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Saturday, November 1, 2008

प्रदीप बिहारीजी की सशक्त रचना 'उजास'


धार्मिक स्थानों पर स्नान करती महिलाओं को, उनके उघडे तन को कुछ लोग रसभरी निगाहों से देखने के इच्छुक होते हैं और अपने इसी प्रयोजन से वह घाट और घटोली तक छान मारते हैं कि कहीं कोई महिला उघडी हुई दिख जाय। जब ऐसे लोग उन महिलाओं को निहारते हैं तो महिलाओं के घरवाले सबकुछ जानते समझते हुए भी कुछ कह नहीं पाते, ऐक यह भावना भी होती है कि कहीं झगडा-टंटा करने से धार्मिक कार्य मे विघ्न न पड जाय, लेकिन उनके अंदर ही अंदर मन बेचैन जरूर रहता है कि कम्बख्त मेरे घर की मरजाद को घूर रहा है और मैं कुछ कह नहीं पा रहा।

इस मुद्दे पर हाल ही में लेखक प्रदीप बिहारी की कहानी उजास पढी, जो कि छठ पूजा के दौरान होने वाले ऐसे ही क्रियाकलापों पर आधारित है। काफी अच्छी और सशक्त लेखनी का परिचय दिया है प्रदीपजी ने।

कहानी का साराँश कुछ इस प्रकार है कि -

रामभूषण बाबू के दोनों बेटों की शादी हो गई थी, लेकिन दोनों के कोई बच्चा नहीं था, सो रामभूषण बाबू की पत्नी ने मनौती मांगी थी कि यदि उन्हे पोता हुआ तो छठ पूजा के दौरान वह अपने आँचल पर नटुआ( नचनिया) नचवाएंगी। कुछ समय बाद बहू के पैर भारी हुए, पर इससे पहले कि पोता हो, रामभूषण बाबू की पत्नी चल बसी।

अब पोते के जन्म के कुछ साल बाद रामभूषण बाबू को सबने याद दिलाया कि पत्नी की उस मनौती को बहू पूरा करे जिसमे पोते के जन्म के बाद अपने आँचल पर नटुआ नचवाने की बात थी, वरना जरा भी उंच नीच हुई नहीं कि छठ मईया का प्रकोप सामने होगा। रामभूषण बाबू काफी दुविधा में थे क्योंकि जवान बहू को कोई कैसे हजारों लोगों के सामने बेपर्दा होकर बैठने दे। बात आँचल पर नटुआ के नचाने की थी, लेकिन इस उपक्रम मे बहू को साडी को आधा ही पहनना पडता और इससे जाहिर था कि उसका बदन उघाड हो जाता, लोग मजे ले-लेकर देखेंगे यह सोचकर ही रामभूषण बाबू परेशान थे। खुद की पत्नी जो बूढी थी, यदि वह आँचल पर नचवाती तो ठीक था, लोग उस गंदी नजर से न देखते , लेकिन किसी तरह धार्मिक मनौती भी तो पूरी करनी थी।

काफी अनमने ढंग से वह घाट की ओर चले, रास्ते मे लोगों की बातें सुनकर तकलीफ भी होती रहीं।

कोई कहता- " पहले नटुआ नाचता था बुढिया के आँचल पर, आज नाचेगा युवती के आँचल पर"

वहीं जब नटुआ आ गया तो बहू भी असमंजस मे थी कि इतने लोगों के बीच कैसे नहाये और कैसे अपने आँचल को पसार कर आधा शरीर खुला रखे। ईधर नटुआ को लेकर लोगों मे अलग ही चर्चा थी -

यह बात जानकर कि नटुआ आज यहाँ रूकेगा नहीं और अभी नाच कर कहीं और जाएगा नाचने के लिये तो कुछ लोग कहते हैं - " ठीक है । तो साले को अभिए नचाते-नचाते गां* फार देते हैं।"

अभी ये चर्चाएं सुनाई दे रही थीं कि फिर किसी की आवाज आई -

" आँचल पर नटुआ नाचेगा कैसे ? "

" सो क्यों, घाट पर आँचल पसार देगी और उस पर नटुआ नाचेगा।"

" तब तो देह-दशा साफ- साफ दिखाई पडेगी"

"यही तो मजा है यार"

" आज तो साला नटुआ भी तर जाएगा"

ये सब सुनते-सुनते रामभूषण बाबू ने अपने मानसिक संतुलन को किसी तरह बनाये रखा।

तभी उस पोते ने रामभूषण बाबू को बताया कि लोग नटुआ नाचने से पहले पटाखा फोडने कह रहे हैं। रामभूषण बाबू ने कहा- तो जाओ फोडो पटाखा, पटाखा नहीं है क्या?

पोते ने कहा - पटाखा तो है मगर....

मगर क्या ?

