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Saturday, December 6, 2008

फाफामऊ वाली पतोहू और सकलदीप की माई


अचार बनाते समय रमदेई ने फाफामऊ वाली पतोहू को तनिक हाथ धोकर ही छूने-छाने को क्या कह दिया, फाफामऊ वाली तो आज उधान हो गई है। रह-रहकर अपना काम करते समय सामने आ जाती है और तीखे व्यंगबाण छोडती है -

कुछ काम तो है नहीं, बस राबडी देवी की तरह तर्जनी अंगुरी उठा कर लहकारे रहेंगी कि, छू-छा मत करो.....हाथ धो लो.....हुँह, जैसे हम कोई छूतिहर हैं, बेटा को हमसे बियाहे बेला नहीं देखा था कि साफ सुथरी हैं कि नहीं, आज आई हैं हमें सफाई दिखाने।

रमदेई भी क्या करें, जब तक जांगर था अपने हाथ की कर-खा लेती थी, अब तो जब खुद की देह ढल गई है तब औरों को क्या दोस दे। सदरू अलग इस रोज-रोज की किच-किच से परेशान रहते थे। खैर, जैसे तैसे दिन बीत रहे थे, यह मानकर संतोख कर लेते कि, जहाँ चार बासन होंगे वहाँ पर आपस में बजेंगे ही। सदरू यही सब सोचते अपने दरवाजे पर बैठे हुए थे।

उधर फाफामऊ वाली पतोहू आँगन में एक बोरा बीछा कर उस पर बैठ अपने छोटे लडके को उबटन लगा रही थी। उबटन साडी में न लग जाय इसलिये घुटनों तक साडी को उपर भींच लिया था, दोनों पैरों को सामने की ओर रखकर, उसके उपर बच्चे को लिटाकर उबटन मलते हुए तो फाफामऊ वाली को कोई नहीं कह सकता कि यह झगडालू है, उस समय तो लगता है कि ये सिर्फ एक माँ है जो अपने बेटे को उबटन लगा कर, मल-ओलकर साफ सुथरा कर रही है। इधर बेटा अपनी मां को देखकर ओठों से लार के बुलबुले बनाता अपनी बुद् बुबद् .....बद्....की अलग ही ध्वनि निकाले जा रहा था। तभी दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई।

कौन.....बिमला....आओ आओ।

अरे क्या बेटवा को उबटन लगा रही हो......और देखो तो कैसे मस्त होकर उबटन लगवाये जा रहा है......बिलकुल मेरे सकलदीप की तरह।

सकलदीप की तरह, हुँह आई है बडी जोड मिलाने वाली......कहाँ मेरा लल्ला और कहाँ इसका नाक चुआता सकलदीप। मन ही मन भुनभुनाते हुए पतोहू ने कहा - अम्मा उधर रसोई में हैं।

फाफामऊ वाली के इस तेवर से बिमला समझ गई आज लगता है खटपट हुई है घर में। फिर भी थोडा सा माहौल को सहज करने की कोशिश करते हुए कहा - अरे हैं तो हैं, क्या हो गया, क्या मैं तुमसे ही मिलने नहीं आ सकती..........आई बडी अम्मा वाली।

पतोहू को अब जाकर थोडा महसूस हुआ कुछ गलत हो गया है.......भला क्या जरूरत बाहर वालों के सामने अपना थूथन फुलाये रखने की। संभलते हुए बोली - अरे नहीं, उबटन से मेरा हाथ खराब है न सो मैंने सोचा कोई लेने देने में तुम्हें अनकुस न लगे, तभी अम्मा की ओर बताया था। बैठो-बैठो, और कहो - क्या हाल है घर ओर का।

बिमला को अब दिलासा हुई कि चलो अभी थोडा ही गदहा खेत खाया है। बैठने के लिये लकडी की छोटी पीढी को अपनी ओर खींचती हुई बिमला ने अपने घर की बिपदा बयान करनी शुरू की। अरे क्या कहूँ बहिन - मेरी सास तो एकदम आजकल भगतिन हो गई है, कहती है बरतन ठीक से माँजो, तनिक साफ-सफाई का ख्याल करो....... हाथ धो-धाकर ही अचार छुओ।

