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Sunday, November 9, 2008

एनडीटीवी के अंग्रेजी प्रोग्राम 'जस्ट बुक्स' की तरह हिंदी किताबों पर कोई प्रोग्राम क्यों नहीं


NDTV के अन्य चैनलों जैसे NDTV 24x7 या NDTV GOOD TIMES पर आपने एक प्रोग्राम देखा होगा JUST BOOKS, जिसमें काफी अच्छे तरीके से अंग्रेजी किताबों के बारे में बताया जाता है, लेखकों के Interviews दिखाये जाते हैं कि कैसे उन्होंने ये किताब लिखी, किताब की खासियत क्या है, लोगों की उनकी किताब के बारे में प्रतिक्रिया कैसी है। लेकिन अफसोस यह JUST BOOKS सिर्फ अंग्रेजी की किताबों के बारे में बताता है, हिंदी में NDTV के पास ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं है जो हिंदी किताबों के बारे में बताये।

कुछ दिनों पहले मैने कहीं किसी चैनल पर एक चर्चा देखी दी जिसमें बताया गया था कि जिस तरह अंग्रेजी किताबों को प्रचार मिलता है, उस तरह की मीडिया कवरेज हिंदी किताबों को नहीं मिलती। यह बात मुझे काफी हद तक सच लग रही है। आपने गौर किया होगा कि अरविंद अडीगा के बुकर जीतने के बाद सारा मिडिया एक सुर से White tiger के बारे मे बोलने लगा, लेकिन वही मिडिया किसी हिंदी किताब को भारतीय पुरस्कार मिलने पर चूँ तक नहीं करता। अभी कुछ महीने पहले अमरकांत जी की किताब 'इन्हीं हथियारों से' थोडी बहुत चर्चा मे आई थी, वह भी साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिलने के बाद, लेकिन जब मै बडे से बडे बुकसेलर के पास गया तो पाया कि उन्हें तो इस लेखक के बारे मे ज्यादा मालूम ही नहीं है। खैर, ये तो हालत है साहित्य पुरस्कार विजेता एक लेखक की हमारे समाज में।

जहाँ तक मेरा अनुमान है यदि कोई चैनल इस बारे में पहल करता है, ऐसा कोई प्रोग्राम बनाता है जो कि हिंदी के किताबों के बारे मे परिचर्चा आयोजित करे या हिंदी लेखकों के बारे मे बताये, तो संभव है उस चैनल को एक अलग पहचान मिल सकती है जोकि साँप, मदारी, जादू टोना जैसे प्रोग्राम दिखाने से लाख गुना अच्छी पहचान है। ऐसे में नया दर्शक वर्ग भी जुड सकता है जो ऐसे बेहूदा प्रोग्रामों से तंग आकर चैनल बदलने पर मजबूर है।

उम्मीद है चैनल्स इस ओर भी सोचेंगे और ऐक नया दर्शक वर्ग अपने से जोडने मे कामयाब होंगे।



क्या आज के चलताउ साँप,मदारी,बंदर, ज्योतिषी वगैरह के प्रोग्रामों को जहाँ रोज दो दो घंटे तक चैनलों पर समय दिया जाता है, तो वहाँ हफ्ते में ही सिर्फ आधे घंटे का भी प्रोग्राम हिंदी साहित्य पर नहीं बन सकता ?


- सतीश पंचम

10 comments:

राज भाटिय़ा said...

अरे हिन्दी आजादो की भाषा है ओर इन गुलामो को आंक के अंधॊ को क्या मालुम जिस अंग्रेजी को यह सर मै बिठाये घुमते है वही अंग्रेजी वाले इन्हे पुछते भी नही,
इन्ही चमम्चो की वजह से देश अपनी इज्जत भी को रहा है.
भाड मै जाये अंग्रेजी ओर उस के बोलने बाले काले .....

Ghost Buster said...

जब हिन्दी की किताबें नहीं बिकतीं तो हिन्दी किताबों पर प्रोग्राम क्या बिकेगा?

सुप्रतिम बनर्जी said...

आपका सवाल सही है। लेकिन हक़ीक़त ये है कि अख़बार, टीवी सभी बाज़ार से प्रभावित होते हैं। और हिंदी टेलीविजन के पास ऐसे दर्शक तो कतई नही हैं, जो किताबों के ऊपर होनेवाली चर्चा का प्रोग्राम देखना चाहें। जो मुट्ठी भर हैं, उनके भरोसे प्रोग्राम शुरू नहीं किया जा सकता है। हल क्या है, ये नहीं पता। पर है सोचनेवाली बात।

जितेन्द़ भगत said...

