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Saturday, October 18, 2008

उपवास के नाम पर ऑफिस में नंगे पैर (विश्लेषण)


क्या कभी अपने ऑफिस मे नंगे पैर गये हैं आप, नहीं न.......लेकिन यहाँ मुम्बई में यह हुआ है और ऐक दो नहीं...कई लोग अपने ऑफिस नंगे पैर पहुँचे। हुआ यूँ कि अंधेरी स्टेशन पर उतरते ही किसी महिला की गाली देती हुई चीख सुनाई दी।

मेल्या....मुडद्या......दिसत नाई का ( मुर्दे.....दिख नहीं रहा क्या )

थोडा ध्यान दिया तो पता चला कि वह महिला नंगे पैर थी और किसी का जूता उसके पैरों पर पड गया था। पल भर में सारा मामला समझ मे आ गया कि आज बहुत सी महिलायें करवा चौथ का वृत रखने के कारण अपने ऑफिस नंगे पैर पहुँचती हैं।

ऐसा अक्सर नवरात्र के समय भी कई बार देखने मे आया कि कई महिलायें बिना चप्पल पहनें अपने ऑफिस पहुँची और बॉस के पूछने पर खिलखिलाते हुए बताती - वो मेरा आज उपवास है न। अब दिन भर क्लाएंट्स आते रहे.....मिस वृतादेवी को देखते और जिज्ञासावश पूछ लेते - क्यों क्या बात है, आज Bare foot, नंगे पैर। तब फिर वही जवाब - आज मेरा उपवास है न।

दिन भर मे न जाने कितनी बार लोगों को वह ये जवाब देते रहीं और धीरे-धीरे ऐसे लगने लगा जैसे कि उनका उपवास मे नंगे पैर ऑफिस आना ही एक उपवास की जरूरी विधि है जिसे बिना पूरा किये उपवास अधूरा रह जायेगा। शाम की चाय के वक्त जहाँ लोग दिन भर शेयर मार्केट की बातों पर जूझते रहे.......तो वहीं इनकी सहेलियाँ उनके उपवास पर मगन रहीं। कॉफी वेंडिंग मशीन अच्छी भली काम कर रही थी पर अचानक ही बंद पड गई, तब वृतादेवी की सहेलियों ने ही कहा - (ध्यान रहे पुरूषों ने नहीं) - लगता है आज इस कॉफी वेंडिग मशीन का भी उपवास है।

यहाँ एक बात देखने मे आई है कि सडक पर नंगे पैर चलना भी एक प्रकार से गंदगी को अपने साथ बटोरते चलना है। लोग सडक पर थूकते हैं...खंखारते है.....और भी न जाने कितनी गंदगियां पडी होती हैं जो हमें अपने से लपेटे मे ले लेती हैं। चप्पल या जूता पहनने से कम से कम वह गंदगी हमारे शरीर को तो न छू पाएगी। और यदि छूती भी है तो उस चप्पल और जूते को जिसे कि हम मंदिर के बाहर ही उतार देते हैं.....ताकि साफ पैरों से प्रसन्न भाव से भगवान के मंदिर मे दर्शन कर सकें।

नंगे पैर सारे दिन रहकर जब मंदिर जाएंगे तो उसी गंदे जूतेनुमा पैर को लेकर ही जाएंगे, क्या तब हमारी आस्था और प्रगाढ होगी, क्या तब ही हम अपने को बडा भक्त मानेंगे। मैं लोगों की आस्था पर प्रश्न नहीं उठा रहा पर कहीं तो कुछ है जो कचोट रहा है कि ऐसे उपवास विधि का क्या तुक जो किसी का पैर पड जाने भर से गाली देने को तैयार हो। उस अंधेरी स्टेशनवाली महिला का रोष देख कर तो लगता है कि उसका उपवास निर्बाध होता यदि वह चप्पल या इसी तरह की कोई चीज पहने होती, तब शायद उसे उस शख्स को गाली देने की जरूरत ही न पडती जिसका पैर गलती से उसके पैरों पर आ गया था।

- सतीश पंचम


( इस लेख को लिखते समय कुछ असमंजस मे हूँ..... क्योंकि ज्ञानजी और सुरेश चिपलूनकरजी के ब्लॉग पर पढ चुका हूँ कि हिंदू धर्म के उपर कुछ लिखने से आपको बेकार मे ही अटेंशन मिलता है.....याकि लोग ज्यादा जानते हैं, उसी असमंजस भरी परिस्थ्तियों मे ये पोस्ट लिख रहा हूँ...यदि किसी की भावनाये मेरे इस लेख से आहत हों तो मैं आप लोगों से क्षमा चाहता हूँ)

12 comments:

Gyandutt Pandey said...

