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Tuesday, July 22, 2008

ऐ जी, मुह उठा के कहाँ चले , संसद ? (फुलकारी)

ऐ जी सुबहिये सुबहिये कहाँ जा रहे हैं मुह उठा के - नेताईन ने नेताजी से पूछा ।
अरे औऊर कहाँ, यहीं जरा संसद तक तनिक टहल आते हैं, दोस्तन से मिल आते हैं औऊर कुछ नहीं तो तनिक सो आते हैं।
सोने काहें संसद मे जा रहे हैं, घरवा नहीं है का ।

अरे तुम का जानों संसद मे सोने का मजा । जब चारों और ऐ बे तू बे लगा हो तब अपनी आँख बंद कर केवल सुनने भर से अध्यात्म लाभ मिल जाता है , लगता है जैसे पंडितजी कथा बांच रहे हैं और हम सुन रहे हैं , श्रोता लोग पंचामृत लेने के लिए मन मे नारायण का जाप कर रहे हैं और पंडितजी जल्दी जल्दी कथा बांच रहे हैं की जल्दी से सब ख़त्म करूँ और सीधा- पिसान जो मिले बाँध बूंध के चलूँ।

लेकिन ऐसन माहोल होता है संसद मे की अध्यात्म मालुम पड़े।

अरे अध्यात्म की बात कर रही हो वहां साक्षात् नारायण के दर्शन हो जाते हैं, भिन्न भिन्न रूप मे दर्शन होता है, कभी नगद नारायण के रूप मे, कभी कौनो निगम के चेरमन के रूप मे त कबहू मंत्री पद के रूप मे ।
अच्छा...... इ बात है तो लोग तीरथ करने संसदे काहें नहीं चले जाते।
जाते हैं, बहुत लोग जाते हैं, और कोई कोई के तो नसीब मे नहीं होता की इ तीरथ करें, गोविन्दावा को देख लो,
धर्मेंद्रवा को देख लो , इ सब को तीर्थ का महात्मे मालुम नही है । पता नहीं कब जान पाएंगे इ लोग।

इतना बाबा लोग सुबह सुबह टीबी पर आते हैं, कभू केहू नही बताया की एहो एक तीरथ है ।

अरे तू का जानो, एक समय रहा जब इ लोकतंत्र का मन्दिर रहा, हर तीरथ से बढ़कर, हर महातम से बढ़कर । समय बदल गया और इ लोकतंत्र के मन्दिर नगद नारायण के मन्दिर बन गवा है , हर कोई अब मुह उठा के खुल के मांग रहा है, कौनो लाज सरम नही, कौनो लिहाज नहीं, और मजे क बात इ की इहाँ लाज लिहाज करे वालन के कुछ नही मिल पाता , मिलता है तो केवल नंगई करने वालों को।

अच्छा तभी तो कहूँ की अपने धरम मे साधू बाबा लोग नंगे या अधनंगे क्यों रहते हैं। अब जा कर समझ आया है।
धन्य है ई मन्दिर और धन्य है ई मन्दिर के साधू बाबा लोग।

- सतीश पंचम

Sunday, July 20, 2008

तो मुर्गा इतना बड़ा है (फुलकारी)

