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Tuesday, September 23, 2008

एनडीटीवी पर जामिया के वीसी ने ये क्या कह दिया


एनडीटीवी पर रात दस बजे जामिया युनिवर्सिटी के वाईस चांसलर कराहते हुए से कह रहे थे मैं तो अपने उन बच्चों के साथ रहूँगा....उन्हें कानूनी सहायता दूँगा.....एक अभिभावक की तरह मेरा फर्ज बनता है कि मैं अपने युनिवर्सिटी से जुडे बच्चों का साथ दूँ जो आज मुसीबत में फंसे हुए हैं। लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही वीसी कि आज जब वे सारे आतंक के शोहदे स्वीकार कर चुके हैं कि उनका बम विस्फोटों में हाथ था......तो किस बिना पर वीसी ने इतनी बडी बात कह दी......क्या ये विचार रखते समय वीसी ने खुद भी कभी एक बार सोचा था कि इसका अंजाम क्या होगा....युनिवर्सिटी को लोग किस नजरों से देखेंगे..........। जहाँ तक मेरी समझ है.....जब देश किसी गहरे संकट की ओर जा रहा हो तो समझ लेना चाहिये कि किसी पढे लिखे चालाक बुद्धिजीवी ने अपना मुह खोला है या फिर कोई समझदार बुद्धिजीवी अपने काम को करने से जान बूझकर बच रहा है........ऐसा देश के बंटवारे के समय हम देख चुके है। आज फिर वही परिस्थितियां बनती दिख रही हैं.......जम्मू और कश्मीर अलगाव पर तुले ही हैं दूसरी ओर ये तथाकथित मुस्लिम एलीट क्लास इस आग में और घी डाल रहे हैं.......। सरदार पटेल ने बंटवारे पर कहा था कि सिर दर्द से बचने के लिये सिर कटाना हमने बेहतर समझा.......लेकिन मैं ये जानना चाहता हूँ कि अब तो पूरे बदन में आग लगी है.....हर अंग जल रहा है.....दर्द दे रहा है.......कहाँ तक क्या-क्या अंग कटा दें कि दर्द से छुटकारा मिले। तो बात हो रही थी वीसी के दिये बयान की.......आप यकीन मानिये....इस बयान की खनक हमें अगले कई सालों तक सुनाई पडेगी क्यों कि बोलने के लिये भले वीसी बोले हों लेकिन असल में यह कुछ लोगों की मानसिकता बोल रही थी कि चाहे कुछ हो जाय हम इस देश के लोगों से अपना विरोधाभास जारी रखेंगे। यह मानसिकता हांलाकि बहुत कम लोगों में है लेकिन देर-सबेर यह अपना असर दिखा कर रहेगी और दिखा भी रही है.......आखिर आज किसी पढे लिखे बुद्धिजीवी ने अपना मुह फिर खोला है।

- सतीश पंचम

21 comments:

Udan Tashtari said...

यही कट्टरपंथिता है, और क्या!!

Shekhawat said...

गैर जिमेदाराना, कटरपंथी,देशद्रोही विचार नही तो क्या

ताऊ रामपुरिया said...

इस बयान की खनक हमें अगले कई सालों तक सुनाई पडेगी

आप बिल्कुल सही कह रहे हैं ! लेकिन आज इसको कोई सुन नही पा रहा है !
मुझे तो यह बयान ही कुछ ठीक नही दिखाई दे रहा है ! ये साफ साफ़ इशारा है !
और आपने तो काफी स्पष्टता से बात रख दी है ! धन्यवाद !

Anil Pusadkar said...

आग मे घी डालने का काम कर रहे है और कुछ नही

Anil Pusadkar said...

आग मे घी डालने का काम कर रहे है और कुछ नही

Suresh Chandra Gupta said...

यह आतंकवादियों की सबसे बड़ी सफलता है. अब तक कुछ आम आदमी आतंकवादियों के छलाबे में आ रहे थे, अब एक विश्व विद्यालय के वीसी भी आतंकवादियों के छलाबे में आ गए लगते हैं.

जितेन्द़ भगत said...

सही कहा आपने।

Gyandutt Pandey said...

