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Sunday, November 30, 2008

देश के हालात पर एक दुकान में हुई चर्चा ( वाकया)


( इस चर्चा में भले ही अश्लील शब्दों का कहीं-कहीं जिक्र आया है, लेकिन इस चर्चा की पकड को समझने के लिये शायद यह जरूरी भी है कि ऐसे शब्दों को जस का तस कुछ ढके छिपे तौर पर सामने रखूँ। उम्मीद है, आप लोग इस चर्चा को सहज ढंग से देखेंगे। )

ओ पैणचो मंत्री लोकी की करदे ने, हुण पता लगिया ।

ओ पता तां पैलां ही सी, पर अद्दे जाके दिसदा पिया वे।

ये वो संवाद थे जो मुंबई के किंग्स सर्कल से सटे पंजाबी कॉलोनी में एक दुकान पर चल रहे थे। तीन लोगों के ये हिंदी-पंजाबी मिश्रित संवाद इतने रोचक थे कि मैने इनकी कुछ बातें अपने अदने नोकिया 2626 पर रिकॉर्ड कर लिया लेकिन अगल बगल उठ रहे ट्रकों और काली-पीली टैक्सियों के उठते शोर के बीच सब कुछ दब गया। अपने एक मित्र के साथ एक दुकान पर कुछ काम से गया था, वहीं पर ये रोचक संवाद सुनने मिले। ये रोचक संवाद जरा आप Text में देखें ।

पहला - ओ साले मंत्री अपणी मां ** रहे सी, पैण चो कर (घर) विच् टांगा विच टांगा डाल के पये होणगे मां दे लौ* ।

दूसरा - उन्ना नु लोकां नाल की मतलब, माचो खुद ते ऐश-उश करांगे पांवै ( भले) इधर पबलिक दे लो* लग जाण।

तीसरा - ओ पैंचो मिडिया वाले वी अपणी मां *** पै ने । एक नू हत्थ नाल खून रिसदा पिया वे ते माचो मु विच्च माइक पा के दस्सदे पये ने - ये देखो कितना खून निकल रहा है - ओ मांचो कून (खून) नहीं निकलेगा ते के चाशनी निकलेगी....... मां दे दीने।

पहला- ओ लौंडा( पकडा गया एक आतंकी) टुटण लगिया वे, ओन्नु चंगी तरह कुटणा चहीदा, पैणचो हुणे टंग नाल बाल नहीं निकलिया, माचो अटैक करन चलिया सी, मां दे दीने नु पुन्न के रखणा चहिदा ए ऐसे लोकां नुं।

दूसरा - ओ बीबीसी वाले आतंकवादीयां नुं टेररिस्ट नहीं बोलदे.....उन्ना नुं गनमैन बोलदे ने ......इन्ना दे तराह ( भारतीय मीडिया की तरह) ढाम-ढूम मूजिक-व्यूजिक ला के चिल्ला के नई बोलदे - आतंकवादी यहाँ अपनी मां चु* रहा है।

( तीनों ने जोरदार ठहाका लगाया)

पहला - ओ तैनु पता ऐ I B वालियां ने उन्नी तरीक नु ( उन्नीस तारीख को) एन्ना नु बोलिया सी कि तुहाडे ताजमहल होटल विच खतरा हैगा। पर ऐ मंत्रीयां नु मां *** नाल फुरसत मिले तां ना।

तीसरा - इस देश दा हुण की होउगा, पता नी यार।

दूसरा - ओ विलासराव, लैके गिया सी रामगोपाल वरमा नुं ......ऐ के तमाशा विखाण वास्ते लै गिया सी के.......नाल अपणे मुंडे नुं वी लै के गिया सी के नां है उसदा.....?