बहुत सही है। हिन्दू समाज में (धर्म में नहीं) बहुत कुछ अण्ट-शण्टात्मक है। कर्मकाण्ड जब जड़ होकर मानव से चफन जाते हैं तो बहुत विकृति होती है। इसके अलावा मानव की ग्रीड वीभत्स बना देती है समाज को। दहेज उसका परिणाम है। इन सब का भंजन तो पोस्ट में होना ही चाहिये।

बाकी धर्म भी इस जड़ता से पीड़ित हैं। शायद ज्यादा ही। हिन्दू धर्म में यह तो है कि आप खुले रूप से विचार रख सकते हैं।

Vivek Gupta said...
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Vivek Gupta said...

ये बात सत्य है कि हिंदू धर्म विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता देता है | और अंध धर्मानुचरण तो मैंने सभी धर्मों में देखा है | हिंदू धर्म की उदारता ही है जो आज इतने धर्म बने हुए हैं | (सारा विचार मेरा निजी है; किसी को दुःख पहुँचाना मेरा लक्ष्य नहीं है)

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

हिन्दू एक धर्म नहीं उस से ऊपर उठी हुई चीज है। जो बहुत से धर्मों, पंथों, विचारों, व्यवहारों को अपने अंदर समेटती है। हम इसे धर्म की श्रेणी में ला कर इस का निम्न मूल्यांकन करते हैं।
इस विविधता के कारण इस जमाने के प्रतिकूल बहुत सी चीजें आ जाती हैं जिन की आलोचना करने और उन्हें विलोपित करने की निरंतर आवश्यकता है। उस आलोचना को जूते मारना कह दिया जाता है तो गलत है। यदि यह आलोचना नहीं रही तो यह भी एक संकुचित धर्म ही हो जाएगा उन का आश्रय स्थल नहीं।

Roushan said...

जिस चीज को आप जानते हैं महसूस करते हैं और समझते हैं उस पर लिखने और अपनी राय व्यक्त करने का पूरा हक़ है
हमारी संस्कृति में वाद-प्रतिवाद की पूरी छूट है

रंजना [रंजू भाटिया] said...

अजीब रिवाज है यह ...कई बातो को बदलना जरुरी है अब

डॉ .अनुराग said...

कमाल की बात है ,हमने कभी भारत में रहते हुए कोई ऑफिस जाती हुई महिला नंगे पैर नही देखी ...वैसे भी आजकल हर हिंदू त्यौहार को बाजार ने अपने तरीके से हाइजेक कर लिया है ओर करवा चौथ को मेहंदी ओर पार्लर वालो ने ...लेकिन अगर इसका सकरात्मक पहलू देखा जाये तो परिवार के पुरुषों का जल्दी घर पर पहुचना .....सबका एक साथ इकठ्ठा होना ... मोहल्ले की महिलायों का एक साथ कुछ वक़्त हँसी खुशी बिताना .....इस त्यौहार से या किसी भी त्यौहार से हमें कितनी चीजे मिल जाती है .....मैंने देखा है महिलाये इसे हँसी ओर खुशी से मनाती है ओर अपने मन से व्रत रखती है (वैसे भी युवा पति अब पत्नी को वर्त रखना जरूरी नही मानते )....दरअसल विवाह का अर्थ ही एक दूसरे के लिए समर्पण ओर त्याग है.
वैसे ज्ञान जी इस बात से मै पुरा इत्तेफाक रखता हूँ की लोग अपने ब्लॉग को हिट देने के लिए जरूर हिंदू विरोधी विषयों को जान बूझकर उठाते है....खास तौर पर आजकल जो माहोल चल रहा है .....पर आप चिंता न करे हम सब यहाँ केवल कुछ कुरीतियों पर चर्चा कर रहे है ..मैंने भी की है कई बार ....

राज भाटिय़ा said...

