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Saturday, August 30, 2008

ऐनडीटीवी पर दिखा वह दो सेकंड का क्लिप


NDTV पर सिर्फ दो सेकंड के लिये एक क्लिप दिखाई दी थी......तुरंत ही बदल दी गई लेकिन अपने पीछे वह क्लिप जाने कितने सवाल छोड गई। हुआ यूं कि NDTV पर बिहार में आई बाढ की खबर देख
रहा था....सभी नाम जैसे सुने हुए से लग रहे थे ...फारबिसगंज......पूर्णिया......कटिहार.....अररिया.....ऐसा लग रहा था फणीश्वरनाथ रेणू की कोई किताब पढ रहा हूं , वही लोग.....वही माहौल....... कि तभी अचानक एक क्लिप दिखाई दी जिसमें एक महिला अपने बच्चों के साथ कमर भर पानी में चल रही थी....बगल में उसका पति कोई एकाध साल का बच्चा लिये चल रहा था.....तभी अचानक उस महिला ने अपने पति से वह बच्चा लेने के लिये हाथ बढा दिया ताकि बच्चा उसके पास रहे पति के पास नहीं .......और यही वह क्षण था जो एक ग्रामीण जीवन की झांकी बयां कर गया......। दरअसल इस महिला ने अपने सामने कई लोगों को अचानक देख लिया और उसे ख्याल आया कि वह तो छूछे हाथ चल रही है...खाली हाथ चल रही है और उसका पति हाथ में बच्चा उठाये चल रहा है....कोई देखेगा तो क्या सोचेगा.......पति मेहरबसुआ है, .....पत्नी आराम से चल रही है खाली हाथ, और खुद पति बच्चा लिये चल रहा है.....मेहरी की सेवा कर रहा है...। नाव पर जा रहे लोगों को देखते ही शायद उस महिला के अंतर्मन में यह बात कौंध गई थी और उसने अचानक ही बच्चे को अपने पति के हाथ से ले लेना चाहा.....।
लेकिन यहां ध्यान देने की बात यह है कि उस महिला द्वारा अपने पति को लोगों की नजरों में पौरूखमय पति दिखाने की बात, उसका मान रखने की बात यूं ही नही आई होगी, इसके पीछे भारतीय ग्राम्य संस्कार थे जो उसे ऐसा करने के लिये मजबूर कर रहे थे......आज भी भारतीय संस्कारों में गुंथी पत्नी कभी भी दूसरों के सामने अपने पति से खुलकर बात नहीं करती , कभी बुलाना हो तो दरवाजे की सांकल खटखटाती है या फिर चूडी ताकि पति मौक निकालकर लोगों के बीच से उठ कर आ जाय और उसकी बात को भी सुने पति भी कभी खुलकर दूसरों के सामने अपने बच्चों से प्यार नहीं करता , बडों का लिहाज करता है...कि लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे ........ यह और इस तरह की कई बातें मुझे अचरज में डाल देती हैं......ऐक ओर कंधे से कंधा मिलाकर चलने की बात हो रही है, पति के साथ पत्नी भी ऑफिस जा रही है, पत्नी कहीं किसी कंपनी में MD है....कही CEO है तो दूसरी ओर यह अचरज भरी सांकल की खटकन.....लग रहा है जैसे अतीत और वर्तमान के बीच ऐक कशमकश चल रही है......और शायद इसे ही कहते हैं - भारत बनाम भारत या फिर......... इंडिया बनाम भारत।

- सतीश पंचम





कुछ महीने पहले लिज् हर्ले अपने भारतीय पति अरूण के साथ भारत आई थी, जहां जाती थी..पूरा मिडिया लेकर चलती थी, बगल में एक बच्चा लटका कर उसका पति इस तरह मुस्कराता मानों जग जीत लिया हो....सभी कैमरे उसकी मुस्कान कवर करते नहीं थकते थे, और वो हर्ले तो इस पति को लेकर इस तरह खुश थी मानो सब को यही दिखाने आई है.......उधर बिहार में जैसे ही कैमरा सामने आया...महिला ने झट बच्चा अपने पति से ले लिया.......लाज के मारे। 

Saturday, August 23, 2008

समलैंगिक विवाह और पंडित केवडा प्रसाद (फुलकारी)


मुंह दिखाई के समय दूल्हन का घूंघट हटा कर जैसे ही जलेबी फूवा ने मुंह देखा, चौंक कर पीछे हट गईं - हाय दईय़ा....दुल्हन को तो दाढी-मोंछ है। कौन गांव की ले आया रे........अरे नासपीटे..........तैने ईतना भी पता न चला कि लडके को ही दुल्हन बना कर ले आया। तभी मैं कहूं..दुलहिन ईतनी तन कर क्यों चल रही है।
उधर घरातीयों में अलग चर्चा चल पडी - अरे यार ये दोनों लडका की आपस में ही शादी .......... कुछ समझ नही आ रहा।
कल्लू काका बोले - अरे कुछ ना समझो तो ही अच्छा है..........ससुरे न जाने आजकल के छोरे कौन खेल.....खेल रहे हैं कि सब खेल ही गडबड हो गया है, सुनील की शादी अनिल के साथ, रमेश की शादी उमेश के साथ और तो और पहलवान विजयलाल की शादी पहलवान अजयलाल के साथ.........अब जाने ई लाल लोग कौन पहलवानी करेंगे कि एक और लाल रचेंगे।
ईधर हलवाई जो अब तक अपना माल असबाब लौटने के लिये समेट चुका था, मजदूरी की राह तकता उकडूं बैठ कर लोगों की बातें सुन रहा था, उसके बगल में ही बाजा बजाने वाले बैठे कान खुजा रहे थे मानों कह रहे हों - लडके-लडके की शादी हो या लडकी-लडकी की, अपने को तो बस बजाने से मतलब है। हलवाई के मन में अलग शंका घर कर रही थी - शादी तक तो ठीक है....मिठाई बनाने का आर्डर मिल गया, लेकिन पहले जो किसी बच्चे - ओच्चे के जन्म होने पर नामकरण वाला आर्डर मिलता था वो तो अब मिलने से रहा, जाने कौन विधी से विवाह करा लाये कि लडके-लडके की शादी हो गई......हूंह।
ईधर पंडित केवडा प्रसाद को घेरकर गांव के लडके अलग मजाक कर रहे थे....और पंडित थे कि बस हें...हें करके खींस निपोर रहे थे।
दीनू बोला - पंडित चच्चा, ई बताईये कि आप तो हर विवाह में यही कहते हो कि - प्रण करो कि मैं एक पत्नी के रूप में पति का साथ निभाउंगी........तो ये बताओ उन दोनों में पत्नी कौन था और पती कौन।