पहला - रीतेश देशमुख....।

दूसरा - हां....रितेश.....के लौड ( जरूरत) पै गई सी ओन्नु लै के जाण दी। हुण के अपणें मुंडे वास्ते लोकेशन वेखण गिया सी कि देख लै बेटा - तैनु इधरे शुटिंग करनी है।

तीसरा - देश दा तमाशा बना के रख दित्ता है होर कुछ नहीं।

अभी ये बातें चल रही थीं कि उन लोगों का ही कोई परिचित एक मोना पंजाबी अपने साथ एक बैग लेकर वहीं से गुजर रहा था। उसे आवाज देकर बुलाते हुए एक ने कहा -

ओए.....बैग वैग लै के कित्थे कोई अटैक उटैक करने जा रिहा है के।

सत श्री अकाल जी।

सत श्री अकाल ( तीनों ने सम्मिलित जवाब दिया)

पास आ जाने पर उस युवक से उन लोगों की बातचीत चल पडी।

कित्थे जा रिहा है।

ओ कल मनजीते दी बर्थडे पार्टी है, उस लई कुछ सामान-सुमून खरीदीया है।

पहला - ओ इधर अटैक-शूटैक हो रिया वे .....ते तुस्सी पार्टी शार्टी कर रहे हो।

( एक हल्की हंसी इन चारों में फैल गई)

उदरों ही आ रिहा वां ( उधर से ही आ रहा हूँ) , लोकी सडकां ते आ गये ने बैनर-शुनर लै के ( लोग सडक पर आ गये हैं, बैनर वैनर लेके )।

सडक ते आणा ही है यार, बंबे दी पब्लिक चूतिया थोडे है.....सैण दी वी लीमट हुंदी ए ( सहने की भी लिमीट होती है)।

यह बातचीत और लंबी चली होगी। लेकिन इधर मैं अपने मित्र के काम निपट जाने पर दुकान से निकल आया....... जब कि इच्छा थी की अभी और इन लोगों की बातचीत सुनूं।



- सतीश पंचम

( ये वो गुस्सा है जो गालीयों की शक्ल में आम लोगों के बीच से फूट रहा है, हमारे नेताओं के लिये, हमारे कर्णधारों के लिये, अब भी वक्त है कि वो समय से चेत जाएं,वरना जनता जानती है कि अपना गुस्सा किस तरह निकालना है)


15 comments:

Udan Tashtari said...

यही आक्रोश हर तरफ है..भाषायें बस बदली हुई हैं..किन्तु भाव तो वही हैं.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

यही गुस्सा उस वक्त भी था जब इंडियन ऐयर लाइन्स का विमान कंधार पहुंच गया था और आतंकवादी छोड़े गए थे।

मुसाफिर जाट said...

सतीश जी, आज तो हर भारतीय इसी भाषा में बात कर रहा है. लेकिन हमारे इन राजनीतिबाजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

Shiv Kumar Mishra said...

द्विवेदी जी ने कहा:

"यही गुस्सा उस वक्त भी था जब इंडियन ऐयर लाइन्स का विमान कंधार पहुंच गया था और आतंकवादी छोड़े गए थे।"

यही कारण है कि इस चिरकुट-गति को प्राप्त हुए हैं. कंधार के बाद कभी गुस्सा ही नहीं किया. या शायद उसके बाद कोई आतंकवादी हुई ही नहीं?

ताऊ रामपुरिया said...

आक्रोश को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा पर ध्यान नही दिया जाता ! भावना प्रबल है ! और आज चारो तरफ़ यही माहोल है ! अछा लिखा आपने इस घटना को !

रामराम !

??????? said...

सतीश जी पब्लिक गुस्सा तो दिखाती है पर तकलीफ भी यही पब्लिक देती है जब चुनाव आता है तो यही पब्लिक पता नही कैसे निर्णय लेती है और फिर अपने से ज्यादा समझदार लोगो का कहना नही मानती है सबकी अपनी अपनी समझ है पर कोई भी किसी के साथ समायोजन नही रखता इसी का नतीजा है ये सब जो आज तक हुआ है लेकिन छोडिये यहाँ तो वाही कन्डीशन है की " कुए में हे भंग घोल दी है तो कौन बचेगा !!!
सतीश जी आप के राय की प्रतीछा में
...........

