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Thursday, October 23, 2008

जानना चाहोगे क्यों बिहारी छात्र आगे हैं नौकरीयों में - ये लो, खुद ही देख लो।

लोग सवाल उठा रहे हैं कि सरकारी पदों पर या रेल्वे वगैरह में बिहारी लोग ज्यादा क्यों हैं, क्या बात है कि बिहारी ही ज्यादा नौकरी पाये दिखते हैं, इस मुद्दे पर ज्यों-ज्यों गहराई मे सोचा, त्यों-त्यों कुछ चीजें शीशे की तरह साफ होती गई। दरअसल पहले बिहार की डेमोग्राफिक स्थिति और लोगों के बीच पनपे नौकरी के रूझान को देखा समझा जाय तो आप को खुद-ब-खुद इसका उत्तर मिल जायगा, इसके लिये कोई भी आँकडेबाजी की जरूरत नहीं है।

दरअसल बिहार में कोई मजबूत मेन्युफैक्चरिंग या निर्माण उद्योग पहले से ही नहीं है,झारखंड मे जो कुछ था वह खनन आधारित ही ज्यादा था जिसके दम पर कभी बेस इंडस्ट्री बिहार में बनाने की कोशिश ही नहीं की गई। ऐसे में लोगों को नौकरीयों की उम्मीद सिर्फ सरकारी क्षेत्र से ही थी जिसमें कि जाने से पहले लोगों को प्रतियोगिता परीक्षा देनी जरूरी थी, और यही वो ट्रेंड था जिसने बिहार मे एक प्रतियोगिता परीक्षाओं को एक समानान्तर उद्योग का दर्जा दे दिया, कम्पटीशन पत्रिकाओं की खपत बढने लगी, कोचिंग संस्थाओं की संख्या बढने लगी, लेदेकर ऐसा माहौल बन गया कि लोकगीतों में भी कम्पटीशन का माहौल दिखाई देने लगा। आपको शूल फिल्म के उस गीत की याद होगी जिसमें विलेन बने नेता को एक कैसेट लाकर दिया जाता है , उसके बजाते ही जो बोल निकलते हैं वो होते हैं - M. A. मे लेके एडमिसन....कम्पटीसन.....देता SS......मतलब लोग यहाँ वहाँ जरूर अपने कॉलेज की पढाई पूरने के लिये एडमिशन लेते हैं लेकिन अपना लक्ष्य कम्पटीशन को ही मानते हैं.....कोई पूछता भी है कि आपका लडका क्या करता है तो लोग अक्सर यही बताते हैं कि कम्पटीशन दे रहा है......यानि तैयारी कर रहा है। और सबसे बडी बात तो ये है कि ये प्रतियोगिता परीक्षा मे जिस पद की कामना की जाती है वह हमेशा IAS, IPS, PCS जैसे पदों से ही शुरू होती है। लोगों का ये मानना होता है कि सबसे कडी परीक्षा यानि UPSC को साधो तो सब बाकी प्रतियोगिता परीक्षाएं अपने आप सध जाती हैं.......और काफी हद तक यह बात सच भी है.......छात्र परीक्षा की तैयारी IAS, PCS लेवल की करते हैं....एक साल- दो साल अपने को मांजते रहने के बाद इन छात्रों का स्वाभाविक है कि IQ लेवल कुछ हद तक उपर हो जाता है......लगभग वही सवाल जो UPSC में पूछे जाते हैं......कुछ सरल ढंग से रेल्वे आदि की परीक्षाओं मे भी पूछे जाते हैं......ऐसे मे चयन स्वाभाविक रूप से ऐसे ही छात्रों का होता है जो ऐसे परिवेश को लेकर चलते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या बाकी राज्यों के छात्र कम काबिल हैं या उनमें वह माद्दा ही नहीं है.....नहीं ऐसा नहीं है....बाकी राज्यों के छात्र भी काबिल होते हैं....उनमें माद्दा भी होता है कि कम्पटीशन को भेद सकें.....लेकिन वह छात्र अपने राज्य से बाहर नहीं निकलते......उन्हें जरूरत ही नहीं पडती या पडती भी है तो कम, क्योंकि एक दो बार असफल होने पर वह बैकअप के तौर पर अपने ही राज्य में अन्य निजी/ प्राईवेट नौकरीयों में लग जाते हैं जो कि सरकारी के मुकाबले थोडी आसानी से मिल जाती हैं......फिर वे अपनी नौकरीयों में ऐसा रम जाते हैं कि कम्पटीशन वाली परीक्षाएं लगभग न के बराबर अटेंड करते हैं, जबकि बिहार के छात्र अपने राज्य मे प्राईवेट नौकरीयों तक की कमी के चलते उसी कम्पटीशन वाले माहौल को लेकर चलते हैं। ऐसे मे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि क्यों उन बिहारी छात्रों का ही चयन ज्यादा होता है सरकारी पदों पर। वैसे कई लोग सिफारिश या पहुँच को भी कारण मान सकते हैं लेकिन यह हालत तो हर राज्य मे है, अब हर जगह तो बिहारी ऐसे नहीं हो सकते कि सिफारिश, पहुँच या अन्य गलत तरीकों से ही नौकरी पा लें।