अमिताभ की उस फ़िल्म का एक द्रश्य याद है आप को जिसमे अमिताभ बच्चन अदालत मे एक झूठी गवाही देते हैं की फलां तो बहुत अच्छा है। उसके बारे मे तरह तरह की बातें बताते हैं, लेकिन जब वकील उनसे पूछता है की क्या आप उन शख्स की कद काठी बता सकते हैं की वो कितने बड़े या छोटे हैं, तो अमिताभ ने कठघरे मे खड़े खड़े ही फट से अपना एक हाथ जमीन से करीब पाँच या छह फीट की ऊँचाई पर लाकर रोक दिया और कहा इतने होंगे जनाब। तब वकील ने कहा -क्या आप को पता है की जिस की आप गवाही देने आए हैं वो एक आदमी नहीं एक मुर्गा है और यह मुकदमा मुर्गों की लडाई से समन्धित है तो अमिताभ ने तपाक से कहा ठहरिये, अभी मैंने अपना दूसरा हाथ लगाया नहीं और आप लोग शुरू हो गए, कहते कहते अमिताभ ने अपना दूसरा हाथ अपने पहले हाथ के नीचे इतनी दूरी तक सटा दिया जितने मे की एक मुर्गा अंट जाए , और तब जाकर मुकदमे मे गवाही पूरी हुई की हाँ मुर्गा इतना ही बड़ा था और अमिताभ जो बयान दिए उसमे सच्चाई है। कुछ यही हाल आजकल नुक्लीअर डील पर हो रही बयानबाजियों की है, सुबह तक एक नेता सपा मे था दोपहर होते होते बसपा मे चला गया , यानी ठीक दोपहर की पैदाईश कह सकते हैं , सुबह तक ख़ुद शाहिद सिद्दीकी जो नई दुनिया के संपादक है सभी पत्रकारों को कह रहे थे की आप लोग बिना सर पैर की बात करते हो, कहीं कोई नेता सपा से या कहीं से नहीं जा रहा है , बिना मतलब ख़बर चलाना बंद करो , मैं सपा मे हूँ, और सपा के लिए हूँ,यह शायद उनका पहला हाथ था ,लेकिन यह क्या वही शाहिद सिद्दीकी दोपहर तक नई दुनिया बसाते हुए बसपा मे चले गए और कहा की मेरे अपने लोगों का मुझ पर भारी दबाव था , मैं नुक्लीअर डील को मुसलमानों के ख़िलाफ़ मानता हूँ , तब लगा की शाहिद सिद्दीकी ने अपना दूसरा हाथ लगाया है और तब जाकर पता चला की मुर्गा इतना बड़ा है। वाह रे माया और वाह रे राजनीती।
उधर पत्रकारों से रामविलास पासवान कह रहे थे की सरकार स्टेबुल है यानी सरकार के बुल स्टे की स्थिति मे हैं स्टेबुल । और शिबू सोरेन से पत्रकार जब पूछे की प्रधानमंत्री के यहाँ आप लोग केवल डिनर वगैरह के लिए जा रहे हैं की कुछ विचार मंत्रणा भी करेंगे तो मैंने सोचा की सीधे सीधे पत्रकार यह क्यों नही पूछता की आप लोग खाना ही खाने जा रहे हैं की बाद मे दिमाग भी खाने की उम्मीद मे हैं , वैसे भी कब कौन नेता क्या खाने लगे कहा नही जा सकता ठीक वैसे ही जैसे पप्पू यह नही कर सकता , पप्पू वह नही कर सकता और पप्पू है की सब करता जाता है , जेल से बाहर आकर वोट भी डालने आ जाता है, वोट डालने से पहले बयान भी दे जाता है और बयान देकर , वोट देकर वापस पप्पू अपने निवास स्थान पर भी चला जाएगा यह हम सब जानते हैं ।

उधर पप्पू यह भी गा रहा है - ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है , ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है..........मैं रखता हूँ दुनिया को ठेंगे पर अपने , ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।
- सतीश पंचम

Saturday, July 12, 2008

तीसरी कसम और न्युक्लीअर डील (फुलकारी)



हीरामन अपनी चार साल पुरानी टप्पर गाड़ी मे न्युक्लीअर डील को लिए चले आ रहे हैं , रस्ते मे कोई गाँववाला मिल जाता है और पूछता है - कहाँ जा रहे हो भाई। हीरामन ने कहा - छ्त्तापूर - पचीरा । ई छ्त्तापुर - पचीरा कहाँ पड़ता है । अरे कहीं भी पड़े , तुम्हे उससे क्या, इस गाँव के लोग बहुत सवाल - जवाब करते हैं, देहाती भुच्च कहीं के - हिरामन ने कुढ़ते हुए कहा ।

    वैसे आप लोगों को बता दूँ की हिरामन को सभी लोग हीरे से तुलना करते हैं कि अरे ये आदमी तो हिरा है हिरा , देखा नहीं , जब बाघ को यहाँ से वहां ले जाने कि बारी आई तो सभी गाडीवानों ने इनकार कर दिया कि हम नहीं ले जायेंगे बाघ - फाग , तब यही हीरामन था जिसने आगे बढ़ कर सभी गाडीवानों कि लाज रख ली, आज भी लोग उन्हें हीरे जैसे मन वाला कहते हैं।