फाफामऊ वाली का जी धक् से हो गया - हाथ धो-धाकर ही अचार छुओ........ये क्या कह रही है। यही बात तो आज के झगडे की जड बना है। और ये बडकी सहुआईन वही कह रही हैं जो मेरी सास ने कहा। अरे अभी सुन लें तो मेरे घर में फिर महाभारत मच जाय। सोचेंगी न समझेंगी बस, यही कहेंगी कि ऐसे घर-फोरनियों के ही कारन सब घर बिगडते जा रहे हैं। खुद कुछ काम न करेंगी और दूसरों के घर काम बिगाडने चल देंगी। पतोहू ने सोचा अब कोई दूसरी बात करू नहीं तो ये अपना रूदन लेकर बैठी रहेगी और सुनना मुझे पडेगा।

अच्छा सकलदीप कैसा है

वो तो ठीक है, उसको क्या होगा.....जो होगा मेरी अम्मा को ही होगा.......उसे देखकर कहती हैं कि कितना खाता है रे घोडमुंहा.....पेट है कि मडार।

इधर पतोहू सोच में पड गई - फिर वही सास की बात, अभी अम्मा रसोई में सुन ले तो हाथ में जलती लुक्की लेकर दौडेंगी। इसे अब सीधे-सीधे दूसरी बात करने के लिये कहूँ वही ठीक होगा।

अच्छा अब दूसरी बात करो, क्या वही पुरानी-धुरानी लेकर बैठी हो.....और सुनाओ......छुटकी का क्या हाल है।

पुरान-धुरान बात.......... बिमला को अब भी पतोहू के असली मंतव्य का पता न चल रहा था कि किसी तरह बात सास से हटकर किसी और मुद्दे पर आ जाय लेकिन वह माने तब न। कुढते हुए बोली - अरे इसे पुरान-धुरान बात कह रही हो......ये तो अब पुराना होने से रहा......रोज ही ऐसी और कई बातें नये ढंग से मेरे घर में होती हैं, वो तो मैं हूँ जो संभाल ले जाती हूँ......मेरी सास का चले तो........।

बिमला की बात अधूरी रह गई......रसोई से बाहर निकलते रमदेई ने कहा - ए सकलदीप के माई,.... तनिक हाथ लगा दो तो छत पर सूखते मकई को उतार लूँ।

फाफामऊ वाली पतोहू समझ गई........ अम्मा जान गई हैं कि मैं बात टाल रही हूँ और ये बतफोरनी मुझसे बार-बार सास-बेसास करे जा रही है, उसे चुप कराने के लिये ही अम्मा ने अपने काम में उसको लगा दिया है। ये बतफोरनी काम में लगी रहेगी और बात बदल जायगी। आज पहली बार अपनी सास पर मन ही मन गर्व हो रहा था फाफामऊ वाली को.....झगडा और झगडे की जड को कैसे ढंका-तोपा जाता है यह कोई रमदेई अम्मा से सीखे।

उधर सदरू आँगन से बाहर बैठे अपने बडे पोते बड्डन के साथ खेल रहे थे - बड्डन ने दो चुंबक अपने हाथ में लेकर उन्हें चिपकाने की कोशिश कर रहा था। दोनों चुंबकों के समान ध्रुवों के N-N पोल को जोडता, लेकिन वो दूर भागते....जैसे ही N- S पोल को जोडता, वह चिपक जाते। सदरू यह सब बडे मगन होकर देख रहे थे - उन्हें लग रहा था - सकलदीप की माई बिमला और मेरी पतोहू इस N-N पोल की तरह हैं, जितना ही सास का नाम लेकर सकलदीप की माई चिपकने की कोशिश करती, पतोहू उतनी ही जोर लगाकर बात बदलने की कोशिश करती है। जैसे ही रमदेई और सकलदीप की माई का संवाद चला, विरोधी ध्रूव जुड गये, N-S पोल की तरह। जरूरी नहीं कि आपस में विचार मिलते हो तो घनिष्ठता बढे ही......इसका उल्टा भी हो सकता है, ठीक चुंबक की तरह।
उधर छत के उपर से रमदेई सूखी मकई कि चेंगारी भर कर पकडा रही थी,सकलदीप की माई बिमला नीचे खडी अपने दोनों हाथों से चेंगारी थाम रही थी। तभी चुंबक से खेलते हुए पोते ने कहा - दद्दा ये देखो....एक चुंबक उपर है, उससे चिपका दूसरा नीचे से लटक रहा है, गिरता भी नहीं। सदरू ने देखा....उपर वाले चुंबक का N पोल, नीचे वाले चुंबक के S पोल से जुडा था ।

- सतीश पंचम

21 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत शानदार!
सदरू भगत की सीरीज तो कमाल की है. मानव-मन पर अद्भुत पकड़ है आपकी. खासकर इन पात्रों की. बहुत बढ़िया पोस्ट है.

