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Saturday, October 4, 2008

दिन में चार बार पतनी को गले लगाने की चाहत में सदरू भगत (हँसी-मजाक)


जब से सदरू भगत ने खबर सुनी है कि दिन में चार बार पत्नी को गले लगाने से जीवन खुशहाल रहता है, तब से तो जैसे उनके पैर जमीन पर नहीं पड रहे, चल तो रहे थे लेकिन सोचते थे कितनी जल्दी पहुँच जाउं कि गले मिलने को हो। मन ही मन सोचे जा रहे थे कि जब रमदेई मुझे हुक्का पकडायेगी तब गले मिल लूँगा, जब खाना परोसेगी तो फिर गले मिल लूँगा, थोडी देर मे जब बर्तन ओर्तन मांज लेगी तो फिर लिपट लूँगा और फिर होते-होते जब सांझ को मेरे पैर दबायेगी तो फिर क्या कहना, तब तो वो विज्ञानी लोग भी क्या लिपटें होंगे जो ये बताये हैं कि दिन मे चार बार पतनी से गले मिलने से जीवन सुखी होता है ......कुल मिलाकर चार बार ही तो गले मिलना है.......अगर ईतना करने से जीवन खुशहाल हो जाय तो क्या कहना। अभी यह सोचे चले जा रहे थे कि रास्ते में झिंगुरी यादव मिल गये।

कहाँ जा रहे हो उडन दस्ता बने हुए।

अरे कुछ नही बस ये जानो कि आज मुझे पंख लग गये है। आज नहीं बोलूँगा........कल मिलना तो बताउंगा।

ईधर झिंगुरी को लगा आज सदरू जरूर सहदेव कोईरी के यहां गये होंगे.......गांजा का असर दिख रहा है......लगता है खूब बैठकी हुई है आज।

हाँफते-डाफते सदरू किसी तरह घर पहुंचे, देखा पतोहू बाहर बैठी अपने पैरों में लाल रंग लगा रही है.....मौका ताडकर भीतर घर में घुस गये। रमदेई कोठार में से गुड निकाल कर ला रही थी कि कुछ मीठा बनाया जाय। तब तक सदरू को सामने देख पूछ बैठी - क्यों क्या बात है.....ईतना हाँफ क्यों रहे हो।

सदरू ने किसी तरह अपनी साँसों को नियंत्रित करते कहा - आज तुझे खुस्स कर दूंगा।

खुस्स करोगे........क्या आज फिर गांजा पीकर आये हो जो टनमना रहे हो।

अरे नहीं रमदेई....पहिले गले मिल तब बताउं.......कहते हुए सदरू आगे बढे।

हां.......हां .......हां ......अरे क्या आज गांजे के साथ चिलम भी गटक लिया क्या जो जवान की तरह घुटूर - घुटूर गोडे जा रहे हो।

अरे आज कुछ न बोल रमदेई, बस आ जा गले लग जा.........जीवन खुस्सहाल हो जाई।

अब रमदेई को पक्का यकीन हो गया कि ये सदरू भगत के मुंह से गाँजा बोल रहा है।

अच्छा तो गले मिलने का नया सौक पाला है.......रहो, अभी तुम्हारा गले मिलौवल ठीक करती हूँ........कहते हुए रमदेई ने बगल में रखे धान कूटने वाले मूसल को उठा लिया और ईस तरह खडी हो गई मानो कह रही हो - बढो आगे.......देखूँ कितनी जवानी छाई है तुममें।




अब सदरू सोच में पड गये कि ये तो कुछ और ही हो रहा है। संभलकर बोले - अरे विज्ञानी लोग बोले हैं कि दिन में चार बार पतनी को गले लगाने से खुस्सहाली मिलती है, तभी मैं आया हूँ तुझे खुस्स करने और तू है कि ले धनकूटनी मूसल मुझी पर टूट पडना चाहती है।

अरे कौन विज्ञानी है जरा मैं भी देखूं उस मुंहझौंसे को........घोडा के फोडा नहीं तो.......वो कह दिया ये सुन लिये......जरा दिखा दो तो कौन गांव का है वो विज्ञानी-ध्यानी.......आये जरा......न गोबर में चुपड कर झाडू से निहाल कर दिया तो कहना........आये हैं गियानी-विगिआनी की बात लेकर। अरे ईतनी ही खुस्सहाली मिलती गले मिलने से तो वो किरपासंकर सबसे जियादे खुस्स होता.....जो रात दिन अपनी मेहरीया को ले घर में घुसा रहता है, ये भी नहीं देखता कि सब लोग यहाँ महजूद हैं......बस्स ........लप्प से घर में घुस गया.......मेहरीया भी वैसी ही है......न उसको सरम न उसको लाज।