यह तो स्वीकारना हुआ कि जामिया इस तरह की विचारधारा का पोषक है - और यह स्वीकारोक्ति बहुत भयावह है।
वीसी जैसे लोग तो सेकुलरिज्म के लम्बरदार होंगे?

संजय बेंगाणी said...

आज फिर विभाजन के दोराहे पर देश खड़ा है, गनीमत सिर्फ इतनी है की कोई गाँधी जैसा बड़ा नेता नहीं जिसके पीछे सारा देश चले. विभाजन नहीं होने दिया जाएगा.

Ghost Buster said...

यही सच्चा चेहरा है इनका. बढ़िया पोस्ट.

रंजन said...

बिना सोचे जो चाहा बोल (बक़) दिया.. इनको तो तुरंत हटाना चाहिये..

masijeevi said...

जब सारा वातावरण अफवाहों और उन्‍माद से विषाक्‍त हो ऐसे में पूरे संदर्भ के साथ बात कहना उचित रहता। मैं इस बयान से और उसके संदर्भ से अपरिचित हूँ किंतु मशीरुल हसन लंपटई या धर्मान्‍धता के लिए नहीं वरन विवेक व विद्वता के लिए जाने जाते हैं। अनेक बसर वे मुसिलम कटृटरपंथियों के निशाने पर रहे हैं इसलिए एक पूरे विश्‍वविद्यालय को मटिया न दें।

यूँ भी आपका क्‍या कहना है कि क्‍या इन आतंकवादियों को कानूनी उपचार न दिए जाएं। मुकदमा न चलाऍं, वकील न करने दें, तफ्तीश भी रहने दें। सीधा फॉंसी चढ़ा दें, या गर्दन उड़वा दें- हममें और तालीबानों में कोई अंतर छोडें कि नहीं।

अशोक पाण्डेय said...

सतीश जी, आपने सही नब्‍ज पकड़ी है, साधुवाद।

कुलीन वर्ग इतना सुविधाभोगी हो जाता है कि सुविधाओं के आगे उसके लिए राष्‍ट्रप्रेम व इंसानियत जैसी भावनाएं मायने नहीं रखतीं। इसीलिए वह आमजन को धर्म, जाति, क्षेत्र आदि के विचारों में उलझाकर तंत्र पर अपनी पकड़ जमाए रहने की सतत कोशिश में रहता है।

इसी कुलीन वर्ग ने सत्‍तालिप्‍सा में देश का बंटवारा कराया और जनतंत्र में जनभाषा की उपेक्षा कर उसे कुलीनतंत्र में बदल दिया। यही वर्ग आज भी अपनी चौधराहट कायम रखने के लिए धर्म और जाति की सियासत कर रहा है।

अनूप शुक्ल said...

एक वी.सी. अगर अपने विश्वविद्यालय के बच्चों को कानूनी सहायता प्रदान करने के लिये कहता है तो इसमें कौन सा देशद्रोह है भाई!

सतीश पंचम said...

मसिजीवीजी , मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि सीधे फांसी पर चढा दे या कानूनी प्रक्रिया को पूरा न करें....वह सब तो अपनी जगह होता ही रहेगा....लेकिन बात यहां उस मानसिकता की हो रही है जिसने आज देश को लपेटे मे ले लिया है.......चाहे कोई कितना भी बडा अपराध क्यों न कर ले उसे लगता है वो बच जायगा...यहाँ कानून का इस्तेमाल अपने अनुचित कामों को पूरा करने के लिये किया जाता है.....यहाँ आजादी का मतलब ही जब कहीं भी कुछ भी करने के लिये आजाद अर्थ से माना जाने लगा है तो एसे में क्या तालिबान और क्या भारत......ईन सब बातों को ध्यान मे रखे और वीसी के बयान को ध्यान मे रखे तो आपको पूरी पोस्ट का निहितार्थ आसानी से समझ में आ सकता है। मेरी ओर से कोई विश्वविद्यालय के उपर आक्षेप नहीं लगाया जा रहा बल्कि उस संस्थान बडे अधिकारी के बयान पर आपत्ति है जो कि इतना शीशे की तरह साफ मामले को देखते सुनते हुए भी कह रहे हैं कि कानूनी मदद अपने उन लडकों को देंगे जिन्होंने इतने लोगों को मारा है, रही बात संदर्भ की तो - यह प्रश्न पूछा गया था पंकज पचौरी की ओर से कि क्या यह उचित होगा कि जामिया अपने स्टूडेंट्स को जिनपर की इतने लोगों को मारने का आरोप है...उनको डिफेंड करे। तब वीसी ने जवाब दिया था कि हम जरूर डिफेंड करेंगे...आखिर वो हमारे ही संस्थान के बच्चे हैं....वैसे पूरे टेप तो एनडीटीवी ही दिखा सकता है।

Suresh Chiplunkar said...