दूरदर्शन पर ऐसे कार्यक्रम अक्‍सर शाम के छ बजे आते हैं, लेकि‍न जैसे दूरदर्शन से दर्शकों की एक दूरी है, वैसे ही हि‍न्‍दी कि‍ताबों और उसपर की गई चर्चा से भी उतनी ही दूरी है।

सतीश पंचम said...

ओह , जितेन्द्र जी की बात से अब याद आया वह परिचर्चा दूरदर्शन पर ही देखी थी मैने। पहले दूरदर्शन पर 'एक कहानी' नाम से एक प्रोग्राम आता था जिसमें लेखक भी अपनी दिखाई जाने वाली कहानी के बारे में कुछ अपनी बात रखता था, काफी लोग उस 'एक कहानी' प्रोग्राम को पसंद करते थे, इसका एक कारण शायद आज के चलताउ चैनलों की भरमार न होना भी था.....लेकिन यही पर वह राज छुपा है जो यदि पहचान लिया जाय तो शायद चैनलों को ऐक नया रास्ता मिले। आज यदि मालगुडी डेज जैसे प्रोग्राम की तर्ज पर अन्य लेखकों के भी प्रोग्राम दिखाये जाने लगे तो जरूर लोग अपना स्वाद बदलने तैयार हो जाएंगे। फिर अगला दौर उन पर परिचर्चा का आ सकता है जो शायद इसी ओर बढता एक सार्थक कदम होगा। मुझे अंग्रेजी किताबों से कोई चिढ नहीं है लेकिन जिस तरह की बाजारवाद का बहाना करके बात को टाला जाता है, वह उचित नहीं लग रहा।
यदि बाजारवाद को ही कारण माना जाए तो मैं यह कहूँगा....बाजार तैयार किया जाता है...ठीक आज के चैनलों की तरह जो पहले तो किसी चीज को लेकर तरह-तरह की बातें गढेंगे और बाद में खुद उसको भुनाएंगे.....लेकिन यह बात अगर साहित्य के क्षेत्र में करने पर बहाने उल्टी दिशा मे गढने लगेंगे।
क्या आज के चलताउ साँप,मदारी,बंदर, ज्योतिषी वगैरह के प्रोग्रामों को जहाँ रोज दो दो घंटे तक चैनलों पर समय दिया जाता है तो वहाँ हफ्ते में ही सिर्फ आधे घंटे का भी प्रोग्राम नहीं बन सकता।

ताऊ रामपुरिया said...

"क्या आज के चलताउ साँप,मदारी,बंदर, ज्योतिषी वगैरह के प्रोग्रामों को जहाँ रोज दो दो घंटे तक चैनलों पर समय दिया जाता है तो वहाँ हफ्ते में ही सिर्फ आधे घंटे का भी प्रोग्राम नहीं बन सकता।"

मैं आपके कमेन्ट का समर्थन करूंगा ! आख़िर कहीं से किसी को तो शुरुआत करनी पड़ेगी ! प्रोग्राम चलता नही या बिकाऊ नही से काम आगे बढ़ने वाला नही है !

अनुपम अग्रवाल said...

श्रीमान
कोई भी चैनल मुनाफे के लिए काम कर रहा है औरपहले इतने हिन्दी के कार्यक्रम नहीं आते थे . क्योंकि बहुत सारे लोग हिन्दी कार्यक्रम देखते हैं इसलिए बहुत सारे कार्यक्रम हिन्दी में आने लगे हैं .धीमे धीमे सोच बदलेगी तो इन्ही लोगों की वजह से हिन्दी तेज़ी से बढ़ पायेगी .
लेकिन शायद इसीलिए हिन्दी का ब्लॉगजगत बढ़ता जा रहा है

Gyan Dutt Pandey said...

बाजार जब गंजे को कंघा बेंच सकता है तो टीवी एक अच्छा हिन्दी पुस्तकों पर कार्यक्रम भी सफलता से पेश कर सकता है। इच्छा शक्ति चाहिये।
पर सभी आसान समाधान में लगे हैं। :(

Udan Tashtari said...

बन तो सकता है मगर टी आर पी?? दिल्ली की बड़ी किताबों की दुकान में हिन्दी की किताबें नहीं बिका करती. आऊट ऑफ फैशन एण्ड बिलो डिग्निटी हैं.

ab inconvenienti said...

आज भारत में रहते हुए अंग्रेज़ी के आलावा किसी भी देसी भाषा का ज्ञान न होना एक अतिरिक्त योग्यता मानी जाती है. फ़िर भी आप इस तरह की पोस्ट लिखने की हिम्मत कर रहे हैं?

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