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Thursday, November 20, 2008

आप जब भी नाई से बाल कटवाएंगे, शायद इस पोस्ट को याद करेंगे (हास्य-वाकया )


क्या कभी नाई से बाल कटवाते समय आपको हँसी आई है। अगर कभी हँसी आती भी है तो लोग अपने ओंठों को बरबस दबाकर हँसी रोकने का प्रयास करते हैं ताकि हिलने- डुलने से उस्तरे से कान न कट जाए। कुछ ऐसा ही वाकया गाँव में एक बार हुआ था जब घुमन्तू नाई ने मेरे बाल काटना शुरू किया। यहाँ आपको बता दूँ कि, घुमन्तू नाई वह नाई होता है जो घूम-घूमकर बढे बाल वाले लोगों को ढूंढता है, और कहीं छाँह वगैरह देखकर वहाँ बैठाकर उनके बाल काटता है।

तो हुआ यूँ कि नाई अपने उस्तरे से मेरी 'कलम'/'खत' ठीक कर रहा था कि तभी बगल से एक भैंस भागती हुई निकली, उसके पीछे उसकी पूँछ पकडे एक आदमी भाग रहा था, साथ ही साथ गाली भी देते जा रहा था - छिनारी, जाएगी वहीं गेनू के भैंसे के पास, इस गाँव के भैंसों से रांण का जी नहीं भरता।

एक तो वह आदमी भैंस की पूँछ पकडे भाग रहा था, दूजे उसकी गाली कुछ विशेषणों से जुडी थी.....जिसकी बैकग्राउंड हिस्टरी यह थी कि गेनू के भैंसे ने जब कभी इस भैंस को गाभिन ( गर्भ धारण) करवाया, हमेशा पाडा ( Male child) ही हुआ, और दुधारू पशुओं में विशेषत: भैंस आदि में Male Child होना अर्थात पाडा पैदा होना आर्थिक दृष्टि से ठीक नहीं माना जाता। लोग दूध वगैरह के लिये ही ऐसे पशु पालते हैं, उस दूध को बेचकर कुछ अर्थलाभ करते हैं, ऐसे में यदि पाडा हो तो नुकसान होता है, इसलिये वह आदमी अपनी भैंस को गेनू के भैंस के पास जाने से रोक रहा था और भैंस थी कि फिल्मी हिरोईन की तरह विद्रोह पर उतारू थी। आगे-आगे भैंस भागे , पीछे-पीछे उसकी पूँछ पकडे वह आदमी। खैर, जैसे तैसे अपनी हँसी को जब्त किया और अपने बाल कटवा कर बाद में जो थोडी बहुत हँसी बची थी, उसी को फेंटता रहा। सोच रहा था कि, मनुष्य तो मनुष्य यहाँ तो जानवरों पर भी रोक टोक है कि वह किससे संबंध बनाये, और किससे नहीं। आस पास के लोग अभी तक हँस कर दोहरे हो रहे थे ।

अभी हाल ही में फणीश्वरनाथ रेणु जी के आत्मसंस्मरण पढ रहा था, तो मुझे उनकी लिखी बातों से वह बाल कटवाते समय आई हँसी याद आ गई।

फणीश्वरनाथ जी लिखते हैं -

मुझे याद है, खूब धूमधाम के साथ मेरा मुंडन संस्कार हुआ था। लेकिन , उस हँसी-खुशी के दिन मैं दिन-भर रोता रहा था - बलिदान के छपागल की तरह !...मुंडन के कई महीने बाद पहली बार अपने गाँव के नाई ने मेरी ऐसी हजामत बनाई कि उसके बाद नाई और कैंची और खूर यानी अस्तुरा के नाम सुनते ही मैं घर छोडकर - गाँव से बाहर किसी पेड की डाली पर जा बैठता। ...मेरे गाँव का बूढा...... भैलाल हजाम........उसके मुँह और नाक से निकलने वाली दुर्गन्ध को किसी तरह बर्दाश्त किया जा सकता था - सिर झुकाकर । मगर, उसकी कैंची एक बाल को काटती और हजारों को जड से उखाडती थी। और वह हाईड्रोसील माने उसका फोता .....इस कदर बढा हुआ था कि गाँव में कई भैलालों में वह अँडिया भैलाल के नाम से प्रसिध्द था । ............ सिर पर भैलाल की कैंची का अत्याचार सहन करना आसान था मगर सिर झुकाकर हँसी को जब्त करना बहुत मुश्किल । और भैलाल के इस वर्धित-अंग पर हँसने की मनाही थी । हमें डराया गया था कि हँसनेवाले का भी वैसा ही हो जाएगा । अत पहली हजामत के बाद से ही भैलाल की परछाई देखकर ही भाग खडा होता । तीन चार महीने बाद कभी पकडा जाता । दो-तीन आदमी हाथ-पैर पकड कर मुझे बेकाबू कर देते । कभी-कभी जमीन पर पटक भी देते । भैलाल की कैंची के साथ मेरे मुंह से असंख्य अश्लील गालियाँ , आँख से घडों आँसू, नाक से महीनों की जमी हुई सर्दी .....।