   हाँ तो हीरामन जी नयूक्लीअर डील कि लदनी लादे आगे बढे, रास्ते मे बैलों को यानी जनता को रह रह कर तेज चलने के लिए उनकी पूँछ के नीचे पेईना (छड़ी) से कोंच लगा देते या खोद- खाद देते जिससे बैल हरहराकर कुछ कदम तेज चलते, लेकिन महंगाई की मार झेल रहे बैल आख़िर कितना तेज चले ?  खैर अभी थोड़ा आगे बढे थे कि देखा एक जगह भीड़ लगी है - एक आदमी जो कोई नेता- फेता लग रहा था , किसी मकान की छत पर चढा है और कुछ बक बक कर रहा है, उसे देखने वालों की भीड़ लगी है और उस भीड़ की वजह से रास्ता जाम है, अब हीरामन टप्पर गाड़ी निकाले तो कैसे निकाले , उस आदमी से कहा - "अरे भाई छत से उतर क्यों नहीं जाते, देखते नहीं गाड़ी रुकी हुई है"।

उस आदमी ने कहा - "अरे छत से क्यों उतरूं, क्या अपनी टप्पर गाडी छत के उपर से ले जाओगे" ? खैर जैसे तैसे लोगों ने ही रास्ता छोडा और टप्पर गाडी आगे बढी । हीरामन मन में सोचने लगे - वह आदमीबडा लटपटीया मालूम पडता था, मुझे पहले ही उस आदमी से बात नहीं करनी चाहिए थी, सीधे लोगों से कहा होता तो वो खुद ही रास्ता छोड देते।

   इधर बैल फिर अपनी पुरानी चाल पर चलने लगे, हीरामन ने उन्हें अब छडी से मारने के लिए हाथ उठाया ही था कि टप्पर गाडी में पीछे से आवाज आई - मारो मत। धीरे धीरे चलने दो, इतनी जल्दी क्या है। हीरामन सोचने लगे कि मैं अपने बैलों को मारता हूं तो इस न्यूक्लीयर डील को तकलीफ होती है, कितना भला सोचती है ये डील। और सचमुच ये बैल भी कितना तेज चलें, पहले से ही महंगाई का बोझ ढो रहे हैं, जातिवाद, संप्रदायवाद, उधारवाद और भी न जाने कितने सारे वाद-विवाद झेल रहे हैं मेरे ये बैल। इस डील के जरिए ये सभी प्रकार के वाद एक झटके में दूर हो जाएंगे। और फिर मुझे लालटेन लेकर चलना भी नहीं पडेगा, सस्ती न्यूक्लीयर उर्जा मिलने से मेरी टप्पर गाडी में भी बल्ब लग जाएगा। इधर रास्ते में हीरामन के साथी लालमोहर और पलटदास (पलटा) भी मिल गए। हीरामन के दोस्तों के नाम फनीश्वरनाथ रेणूजी ने जाने क्या सोचकर लालमोहर और पलटा रख दिया था, कि आज भी उस नाम का असर हैकि लालमोहर अपने नाम के अनुसार लाल रंग को अच्छा समझता है, कम्यूनिस्टों सी बातें करता है। और पलटदास,वो भी कुछ कम नहीं, आज इधर तो कल उधर, पलटना जारी रखता है, जाने कौन जरूरत पड जाय।तभी तो हीरामन एक जगह कहता भी है - जियो पलटदास.......जियो