सुनकर पंडित केवडा प्रसाद बोले - अब मैं का जानूं कौन पती था और कौन पत्नी, उन दोनों में जिसको अपने आप को पती समझना हो पती माने, जिसे पत्नी मानना हो वो पत्नी माने, हमको तो जो कहा गया वही करे हम......और एक बात कहूं.......तूम जो ईतना भचर-भचर कर रहे हो, कल को का पता तुम ही कोई लडका ले आओ और कहो कि पंडितजी ईस हरिप्रसाद की शादी मुझ दीनूलाल से करवा दो तो हम मना थोडे करेंगे।
सुन कर दीनू थोडा पीछे हटा तो झटकू आ पहुंचा, उसने अपनी टांग खुजाते हुए कहा - लेकिन ये बताओ कि - उन दोनों के बीच क्या-क्या होगा ?
क्या होगा माने ? अब पंडित जी को दूसरी शंका हुई कि न जाने अब ये चर्चा कौन तरफ ले जाना चाहते हैं........अब यहां से चलना चाहिये.......लेकिन क्या करें, अभी तक घराती लोगों की तरफ से विदाई दक्षिणा नहीं मिली है।

उधर कुछ पढे लिखे घरातीयों के बीच चर्चा चल रही थी, जब से रामदौस ने समलैंगिकता कानून को कानूनी जामा पहनाने की बात की है, लडके तो जैसे बिगडे ही जा रहे हैं.....क्या किया जाय कुछ समझ नही आ रहा।
मास्टर चंपकलाल बोले - अरे कल मैंने कक्षा में दिनेश को हरिलाल के पास बैठने को कहा तो उसने बैठने से इन्कार कर दिया, कहता है हरिलाल उसे छेडता है। बताओ भला, अब किसको कहां बिठाउं कुछ समझ ही नहीं आ रहा है।
अब तक चुप कनवरीया दद्दा खंखारकर बोले - अरे आप को तो केवल बैठाने-उठाने की चिंता हो रही है, मैं सोच रहा हूं यदि यही हाल रहा तो, अपनी चूडीवाली सुगनी फूवा का क्या होगा, वो किसे चूडी पहनायेगी? समझ नहीं आता क्या किया जाय।

उधर पंडित केवडा प्रसाद मन ही मन सोच रहे थे कि पंडिताईन घर पर दान दक्षिणा का इंतजार कर रही होगी, ईधर ये धत् कर्म चल रहा है, जल्दी दान दक्षिणा देने की कौन कहे, कह रहे हैं .....कुछ समझ नहीं आ रहा , क्या किया जाय।
आस पास बैठे लोगों की देह छू -छू कर बोलने लगे - चंपकलालजी आप......, कनवरीया दद्दा आप और संतलाल यादवजी आप........ये बतावें कि अब क्या हो सकता है, शादी-उदी तो विधी का विधान है, उसमें हम और आप क्या कर सकते हैं......विधान बनाने वाले उ बडे लोग हैं......चाहे संविधान बनायें या बिगाडें...हम आप कुछ नहीं कर सकते....क्योंकि होईहे वही जो राम रचि राखा ।
झटकू ने थोडा खुलकर पूछा - राम रचि राखा माने...........वही सेहत मंत्रालय वाले तो नहीं ?
:)

- सतीश पंचम

Monday, August 18, 2008

विनोद दुआ और प्रणव रॉय के कान काटते दुकानदार(फुलकारी)



कल्लन अपने कान खुजाता मुशरर्फ की ईस्तीफे वाली स्पीच टीवी पर सुन-देख रहा था और बाकी अन्य लोग उसका मन चाहा मतलब निकाल रहे थे जिनमें धन्नू कसाई, लल्लन हलवाई, असलम टेलर, लुल्लुर हज्जाम सभी थे। उनके विश्लेषण विनोद दुआ और प्रणव रॉय तक के कान काट रहे थे।



मुशरर्फ ने कहा - मैनें अपने मुल्क के लिये जो कर सकता था वो किया।

ईतना सुनना था कि धन्नू कसाई बोला - मियां मैं भी तो सुनूं क्या-क्या किये हो, एक ठो बकरीया तो हलाल नहीं कर सकबो, मुलुक खातिर करबो की बात करते हो। तोहरी तो हिम्मत हम तबही जान गये थे कि तोहरा में गोस कितना है और हड्डी केतना जब तुम करगिल कांड किये रहे, करबो की बात करते हो।

धन्नू की बकबक सुन कर असलम टेलर बोले - अमां यार बडे वाहियात किसिम के हो, सुन तो लो क्या कह रहा है, पहले ही गला, अस्तर, अचकन का नाप ले रहे हो।

इतने में मुशरर्फ ने कहा - मैं अपने किये हुए कामों को मुल्क की हिफाजत के लिये ठीक समझता हूं, दहशतगर्दी से अपने मुल्क को आजाद करना ही मेरा मकसद था।

ये सुन कर लुल्लुर हज्जाम बोल पडे - ई का कह रहा है - दहशतगर्दी से अपने मुलुक की आजादी याने आखिर पट्ठा मान गया कि दहशतगर्द उसके यहां ही थे, बडे दिन बाद हलक से सच बोल रहा है।

आगे की बात धन्नू कसाई ने पूरी की - लुल्लुर मियां जब आखरी टेम होवे है ना तो बडे बडे बकरे लेंड गिरा देते है, ई तो बस हलक से मिमिया के रह गवा है।

अब तक चुप कल्लन जो अपने कान खुजा रहा था, सीधे होकर बैठ गया और लगभग हकलाते हुए बोला - ई...ई मुसरर्फ दद्दा चल गईल का।

और नहीं तो क्या देख नहीं रहे कैसे था...में बोल रहा है......किया था......लिया था......ससुर था माने अब चला चली वाली बात हो रही है - लल्लन हलवाई ने पहली बार मुंह खोलते हुए कहा।

असलम टेलर से रहा नहीं गया, बोले - अरे अब सब तूम ही लोग बोलोगे कि कुछ उस की भी सुनने दोगे, बिना मतलब पचर....पचर बोले जा रहे हो कनवा कल्लू की तरह......ऐसे ही वो भी पचर.....पचर बोलता रहता है..........तूम लोगन पर उसकी छाया तो नहीं पड गई।