धन्यवाद

Gyan Dutt Pandey said...

दुकान पर यह चर्चा वही भाव व्यक्त करती है - और शायद और भी बेबाक तरीके से; जो हर आदमी व्यक्त करना चाह रहा है।
बहुत जानदार पोस्ट।

डॉ .अनुराग said...

भाषा यहाँ गौण है....पर मेरा सिर्फ यही कहना है हमें इस वक़्त आतंकवाद के मुद्दे से हटकर दूसरे छोटे मुद्दों जैसे राम गोपाल वर्मा पर बहस नही चेद्नी चाहिए ..न ही मीडिया को इतनी तवज्जो देनी चाहिए .कही न कही प्राथमिकताये तय करनी होगी...जनता का यही गुस्सा सरकार को जवाबदेह बना रहा है.....समझ ले

अशोक पाण्डेय said...

नहीं सतीश भाई, जनता अपना गुस्‍सा कभी नहीं निकाल पाएगी। अंगरेजों के खिलाफ इसलिए गुस्‍सा निकाल लिया क्‍योंकि उनसे यहां की जनता का धर्म, जाति और क्षेत्र का कोई संबंध नहीं था। अब वह बात नहीं रही, हमारा शोषण करनेवाले लोग हमारे बीच के ही है। वे शोषण करते वक्‍त हमें अपना नहीं मानते लेकिन हम प्रतिकार के वक्‍त उन्‍हें अपना मान लेते हैं। वे लोग हमारी संकीर्ण भावनाओं को उभार कर हमेशा अपना उल्‍लू सीधा कर लेते हैं।

राज भाटिय़ा said...

भाई हम अपना गुस्सा तभी निकाल सकते है जब हम सब एक हो जाये,धर्म को, उंच नीच को ओर जातपात को छोड दे तब , ओर सब का एक ही नारा हो हमे जीना है इज्जत से , शान से . वरना हम सब युही गुटो मे बंट कर जात पात पर धर्म पर लडते रहेगे, ओर यह हरामी नेता हमे उल्लू बना कर अपनी रोटियां सेकते रहेगे.
आओ हम सब एक होजाये

कार्तिकेय said...

सतीश जी, मेरे विचार से आज़ादी के बाद पहली बार हमें ऐसी सरकार नसीब हुई है, जिसमें हर पद पर, सारे पोर्टफोलियो में, सारी कुर्सियां केवल शिखंडी और वृहन्नला ही गंधवा रहे हैं.

किसको किसको गरियायेंगे, शक्ति केन्द्र मैडम जी को, गुरु गोविन्द सिंह जी के एक नाकारा वंशज को, शिवाजी की एक नालायक संतान को, या "वैसे" राष्ट्रपति की जगह चयनित "ऐसी" राष्ट्रपति को. सभी तो पिछले पांच सालों से देश की मां-बहन एक किए हुए हैं. अभूतपूर्व जोड़ी है.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

हम तो पिछले तीन दिन से ऐसी ही वार्ता में स्वयं व्यस्त रहे हैं; इसीलिए की-बोर्ड पर हाथ नहीं लगाया कि यहाँ भी वही न कर बैठें। रात में सोते हुए अचानक यही कुछ बड़बड़ाने लगे थे पिछले दिनों। पत्नी ने झकझोर कर रोका तो शान्त हुए। क्या करें, अब तो भारतवासी होने में शर्मिन्दा महसूस कर रहे हैं...।

गौतम राजरिशी said...

बहुत सुंदर प्रस्तुतीकरन सतीश जी

लेकिन क्या फायदा जब तक इस आक्रोश को महज आक्रोश ही रखा जाये,बनिस्पत इसको सही दिशा में चैनलाइज करने के....

कविता वाचक्नवी said...

यह गुस्सा प्रत्येक भारतीय में जीवित रहे तो बात है, वरना मीडिया के बस्ता समेटते ही हम भी टसुए बहाना छोड़ देंगे।

जितेन्द़ भगत said...

अच्‍छी प्रस्‍तुति‍।

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