दूसरी बात ये आरोप लग रहे हैं कि रेल्वे ने अपने विज्ञापन महाराष्ट्र के स्थानीय भाषा के समाचार पत्रों मे नहीं दिये जिससे कि यहाँ के लोगों को पता चल सके कि ऐसी कोई वेकेंसी निकली है। तो मैं ये कहना चाहूँगा कि ऐसे विज्ञापन कहीं निकले या न निकले, रोजगार समाचार या Employment News मे तो निकलता ही है, जिसे कि यहाँ और अन्य राज्यों मे कम ही पढा जाता है क्योंकि जब निजी क्षेत्र की जहाँ बहार हो वहाँ सरकारी क्षेत्र की कौन पूछे जिसके मिलने को अब सपना मानने लगे है लोग, यही कारण है कि जो रोजगार समाचार बिहार आदि राज्यों मे खूब मन से पढा जाता है, और लगभग हर न्यूज स्टॉल पर आसानी से मिल जाता है, वही अखबार मुंम्बई जैसे शहर मे लेने के लिये यहाँ- वहाँ ढूँढना पडता है क्योंकि उसकी यहाँ ज्यादा माँग नहीं है। वहाँ बिहार मे हालत तो ये हो जाती है कि लोग निजी तौर पर साइक्लोस्टाईल्ड फॉर्म दस रूपये में लिफाफे सहित जगह-जगह दुकानों पर बेचते हैं जबकि यहाँ मुम्बई मे वह केवल रेल्वे स्टेशनों पर ही उपलब्ध हो पाता है। ऐसे में आप सहज रूप से अंदाजा लगा सकते हैं कि बिहार और मुम्बई या देश के अन्य राज्यों के बीच Competitive Exams का माहौल कैसा है और किन लोगों का ज्यादा चयन हो सकता है।

उधर उत्तर प्रदेश मे भी कमोबेश हालत लगभग यही है लेकिन वहाँ कुछ हद तक निजी क्षेत्र की उपलब्धता के चलते Competitive Exams के प्रति माहौल बिहार के मुकाबले कुछ हद तक सीमित सा लगता है, या माहौल है भी तो उस हद तक जोश और जज्बे को बरकरार नहीं रख पाता जो बिहार के छात्र अपनी नौकरीयों की जरूरतों के कारण बनाये रखते हैं,और ऐसे मे जबकि लोकगीत तक Competition मुद्दे पर बनने लगे तो आप समझ सकते हैं कि वस्तुस्थिति क्या है।

- सतीश पंचम
( मैं खुद उत्तर प्रदेश से हूँ....लेकिन बहुत हद तक इस माहौल से परिचित होने के कारण ही बिहार के बारे में यह पोस्ट लिख रहा हूँ , यदि कहीं मेरी जानकारी मे त्रुटि हो तो कृपया जरूर बता दें)

16 comments:

सुमो said...

बाकी तो मालूम नहीं आज के लेकिन बिहार के नेता तो शूल फिल्म के विलेन जैसे ही हैं
अपनी स्वार्थपरता के आगे देश को भी बेच देने वाले

श्रीकांत पाराशर said...

Sifarishen to chalti hain,parantu kahan nahin chalti, kisi ek neta ya ek pradesh par aarop nahin lagaya ja sakta. aapne sahi kaha hai ki bihar men rojgar uplabdh nahin the to lo prayas jyada karte. jahan aasani se guzara chal raha ho ve prayas kam karte hain. dheere dheere asar 15-20 saal men hota hai. 30-40 saal se bihari govt ki nokariyon ke liye pratiyogi parikshayen de rahe hain, isliye 15-20 saal se ve kahin na kahin lage hue hain aur ab dusaron ko lagne laga hai ki sab jagah bihari hi kyon hain . dusari baat bihari kaam-dham ke liye bihari ek hazar do hazar km bhi door jane ko tayyar rahta hai jabki log apna ghar pradesh chhod kar nahin jana chahte. isliye sikke ke dono pahlu logon ko dekhne chahiye. kewal bihariyon ko koshna bhi theek nahin hai. Han, ek baat aur, main bihar se nahin hun, is liye yah na socha jaye ki main unka paksh kisi karan se le raha hun.

संगीता पुरी said...