अब सब लोग चुप हो गये.....और फिर सुनने लगे।

मुशरर्फ ने कहा - अब पाकिस्तान की आवाज सुनी जाती है, पहले कभी पाकिस्तान की आवाज नहीं सुनी जाती थी, वो मेरे किये काम थे जिन्होंने पाकिस्तान को पहचान दिलाई।

अब असलम टेलर खुद ही बोल पडे - हां...हां क्यों नहीं....क्यों नही.........हमारे कनवा कल्लू की भी पहले कोई नही सुनता था, पर अल्ला कसम जब से उसने शेखू चचा की भैंस के बारे में बताया, सब लोग उसकी सुनने लग गये।

क्या बताया भैंस के बारे में - कई आवाजें एक साथ आईं।

अरे कुछ नही, उसने कई बार मजाक किया था कि असलम मिंया आपकी बकरी रस्सी तुडाकर चौधरी के खेत में चर रही है....जाकर देखा तो बकरी जहां थी वहीं बंधी थी, समझ गया कि मजाक कर रहा है ये नामुराद। कई दिन ऐसे ही मजाक करता था तो कोई उसकी सुनता ही नहीं था।
अगल-बगल लोगों में अब आगे की बात सुनने की ईच्छा बढने लगी कि देखें आगे क्या बताते हैं असलम मियां। सभी थोडा आगे सरक आये।
असलम टेलर ने थोडा खंखार कर कहा - तो हुआ यूं कि एक दिन यही कनवा कल्लू बोला - आपके खेत में मजहरू मियां की भैंस चर रही है, हमें लगा कि ये फिर मजाक कर रहा है......हम नहीं गये देखने, और मजे की बात देखीये कि हम सही थे........कोई भैंस नहीं चर रही थी........कल्लू ने मजाक किया था।
तब.......
तब क्या, हम ने जान लिया कि कभी ईसकी बात को सही नही मानेंगे।
फिर........
फिर क्या, एक दिन कहने लगा कि आपके खेत में शेखू की भैंस नहीं है।
मैने कहा नहीं है तो नहीं है, ईससे तुझे क्या.......?
तो जानते हो क्या कहा उसने ?
क्या ?

उसने कहा कि........मैं फिर कहता हूं तुम्हारे खेत में शेखू की भैंस नहीं चर रही।

मैंने कहा .........जाने क्य़ा बात है जो बात को नहीं मे बता रहा है, जाकर देखा.......तो क्या देखता हूं की सचमुच शेखू की नहीं, लेकिन मजहरू की भैंस जरूर खेत में खडी फसल चर रही है........बस तब से हम कल्लू की बात मानने लगे, कि जब वो नहीं कहे तो समझो है और है कहो तो समझो नहीं है, लेकिन मानते है जरूर।

बस वही समझ लो जब मुशरर्फ मियां हां कहें तो उसका मतलब न से है और न कहें तो उसका मतलब हां से है। सभी लोग हां में सिर हिलाने लगे।

तभी मुशरर्फ ने कहा - कश्मीर हमारी रगों में है।

आस-पास बैठे सभी लोगों ने कहा- है......कह रहा है, है.... यानि ......नहीं है।

धन्नू कसाई बोला -चलो .....जाते-जाते ऐक और सच कबूल गय़ा.....मैं न कहता था.......आखिरी बखत बडे-बडे बकरे लेंड करते हैं।

कल्लन बोला - और जब कट रहे हों, तो कहते हैं - कश्मीर हमारी रगों में है,..... माने नहीं है।

:)






- सतीश पंचम

Sunday, August 17, 2008

ऐक फूल, मल्टीपल माली (फुलकारी)


अब तक आप ने एक फूल दो माली के बारे में सुना होगा, लेकिन झारखंड में एक फूल और मल्टीपल माली नजर आ रहे हैं। निर्दलीय विधायक मधु कोडा न जाने कौन मधुवन में खिले कि सभी लोगों से बाजी मारते निर्दल मुख्यमंत्री होने का इतिहास रच दिया, और उन्हें समर्थन देने वालों के बारे में क्या कहा जाय, लालू जी की पार्टी, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा पार्टी , निर्दलीय विधायक आदि सभी लोगों की ओर से उन्हें समर्थन मिला और सफलता से काफी समय तक कोडा जी इस मधुवन में खिले रहे, और उन्हें ईसी तरह कई माली सींचते रहे।
यहां एक माली शिबू के मन में यह इच्छा हुई कि मैं ही क्यों न खिल जाउँ, बस फिर क्या था, अन्य मालीगण से अपनी व्यथा बताई और लगे हाथ अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी, लेकिन यहीं पेंच लड गया, लालू जी ने कहा- शिबू जी को खिलना है तो खिलें, हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यदि उनमें स्वंय के खिलने लायक खाद पानी हो तो, वरना हम अपने से कोई खाद पानी नहीं देंगे। यही बात शिबू जी को बुरा लग गई, कहा - केन्द्र में तो हमसे ही न खाद लिया था, अब पानी के लिये हमसे कह रहे हो, ईतने भी बेपानी न करो यार। अरे सुना है बारह बरीस में तो घूरे के भी दिन बहूरते है, तो क्या हम उनसे गये गुजरे हैं, हम अपने घूरे से ही खाद देंगे, पानी देने और भाई लोग आ जाएंगे।
अब और लोग पानी देने आते हैं कि नहीं, लेकिन एक बात तय है - जब तक मालीगण अपने में उलझे रहेंगे, मधु जी मधुवन में खिले रहेंगे, और कहेंगे -

मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है,
जीना उसका जीना है, जो औरों को उलझा देता है
मधुबन खुशबू देता है .......
:)
- सतीश पंचम

Friday, August 15, 2008

फिल्म नया दौर से बेहद मिलते-जुलते हालात (विश्लेषण)


फिल्म नया दौर का वो सीन याद है जब सडक बनाने को लेकर विवाद हो गया था, विलेन (जीवन) किसी भी हालत में सडक बनने नहीं देना चाहता था क्योंकि इससे उसके विरोधी तांगे वालों को रोजगार मिल सकता था और उसकी खुद की चल रही बस की सवारी कम हो सकती थी, यदि आप फिर वही सीन याद करें तो हूबहू आज के ताजा हालात से मेल खाते दिखाई देंगे, यहां तक की फिल्म के डॉयलॉग तक अकल्पनीय रूप से ऐसे लगेंगे जैसे आज की परिस्थतियों को देखकर कहे जा रहे हैं - पेश है इसी मुद्दे पर मेरी ओर से एक विश्लेषण।