फोडने के लिये पन्नी खोलेंगे तो हिरोईन उघार हो जाएगी।

पोते ने पटाखे के पैकेट के उपर छपे महिला की तस्वीर की ओर इशारा किया। रामभूषण बाबू को लगा कि उनके सामने उनका पोता नहीं दादा खडा है।

उधर नटुआ नाच नहीं रहा था, आँचल के पास खडा था। लोगों ने इस पर भी चुटकी ली - " ईनफिरिएरिटी कॉम्पलेक्स है। इतनी कीमती साडी पर पाँव रखने की हिम्मत नहीं हो रही"

कहानी के अंत में रामभूषण बाबू ने न सिर्फ अपने मानसिक संतुलन को बनाये रखा, बल्कि इस आँचल पर नटुआ नचाने की कुप्रथा के खिलाफ एकाएक विद्रोह भी कर दिया।

इस हिदी मे अनुवाद की गई मैथिली कहानी 'उजास' को पूरा पढने के बाद महसूस होता है कि हमारा क्षेत्रीय साहित्य कितना सुघड है और उसमें कैसे-कैसे सशक्त रचनाकार हैं। प्रदीप बिहारीजी को उनकी इस सशक्त मैथिली रचना के लिये बधाई देता हूँ। यह कहानी पढकर शायद ऐसे लोगों को भी बुध्दि आए जो अपने कुत्सित कार्यों से धार्मिक स्थानों तक को नहीं बख्शते।

- सतीश पंचम

( मैने यह कहानी नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाओं के हिंदी अनुवाद 'मैथिली कथा संचयन' के जरिये बताई है। आप भी यह किताब जरूर पढें। फिलहाल यह 'मैथिली कथा संचयन' मुंम्बई के जीवन प्रभात पुस्तकालय में उपलब्ध है - पता है - जीवन प्रभात पुस्तकालय, A-4 / 1 , Kripa Nagar, Irla Bridge, Mumbai - 56, Phone no. - 022-26716587 । सफेद घर की ओर से ऐसा प्रयास जारी रहेगा जिसके जरिये आप लोगों तक इस तरह की रचनाओं की जानकारी दी जाए।)

14 comments:

संगीता पुरी said...

ग्रामीण रीति रिवाजों के बारे में पढकर अच्‍छा लगा। बधाई आपको भी और लेखक प्रदीप बिहारी जी को भी।

जितेन्द़ भगत said...

कहानी वाकई लाजवाब थी, एक कुप्रथा पर चोट करती हुई। प्रदीप जी ने सही मुद्दा उठाया है, लंपटो की कमी नहीं है, इसलि‍ए धर्मांधता से बाहर आने में ही घर की मर्यादा सुरक्षि‍त रह सकती है।

Gyan Dutt Pandey said...
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ताऊ रामपुरिया said...

कहानी के अंत में रामभूषण बाबू ने न सिर्फ अपने मानसिक संतुलन को बनाये रखा, बल्कि इस कुप्रथा पर एकाएक विद्रोह भी कर दिया।

बहुत सशक्त और कुप्रथा विरोधी रचना ! आगे भी आप ऎसी रचनाए पढ़वाते रहे ! आपको बहुत धन्यवाद !

डॉ .अनुराग said...

एक प्रकार के मानसिक रोगी है ऐसे लोग ....

रंजना [रंजू भाटिया] said...

कई रिवाज़ वाकई अजीब मानसिकता के प्रतीक हैं ..यह अब खतम होने चाहिए ..कहानी अच्छी है ..इस किताब के बारे में बताने का शुक्रिया

Vivek Gupta said...

बहुत सशक्त रचना

राज भाटिय़ा said...

इसे अब अन्धविश्वस नही कहेगे तो ओर क्या कहेगे?? लेकिन यह सिर्फ़ ग्रामीण इलाको मै ही नही दिल्ली जेसे शहरो मै ऎसे लोग मिल जाते है, जो बहुत ही ज्यादा पढे लेखे होने के वाजुद भी ऎसा करते है,
बहुत ही सुन्दर कहानी कही आप ने .
धन्यवाद

आदर्श राठौर said...

आपने वाकई एक अलग मुददे को उठाया है।

मा पलायनम ! said...

हमारा क्षेत्रीय साहित्य वास्तव में सर्वश्रेष्ठ है और उसमें अच्छे और सशक्त रचनाकार हैं। इस रचना को हम सब तक लाने के लिये आपको बधाई । यह कहानी पढकर भी मानसिक रोगीओं को यदि बुध्दि आ जाए तो सृजन की सार्थकता होगी .

Gyan Dutt Pandey said...
This comment has been removed by the author.
Gyan Dutt Pandey said...

ऊलजलूल कुप्रथायें हैं। इनका समाप्त होना जरूरी है।

वाराणसी के पास मैने पाया कि अर्थी के साथ जो गांव-देश वाले जाते हैं, उन्हें दाह संस्कार के बाद मृत के परिवार वाले भरपेट मिठाई खिलाते हैं। शोकाकुल परिवार के लिये यह कितनी अनुचित रस्म है?!

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

ऐसी कुप्रथाएं पूरे देश में भरी पड़ी हैं ......
अच्छा है जितनी जल्दी ख़त्म हों!

pritima vats said...

बहुत अच्छी कहानी है, प्रदीप बिहारी जी की कहानी के माध्यम से बड़े ही सहज ढ़ंग से समाज में फैली कुप्रथाओं को दर्शाया है आपने।

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