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Tuesday, November 11, 2008

सदरू भगत और उनके पोते


रमदेई ने नमक के डिब्बे में देखा तो नमक नहीं था, अब क्या हो....उधर सदरू हुक्के को चारपाई के पाये से टिकाकर रख दिये थे जो उनके अब भोजन तैयार होने पर लाने का इशारा था। इधर रमदेई अलग सोच में थी, इस नमक को भी अभी खत्म होना था.....ये बच्चे भी तो नहीं दिख रहे जाने कहाँ चले गये, किससे मंगाउं। तब तक बडी बहू का लडका बड्डन दिख गया।

ए बड्डन, जा नंदलाल साह के यहाँ से नमक लेकर आ।

अभी रमदेई ने अपनी बात पूरी भी न की थी कि जाने कहाँ से छोटी बहू का लडका छुट्टन आ पहुँचा।

पैसे दो, हम ले आते हैं नमक।

बड्डन को अचानक छुट्टन के इस तरह आ जाने से अपने अरमानों पर पानी फिरता लगा। नमक लाने के बहाने जो पैसे मिलते हैं वह अक्सर एक दो रूपये जयादा ही मिलते हैं, न जाने नमक का दाम ही बढ गया हो। अब जो एक दो रूपये अलग मिलते थे उस पर कोई अलग कब्जा कर ले यह बड्डन कत्तई न मानेगा। दौडकर पास आता बोला- अरे तू क्यों जाएगा नमक लाने, दादी ने मुझे कहा है नमक लाने तो मैं ही जाउंगा, तू नहीं।

छुट्टन भी अड गया - मैं पहले पहुँचा, इसलिये मैं ही नमक ले आउंगा.......छुट्टन ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, जैसे बड्डन के इस दुनिया में अपने से पहले पहुँच जाने का प्रतिकार कर रहा हो।

नहीं, दादी ने मुझे कहा है सो नमक मैं ही लाउंगा।

दोनो के बीच विवाद बढता जा रहा था कि नमक कौन लाये, आखिर उपर की कमाई का सवाल था जो नमक मंगाने के बतौर मिलते। सदरू अलग सोच में पडे थे, कितने सेवाभावी पोते हैं......सेवा करने के लिये आपस में लड रहे हैं।

रमदेई से और न देखा गया - डांटते हुई बोली - तुम लोग क्या आपस में ही लड खप रहे हो, आज से पहले तो कभी इतनी सेवा के लिये तुम लोगों में मारपीट होते न देखा था।

अब सदरू ने खंखारते हुए गला साफ किया, बोले- इन दोनों की लडाई देखकर मुझे तो आजकल के नेताओं की याद आ रही है।

वो कैसे ?

वो ऐसे कि - आजकल चुनाव के लिये पार्टी दफ्तरों में टिकट पाने के लिये नेता लोग आपस में ही मारपीट कर रहे हैं.....क्या भाजपा, क्या काँग्रेस.....सब पार्टी ऑफिस में वही हाल है। हर कोई जनता की सेवा करना चाहता है, और मजे की बात तो यह है कि आपस में इतनी जोर से लडते हैं कि लगता है किसी दुश्मन से लड रहे हैं।

इस लडाई में एक दूसरे की कार पहले तोडी जाती है - माने कारसेवा और फिर नंबर आता है गमले का।

गमला क्यूँ ?

गमला इसलिये क्योंकि जो टिकट पा गया है वह दूसरे के लिये गम लाता है माने गमला।
अब जो टिकट नहीं पाया है वह अपना गम उस को देना चाहता है जिसे टिकट मिल गया है यानि मेरा गम ले - फिर गमला निशाना बनता है। इस गम ले और गम ला के चक्कर मे पार्टी ऑफिस के सारे गमले टूट जाते हैं.....वह भी सिर्फ सेवा के नाम पर, जैसे ये दोनों आपस में सेवा के लिये लड रहे हैं।

अभी ये गमले और गमला की चर्चा चल ही रही थी कि, दोनों लडके आपसे में लडते हुए बगल में पडे चारे के लिये रखी घास की टोकरी से जा टकराये और पूरी घास जमीन पर गिर गई ।

सदरू ने हँसते हुए कहा - लगता है ऐसे ही होते हैं ग्रास रूट लेवल के कार्यकर्ता.....जमीन से जुडे हुए....जिस घास को जमीन से उखाड कर लाया था, उसी को फिर जमीन पर गिरा आये......वाह रे बांके सेवक और धन्य है तुम्हारी सेवा।

घास गिर जाने से दोनों पोते आपस मे समझ गये कि अब रमदेई दादी छोडेगी नही, जरूर पीटेगी। दोनों ने आव देखा न ताव, चले भाग....अब दोनों के भागने में भी होड लगी थी।
लेकिन मूल समस्या अब तक ज्यों की त्यों बनी थी - नमक कौन लायेगा ?


- सतीश पंचम

9 comments:

Anil Pusadkar said...

सेवा भाव के असली भाव को बडी सहजता से व्यक्त कर दिया आपने।राजनिती के वर्तमान और वस्तविक स्वरुप को सामने ला कर खडा कर दिया,एकदम आसानी से।बहुत बढिया लिखा आपने,बधाई।

जितेन्द़ भगत said...

स्‍वार्थ असली मकसद को हमेशा दरकि‍नार कर देता है। बेहतरीन लेख बन पड़ा है पंचम जी।

ताऊ रामपुरिया said...

सही लिखा आपने ! आजकल हालत ऐसे ही हो रहे हैं ! बहुत सटीक लिखा आपने ! शुभकामनाएं !

Gyan Dutt Pandey said...

वाह! अब देखो, नमक आया हो या नहीं, पोस्ट नमकीन बन गई! :)

डॉ .अनुराग said...

अब नमक पर न लड़ बैठे की टाटा का या ???????

Udan Tashtari said...

बहुत सही-स्वार्थ क्या न करा दे.

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर बात आप ने इस कहानी के माध्यम से कह दी, नमक तो दादी या दादा ही लायेगे.

कार्तिकेय said...

दोनो के बीच विवाद बढता जा रहा था कि नमक कौन लाये, आखिर उपर की कमाई का सवाल था जो नमक मंगाने के बतौर मिलते। सदरू अलग सोच में पडे थे, कितने सेवाभावी पोते हैं......सेवा करने के लिये आपस में लड रहे हैं।

कहीं यही परिदृश्य तो नहीं लोकतंत्र के पहरुओं और मूर्ख रियाया का?
एक प्रतीकात्मक पोस्ट.

pallavi trivedi said...

badhiya likha hai....badhai.aaj ki sthiti ka sahi chitran.

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