    सडक न बनाने के लिये विलेन(जीवन) ने अपने साथी पंडित को इस काम पर लगा दिया, उस पंडित का कमाल देखिये, एक देवी मां की मूर्ति ठीक उस जगह जमीन खोद कर गाड़ दी जहां से सडक गुजरने वाली थी, बस फिर क्या था, अगले दिन जब सडक बननी शुरू हुई तो बीच सड़क देवी मां की मूर्ति निकल आने से सभी गांव वालों में हडकंप मच गया, सभी लोग हतप्रभ रह गये, किसी को देवी मां का चमत्कार लग रहा था तो कोई कह रहा था अब यहां मंदिर बनेगा, और इस मंदिर बनाने के लिये जोरदार आवाज उठाने वालों में वह विलेन और उसका साथी पंडित बढचढ कर बोल रहे थे, विलेन तो देवी मां के मंदिर बनाने के लिये बंदूक तक तान बैठा। कई लोगों को लगा यहां मंदिर ही बनाना चाहिये नहीं तो देवी नाराज होंगी, इस हंगामे को बढते देख लोगों ने बीच बचाव किया, जुम्मन चाचा जो कि मुसलमान थे , उन्होंने फिल्म के हीरो शंकर (दिलीप कुमार) को मनाया कि रहने दो बेटा, लडाई झगडा मत करो , मंदिर ही बन जाने दो, हम कोई और रास्ते से सड़क बना लेते हैं।

अब शंकर का कहना था कि, मंदिर और शिवाला लोगों को रास्ता दिखाने के लिये बने हैं, ना कि रास्ता रोकने के लिये. लेकिन अब क्या किया जाये.......वो सामने वाली जमीन गोपाल की है जिसका हमसे बैर चल रहा है, वो भला क्यों दे सड़क बनाने के लिये अपनी जमीन ।

    तब किसी तरह मौके पर मौजूद पत्रकार जॉनी वॉकर पहल करते हैं कि चलो मैं शुरू करता हूं सडक बनाना, पहले कुछ शुरूवात तो करो,........ लेकिन अभी पत्रकार महोदय ने शुरूवात ही की, कि एक लाठी बज गई....... गोपाल ने पत्रकार को रोक दिया, साथ ही ताकीद भी कर दिया ,  अगर किसी ने यहां से एक कदम भी मेरी जमीन पर रखा तो लाशें बिछ जाएंगी , तब शंकर (दिलीप कुमार) आगे बढ कर कहते है.- गोपाल, घर के लोग आपस में भले ही झगडा करें लेकिन जब कोई बाहर वाला आता है तो दोनों उससे मुकाबला करने के लिये एक हो जाते हैं......बस्ती की ईज्जत तुम्हारे हाथ में है गोपाल। और फिर क्या था, गोपाल ने परिस्थितियों को देखते हुए , रोजगार आदि के हालात को समझते हुए न सिर्फ शंकर के गले मिल लिया बल्कि, सडक के लिये ये तक कह दिया -मेरी जमीन से बनाओ सडक, देखता हूं कौन रोकता है...........और सडक को जब गोपाल की जमीन से बनाया जाने लगा तो पहले वाली सड़क के मुकाबले इस सड़क की दूरी और कम हो गई......यानि दिल और जमीन दोनों की ही दूरियां घट गई।

     अब जरा आज के हालात को देखा जाय, सेतू समुद्रम के नाम बवाल करने वाली पार्टियां क्या उस पंडित की तरह व्यवहार नहीं कर रही हैं जिसने रास्ता रोकने के लिये भगवान के नाम का सहारा लिया । इसी मुद्दे पर जब इन पार्टियों द्वारा तोडफोड किया जाता है तो उस विलेन (जीवन) की याद आ जाती हैं जिसनें भगवान के नाम पर रास्ता रोकने के लिये बंदूक तक उठा लिया। शंकर का यह कहना कि "मंदिर और शिवाला लोगों को रास्ता दिखाने के लिये हैं रास्ता रोकने के लिये नहीं" - अपने आप में आज की हकीकत को बयान कर रहे हैं,

याद रहे - सेतू समुद्रम के बनने से न सिर्फ रोजगार ही बढेगा (तांगे वालों का तरह) , बल्कि उससे , जहाजों के आवागमन में दूरी भी घटेगी (ठीक नया दौर की सडक की तरह), इससे जहाजों में लगने वाले ईंधन की खपत भी कम होगी, और पर्यावरण को भी नुकसान कम होगा।

एक और मुद्दा यदि इसी फिल्म के आलोक में समझा जाय तो बेहतर होगा -

       अमरनाथ की यात्रा से न सिर्फ लोगों को रोजगार मिल रहा है, बल्कि लोगों की आपसी समझ भी बेहतर होती दिखती है....पूरे देश के लोग ईकट्ठा होकर अपने आप को इस जम्मू-कश्मीर से जोड लेते हैं, यही वह सेतू है जो लोगों को जोडे हुए है, पर्यटन के नाम पर होने वाले जुडाव के मुकाबले यह जुडाव और लगाव कुछ ज्यादा कसा हुआ है........लेकिन यहीं पर मुश्किल शुरू होती है......कश्मीर के आतंकवादी और वहां के नेता क्यों चाहेंगे कि यह जुडाव बना रहे.......वो तो खुद अलगाव की ओर बढना चाहते हैं.......ऐसे मे अमरनाथ यात्रा के लिये दी गई जमीन उनके लिये उस पंडित की देवी मां से कम क्या होगी, बवाल शुरू हुआ और जमीन सरकार द्वारा वापस ले ली गई, ऐसे में न कोई गोपाल नजर आ रहा है, न शंकर, और न जुम्मन चाचा , बल्कि जुम्मा चाचा लोग हैं जो किसी हालत में समझौते की बात नहीं करते। और गोपाल , वो भला क्यों अपनी जमीन दे जब तक कि शंकर सामने से आकर न कहे.......लेकिन यहां शंकर लाठी लेकर मांग रहा है तो गोपाल भी लाठी लेकर उसे रोक रहा है........जाने यह लठैती कब रूकेगी......जाने कब यह दिल से दिल की सडक बनेगी।

- सतीश पंचम

Tuesday, August 12, 2008

देहाती औरतों का झगडा और बॉलीवुड (फुलकारी)