सदरू को लगा रमदेई तो ठीक कहती है......अगर गले मिलने से ही सबको खुसहाली मिले तो कोई काम क्यों करे......सब अपनी अपनी मेहरारू को ले गले मिलते रहें और खुश होते रहें।

तभी बाहर लल्ली चौधरी की शरारत भरी आवाज आई - अरे भगत कहाँ हो.....अंदर घर में क्या कर रहे हो भाई........एतना कौन अरजेंटी आ गया।

रमदेई ने कहा - हाय राम ये कहाँ से आ गये साफा बाँधकर, फट् से बाहर निकलते कहा - अरजेंटी का तो ऐसा है चौधरीजी कि आज ये खुस्सहाली बाँट रहे हैं।

खुस्सहाली बाँट रहे हैं......तनिक हमको भी बाँटो भगत......अरे ऐसी कौन सी खुशहाली बाँट रहे हो कि रमदेई को ही बाँटोगे।

तभी सदरू भी बाहर निकल आये और लगभग चहकते हुए कहा - तुम्हे खुसी बाँटने का अभी बखत नहीं आया लल्ली........जिस दिन बखत आयेगा बता दूँगा....लेकिन एक बात है लल्ली भाई।

क्या ?

वो ये कि आज भी हमारी पतनी को समझ नहीं है कि विज्ञान क्या होता है.....खोज क्या होती है.......और उसके दम खुसहाली कैसे मिलती है।

लल्ली की कुछ समझ में न आ रहा था कि ये सदरू क्या आंय-बांय बके जा रहे हैं.....फिर भी सिर हिलाकर हुँकारी भरी जैसे सब समझ रहे हों।

तभी सदरू ने देखा पतोहू नहीं दिख रही है......अभी आया तब तो पैरों मे आलता वगैरह लगा रही थी।

पूछा - फाफामउ वाली नहीं दिख रही है, अभी जब आया तो यहीं थी।

लल्ली ने कहा- अरे अभी मैं आया तो देखा तुम्हारा बडा लडका रामलाल अपने दक्खिन वाले घर मे जा रहा था.......बहू भी पीछे-पीछे पानी लेकर गई थी......क्या हुआ जो ईतना पूछ ओछ रहे हो।

नहीं कुछ नहीं ऐसे ही पूछ रहा था.......वैसे लगता है आजकल की नई पीढी विज्ञानी लोगों की बात जरा जल्दी मान जाती है......है कि नहीं रामदेई.....।

इधर रामदेई को लगा जैसे उसे ही लगाकर यह बात कही गई है, बोली - हाँ हाँ.....बडे आये नई पीढी की वकालत करने.......अरे वो तो कम से कम खुस्सहाली बाँट रहे हैं मिलजुलकर......लेकिन तुमसे तो वो भी नहीं हुआ......जरा सा मूसल क्या देखा.....लगे बगलें झांकने........ईतना भी नहीं जानते कि सब लोगों का खुसहाली बांटने का तरीका होता है......कोई गले मिलकर खुसहाली बांटता है तो कोई मूसल लेकर........और जो मूसल लेकर खुसहाली बांटता है.....उसकी खुसहाली उ गियानी विगियानी लोगों की खुसी से कहीं ज्यादा होती है।

वो कैसे ?

वो ऐसे कि गले तो सब मिल लेते हैं......मूसल कोई-कोई को खाने मिलता है.......समझे कि बुलाउं कोई गियानी-विगियानी को।

लल्ली चौधरी को अब भी पल्ले नहीं पड रह था कि आखिर य़े किस मुद्दे पर बातचीत चल रही है, सो समझ लिया यहां से हट जाउं वही ठीक रहेगा, सो खंखारते हुए बोले- ठीक है भाई आप लोग खुसहाली बांटो, मैं तो चला अपनी भैंस ढूढने....न जाने कहाँ खुसहाली बाँटते फिर रही है।

लल्ली के जाते ही सदरू लपक कर रमदेई के पास पहुँचे - हाँ तो क्या कह रही थी तू कि मूसल खाने में खुसहाली मिलती है......सच।

अरे अब भी नहीं समझे का.......हम तो राजी थीं खुसहाली बाँटने.......तुम ही भाग आये मूसल की मार के डर से।

तो क्या वो तेरा मूसल उठा कर मेरी ओर झपटना सब नाटक था ?

हाय दईया.......अब तो लगता है सचमुच कोई गियानी-विगियानी बुलाना पडेगा जो ईनको मूसल वाली खुसी समझाये।

बगैर मुसल का डर दिखाये राजी हो जाती तो तुम ही कहते बडी उस तरह की हो.....।

ईधर सदरू लपक लिये रमदेई की ओर यह कहते.........जियो रे मेरी करेजाकाटू .

