुछ। क्या केंद्र और राज्य सरकार के पास इतनी कम संख्या में नाव और हेलीकॉप्टर आदि थे कि जिसके लिये लोगों को दस-बारह दिन तक इंतजार करना पडता, नहीं.....यदि चाहते तो आसमान को हेलीकॉप्टरों से पाट सकते थे लेकिन चुनाव अभी दूर है और कोसी अभी भी मजबूर है... इसी तरह टूटने के लिये और लोगों को इस टूटन से मारने के लिये, घरबार छोडने के लिये..... हम लोग टीवी पर देख रहे हैं- हजारों की संख्या में बडे-बडे बाल बच्चों वाले नाती पोतों वाले पचास-पचपन की उम्र के लोगों को अपने बच्चों के सामने फूट- फूट कर रोते हुए, बिलखते हुए....क्या इसके पहले कहीं देखा है आपने.......टीवी पर बडों को बच्चों की तरह रोते हुए।


- सतीश पंचम

Monday, September 1, 2008

एन डी टी वी और अजीब उलझन




जेल में कई चीजों की कमी महसूस होती है, बच्चों और स्त्रियों की आवाज वहां सुनाई नहीं देती, जो भाषा बोली जाती है उसमें गाली और गंदगी होती है। अभी मुझे महसूस हुआ है कि मैंने पिछले कई महीनों से कुत्ते का भौंकना नहीं सुना है।

- जवाहरलाल नेहरू की जेल डायरी

कभी-कभी कैमरा रिपोर्टिंग करने के साथ कुछ अनचाही चीजें भी दीखा जाता है, अभी रविवार की शाम NDTV 24x7 पर Walk the Talk प्रोग्राम देख रहा था, ममता बनर्जी से गांव-कस्बे की किसी सडक पर चलते-चलते शेखर गुप्ता सवाल पूछ रहे थे, कभी-कभी रूक भी जाते थे। उन दोनों की बातचीत के दौरान उस इलाके के काफी लोग थोडी दूर खडे होकर ये सारी सवाल-जवाब भरी कवायद देख रहे थे, उनके हाव भाव से लग रहा था जैसे उन्हें कहा गया हो कि जरा दूर ही खडे हों, पास न आयें ताकि कैमरे में अनचाही आवाजें और डिस्टर्बेंस आदि न हो( जो कि ठीक भी था)। अब हालत ये थी कि वहां सडक पर चलते हुए बात करते शेखर गुप्ता और ममता बनर्जी के अलावा कोई और किसी की हरकत नजर नहीं आ रही थी, लोग खडे तो थे लेकिन शांत। एक दुपहिया वाहन वाला उस कस्बेनुमा सडक से गुजरा भी तो पैदल होकर अपने वाहन को लगभग खींचते हुए लेकर गया ताकि गाडी की कोई आवाज न हो। अभी ये सब चल ही रहा था कि कहीं से एक कुत्ता आ गया, पहले वह थोडी दूरी पर रूक गया, फिर बेखौफ होकर ममता बनर्जी के पास पहुंच गया और लगा उनके पैरों के पास मंडराने। अब हालत ये थी कि ममता बनर्जी का आधा ध्यान अपने टाटा विरोध पर बोलने पर था और आधा ध्यान कुत्ते की तरफ, कैमरे ने अपना ऐंगल भी बदला की कुत्ता न दीखे लेकिन वो माने तब न.....थोडी देर मंडराने के बाद वो कुत्ता वहां से थोडी दूर जाकर बैठ गया लेकिन अब भी कैमरे में बराबर दिख रहा था।


अब इस पोस्ट के दूसरे हिस्से पर आते हैं - ममता उस कुत्ते के दूर चले जाने के बाद अब अपने पूरे उफान पर थीं....टाटा ये......टाटा वो....टाटा फलाना.....टाटा ढेकाना......न जाने कितनी बार टाटा कह चुकीं कि तभी ब्रेक होने की घोषणा हुई, क्या देखता हूं कहा जा रहा है -


"Walk the Talk , Brought to you by TATA Indicom - सुनें दिल की बात"
:)
- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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