कभी आपने देहाती औरतों को लडते हुए देखा है - हाथ चमका-चमका कर झगडा करेंगी और साथ ही साथ अपना काम भी करते जाएंगी । ईस झगडे मे धीरे-धीरे आस पडोस की अन्य औरतों के नाम आते जाएंगे और झगडा करने वालियों की संख्या बढती जाएगी, कभी कोई कहेगी - तू अपने वाले को क्यों नहीं देखती, दिन भर दीदा फाड कर यहां वहां आने-जाने वालियों को देखा करता है तो दूसरी कहेगी - और जो तेरा वाला झिंगुरी की बहुरिया से लटर-पटर करता है, वो -उसे कौन कोठार में तोपेगी। बस ईतना कहना होगा कि झिंगुरी की बहुरिया मैदान में हाजिर, फिर क्या - ऐसे-ऐसे देसी घी में तले हुए शब्द सुनने मिलेंगे कि बस , आप सुनते जाईये, लेकिन एक बात जो देखने मिलेगी वो ये कि ईनका काम कभी नहीं रूकता, उसी हाथ को चमका कर झगडा भी करेंगी, उसी हाथ से बच्चों के नाक को भी पोछती रहेंगी और उसी हाथ से जरूरत पडने पर एक दूसरे के बाल पकडकर झोटउवल भी कर लेंगी, लेकिन ईनका काम नहीं रूकेगा। एक दो दिन की मुह फूला-फूली के बाद खुद ही मेल-मेलौवल भी कर लेंगी।
कुछ यही हाल आपको बॉलीवुड में भी देखने मिलेगा, एक फिल्म स्टार दूसरे को गरियाता ही दिखेगा, कभी शाहरूख, अमिताभ को कुछ कहते सुने जाएंगे , तो कभी आमिर अपने को शाहरूख से आगे बताएंगे। अभी हाल ही में सलमान ने भी शाहरूख को अपना विरोधी करार दिया है, ईसके पहले अमिताभ और सलमान के बीच भी अनबन रहने की खबरें आती थी, पता चला कि अब दोनों में मेल-मिलौवल हो गया है और दोनों ही एक फिल्म - गॉड तुस्सी ग्रेट हो - में एक साथ आ रहे हैं, यानि ईनका काम कभी नहीं रूकता, चाहे जितना आपस में सिर-फुटौवल कर लें। इस बीच ये सिर-फुटौवल कभी-कभी दिखावटी भी होती है - फिल्म को प्रमोट करने के लिए, राखी जैसी तो ईस मामले में उस्ताद महिलाएं है ही - कभी मिका को लेकर हलकान रहेंगी तो कभी किसी टी वी शो को लेकर, और रह रह कर इनके काम करने के रेट बढते रहते हैं, यानि फिर वही बात - काम नहीं रूकना चाहिए, क्योंकि काम रूक जाएगा तो झगडा किस लिए करेंगे।
कभी-कभी सोचता हूं कि इन लोगों से अच्छी तो देहाती औरते हैं जो मन लगा कर झगडा करती है, ईन लोगों की तरह झगडा करने के पैसे तो नहीं लेतीं।
:)

- सतीश पंचम

Monday, August 11, 2008

ये है एन डी टीवी को मिले २५ पुरस्कारों का राज




NDTV को 25 पुरस्कार मिलने का आख़िर राज क्या है - जानना चाहेंगे आप , जरूर बताऊंगा , लेकिन पहले एक नजर आज के चलताऊ किस्म के न्यूज़ चैनल की अमूमन देखाए जाने वाले प्रोग्रामों की ओर देखिये - सुबह ६ या ६.३० बजे किसी बाबा का प्रवचन , सात बजे - समाचार, जिसमे ज्यादातर तड़क भड़क के साथ रात भर मे कोई ऐसी घटना को ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप मे दिखाया जाए जिसमे कोई बार पर या रेव पार्टी पर छापा पड़ने की ख़बर हो और कैमरा बार - बार उन बार-बालाओं के पुलिस वैन मे चढ़ते उतरते इन लोगों के क्लोस-अप चेहरे दिखाए , या फ़िर रेव पार्टी के लोगों को इस तरह कैमरा कवर करे जिसमे कोई ख़ूबसूरत लड़की अपना चेहरा छुपा कर बैठी हो और रिपोर्टर इस ताक मे हो की इसका चेहरा भर दिख जाए तो बाकी लोगों से वह बाजी मार ले जायेगा और शायद उसकी रिपोर्टिंग को ज्यादा धारदार माना जाए । दिन चढ़ते ही इन चलताऊ किस्म के चैंनेलों पर खबरें थोक के भाव आने लगती हैं - फलां जगह सांप ने मन्दिर मे डेरा जमाया , एक बाबा हैं जो केवल चिमटे से इलाज करते हैं , एक और बन्दर देखिये जो शराब पीता है , कौवा जो अक्सर कांव - कांव करता है , और न जाने ढेरों ऐसी खबरें .....जिनकी फेहरिस्त लेकर बैठूं तो आप भी शायद उस लिस्ट को पढ़ते - पढ़ते ही सो जाएँ ।