बिल्कुल सही चित्र खींचा है आपने बिहार का..... प्रशासन के असहयोगात्मक रवैये से यहां कोई उद्योगधंधे नहीं है....लोग अपनी या अपने बच्चे की प्रतिभा का सदुपयोग पढ़ाई लिखाई के क्षेत्र में ही करते हैं...बिहारी बच्चों जितनी मेहनत कर पाना अन्य राज्यों के बच्चों के लिए मुश्किल है...लेकिन जब सफलता मिलती है , तो उसपर सबों को आपत्ति होती है।

Sanjeev said...

भारतीय संविधान की शपथ सभी नेताओं द्वारा ली जाती है। इसमें अवसर की समानता का उल्लेख है। अब यदि वे ही इसका उल्लंघन करें तो क्या उन पर कोई मामला नहीं बनता है?

लवली / Lovely kumari said...

नब्ज पकड़ी है आपने सतीश जी ..मैं झारखण्ड से हूँ पर एक बिहारी परिवार में विवाहित.मैंने देखा है उपरोक्त कमपिटींटिभ माहौल.

डॉ .अनुराग said...

आपको क्यों किसी को कुछ सफाई देने के जरुरत है ?जिस राज्य के मध्यम वर्गीय परिवारों के पास गर्व करने के लिए सिवाय अपनी शिक्षा हो ...उसे ओर क्या अवसर मिलेगे ?वो ओर क्या करेगा ?मै उत्तर प्रदेश से हूँ ओर हमारे समय में12 के बाद दो ही आप्शन होते थे .मेडिकल या इंजीयरिंग ..कुछ लोग pcs या आईएस की तैयारी करते थे ,आज जैसा माहोल नही था की पैसे वाले आज चाहे जो चाहे वो अपने बेटे के बना दे .डोनेशन से ....पिता सरकारी नौकरी में थे.उच्च पद पर थे .फ़िर भी ऐसा नही की हमें लाखो दे कर डोनेशन करवा दे .इसलिए जानते थे की अपने सपनो को सिर्फ़ मेहनत से पूरा करना पड़ेगा .मेरी क्लास के १२ के बैच में ४० लड़के थे ..जिसमे से २६ आज डॉ है...सभी मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे है

Suitur said...

अच्छा लिखा है ......प्रशासन के असहयोगात्मक रवैये से यहां कोई उद्योगधंधे नहीं है अतः लोग अपनी प्रतिभा का सदुपयोग पढ़ाई लिखाई के क्षेत्र में ही करते हैं...

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सही और सटीक चित्रण किया है आपने ! धन्यवाद !

अजित वडनेरकर said...

अच्छी पोस्ट । सहमत हूं।

जितेन्द़ भगत said...

पि‍छड़े प्रदेशों से हर तबके के लोगों का पलायन जारी रहेगा, रोजगार के अवसर की कमी के कारण या बाढ़ आदि‍ के कारण अथवा भ्रष्‍ट राजनीति‍क तंत्र के कारण।

Gyandutt Pandey said...

एक सोच जो इस क्षेत्र में उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है - कि नौकरियां घूस दे कर पाई जाती/जा सकती हैं; वह बहुत खतरनाक है।
मां-बाप लड़के की नौकरी के लिये खेत बेचते/कर्ज लेते और दलाल की तलाश करते पाये जाते हैं। वह बड़ा ही भीषण अकर्मण्यवाद आ रहा है।

रंजना said...

वाह ! वाह ! वाह ! एकदम सौ फीसदी सही बात कही है आपने.आपका आकलन एकदम सटीक है.
सचमुच जिन्हें कारण जानना है वो ये पोस्ट पढ़ लें.

शोभा said...

एक दम सही कहा है आपने. एक विवेचनात्मक लेख के लिए बधाई.

PD said...

बहुत बढिया लिखा है आपने.. काफी विश्लेशन करने के बाद लिखा गया पोस्ट है यह.. ज्ञान जी कि बातों को भी ध्यान में रखा जाये.. वैसे मैं बिहार से हूं और मेरे बिहारी मित्रों में एक को छोड़ कोई भी सरकारी नौकड़ी में नहीं है.. हां मगर एक बात तो है कि कोई भी बिहार में नौकड़ी नहीं कर रहा है..

राज भाटिय़ा said...

बिहार के लोग इतने मेहनती है, तो फ़िर भी बिहार क्यो पिछडा है, ( माफ़ करे मै बिहार के बारे ज्यादा नही जानता, लेकिन सुना ओर पढा बहुत है, जब भारत मे था तो बिहार को बोद्ध धर्म, कारण जानता था, फ़िर जय नारायण जी के कारण)
आप ने यह लेख बहुत ही मेहनत से लिखा है, लेकिन मै तो बिहारियो का भी गुरु निकला लगी लगाई नोकरी छोड कर हजारो किमी दुर आ गया, यानि मै सब से बडा बिहारी हुया(पंजाबी बिहारी :) )
धन्यवाद

अनूप शुक्ल said...

अच्छी पोस्ट।

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