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Saturday, May 31, 2008

पत्नी नाईटी पहने टिफिन दे और पति इनकार करे

मुम्बई के किंग्स सर्कल स्टेशन पर एक अजीब वाकया हुआ । गाड़ी स्टेशन पर आकर लगी तो सभी यात्री फ़टाफ़ट चढ़ गए और प्लेटफार्म खाली हो गया लेकिन तभी सब की नजर प्लेटफार्म पर खड़ी एक महिला पर गयी जो की नाईटी पहने थी और अपने हाथ मे लिया हुआ टिफिनबॉक्स अपने पति को पकड़ा रही थी और पति था की टिफिन लेने को तैयार नही था , वो अपने पैरों के बीच मे अपना आफिस बैग दबाये हुए , अपने दोनों हाथ बाँध कर खड़ा था और अपनी पत्नी से बहस कर रहा था। पत्नी थी की टिफिन दिए जा रही थी और पति था की केवल न न करते हुए बहस कर रहा था , पत्नी कहे जा रही थी की देखो लोग देख रहे हैं लेकिन पति था की अपनी ही धुनकी मे था , वो लगातार कह रहा था की तू माँ से ऐसे कैसे बात कर रही थी या ये या वो ऐसी तमाम घरेलु बातों का जिक्र पति थोडी ऊंची आवाज मे कर रहा था । गाड़ी भी अक्सर जो तीस सेकंड से ज्यादा नही रूकती वो भी न जाने क्यों ज्यादा समय रुक गयी । लोगों की दिलचस्पी अब उनके झगडे मे बढतीजा रही थी , इतने मे एक नौजवान जो गाड़ी के दरवाजे पर ही खड़ा था बोल पड़ा , अरे जाने दो , काहे को टिफिन दे रही हो, बाहर बहुत वडापाव बीडापाव मिलता है , खा लेगा किधर । इतना सुनना था की लोग थोड़ा मुस्करा उठे , तबतक किसी और ने कहा चुतिये ले न , मालुम है बाहर जा के पहले होटल मे खायेगा बाद मे आफिस जायेगा। अब तो वो आदमी भी चुप हो गया और पत्नी ने गाड़ी के दूसरी और मुह फेर लिया , पति तब तक संभल गया था । चुपचाप , बैग लिया और स्टेशन के भीतरी हिस्से मे चला गया , पीछे पीछे पत्नी भी चली गयी । इधर गाड़ी भी चल पड़ी । मन मे तो आया की क्या गाड़ी भी यही देखने रुकी थी । इधर डब्बे के अन्दर अलग चर्चा चल पड़ी की इधर कहीं आस पास की होगी तभी नाईटी मे ही पति के पीछे पीछे आ गयी , एक और बोला- अरे तो झगडा घर मे करने का , इधर स्टेशन पे थोडी ऐसा करने का, तब तक कोई और बोला तेरे बोलने का मतलब है लेकिन झगडा करने का । सुनकर डिब्बे मे थोड़ा ठहाका लग गया ।

नागार्जुन की कहानी सच साबित हो गयी

बिहार के समस्तीपुर मे फ़िर एक बार नागार्जुन का लिखा उपन्यास बलचनमा सच साबित हो गया जब मजदूरी मांगने गए मजदूर को बांस्वारी से बाँध कर मारा गया और बगल मे ही उसकी पत्नी अपने बच्चों को लेकर बिलख रही थी। ये तस्वीर कई जगह दिखाई गयी है और यदि नागार्जुन के १९३६ मे लिखे उपन्यास का अंश पढ़ें तो लगता नही की बिहार बदल रहा है । अंश देखिये - ......... मेरे बाप को एक खभेली से कसकर बाँध दिया गया था। जांघ, चुतर , पीठ और बांह - सभी पर बांस की कैली के निशाँ उभर आए हैं। चोट से कहीं कहीं खाल उधड़ गयी है और आंखों से बहते आंसुओं के ट्घार गाल और छाती पर से सुखाते हुवे नीचे चले गए हैं ..........माँ रो रही है, और मैं भी रो रहा हूँ। मेरी छोटी बहन की तो डर के मारे हिचकी बंध गयी थी। ..........- ये शब्द शब्दशः सच दिख रहा था १९३६ मे भी और २००८ मे भी । क्या देश को बदलने मे इतना समय कम पड़ रहा है , नागार्जुन जी ने शायद ये न सोचा हो लेकिन सच तो यही लगता है , बलचनमा - कब तक लिखा जाता रहेगा और कब तक साबित होता रहेगा कौन जाने ?