अब जरा NDTV की ओर देखिये - सुबह भी वही खबरें मिलेंगी जो शायद आप को रात मे देखने मिली हों , एकाध ख़बर रात की हुई घटनाओं की ताजा - खबर कहकर दिखेगी भी तो थोडी देर बाद ही न्यूज़ रीडर ख़ुद ही कह देगी - अब बढ़ते हैं अगली ख़बर की तरफ , यहाँ भी आप को अक्सर कोई नई ख़बर तो नहीं मिलती लेकिन वो अगली खबर होती है , यानी जो भी खबरें बताई जा रहीं हैं वो होती तो बासी खबर ही हैं लेकिन उन्हें सारंगी की तरह देर तक रेतते नहीं रखा जाता , टुकडों मे बदल दिया जाता है , कभी कभी तो रात की ख़बर की पूरी रिकॉर्डिंग ही सीधे पेश की हुई लगती है, लेकिन यहाँ थोडी गहराई मे सोचें - इन खबरों मे सांप बिच्छू की खबरें नहीं होती , इनमे बाबाओं की चमत्कारी शक्तियां नहीं दिखाई जातीं , इनमे दिखती है तो एक बौद्धिकता , इनमे दिखती है एक प्रकार की विचार करने की शक्ति , और यही वो बात है जो इस चैनल की विश्वसनीयता बढ़ा देती है । सिर्फ़ नयी खबरें दिखने की आड़ मे कुछ भी दिखाते जाना शायद इस चैनल ने सीखा ही नहीं है । आगे बढ़ते हैं - जब सभी चैनेल मार काट की खबरें दिखाते हैं जो की होती तो हैं लेकिन उन्हें खिंच कर लंबा कर देने की पूरी कोशिश होती है तो ये चैनल गुड मोर्निंग इंडिया दिखाता है , ठीक पूरी ताजगी के साथ । मैं यह तो नहीं कह रहा की हिंसा की खबरें नहीं दिखानी चाहिए , लेकिन उसमे भी एक प्रकार की तारतम्यता होनी चाहिए , उसमे भी लोगों को समझदारी भरे ढंग से दिखाने की जरूरत होती है , ये नहीं की एक ही द्रश्य बार बार दिखाओ और उसके असर से बात बनने की बजाये और बिगड़ जाए । गुड मोर्निंग इंडिया के बाद एक दुसरे प्रोग्राम जिसमे की लोगों की बहस चलती है तो लगता है असली संसद तो यही है , लोग अपने विचार बखूबी रखते हैं, कभी माहौल ख़राब भी हो जाता है तो पंकज पचौरी वहीं अपनी एडी लगा के कहेंगे - हम....हम ......अभी इसी... इसी मुद्दे पर बात करेंगे, आप कहीं न जाइये , और प्रोग्राम एक दो विज्ञापन दिखा कर फ़िर उसी मुद्दे पर लौट आता है - यह है एंकरिंग का तरीका जो लोगों को बांधे भी रखे और खुला बोलने भी दे , वहीं बरखा दत्त की एंकरिंग भी पूरे उफान पर होती है - Lets look at the matter what Mr Farrookh has to say ....... और इसी बीच कोई टोक देता है Listen ......Listen to me first और तब बरखा कहती हैं- yes but he had to say and please........please first I want to listen from him and then I will come back to you और यहीं वो एंकरिंग की अधिकार पूर्ण चेतावनी दिखती है की यह बहस है , इसे यूँ ही जाया मत कीजिये । एक और प्रोग्राम आता है विनोद दुआ के साथ - जायका इंडिया का - गजब की जानकारी मिलती है । यूँ तो हम सभी जानते हैं की किस इलाके की क्या ज्यादा नामी चीज है लेकिन विनोद दुआ द्वारा उसे पेश करने का तरीका ही उसे अलग करता है , कभी बनारस की ठंडाई को लेकर बताएँगे कहीं सूरत की उन्दिया , इन्ही सब के बीच चलते जायेंगे और बताते जायेंगे । उधर कमाल खान को जब कोई रिपोर्टिंग करते देखते हों तो आप को उनके बोलने मे साहित्य की झलक दिखती होगी , कुछ शायराना अंदाज मे किसी चीज की रिपोर्टिंग करते हुए यह कह देना की फिराक ने कहा था .......या कभी हम ने सोचा था .........और यही वह सोच है जो कमाल को भीड़ से अलग करती है ।

ऐसा नहीं है की सब कुछ अच्छा ही लगता है, रात बाकी जैसे कार्यक्रम पर पेज थ्री की छाप दिखती है तो सोचता हूं ये अभिजात्य वर्ग का एक और चेहरा है जिसे पता नहीं क्यूं दिखाए जा रहे हैं।

ईसके अलावा बाकी सारे लोग हैं और ढेर सारे प्रोग्राम्स हैं जो NDTV को सबसे अलग करते हैं। कभी कभी मुझे इस चैनल पर दूरदर्शन की झलक दिखती है । सोचता हूं कहीं तो है कुछ बात जो इस चैनल से जोड़े हुए है । दूसरे चैनल भी कुछ सीख लेते हुए अपने आप को बदलें तो एक स्वस्थ प्रतियोगिता देखने में मिलेगी जो दर्शक और इन न्यूज़ चैनलों को जोडे रखेगी, वरना केवल सांप-बिच्छू दिखाने से तात्कालिक रूप से लोग भले आकर्षित हो जांय, अंत में यही कहेंगे - यार ये तो हमेशा यही सांप, नाग, बंदर, बाबा और चमत्कार ही दिखाता है- बदलो चैनल , और यहीं पर विश्वसनीयता सीधे तौर पर घटने लगती है।

उम्मीद है सूरते-हाल बदलेगी , वरना अब भी लोग भारत को यदि सांप-बिच्छू का देश माने तो ईसमें आश्चर्य कैसा।

Saturday, August 9, 2008

अब काली गाय कहाँ ढूँढू (फुलकारी)

काली गाय को पके आलू खिला देना , सफ़ेद- काले कुत्ते को पपीता खिला देना , तुम्हारा काम बन जायेगा, हो सके तो दो केले दान मे दे देना , किसी को चीकू या ऐसा ही कोई फल पूर्व दिशा की और मुह करके दान करना , तुम्हारा काम बन जायेगा । ये कुछ मंत्र हैं जो आजकल रोज गणेश जी के नाम पर एक न्यूज़ चैनल पर दिमाग खाने आ जाता है, बच्चे मजे लेते हैं की पापा वो देखो बौड़म महाराज आ गए । आप लोगों की जानकारी के लिए बता दूँ की ये बौड़म महाराज राशि के हिसाब से सब को कोई न कोई मन्त्र बताते जायेंगे , ऐसे ऐसे लच्छेदार भाषा बोलेंगे मानों सीधे गणेशजी से ही मिल कर आ रहे हैं। तुम ये करना , तुम वो करना , हो सके तो ये भी करना ........समझ नहीं आता की क्या करूँ की ये बौड़म महाराज को न देखना पड़े, रिमोट लेकर बदलना चाहता हु तो बच्चे कहते हैं , नही हमें ये ही देखना है । मैंने कहा कोई कार्टून वगैरह देखो तो कहते हैं इससे बड़ा कार्टून कहाँ मिलेगा , तंग आकर मैं कुछ पढने लगता हूँ तो ठीक से पढ़ा भी नहीं होता की तभी इन बौड़म महाराज की साक्षात् वाणी सुनाई देती है - अब ये दान देना ...........चीकू दो हो सके तो तीन दान देना - वगैरह- वगैरह और इस वगैरह के चक्कर मे पढने से मन उचट जाता है और मैं भी मूर्खों की तरह टुकुर -टुकुर इन बौड़म महाराज को देखता रहता हूँ । ये महाराज इतनी चमकीली और लिजलिजी ड्रेस पहनते हैं की अमीबा भी देखे तो अपने लिजलिजी देह पर शर्मा जाए ........ ऊपर से हाथ चमका -चमका कर ऐसे प्रवाह मे बोलेंगे लगेगा - मुह से कोई आवाज का फव्वारा निकल रहा है ।

