
सामुज यादव ने जब से सुना है कि बाँस के बने अंडरवियर बाजार में आ गये हैं तब से सोच रहे हैं कि लोग उसे पहनते कैसे होंगे.....चुभता तो होगा ही....बाँस जो ठहरा। आम के पेड के नीचे बैठे रहर की सीखचों से खाँची (टोकरी) बनाते सामुज के मन में रह-रह कर यह सवाल आ रहा था....कहें तो कहें किससे.....सभी अपने काम में व्यस्त....कडेदीन अपने खेतों में रहर बो रहे हैं......फिरतू चमार आज रामलखन केवट के यहाँ जुताई कर रहे हैं......मन की बात कहूँ तो कहूँ किससे। तभी साईकिल से आते मास्टर लालराम प्रजापति दिखाई पडे। दूर से ही सामुज बोले - अरे कहाँ जान दे रहे हैं ई भरी दुपहरीया में....क्या करेंगे इतना रूपया कमाकर। मास्टर ने सामुज की बात को अपने से बातचीत करने का न्योता समझ अपनी साईकिल सीधे आम के पेड के नीचे ले आये। साईकिल से उतरते हुए कहा......अरे तुम्हारी तरह आम के पेड के नीचे बैठ खाँची बनाने जैसा आरामदेह काम थोडे है कि बस....हाथ और मुँह चलाते रहो बाकी सब काम होते रहे। अरे तो आप भी तो वही करते हैं - मुँह - हाथ चलाते हैं.....कोई लडका सैतानी किया तो बस हाथ की कौन कहे कभी-कभी पैर भी चलाने लगते हैं - सामुज ने हँसते हुए कहा।
मास्टर सिर्फ सिर हिलाकर हँसते रहे और साथ ही साथ साईकिल को पेड के तने से सटा कर खडा भी कर दिया।
सामुज ने धीरे-धीरे बात को मोडते आखिर पूछ ही लिया - अच्छा ये बताओ मास्टर - कि लोग बाँस की बनी अंडरवियर कैसे पहनते होंगे।
बाँस की बनी अंडरवियर ? मास्टर के मन में जिज्ञासा जगी कि ये क्या कह रहे हैं सामुज यादव, भला बाँस का भी अंडरवियर होता है कभी...पूछ ही लिया.....ये किसने कह दिया तुमसे कि बाँस का अंडरवियर होता है। सामुज ने फट से वो अखबारी कागज निकालकर दिखाया जो हवा से उडते-खिसकते उसी पेड के नीचे आ पहुँचा था जहाँ वो खाँची बना रहे थे- लिखा था - लंदन में बाँस के रेशों से बनी इकोफ्रेंडली अंडरवियर बनी है जो कि लगभग तीस पाउंड की है.....। मास्टर ने पहले तो उस धूल-धूसरित कागज को ध्यान से देखा.....फिर कुछ सोचने की मुद्रा बनाई और कहा - इकोफ्रेडली माने - पर्यावरण का मित्र.....तीस पाउंड माने केतना होता है कि......एक गुडे अस्सी माने अस्सी गुडे तीस....माने चौबीस सौ.....यानि अढाई हजार का अंडरवियर.........। हाँ तो सामुज वो अंडरवियर अढाई हजार का है और उससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचता......यही लिखा है इस कागज पर....। तो क्या हम लोग जो पहनते हैं उससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है क्या......ये नई बात सुन रहा हूँ......। मास्टर भी सोच में पड गये कि बात तो ठीक ही पूछी है.......वो जो सन्नी देओल आकर कहता है......चड्डी पहन कर चलो और न जाने क्या-क्या तो ईसका मतलब सब पर्यावरण के खिलाफ ही बोल रहा है क्या, कहीं ये अमीरों के चोंचले तो नहीं हैं। सामुज बोले - अरे अढाई हजार की चड्डी कौन पहने......