वर्नाकुलर मीन्स लैंग्वेज ऑफ़ रोमन स्लेव्स

राजेंद्र यादव की कहानी - टूटना - पढ़ रहा था तो एक शब्द पर ध्यान गया की- वर्नाकुलर मीन्स लेंग्वेज ऑफ़ रोमन स्लेव्स , जिसे कहानी का नायक किशोर नफरत से बोल रहा था। उसके विचार से अंग्रेजी वाले अपने बड़प्पन को जताने के लिए ऐसे शब्दों का जानबूझकर इस्तेमाल करते हैं। पढ़ते वक्त लगा की ये शब्द तो आज भी इस्तेमाल हो रहे हैं लेकिन इनका मतलब सिर्फ़ मादरेजबान या मदर टंग कह कर बताया जाता है। कभी किसी ने इसके इतिहास मे जानने की कोशिश नही की। खैर वैसे भी भाषा का मतलब ही अपनी बात को समझाने के लिए होता है लेकिन देख रहा हूँ की हमारे फ़िल्म स्टार वर्नाकुलर बोलने मे जैसे ख़ुद को इंडियन स्लेव मानने लगते हैं , और उनका ये मानना केवल अवार्ड फंक्शन तक ही सीमित होता है, फिल्म करने मे कोई आपत्ति नही होती। यानी खाते हिन्दी की हैं गाते अंग्रेजी की हैं। यानी उन्हें अंग्रेजी स्लेव बनने मे आपत्ति नहीं है, उन्हें आपत्ति है तो केवल इंडियन स्लेव बनने मे क्योंकि कहा है न की - घर का जोगी जोगडा आन गाँव का सयाना । आप की क्या राय है दोस्तो, जरा यहाँ भी बताइयेगा।

Wednesday, May 28, 2008

रश्मि कुमार की रचना - मन न भये दस बीस

मन न भये दस बीस - पढ़ने के वक्त लगता ही नही की किताब पढ़ रहे हैं, हर एक कहानी जैसे हमारे अगल बगल की ही है , कभी लगता अरे ये तो मेरे साथ हो चुका है, अरे ये तो मैंने देखा है, अरे ऐसा तो मामा जी के घर उस दिन ऐसा ही हुआ था। बस यूं कहा जाय की सारे अनुभव यही मिल जाते हैं।
एक महिला जो चेहरे से ख़राब है, जी तोड़ कोशिश करती है की उसकी वजह से किसी को दुःख नही पहुंचे , लेकिन लोग हैं की दुःख देने के लिए जैसे आतुर रहते हैं, ऐसे मे छोटा सा उसका बच्चा कैसे उसके स्वाभिमान को वापस लाता है वो देखने लायक है, इसी तरह एक कहानी मे पत्नी द्वारा पति का नाम ले कर बुलाये जाने पर नाराज होने वाली सास से किस सहजता से इस मुश्किल का तोड़ निकाला जाता है वह भी काबिले तारीफ है। एक कहानी और थी जिसमे एक शख्स को दुखी दिखाया जाता है क्योंकि उसके बच्चे उसकी नही सुनते। बहुत दुखी माहौल मे ही अचानक कोई पूछता है की आप का रिटायरमेंट फंड तो अच्छा खासा होगा, बस जैसे यही सुनते ही उसकी पीठ सीधी हो जाती है और ऐसे ही न जाने कितनी बातें हैं जिन्हें बस पढ़ते चले जाओ।

मेरे पास रश्मी कुमार का ईमेल आईडी नही है, यदि किसी के पास हो तो मेरी तरफ़ से ऐसी रचना के लिए बधाई जरूर दे दीजियेगा।

मन न भये दस बीस( सत्साहित्य प्रकाशन , २०५ बी , chaavadi बाजार , न्यू दिल्ली - ६ द्वारा प्रकाशित)

Sunday, May 25, 2008

मुम्बई मे नई हिन्दी लाईब्रेरी खुली है .