भाई सतीश जी अगर भगवान नंगे पावंओ वालो को मिलते हो तो यह गोरे तो गर्मियो मे पुरे ही नंगे हो कर बीच पर ओर पार्को मे लेटे होते है, तो इन्हे पहले मिलने चाहिये,
सच बात तो यह है की हम पांखण्ड ज्यादा करते है, ओर कर्म कम, जेसा की गीता मे लिखा है, हमे कर्म पर जोर देना चाहिये, लेकिन हम धर्म पर ओर पांखण्ड पर ज्यादा जोर देते है,
आप ने बिलकुल सही लिखा है, जो गलतिया हम करते है उन पर चर्चा जरुर होनी चाहिये, यह कोई बुराई नही.
धन्यवाद, एक अति सुन्दर चर्चा के लिये

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

नंगे पाँव चलने के पीछे का भाव तो बहुत स्पष्‍ट नहीं है; लेकिन परम भक्ति के जो आदर्श हैं- हनुमान जी उन्होंने भी कुछ ऐसा ही कर्म कर दिया था। एक रोचक बात सुनी थी मैने उनके बारे में - सबूत सहित पेश है-:)

माँ सीता को सिन्दूर लगाते देखकर भक्त हनुमान पूछ बैठे- “माते, इस चुटकी भर सिन्दूर को लगाने का क्या उद्देश्य है?”
अब कुँवारे हनुमान से वैवाहिक जीवन की पहचान और इसके महत्व के बारे में चर्चा करना सीता जी ने जरूरी नहीं समझा, तो बस यह बता दिया कि “सिन्दूर लगाने से तुम्हारे प्रभु श्रीराम प्रसन्न होते हैं।”

बस क्या था, पवनपुत्र को ऐसा विश्वास हुआ कि उन्होंने पूरे शरीर में ही सिन्दूर पोत लिया। रामजी के पास पहुँचे तो अन्तर्यामी ने सब समझ लिया। अपने भक्त की भावना को ठेस कैसे लगने देते, प्रसन्न हो लिए। हनुमानजी तो प्रमुदित थे ही।

बस तबसे बजरंगबली अच्छी-भली काया में सिन्दूर पोते घूम रहे हैं। इस युग में भी हनुमत के मन्दिरों में श्रृंगार मद में सर्वाधिक खपत सिन्दूर की ही है।:)

मतलब ये कि अपने आराध्य तक पहुँचने का कोई आसान फार्मूला मिल जाय तो जनता उसी पर उमड़ पड़ती है।

कबीरदास भी तो कह गये- पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड़।

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

मुझे शंका है कि जिस खुले दिमाग से आपने अपना लेख लिखा है, उसी खुले दिमाग से आप मेरी टिप्‍पणी भी पढ़ पाएंगे।

दरअसल आपकी पोस्‍ट में श्रद्धा और लॉजिक की टक्‍कर दिखाई गई है। वास्‍तव में दोनों का कोई मेल नहीं है।

मैं एक ब्‍लॉगर से पूछूं कि वह ब्‍लॉग क्‍यों लिखता है तो वह कहेगा इससे मन की संतुष्टि मिलती है। ऐसे में मैं पचास ब्‍लॉगों के लिंक देकर बताउं कि ये देखो यहां लोग कुंठाएं निकाल रहे हैं। और आप भी संतुष्टि के नाम पर कमोबेश ऐसा ही कर रहे हैं, तो शायद आप सहमत नहीं होंगे।

ऐसा ही कुछ श्रद्धा और लॉजिक के साथ है।

हमें दोनों को सावधानी से अलग रखना होगा, वरना लॉजिकल कुंठा में फंस जाएंगे। जैसे विज्ञानवादी धर्म को लेकर फंसे हुए हैं।

धर्म की कसौटी को कड़ा करने का उद्देश्‍य भी समझ में नहीं आता। एक आदमी मूंछे रखता है या काट देता है, वह बड़ा इश्‍यू नहीं है। उसके मन की बात है। लेकिन नंगे पैर रहकर उपवास करता है या ऊनी मोझे पहनकर तो वह सार्वजनिक बहस का विषय है।


कभी कभी लगता है आम इंसान के भीतर बसी असुरक्षा की भावना ऐसी चर्चाओं को जन्‍म देती है, जिसमें यह भावना होती है कि कहीं नंगे पैर रहकर यह कहीं अतिरिक्‍त आध्‍यात्मिक और सांसारिक फायदे तो नहीं उठा रहा.. :)

सुज्ञ said...

सिद्धार्थ जोशी जी की यह टिप्पणी यथार्थ अवलोकन है। तलस्पर्शी!!

सतीश पंचम said...

सिद्धार्थ जी,

आपकी इस बात से सहमति है कि लॉजिक और श्रद्धा को मिक्स कत्तई नहीं करना चाहिये। एक लिंक दे रहा हूँ, इसी सफेद घर पर बहुत जमकर बहस हुई थी। थोड़ा पढ़ियेगा - गोपनीय श्रद्धा गोपनीय ईश्वर.

http://safedghar.blogspot.com/2011/05/blog-post_24.html

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