और फिर हम तो वो हैं कि पट्टेदार नीली चड्डी पहनते है..........शकील मिंया की दर्जियाने में दस रूपये में सिला ली......नाप ओप का झंझट नहीं........सालों से जानते है कि मेरा साईज क्या है.....पहनने में भी आसान, खुला और हवादार। मास्टर बोले - अब खुला और हवादार का बखान मत करो मेरे सामने......उस दिन देख रहा था यहीं इसी पेड के नीचे तुम्हारी आंख लग गई थी......तुम्हारी धोती जरा सा बगल में क्या खसकी......गाँव के लडकों को मानों कोई खेलने का सामान मिल गया........सब तुम्हारी खुले मोहडे वाली चड्डी में देख-देख हँस रहे थे और तुम बेफिक्र सो रहे थे। लडके छोटे-छोटे पत्थर तुम्हारे उस खुले स्थान पर फेंक रहे थे। वो खदेरन का लडका दग्गू एक पतली लकडी से तुम्हारे चड्डी में कोंच न लगाता तो तुम उठते भी नहीं, सोये ही रहते। सामुज ने हँसते हुए कहा - अरे तो लडके हैं अब शरारत नहीं करेंगे तो कब करेंगे। और जहाँ तक पर्यावरण प्रेमी की बात है तो मैं तो खुले और हवादार में होना पसंद करूँगा वही सबसे ज्यादा ठीक लग रहा है। तो इस मायने में तो वो अंगरेज लोग ज्यादा ही पर्यावरण प्रेमी होंगे जो चाहे समुदर हो या नदी फट से ओपन हो जाते हैं - मास्टर ने हँसते हुए ही कहा। तभी झिंगुरी सिर पर बोझा लिये आते दिखे.......मास्टर ने कहा वो देखो कितना बडा पर्यावरण प्रेमी आ रहा है.......आज तक कभी इसने धोती के अंदर चड्डी नहीं पहनी.......अढाई हजार की कौन कहे अढाई रूपये का भी खर्चा नहीं है इस पर्यावरण प्रेम में......न रहे बाँस और न बजे बाँसुरी :)
- सतीश पंचम


14 Comments:
सही है!! :)
अढाई हजार की कौन कहे अढाई रूपये का भी खर्चा नहीं है इस पर्यावरण प्रेम में......न रहे बाँस और न बजे बाँसुरी :)
बहुत अच्छा लिखा है भाई।
सुंदर | इस पर्यावरण प्रेम और स्विमवियर का अरबों डालर का बिज़नस है पश्चिम में |
सुबह - सुबह मजा आ गया.. सुन्दर
धोती के अंदर चड्डी नहीं पहनी..कितना बडा पर्यावरण प्रेमी ???सही पैमाने है गुरुवर...छा गये
bahut rochak laga...
बहुत रोचक लेख है।अच्छा लगा।
सादर ब्लॉगस्ते!
कृपया निमंत्रण स्वीकारें व अपुन के ब्लॉग सुमित के तडके (गद्य) पर पधारें। "एक पत्र आतंकवादियों के नाम" आपकी अमूल्य टिप्पणी हेतु प्रतीक्षारत है।
यहां पर्यावरण प्रेम मजबूरी है और वहां यह अरबों का व्यापार है!
सही लिखा!
इतनी सुंदर रचना के लिए आपको बधाई ! भाषा में कमाल की मिठास है !
धन्यवाद !
भाई सतीश पंचम जी आज तो आप ताऊ की प्रणाम ले लो !
क्या लिखते हो आप ? मजा आजाता है ! ताऊ तो आपका
फैन हो गया ! बहुत शुभकामनाएं आपको !
अरे वाह आज आप का न्या रुप !!! बहुत ही सुन्दर मजा आ गया , बहुत ही सुन्दर( हम भी भारत की चड्डी ही ....
धन्यवाद
BHAI SATISH JI, GAON KE LOG AESE HI TO HOTE HAI. BILKUL THIK LIKHA HAI AAPNE.
मस्त लिखा है। मजा आ गया। ऐसी करारा व्यंग्य है कि आजकल के पर्यावरणविद तिलमिलाकर रह जाएंगे।
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