मैं समझ नहीं पा रहा ये न्यूज़ चैनल वालों को आख़िर हो क्या गया है, कहीं ये भी तो बौड़म महाराज नहीं बनते जा रहे हैं , जिस चैनल पर देखो वहीं ईस प्रकार के बौडम महाराज दिख जाते हैं। सुबह प्रवचन करते दीखते हैं बाद मे उसी चैनल पर ये अपराध भी करते दीखते हैं , कहीं जमीन हथियाने के रूप मे तो कहीं किसी केस में । अब सोचता हूँ की उन्ही बौड़म महाराज के पास जाकर उनसे ही मुक्ति का उपाय पूछूं , लेकिन जानता हूँ , वो कहेंगे - काली गाय को पपीते का बीज खिला देना , सब ठीक हो जायेगा , अब मैं इस शहर मे काली गाय कहाँ से ढूँढू। :)

- सतीश पंचम

Saturday, August 2, 2008

यमराज की कबड्डी (झलकी)

झमाझम बारिश के बीच रात के आठ बजे ट्रेन का इन्तजार करते यात्रियों की नजर ट्रेन के आने की दिशा मे लगी थी की तभी ओवेरहेड वायर पर पीले प्रकाश की एक झिर्री दिखाई दी और लगा कोई पीले प्रकाश से उस ओवेरहेड वायर को नापता हुआ चला आ रहा है , यात्रियों मे सुगबुगाहट तेज हो गई , सभी लोग अपने को किसी तरह ट्रेन मे घुस जाने के लिए जैसे तैयारी करने लगे, कोई अपना बैग संभाल रहा था तो कोई पाकेट , किसी की नजर अपने मोबाईल पर थी तो कोई अपनी आस्तीनें मोड़ रहा था मानों कोई जंग लड़ने जा रहा हो.....लेकिन यह क्या , इंडिकेटर पर तो पनवेल लिखा है लेकिन ट्रेन तो छत्रपति शिवाजी टर्मिनस की ओर जाने वाली ट्रेन है , पनवेल वाली को क्या हुआ । लोग पनवेल वाली इस तरह कह रहे थे मानों किसी घर मे कई बहुएं हों और घर के लोग अक्सर उन बहुओं के बारे मे बात करते समय उसके मायके का नाम लेकर बुला रहे हों , की वो रामपुर वाली बडकी, वो भिलाई वाली छोटकी, वो बिचली जबलपुर वाली। ऐसे मे लोग यदि पनवेल वाली कहें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि यह पनवेल वाली ही तो है जो उन्हें अपने घर पहुँचा देगी वरना हालत तो ये है की कहीं रात प्लेटफार्म पर ही न गुजारनी पड़ जाय । तभी एलान किया गया की भारी बारिश की वजह से कुछ ट्रेने रद्द कर दी गयीं हैं और कुछ ट्रेनें देरी से चल रही हैं । अब लोगों का उत्साह जो अब तक ठांठे मार रहा था अचानक बर्फ के मानिंद ठंडा हो गया.... लगा अब क्या होगा। अँधेरी स्टेशन की तरफ से आने वाली ट्रेने भर भर कर आ रहीं थीं और लोगों की भीड़ बढती जा रही थी , लोग यहीं वडाला स्टेशन पर पनवेल या बेलापुर जाने वाली ट्रेन पकड़ने के लिए उतरते , लेकिन हो यह रहा था की लोग तो आते जा रहे थे लेकिन पनवेल वाली नहीं आ रही थी ।


तभी शिवाजी टर्मिनस की ओर से एक ट्रेन पनवेल के लिए आती दिखायी पड़ी , इंडिकेटर पर देखा पनवेल ही लिखा था , सभी फ़िर से उसी तरह तैयारी मे लग गए जैसे अभी एक पहली वाली के लिए तैयार हुए थे , फ़िर वही आस्तीनें, फ़िर वही बैग और फ़िर वही उत्साह । ट्रेन धडधडाती हुई प्लेटफार्म पर आयी और लोगों ने देखा ये तो पहले ही इतनी भरी है की इसमे और लोग चढ़ तो क्या बल्कि एकाध बाहर ही न फेका जाएँ , लोग दरवाजों पर लटके हुए थे, कोई ट्रेन की छत पर चढा था तो कोई दो डिब्बों के बीच मे बनी सीढियों पर सटा था , किसी को खिड़की मे ही जगह मिल गयी थी , यानी ट्रेन को बाकायदा लोगों ने इस तरह ढांप लिया था की जैसे कोई स्त्री पहली बार गर्भवती हो और मारे लाज के वो अपने पेट को तोपने का भरसक प्रयास कर रही हो । फ़िर भी किसी-किसी को लग रहा था की और किसी को जगह मिले न मिले उसे जरूर मिल जायेगी और इसी प्रयास मे वो दरवाजे पर खड़े लोगों को आगे अंदर घुसो कहते हुए शंखनाद करता ख़ुद उन्हें घुसाने की कोशिश करता की कम से कम फ़ुट बोर्ड पर पैर रखने की जगह ही मिल जाए लेकिन हाय रे किस्मत, कोई टस से मस नहीं हो रहा था । थक हार कर वो प्लेटफार्म पर चुपचाप खड़ा हो गया, ठीक उन्हीं यात्रियों की तरह जो पहले ही हार मान चुके थे , और अगली ट्रेन का इन्तेजार करने लगे थे और लोग आपस मे बातें भी कर रहे थे कि -मान लो इस भरी हुई ट्रेन मे यदि कोई मर- मुरा जाए तो यमराज भी उसके प्राण पखेरू लेने के लिए कदापि न घुस पाएंगे। लेकिन लोग शायद यह नहीं जानते थे की यमराज ख़ुद आज मुंबई के वडाला स्टेशन पर मौजूद हैं । वो इस तैयारी मे थे की किसी की साँस टूटे तो उसे लेकर यमलोक चलें और इसी इंतजार मे पिछले कई ट्रेनों का इन्तजार कर रहे थे। लेकिन लोग थे की अपनी साँस तोड़ने को तैयार नहीं, ठीक उस कबड्डी के खिलाडी की तरह जो विरोधी खेमे मे जाने पर मुह से कबड्डी - कबड्डी का जाप करता रहता है और जानता है की जहाँ ये जाप बंद हुआ , वहीं उसकी मौत यानि आऊट हो जाने की घोषणा हो जायेगी।