यूँ तो यह पोस्ट बाल कटवाते समय हँसी को केंट्रोल करने पर है लेकिन कई और क्रियाकलाप भी हैं जब आपको हँसी रोकनी पडेगी, जैसे दाँत निकलवाते समय Dentist के पास,कचहरी में गवाही देते समय जज के पास, और सबसे बढकर किसी के मरने पर शोक सभा में....वरना आप जानते हैं, अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती.....फिर चाहे वह हँसी किसी स्वर्गवासी पर हो या भैलाल हजाम के फोते पर।


- सतीश पंचम

( संस्मरण अंश - रेणु जी के लेख 'अथ बालकाण्डम्' से साभार- रेणु की हास्य व्यंग्य कहानियाँ , वाणी प्रकाशन, सम्पादक भारत यायावर)


14 comments:

कविता वाचक्नवी said...

इसी समाज में कहानियाँ छितरी पड़ी हैं, तरह तरह के पात्र हैं।
अच्छा लिखा है। अब बाकी की राय तो नाई के पास जाने वाले देंगे।

musafir jat said...

भाई सतीश जी, आजकल नाई भी माडर्न हो रहे हैं. पहले वाले नाई तो मिलते ही नहीं हैं. नाईयों पर जो भी संस्मरण लिखे जा रहे हैं, वे सभी काफी पुराने हैं. आधुनिक संस्मरण कहीं देखने को नहीं मिल रहे. फिर भी आपने बीते दिनों की याद करा दी.

Gyan Dutt Pandey said...

घुमन्तू नाऊ के नाम पर मुझे अपने गांव के सीताराम नाऊ की याद आती है। उसके चश्मे पर टनों धूल रहती थी। एक ईंट पर बच्चों को बिठाता था बारी बारी और दन्न दन्न बाल छील कर निपटा देता था! सीताराम के आने का समाचार सुन हम आपकी पोस्ट की भैंस की गति से भाग निकलने की जुगत करते थे! :-)

pallavi trivedi said...

बड़ा रोचक प्रसंग है...

Dr. Nazar Mahmood said...

रोचक प्रसंग ,अच्छा लिखा है।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मजेदार लगा यह किस्सा .

अशोक पाण्डेय said...

हम तो तब भी आपकी पोस्‍ट याद करते हैं, जब नाई से बाल नहीं कटा रहे होते :)

Alag sa said...

धीरे-धीरे वे इटैलियन सैलून वक्त की मार के आगे खत्म होते जा रहे हैं। जिनमें ईंट की कुर्सी (जिससे इन सैलूनों का नामकरण हुआ) ग्राहक के हाथ में आईना तथा किसी पेड़ की छांव में खुली हवा का आनंद था।

अनूप शुक्ल said...

ये देखिये आपके भैलाल के फोटो भी हैं इस गुम्मा हेयर कटिंग सैलून में। आप लेख तो धांसू लिखे ही हैं।

सतीश पंचम said...

आप सभी के सूचनार्थ बता दूँ कि अनूपजी ने ठीक तीन साल पहले 21 नवंबर 2005 को इसी मुद्दे पर एक अच्छा लेख लिखा था और आज 20 नवंबर 2008 है। अनूपजी ने जो लिंक दिया है अभी-अभी उसे पढ कर आ रहा हूँ जिससे कि इस इटैलियन सलून की और खासियतें पता चल रही हैं। हो सके तो उस सलून (अनूपजी द्वारा दिये लिंक) पर जरूर जाएं।

राज भाटिय़ा said...

मै तो अब भी डरता हुं इन नाईओ से आज तक शेव इन से नही करवाई. *भेसं जी* का पढ कर बहुत हंसी आई .
धन्यवाद

डा. अमर कुमार said...

हाँ, मैंने पढ़ा तो था.. कुछ विस्मृत था ।
ताजा करवाने के लिये धन्यवाद !

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

bhai!!!!!!


hamko to naai ke cutting karte hi badhiya neend aane lagti hai!!!!!!!!




aap kah rahe hain to hans kar bhi dekhenge!!!!!!!1

PD said...

हंसी रोक नहीं पा रहा था. पर डाक्टर जी का कमेन्ट देख उनकी याद हो आया.

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