   इधर न्यूक्लीयर डील को देख लालमोहर को शंका हुई, पूछा - इस डील की लदनी लादे कहां से चले आ रहे हो,इसके आने से हमारे उन्मुक्त स्वतंत्रता में बाधा होगी, हम ठीक से गा नही पाएंगे कि - उड उड बैठी ई दुकनिया, उड उड बैठी उ दुकनिया......जब हम गाएंगे तो ये डील कहेगी कि उसी को देखकर ये लोग गा रहे हैं, बोली ठोली बोल रहे हैं......ना ना बाबा नाहम तो ये डील नहीं मानेंगे, जिंदगी भर बोली-ठोली कौन सुने..... इसे तुम वहीं छोड आओ जहां से लाए हो। तब हीरामन लालमोहर को समझाने लगे, देखो इसके फलां फलां फायदे हैं, और सबसे बढकर ये हमें पास भी तोदे रही है। पास का नाम सुनकर लालमोहर और पलटा थोडा सतर्क हो गए, पूछा - पास...कैसा पास ?  हीरामन ने कहा - "अरे कोई अईसा वईसा अठनिया दर्जा वाला पास नहीं, न्यूक्लीयर दर्जा वाला पास"। लालमोहर दर्जा का नाम सुनते ही उखड गया, लाल - लाल होते बोला - दर्जा की बात करते हो, यहां हमसभी को एक समान दर्जा की बात करते हैं और तुम एक और दर्जा बढाने की बात करते हो, लानत है तुमपर। अभी ये बातें हो रही थीं कि लालमोहर ने देखा - पलटा कहीं नजर नहीं आ रहा है।अरे ये क्या, पलटा तो उधर डील की चरणसेवा कर रहा है , जाने इस डील ने कौन सा मंत्र मार दिया है। लालमोहर ने पलटा की बांह पकड कर झकझोरते हुए कहा - तू यार हमेशा यही करता है, जरा सा कुछ हुआ नहीं कि पट से हाथ जोड चरणसेवा करने लगता है, और आज तू सेवा कर रहा है न्यूक्लीयर डील की,तेरा तो उन लोगों जैसा हाल है कि - आज न्यूक्लीयर टेस्ट किया, कल वहीं जाकर उस जमीन से माथे पर तिलक लगा लिया, पता चला अगले दिन माथे पर फोडा हो गया। इधर पलटा मन ही मन सोच रहा था - तूम क्या जानों मैं क्यूं चरणसेवा कर रहा हूं , मेरे घर पर माया का कब्जा हो गया है, मेरे बैल पगहा तोड कर भागे जा रहे है, ले दे कर एक ही सहारा था, सो मायामोह में ढहाया जा रहा है, अब तुम ही बताओ लालमोहर कि, मै कुछ गलत कर रहा हूं ? लालमोहर क्या बोले, हीरामन को ही बोलना पडा - अब पलटा तुम एक काम करो, जाकर जरा अपने जान पहचान वाले उस पनवाडी से अपने हरे हरे पान ले आओ, देखते हैं, ई डिलिया को कौन रोकता है।और देखना उस लहसनवा को भी लेते आना। लालमोहर बोला - कौन लहसनवा, उ दलबदलू ?

हां हां वही - पलटा तपाक से बोला।  इधर ये बातचीत चल ही रही थी कि- लहसनवा खुद ही बोल पडा - ऐ मालिक......लालमोहर बोला - चोप....तू कहां चला आ रहा है बडे लोगों के बीच में। ऐक जोरदार रसीद कर दूंगा, तबियत हरी हो जाएगी।

लहसनवा बोला - तबियत हरी हो जाए तो होने दो हरी ....... हम तो हैं ही हरित प्रदेश वाले।तब तक पलटा हरे हरे पान ले आया। पान खाकर हीरामन ने देखा - ई हमरे सफेद कुर्ता पर लाल दाग कैसे लग गया, इसके पहले तो कभी नहीं लगा था।

  "इसके पहले तूमने कभी लाल पान भी तो नहीं खाया था" - लालमोहर ने हंसते हुए कहा।

  तभी लालमोहर ने देखा न्यूक्लीयर डील उन चारों की ओर देख रही है। लालमोहर ने चहकते हुए पलटा से कहा - "देख रहे हो कैसे देख रही है" ।

 "कौन ?"

"अरे वही".

 "किसको ?"

"और किसको ?......उसे मालूम पड गया है कि मेरा पावर हीरामन से ज्यादा है"

  इधर लहसनवा झोला झक्कड उठाने की प्रैक्टिस कर रहा था क्योंकि अक्सर इस तरह की डील के बाद झोला वगैरह वही उठाता था, उधर हीरामन पलटा के हरे पान चबा रहा था, लाल छींटे अब भी पड रहे थे, तभी सब की नजर सामने चल रही नौटंकी मंच पर एक साथ पडी। मंच पर न्यूक्लीयर डील नाच गा रही थी, बोल थे -पान खाये सईंया हमार..... मलमल के कुर्ते पर छींट लाल लाल....... मंच के उपर लगे झालरों के उपर बडे - बडे अक्षरों में लिखा था - 'द ग्रेट भारत नौटंकी कंपनी' ।

