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Tuesday, October 14, 2008

मानो तो वादी नहीं तो आतंकवादी


अभी ऐक आतंकवादीजी रास्ते मे मिल गये - मैने पूछ लिया - कहाँ जा रहे हो ?

मौसियाने जा रहा हूँ।

मतलब ?

अरे यार अपने खाला के घर जा रहा हूँ, कुछ बम-वम फोडना है कि नहीं।

मैने कहा यार समझ नहीं आ रहा कि ये तेरा कौन सा मौसीयाना है।

तो बोला - अरे हमारी माँ कई बहने हैं, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भारत.......सब अपुन की माँ की बहने है, तो क्या है कि अपनी एक माँ को छोड बाकी अपुन की मौसी लगेंगी। तो अभी जा रहा हूँ....मौसीयाने बम फोडने। तूम आते हो तो चलो।

मैं सकपका गया.....मैने कहा - यार मैने ये तो सुना था कि आतंकवादीयों ने यहाँ अपनी खाला का घर समझ रखा है, लेकिन नहीं जानता था कि....इतनी शिद्दत से तुम इसे अपनी खाला का घर मान बैठे हो।

मानना क्या है - मानों तो वादी नहीं तो आतंकवादी।

वादी मतलब ?

वादी शब्द बहुत सारे बोरबचन का पर्यायवाची शब्द है - जैसे उदारवादी,समतावादी,समाजवादी,संघर्षवादी,जनवादी,राष्ट्रवादी।

तो तुम्हें ये सब बोरबचन लग रहे हैं।

नहीं बोरबचन तो अपने गुरू श्री लादेन को लगता था, मुझे तो ये वादी वाले शब्दों से लगता है कि कहीं लोकतंत्र के हसींन वादीयों मे घूम रहा हूँ। कोई कुछ बोलने वाला नहीं, कोई कुछ कहने वाला नहीं। कभी कोई बाटला-फाटला जैसी मुठभेड हो जाय तो हमारे हमदर्द भी यहीं से निकल आते हैं ये कहते हुए कि हमें मुठभेड पर शक है। लोकतंत्र मे ये वादी शब्द कितना अच्छा लगता है सुनने मे है न।
मैं सोच मे पड गया - सचमुच आजकल ये इतने सारे लोकतंत्र के पवित्र नामों वाले वाद जैसे राष्ट्रवाद, समाजवाद,जनवाद आदि उन्होंने अपना अर्थ और महत्व किस तरह खोया है, और उस अर्थ को खोने मे हमारे ही लोगों का कितना बडा हाथ है, चाहे वह अमर सिंह जैसे बकबकीया नेता हों या फिर कोई और हो,फिर इतने सारे आतंकवादीयों को ये देश आतंक के लिये हसीन वादी क्यों न नजर आये।

- सतीश पंचम

8 comments:

Tarun said...

बहुत खूब एक ही गठरी में सभी छुपे बैठे हैं, क्या वादी क्या आतंकवादी।

mahashakti said...

और इनका सबसे बड़ा मऊसियाउर भारत ही है

Anil Pusadkar said...

सही, बिल्कुल सही, ठीक वैसे ही है, जैसे लोकतंत्र के चार कालम के बाद ,फ़िफ़्थ कालम । वाद शब्द के परिवारवाद की अच्छी बखिया उधेडी है सतिश जी। आणंद आ गया ।

ताऊ रामपुरिया said...

वादी शब्द बहुत सारे बोरबचन का पर्यायवाची शब्द है - जैसे उदारवादी,समतावादी,समाजवादी,संघर्षवादी,जनवादी,राष्ट्रवादी।

सर जी जबरदस्त व्यंग और मनोरंजन उससे भी बड़ा ! मुझे गर्व है की मैं आपके लेखन का फैन हूँ !

परमजीत बाली said...

बढिया व्यंग्य है।

Gyandutt Pandey said...

बहुत बढ़िया।
आपकी ऐसे ही दो चार पोस्टें और तो आतंकवादी जी के फैन हो जायेंगे हम सब। :-)
बड़ी मासूमियत से मौसी के घर बम फोड़ते हैं ये सिद्धान्तवादी!

राज भाटिय़ा said...

क्या बात है, मानो तो वादी.....
आप की कलम का कोई सानी नही, बहुत ही सुन्दर ढंग से बात लिख देते है आप .
धन्यवाद

डॉ .अनुराग said...

झकास है भाई.......कल रात को डिस्कवरी चैनल पर एयर लाइन क्रेश इन्स्वेतिगेशन में कुछ ऐसा ही मौसियाने का जिक्र था ...

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