यह ट्रेन भी चली गयी और लोग फ़िर भुनभुनाते कुनबुनाते प्लेटफार्म पर खड़े रहे की अब देखें अगली ट्रेन कब आती है । इस बीच लोग आपस मे समय काटने के लिए कुछ बातचीत भी करने लगे , कुछ का कहना था की ये रेल विभाग की नादानी है, बारिश के लिए पहले ही कुछ इंतजाम करना चाहिए था, ट्रैक को थोड़ा ऊपर उठा देना चाहिए था मानों ट्रैक न हुआ कपड़े सुखाने की रस्सी हो गयी जिसे जब चाहे रस्ते मे पड़ जाने पर लोग यूँ ही हाथ से ऊपर उठा कर उसके नीचे से निकल जाते हैं।

बातचीत करते करते लोगों का ध्यान सामने के विज्ञापन पर पड़ा जिसमे लिखा था - अपना लक पहन कर चलो , लोगों को उस विज्ञापन से एक नया मुद्दा मिल गया । एक ने कहा - लगता है आज किसी ने अपना लक्क नही पहना है तभी कोई ट्रेन नही मिल रही है , सुनते ही सभी और हसी की फुहार छुट पड़ी और इसी बीच लोगों की नजर बगल मे लगे एक और विज्ञापन पर पड़ी जिसमे एक नाईजीरियन लाल रंग की बंडी पहने था और उस पर लिखा था यूनिसेक्स वेस्ट । लोगों को शायद इसी तरह के टोपिक की जरूरत थी । एक बोला - विज्ञापन के इस नाईजीरियन को देख लगता है जैसे उसे जबरदस्ती पहना कर बैठा दिया गया है। दूसरा बोला- पैसे मिलेंगे तो आप बंडी क्या बिन बंडी भी बैठने को तैयार हो जायेंगे और आजकल बिन बंडी ज्यादा पैसे मिल रहे हैं। सभी जो आसपास खड़े थे मुस्करा पड़े । यमराज भी खड़े खड़े मुस्करा दिए , और तभी एक ओर पनवेल वाली गाड़ी आते दिखायी पड़ी , लोग फ़िर अपनी उसी मुद्रा मे आ गए , कसी हुई बाहें, तैयार दिल और गरगराते रेल की पटरियों की आवाज और उन्ही सब के बीच किसी की साँस टूटने की राह तकते यमराज , कोई तो गिरे इस रेल से .......कोई तो साँस टूटे ।

यह ट्रेन भी कसी हुई थी , बल्कि पहले वाली से कुछ ज्यादा ही क्योंकि इन्तजार जब लंबा होता है तो लोग रही सही आशा को इस उम्मीद मे झोंक देते हैं की जो हो देखा जायगा , और यही वह समय होता है जब यमराज की कबड्डी अपने पूरे उफान पर होती है , लोग टप्प-टप्प कर ट्रेन से एक या दो की संख्या मे गिरते हैं और यमराज उन छूटे हुए खिलाड़ियों को इन साँसों वाले कबड्डी के खेल से बाहर कर देते हैं। नियम वही - साँस नही टूटनी चाहिए।

लोगों ने इस नयी आयी ट्रेन मे घुसने की भरपूर कोशिश की , लेकिन असफल होने के लिए ही। तभी सब लोगों की नजर लेडिज डिब्बे पर गयी , अरे इसमे तो सिर्फ़ पन्द्रह - बीस लेडिज ही हैं बाकी डिब्बा तो खाली है , और इस भरी बारिश मे कौन लेडिज इतनी देर तक ऑफिस मे रुकेगी , इसलिए तो आज लेडिज डिब्बा इतना खाली-खाली लग रहा है। koochh यात्रियों की नजरें आपस मे मिलीं जैसे पूछ रहीं हो की , - कहो क्या कहते हो चला जाय । कुछ नजरों ने हिचकिचाहट दिखलाई , कुछ ने हिम्मत दिखायी और देखते ही देखते लोगों का रेला लेडिज डिब्बे की ओर बढ़ने लगा। अन्दर बैठी महिला यात्रियों के चेहरे देख कर समझा जा सकता था की उनके मन मे क्या चल रहा है। इधर यमराज के मन मे भी कुछ चल रहा था - शायद कोई शिकार न मिलने की पीड़ा या फ़िर कोई कानूनी उलझन जो की पुरूष यात्रियों द्वारा महिला डिब्बे मे यात्रा करने से बढ़ गयी थी। इधर महिला डिब्बे मे सवारियों ने विरोध करना शुरू किया की आप लोग लेडिज डिब्बे मे यात्रा नहीं कर सकते , लेकिन पुरूष यात्रियों की भीड़ इतनी ज्यादा थी की उनकी ओर कोई ध्यान ही नहीं दे रहा था । उन महिला यात्रियों को सुनाने के लिए एक पुरूष यात्री ने अपने साथी से कहा - आजकल रेलवे मे अपग्रेडेशन का नियम लागू है , जब कोई सीट खाली जा रही हो तो वेटिंग वालों को उस पर जगह मिल जाती है और इधर तो पूरा डिब्बा ही खाली है । दुसरे यात्रियों ने उसकी इस बात की तारीफ़ की और एक ने कहा - हाँ और क्या.....जब लम्बी दूरी मे ये अपग्रेडेशन लागू है तो छोटी दूरी मे क्यों नहीं। एक ने कहा - अब तो यूनिसेक्स वेस्ट (बंडी) भी आ गयी है तो क्या ट्रेन नहीं आ सकती । उधर यमराज प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े सोच रहे थे की इस डिब्बे मे घूसूं की नहीं - ख़ुद पुरूष जो ठहरे ।

उधर सिग्नल हरा हो गया लेकिन ट्रेन आगे नहीं बढ़ रही थी , बहुत से लोग अब भी प्लेटफार्म पर छूटे हुए थे उन्हें किसी भी तरह जगह नहीं मिल पायी थी और अगली गाड़ी का इन्तजार कर रहे थे। तभी यमराज के कानों मे किसी की आवाज आई - अरे एक बन्दा गिर गया है , ट्रेन की छत पर से सीधा निचे आ गया है। यमराज की बांछें खिल गयी, दौड़ते हुए पहुंचे उस जगह जहाँ किसी के गिरे होने की तस्दीक़ की गयी थी, देखा एक पन्द्रह बीस साल का युवक अपने कपडों को झाड़ते हुए उठ कर खड़ा हो रहा था , और लोग कह रहे थे जा तेरा लक तेरे साथ था जो मोटरमेन ने समय पर गाड़ी आगे नहीं बढाया नहीं तो तू आज गया था । इधर यमराज अपने शिकार को हाथ से निकलते देख कह बैठे - लगता है आज सभी का लक सबके साथ है।

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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