-सतीश पंचम


Sunday, July 6, 2008

भारतीय क्रिकेट टीम को कर्ण का श्राप लगा है

लगता है भारत की क्रिकेट टीम को कर्ण का श्राप लगा है , जैसे कर्ण को श्राप लगा था की जब तुझे अपने हथियारों की सबसे ज्यादा जरूरत होगी तब ये तेरा साथ नहीं देंगें, वैसे ही भारत की टीम फाईनल मैच मे अक्सर हारती नजर आती है। अभी पिछले फाईनल मे हार पचा भी नही था की इस बार फ़िर हार हो गयी। वर्ल्ड कप मे भी यही हाल हुआ, सभी सीसन के मैच हमने ठीकठाक खेले, लेकिन जब वर्ल्ड कप मे खेलने का वक्त आया तो बरमूडा छोड़ कोई और हमसे कमजोर न निकला। याद है बरमूडा के उस खिलाडी Levrock ने जब उथप्पा का कैच लिया था तो वो कितना खुश हुआ था , आज भी लोग उसे रियल खुशी मानते हैं, तब कमेंटेटर ने कहा था की बरमूडा के खिलाड़ी जीवनयापन के लिए अन्य काम धंधे करते हैं, क्रिकेट तो केवल टाईम पास के लिए खेलते हैं। आज सोचता हूँ की हमारे क्रिकेटर भी तो यही करते हैं , जीवनयापन के लिए अन्य काम धंधे करते हैं, कोई रेस्टोरेंट खोल रहा है , कोई विज्ञापन कर रहा है , तो कोई कमेंटरी , जब क्रिकेट खेलने का वक्त आता है तो कोई सहवाग से परमीशन लेकर आधे घंटे के लिए मॉडलिंग कर आता है तो कोई अपनी पत्नी के लिए होटल मे सुइट बुक न होने से नाराज हो जाता है । हमारे खिलाड़ी क्रिकेट खेलते कब हैं, समझ ही नही आता। तब सोचता हूँ की कमेंटेटर ने जो बात बरमूडा के लिए कही थी , वही बात भारत के खिलाड़ियों के लिए भी कही जा सकती है , यानी - जीवन यापन के लिए अन्य काम धंधे करते हैं, क्रिकेट तो केवल टाईम पास के लिए खेलते हैं।
उस कैच का क्लिप देखने के लिए यहां क्लिक करें। बहुत ही मजेदार कैच था , क्लिप देखने के बाद अपनी राय जरूर दें , आपकी राय का इंतजार है।

Saturday, July 5, 2008

प्रेमी जोड़े और लोगों की मुसीबत (फुलकारी)

पार्को मे या अंधेरे झुरमुटों के बीच बैठे प्रेमी जोडों पर अक्सर आप की नजरें पड़ी होंगी, लोग उन पर शंकित निगाहों से देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन मुंबई मे एक जगह लोग उन्हें देखने के लिए ही जाते हैं, और वो जगह है मुंबई का फाईव गार्डन इलाका जहाँ की बातें अब आप लोगों को बताने जा रहा हूँ। बस नम्बर 171 उसी इलाके से होकर गुजरती है । होता ये है की जब बस उस इलाके से गुजरती है तो बस मे बैठे लोगों की गर्दन अपने आप उस और मुड जाती है जिस ओर प्रेमी जोडों के बैठने का ठिकाना है। एक साथ इतने लोगों की गर्दन मुड़ने से यूँ लगता है जैसे कोई परेड चल रही है और कई सिपाही सलामी मंच की ओर एक साथ देख कर सलामी दे रहे हैं। जैसे ही इलाका ख़त्म हो जाता है, वैसे ही सभी की गर्दनें अपने आप अपनी पुरानी जगह आ जाती हैं और लगता है , सलामी मंच पीछे छुट गया है और सैनिकों ने अपना सीधे चल वाली मुद्रा अपना ली है।
फ़िर बस थोड़ा और आगे बढती है तो एक बस स्टाप पड़ता है जिसके लोहे के पाईपों पर प्रेमी जोड़े बैठे रहते हैं। कोई गलबहियां डाले बैठा है तो कोई गालों को सहला रहा है, तब फ़िर सभी की नजरें उसी बस स्टाप पर जा बैठती हैं ,कई बार यहाँ रहने वाले लोगों ने चाहा की उनके इलाके के बस स्टाप पर से ये प्रेमी जोड़े हट जाएँ, उनके रहने से घर के बच्चों पर बुरा असर पड़ता है , लेकिन ये जोड़े नहीं हटते और फ़िर आ बैठते हैं। एक बार तो हद हो गयी , लोगों ने उन लोहे के पाईपों पर ग्रीस लगा दिया जिससे की जोड़े न बैठ पायें, जोड़े आते और मन मसोस कर आगे की ओर बढ़ जाते, कुछ देर यही सिलसिला चला, आसपास के लोगों ने सोचा चलो , जान छुटी, अब ये यहाँ नजर नहीं आयेंगे। अगले दिन देखा सभी जोड़े उन लोहे के पाईपों पर अखबार बिछा कर बैठे थे और आसपास के लोग अपना माथा पीट रहे थे।
वैसे इस इलाके के बारे में म्यूनिस्पेलिटी को भी पता है , उन देखरेख करने वालों ने देखा की सीमेंट के जो लंबे लंबे सोफेनुमा सीटें बनी हैं उन पर जोड़े अक्सर ज्यादा ही खुलेपन का इजहार करते हैं और कोई कोई तो उस पर आराम से सो जाता है और लोगों को बैठने की जगह नहीं मिलती , इसी उपक्रम मे प्रेमी जोडों को अलग अलग बैठने के लिए उद्यान अधिकारीयों ने उन सीमेंट के बड़े बड़े सोफेनुमा सीटों को हटवाकर सीमेंट का ही ढेर सारा सिंगल चेयर लगवा दिया जिससे की एक सीट पर सिर्फ़ एक ही व्यक्ति बैठे लेकिन यहाँ भी जोडों ने उन्हें फेल कर दिया , अब दोनों ही प्रेमी प्रेमिका उस सिंगल चेयर पर और भी सटकर बैठने लगे और कोई कोई तो एक दुसरे के गोद मे बैठने लगे और अधिकारी अपना सर नोचते रहे ।
अब इससे ज्यादा डिटेल बताने लगूंगा तो अश्लीलता का आरोप लग सकता है , इसलिए अब ये चर्चा यहीं समाप्त कर देता हूँ।