पता है - जीवन प्रभात विमला पुस्तकालय , ऐ - ४/१ कृपा नगर, जैन मन्दिर के सामने, इर्ला ब्रिज, विलेपार्ले , मुम्बई -५८,
फ़ोन नम्बर -०२२- २६७१६५८७
किताबे जो मिलती है - इन्ही हथियारों से - अमरकांत, सारा आकाश - राजेंद्र यादव, अधूरा गाव - रही मासूम मानसरोवर (८ भाग) - प्रेमचंद, और साथ ही शरद जोशी, दुष्यंत कुमार, नरेन्द्र कोहली, अमृता प्रीतम, अशोक चक्रधर, मंटो, बेदी, शिवानी - और ऐसे ही लेखकों से भरी ये लाइब्रेरी अभी हाल ही मे खुली है। मैंने जाकर देखा तो दंग रह गया। मात्र पचास रुपये मासिक फीस और ये खजाना - और वो भी मुम्बई मे , वाह ।
कही पर ममता कालिया , कही पर मत्रेयी पुष्पा बगल मे ही रामदरश मिश्रा हैं तो कही कोने मे अशोक चक्रधर हस रहे है और पुछ रहे है कहो कैसे यहाँ आना हुआ इस मुम्बई मे , वही बगल मे ही इस्मत चुगताई भी सिमटी मिलीं तो लगा जैसे प्रेमचंद अपने आठ मानसरोवर से उन्हें भीगा रहे हैं। एक तरफ महादेवी भी दिखाई पड़ी , निचे के रैक मे देखा तो फनिस्वर्नाथ रेणू कह रहे थे यार यहाँ थोड़ा मैला आँचल है , बगल मे ही विवेकी रे भी पलथी मारे मुस्करा रहे थे और जैसे पूछ रहे थे क्यों कैसी रही हम लोगों की मंडली। चलने लगा तो पीछे से अमरकांत कहने लगे जा रहे हो तो सफ़ेद घर मे ही न रह जाना।
मैं मन ही मन ठान चुका था , सफ़ेद घर मे रहूँ या नहीं, सफ़ेद घर मे चर्चा जरूर करूंगा।
फ़िर अपनी स्टाईल मे कहूँगा - Recommended by Safed Ghar .

Saturday, May 24, 2008

फ़िर बैतलवा डाल पर

हाल ही में विवेकी राय द्वारा लिखी किताब पढी फिर बैतलवा डाल पर । किताब क्या थी पूरी एक मन को छू लेने वाली चंचल अल्हढ़ पगडंडी थी जो ना जाने कितने रूप दिखाती हुई ले जा कर लोगों के बीच छोड़ देती और कहती वो देखो गदहा के कान मे तेल डाल रहा है ताकि वर्षा का पानी रूक जाय , ऊधर देखो लोग चौबे जी को गरम दूध पिला रहे है ताकि अब भी वर्षा का पानी रूक जाय। चन्दा माँगने गए लोगों से तों ठाकुर ऐसे बात करने लगे जैसे हज़ार दो हज़ार को कूछ समझते ही नहीं, यहाँ वहाँ की बातें बहूत देर तक करने के बाद चन्दा दिया ये कह कर की इसे हज़ार रुपये की थैली समझो - और चन्दा था कितना - दो रुपये। और ऐसी कितनी ही कहानियाँ है जो रह रह कर मन को पुलकित कर देती हैं, एक कहानी मे तों गज़ब बताया गया की सुरती खाने के लिए मास्टरजी को क्या क्या करना पडा, ऊन्हे सलाह भी मिली की भीख माँगना सीखना हो तों पहले सुरती खाना सीखिए। सुरती के लालच में मास्टरजी बहूत देर तक किसी के पीछे पीछे चलते रहे , केवल ऊसकी हाँ मे हाँ मिलाते रहे की अब दे दे , अब दे दे लेकिन सुरती बनाने वाला अपनी बातों मे लगा आगे आगे चलता रहा और पीछे पीछे मास्टरजी , एक खेत पर पहुँच कर सुरती बनाने वाला बताने लगा की देखो यहाँ किसी ने ताजा ही फसल चोरी किया है और बताते बताते भूल से अपने मुँह मे बनाई हुई सुरती डाल लिया , मास्टरजी बस देखते रह गए। ऐसी न जाने कितनी कहानियाँ है जो मजेदार तों हैं ही साथ ही साथ गाँव की झलक खूब दिखा देती हैं। भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक वाकई तारीफ़ करने लायक है। कूछ संवाद देखिये

के ताघारल आवत बा हो !
गोहार बोला लाइ है रांड कहीं की ,
पंडितजी कहे हैं की भोजन धरम धक्का रहेगा की छाती फार अर्थात मन से खिलाओगे की बस ऐसे ही .

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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