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

भाई बचपन याद दिला दिया फाफामऊ के नाम से... परसी का पुरवा है वहां साईजिंग मिल के पास में वहीं हमारा बचपन कुछ हिस्सा बीता है।
सुंदर लिखा है।

ताऊ रामपुरिया said...

"तभी चुंबक से खेलते हुए पोते ने कहा - दद्दा ये देखो....एक चुंबक उपर है, उससे चिपका दूसरा नीचे से लटक रहा है, गिरता भी नहीं। सदरू ने देखा....उपर वाले चुंबक का N पोल, नीचे वाले चुंबक के S पोल से जुडा था ।"

अबकी रामदेई और सदरू भगत ज़रा देर से आए पर मजा आगया ! और इसमे भाषा का आनंद तो है ही पर मानव मन की बड़ी जोरदार ढंग से अभिव्यक्ति सामने आती है !

रामराम !

Anil Pusadkar said...

शानदार,शुद्ध देसी पोस्ट्।

डा. अमर कुमार said...



आह्हः आज आनंद आ गया ! अपने मुरीदों में मेरा नाम जोड़िये, तो जी !

डा. अमर कुमार said...



आह्हः आज आनंद आ गया ! अपने मुरीदों में मेरा नाम जोड़िये, तो जी !

राज भाटिय़ा said...

सब के साथ साथ हमे भी खुब मजा आ गया, ओर एक नयी बात पता चली की सास ओर बहू दोनो ही चुम्बक की तरह से है, ओर दोनो ही N N हो ? लेकिन क्या करे इसे तो भगवान ने ही बनाया है, N for naari ओर जब दो N N यानि दो नारिया मिलेगी तो.....
धन्यवाद

अनामदास said...

उजियार..चकाचक, एकदम टनाटन, और लिखिए, यह है भारत का असली रंग...अवसान से पहले जितना दर्ज हो जाए उतना अच्छा...फाफामऊ वाली अचार क्यों डालेंगी...मैगी का अचार मिलेगा, ख़रीद लाएँगी मटकते हुए...

अनूप शुक्ल said...

शानदार! मजेदार! चुम्बकीय ज्ञान!

गौतम राजरिशी said...

रमदेइ और बिमला के बहाने मानव मन की अनोखी दास्तान...

और अनूठी भाषा शैली ने मन मोह लिया

Gyan Dutt Pandey said...

बढ़िया! यह पोस्ट हमारे शहर-कम-गांव-ज्यादा परिवेश की चीज लगती है। बस गंगा उस पार ही तो है फाफामऊ!

अशोक पाण्डेय said...

वाह सतीश भाई, कौन से शब्‍द का इस्‍तेमाल करूं समझ में नहीं आ रहा। बस यूं समझ लीजिए कि लग रहा है कि मुंशी प्रेमचंद को पढ़ रहा हूं। ग्राम संस्‍कृति की मिठास और आंचलिक भाषा का सहज सौंदर्य मन मोहनेवाला है। आभार।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

कमाल का दृश्य खींचा है आपने। हम तो यहाँ इलाहाबाद में बैठकर ही जैसे गाँव घूम आए। आभार।

Sachin Malhotra said...

bahut hi khoob...

or sach mein hume acha lagega agar aap meri website (www.sunehrepal.com) par bhi join kare .... aapki joining ka intzaar rahega...

take care

डॉ .अनुराग said...

सब कुछ कह दिया ...मानवीय जीवन के नित्य के अनुभवों से निकलकर ....

Mahendra said...

ubtan nahi bukwa kahte hai

Padm Singh said...

यहाँ आय के तो जिउ जुड़ा जाता है... पंचम जी आपके लेखन का कायल हूँ और क्या लिखूँ

Mired Mirage said...

बहुत बढ़िया लिखा है मुंबई वाले ने! वाह !नाम तो कोई होगा नहीं!आवश्यकता क्या है?
घुघूतीबासूती

सतीश पंचम said...

:)

देवन्द्र पाण्डेय said...

बड़ी प्यारी कथा है। चुंबक के माध्यम से जो बात कहने का प्रयास किया गया है वह भी आधुनिक जीवन शैली में सटीक बैठता है।.. जरूरी नहीं कि आपस में विचार मिलते हो तो घनिष्ठता बढे ही..इसका उल्टा भी हो सकता है, ठीक चुंबक की तरह।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

भाई आप बहुत अच्‍छा लि‍खते हो

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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