हो सके तो टिप्पणियाँ दे कर हमारा मनोबल बढाये , ताकझांक के लिए नहीं भाई , आगे भी ऐसी फुलकारी लिखने के लिए :)

Tuesday, July 1, 2008

देश Autopilot पर है. (Short Story)

नितिन के कदम खुदबखुद Pilot Rest-Room की ओर बढे जा रहे थे, कमबख्त इस बंगलोर वाली Flight ने परेशान कर रखा है , एक नजर घड़ी की तरफ़ डाली - ओह.... Its 4.00 am.....damm, I hate this timing. जब सभी लोग सो रहे होते हैं रात एक बजे , कमबख्त तभी इस Flight को attend करो , साले ये भी तो नही कह सकते की एक spare Pilot रखें, cost saving .......Bullshit.... मन ही मन नितिन कुढ़ता हुआ Pilot Rest Room मे दाखिल हुआ। सोफे पर धम्म से गिरते हुए जैसे उसे लगा अब यहीं सो जाऊं तो अच्छा रहे, तभी Rest Room attendent कृपाल सिंघ ने दरवाजा खटखटाया , May I sir, ............ya Come come, न चाहते हुए भी नितिन को बोलना ही पड़ा , इस वक्त वो किसी से बोलना नहीं चाहता था लेकिन एक कृपाल ही तो था जो रोज उसी की तरह नाईट ड्यूटी करता , और गाहे बगाहे जब उसे नाईट ड्यूटी से खीज होने लगती तो कृपाल को देख कर जैसे उसे अहसास होता की वो अकेला नहीं है, हालांकि Co-Pilot सुधीर साथ होता है लेकिन उसके साथ कितनी देर बात की जाय, बंगलोर से मुंबई तक तो लगभग रोज ही वो दोनों साथ साथ होते हैं और बातें भी तो वही पायलटों वाली , Poor Visibility, Hang-on, Hang-Off, one point Landing , Two Point Landing, कमबख्त इसके सिवा ज्यादा हँसी मजाक भी तो नहीं कर पाते , अभी उस दिन Air-Hostess मीना चटर्जी को सिर्फ़ Hi Kitty ही तो कहा था , Flying Manager मिश्रा ने छूटते ही कह दिया , see , I don't want any escalations, Please behave properly in Cockpit, Your voice details are with us........no more to say. साला जैसे उसे cockpit की इन्ही बातों को सुनने के लिए रखा है।

सुधीर साब नहीं आए - कृपाल ने पानी का ग्लास और नमकीन रखते हुए पूछा।

नहीं, उसके कोई गेस्ट मिल गए हैं , उनसे मिल कर बाद मे आएगा- अनमने होकर नितिन ने जवाब दिया ।

चाय ले आऊं ?