सेकुलरों की तो निकल पड़ी… चलो सभी लोग उनका साथ दो भाईयों, पहले निचली कोर्ट मे, फ़िर हाई कोर्ट में, फ़िर सुप्रीम कोर्ट में, यदि सुप्रीम कोर्ट फ़ाँसी भी दे दे तब भी राष्ट्रपति तो सेकुलर है ही, वहाँ बचा लेंगे, तब तक 8-10 साल निकल ही जायेंगे, इस बीच में 100-200 बम विस्फ़ोट और हो जायेंगे तब किसे याद रहेगा न जामिया, न मिलिया, न इस्लामिया… जय हो सेकुलरवाद की…

PD said...

क्या कहें ऐसी मानसिकता पर?

रौशन said...

हसन साहब ने ऐसा कुछ नही कहा है जिसपे इतना भड़का जाय. उन्होंने कानूनी सहायता की बात कही है जो क ख़ुद कोर्ट का भी जिम्मा था. उन्होंने किसी बात का समर्थन न करके सिर्फ़ एक विश्विद्यालय के कुलपति की भूमिका निभाई है.
भाइयों ये हिंदुस्तान है कानून का राज चलना चाहिए. भावनाओं का नही. ये आतंकवादी भावनाओं के उफान की ही फसल काटते हैं. हमें यकीन है की वो गुनाह गार हैं तो कोर्ट को भी यकीन के साथ कहने का मौका दीजिये और उन्हें सफाई का मौका भी मिलना चाहिए. बस जरा केस तेज चले.
हसन साहब को इस तार्किक निर्णय के लिए बधाई.

सतीश पंचम said...

रौशनजी मैं तार्किक फैसले लेने की कद्र करता हूँ लेकिन केवल तर्क के नाम पर अंधसमर्थन का हिमायती नही हूँ.....जब पंकज पचौरी और रवीश से वीसी की बातचीत चल रही थी तो वीसी का कहना था कि ये सोलह-सत्रह साल के बच्चे हैं इनपर इतना ज्यादा कहना या हो हल्ला करना कुछ ठीक नही लग रहा है...तब पंकज ने ही विस्तार से बताया कि फलां की उम्र चौबीस है और उसकी छब्बीस....यानि वीसी किसी भी हालत में अठारह साल की जद से बचते हुए बोले ताकि कुछ संभल कर कहा जा सके.....दूसरी ओर मैं भी कभी नहीं चाहूँगा कि किसी को भी बिना मुकदमा चलाये सजा दे दी जाय....लेकिन एक वरिष्ठ व्यक्ति के द्वारा आतंकवादियों को कानूनी सहायता देने की बात कहने से क्या संदेश जाता है समाज में, उसका भी ख्याल रखना चाहिये था......कल को और आतंकवादी पैदा होंगे और उम्मीद करेंगे कि हमारे हक में हमारे संचालक को बोलना ही चाहिये क्योंकि हम उनके संस्था के हैं... तब ? हर फैसला तात्कालिक असर को ही देखकर नही करना चाहिये....उसके दूरगामी परिणामों को भी देखते हुए फैसला करना चाहिये।

मुनीश ( munish ) said...

HIGHLY DEPLORABLE , SHAMEFUL AND CONDEMNABLE COMMENTS FROM AN ACADEMICIAN OF HIGH STATURE . FIE! DHIKKAR HAI!!

राज भाटिय़ा said...

हमारी सरकार को क्या यह सब नही सुनाई देता, क्या उसे यह सब नही दिखता,अभी भी वक्त हे , फ़िर ....
धन्यवाद

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