उधर धान कूटने वाला मूसल जमीन पर फेके जाने के बाद थोडी देर ढुलकता रहा और फिर न्यूटन के गुरूत्वाकर्षण बल से खुद एक ओर स्थिर हो पडा रहा मानो कह रहा हो - ये है न्यूटन का भाई ओल्डटन :)



- सतीश पंचम

18 comments:

राज भाटिय़ा said...

सतीश जी बहुत ही प्यारी भाषा ओर बहुत ही प्यारी कहानी, मेने भी आराम से पढी पुरी कहानी , मजा आ गया, वेसे आदमी को सुखी रहने के लिये चार बार गले मिलना चाहिये, फ़िर बीबी को खुश रहने के लिये भी चार बार कुल ८ बार ही हुआ ना.....वेसे हमारी रम्देई तो वेसे ही गऊ हे.
धन्यवाद

अनूप शुक्ल said...

मजेदार! हम खुश हो गये।

Gyandutt Pandey said...

गले मिलना वाया मूसल ज्यादा खुशी प्रदान करता है। ऐसा किया जाये कि एक एक मूसल सभी घर में रखें। बस मूसल खरीदें - ओखल की जरूरत नहीं! :-)

Anil Pusadkar said...

गज़ब की कहानी। आणंद आ गया।पढना शुरु किया तो खतम कर ही दम ले रहा हूं।वाकई शानदार्।

दीपक "तिवारी साहब" said...

ठीक है भाई आप लोग खुसहाली बांटो, मैं तो चला अपनी भैंस ढूढने....न जाने कहाँ खुसहाली बाँटते फिर रही है।

इनकी भैंस को ताऊ के यहाँ ढुन्ढ लिया जाए ! अभी बहुत सारी नई भैंसे लाया है ताऊ ! :)
बहुत शान दार लेख ! मजा आगया ! धन्यवाद !

भूतनाथ said...

एक ठो मुसलवा की हमका भी दरकार है भाई ! क्या कमाल का लिखा है !

ताऊ रामपुरिया said...

लेकिन तुमसे तो वो भी नहीं हुआ......जरा सा मूसल क्या देखा.....लगे बगलें झांकने........ईतना भी नहीं जानते कि सब लोगों का खुसहाली बांटने का तरीका होता है......कोई गले मिलकर खुसहाली बांटता है तो कोई मूसल लेकर........और जो मूसल लेकर खुसहाली बांटता है.....उसकी खुसहाली उ गियानी विगियानी लोगों की खुसी से कहीं ज्यादा होती है।

भाई सतीश जी आपके लेखन का मैं पहले भी फैन था और आज तो मैं आपका एग्जास्ट फैन हो गया ! भाई आपके चरण कमल
ज़रा हमारी तरफ़ किए जाए ताकि हम उन्हें छु सके ! मेरे पास तारीफ़ के शब्द नही है ! इस पोस्ट को पसंदीदा रचनाओं की लिस्ट में लगवा रहा हूँ ! बहुत धन्यवाद !

makrand said...

good story sir

makrand said...

good story sir

Udan Tashtari said...

मूसल से खुशहाली की यात्रा और गला मिलन!! हम तो डर ही जायें ऐसे में..लगे कि बिना गले मिले ही खुश हैं. शानदार लिख्खा है. पढ़कर ही खुशहाली आ गई.

PD said...

and what's for GF?? ;)

सतीश पंचम said...

PD भाई आप ने सवाल पूछा है तो बता रहा हूँ.....कि GFs को ऐसी खुशहाली मान सकते हैं जो गले पडने को तैयार है पर आप ऐसी खुशहाली को कुछ दिन और टालना चाहते है ताकि उन्मुक्त खुशी में बाधा न पडे :D
(क्योंकि बाद मे दाल चावल, नमक तेल के चक्कर मे खुशहाली मे बाधा पडने की आशंका जो होती है :)

गुरतुर गोठ said...

बडा गजब के पोटारी के पोटारा वाले कहिनी कहेव पंचम बाबू मजा आगे ।

PD said...

यह भी बहुत सही फरमाया आपने.. :)

Nagarro said...

ha ha.. Phaphamau wali nahi hai kya.... aap Phaphamau ke barein mein jante hai

Rohit Tripathi said...

bahut ache

Rohit Tripathi said...

bahut ache

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

आपकी जय हो,
सदरू भगत में मुझे अपने बुढापे का चेहरा नजर आ गया।

देखते हैं कोई दिन ऐसा भी आएगा जब गले लगाने से पहले मूसल की बाधा भी पार करनी पड़े।

बहुत सुंदर कहानी।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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