नहीं , आज मूड नहीं है । तुम जाओ , अभी थोड़ा सोना चाहता हूँ ।

जी अच्छा, - कहकर कृपाल वापस चला गया।

पानी पीकर नितिन की नजर टेबल पर पड़ी aviation Magazines पर पड़ी, - कहीं Airspace है, तो कहीं Flying ढकी है, उसके बगल मे ही Wings दिख रही है , उसने ज्यादा इधर उधर न देखते हुए सोफे पर ही सो जाने का उपक्रम किया , पैर फैलाकर उसने आँखें बंद कर लीं , लेकिन कमबख्त नींद को क्या हो गया , वो भी नहीं आ रही अब, सामने पड़े Rest Bed पर नजर पड़ी , नितिन ने उठकर उसी पर सो जाना चाहा, पानी और नमकीन वैसे ही पड़े रहे, जैसे उन्हें पता हो की उन्हें कोई छूने वाला नहीं है- इतना वो भी जानते हैं।

Bed पर पड़ने के बाद नितिन ने आँखें बंद कर सोना चाहा , लेकिन बहूत देर तक आँखें बंद करने के बाद भी नींद नहीं आई, कभी - कभी ऐसा भी होता है की जिस चीज की जब जरूरत होती है, वो अचानक मिल जाए तो उस चीज की वल्यु ख़त्म सी हो जाती है। वह चीज जब तक सामने नहीं होती , लगता है , यही सबसे जरूरी चीज है।

अब........

अब क्या करूँ, ये अचानक नींद को क्या हो गया, अभी तक तो साली जैसे बदन तोड़ रही थी- नितिन जैसे मन ही मन बुदबुदाया। Bed के बगल मे पड़े न्यूज़ पेपर पर हाथ बढाया ..... सोये सोये ही खबरें अनमने सी देखने लगा , Nuclear deal issue गर्म था , एक जगह आरुशी हेमराज की खबरें बतायी गयी थीं, मुह का स्वाद जैसे कड़वा हो गया, एक मर्डर क्या हुआ पूरा मिडिया पीछे पड़ गया, तभी एक जगह नजर पड़ी- विमान मे पायलट सो गए , पूरी ख़बर मे दिलचस्पी बढ़ गयी, एक तो वैसे भी उसके पेशे से जुड़ी ख़बर थी, ऊपर से ये जिस तरह से हेडिंग लिखी गयी थी , उससे उसकी दिलचस्पी और बढ़ गयी, पूरी ख़बर को एक साँस मे पढ़ डाला, विमान Autopilot पर रख कर पायलटों के सो जाने की ख़बर थी की किस तरह विमान मे कई सौ यात्री थे और पायलट थे की सोये हुए थे, एक बार फ़िर नितिन को लगा मुह का स्वाद बिगड़ गया है, उठ कर बैठ गया, कुछ देर यूँ ही bed पर बैठने के बाद , उसने सोचा चाय पी जाय, बगल मे लगे काल बेल को बजाया, थोडी देर मे कृपाल वापस दरवाजे पर-

yes Sir?

कृपाल एक चाय लाना।

जी- कहकर कृपाल चला गया।

नितिन फ़िर सोच मे डूब गया, - क्या होता अगर Autopilot Mode मे ही कोई accident वगैरह हो जाता। ऐसा नहीं है की नितिन ने प्लेन Autopilot मे न रखा हो, लेकिन कितनी देर, सिर्फ़ कुछ मिनट तक जब लगता की यहाँ ज्यादा कुछ Handle करने को नहीं है, और फ़िर CoPilot भी तो होता है, लेकिन यहाँ तो दोनों ही सो गए थे । सोचते हुए नितिन को News की headlines याद आई - गुर्जर आन्दोलन से rail सेवा बंद, सिखों ने बाबा राम रहीम के वजह से बंद किया, jammu बंद , अमरनाथ श्राइन बोर्ड से जमीन वापस ली गयी, मुंबई मे बाहरी- भीतरी के नाम पर हंगामा मचा है , लोगों को परेशान किया जा रहा है की तुम नॉर्थ वाले हो या कहाँ के ...............

तभी नितिन ने सोचा - ये देश भी तो Autopilot पर है - कोई देखने वाला नहीं, कोई बोलने वाला नहीं - ऐसे मे कोई Accident हो जाए तो .......लेकिन accident तो उस विमान मे भी नहीं हुआ था , तो क्या देश सचमुच Autopilot पर है ?

* * * * *

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