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Saturday, September 20, 2008

मुंबई लोकल में दिखा ऐक संताप (रेल वाकया)


कल लोकल ट्रेन में दो लडकों की बातचीत चल रही थी....किसी तीसरे के बारे में.....अरे वो तो कोसी रीवर की तरह है...किधर भी बहता है......जिधर नहीं बहने का उधर भी बहता है.....। सुनकर मेरी जिज्ञासा बढ गई ........ आखिर कोसी के रौद्र रूप को उदाहरण बनाया जा रहा था......तभी एक ने कहा- साला कभी संगीता के पीछे पडता है कभी मनीषा के पीछे......और कभी तो रिया को भी चाय-बी पिलाते रहता है। साले को किसके पीछे पडने का येईच नहीं मालूम। उन लोगों की बातचीत सुनकर आप भी समझ गये होंगे कि आखिर बातचीत की धार किस तरफ चल रही थी । तब तक दूसरे ने कहा - अरे उसको मैं बोला - सीधे से एक को पकड....शादी बना डाल.....लेकिन येडे को अकल नहीं माँ के दीने को.....। और दोनों हंसने लगे.....लग रहा था वही हैं.....दूसरों के होने न होने से उन्हें कोई फर्क नही पडता.....। अभी ये सिलसिला चल ही रहा था कि टिकट चेकर आ गया.....इधर ईन दोनों का हँसना-खिलखिलाना चल ही रहा था। टीसी ने टिकट मांगा तो दोंनों ने आराम से अपने अपने पैंट की पिछली जेब में हाथ डाल कर पर्स निकाला और उसमें रखे मन्थली पास को आगे किया। टीसी ने एक नजर उनके पास पर डाली और आगे बढ गया। दोनों वापस अपनी उसी मुद्रा में आ गये.....कोसी की धारा अब भी उनके मुख से बीच-बीच मे फूट पडती । उनके हँसी-ठिठोली को जारी देख एक बूढा पास आया और बोला....तमारे को कोसी नाम में मज्जा लगता ऐ......उधर ईतना लोग का घर बार गिरेला है अन तमे मज्जा आवी ने....शेम ऑन यू डीकरा.......अरे कबी तो सिरियस होने का.....। बूढे का इस तरह बोलना कुछ ऐसा असर कर गया कि दोनों चुप हो गये और लोग उत्सुक हो देखने लगे कि देखें आगे क्या बोलता है बूढा। लेकिन वो बूढा कुछ नहीं बोला। उठकर ईन लोगों के पास आ जाने के कारण अब उस बूढे की सीट पर कोई दूसरा बैठ गया था। बूढा वहीं पास ही एक जगह खडा रहा। अब जो शख्स उस बूढे की सीट पर बैठ गया था वह उठा और उसने कहा - अंकल बैठ जाओ......। लेकिन बूढा बाहर की ओर देखता रहा....रेल अपनी उसी रफ्तार से जा रही थी......। अगला स्टेशन आया....और बूढा उतर गया। तभी उन दोनों छोकरों में से एक बोला......लगता है सरक गएला है........। दूसरा बोला - देख ना यार.....कुछ जान पेचान नहीं.....तू कौन.......मैं कौन.......खाली पीली आ के सुना डाला। अगले स्टेशन पर वो दोनों भी उतर गये.....और मैं सोचता रहा......उस बूढे के बारे में जो बिहार में आई बाढ की त्रासदी पर मजाक बर्दाश्त न कर सका.....उन लडकों के शब्द अब भी कानों में गूँज रहे थे........लगता है सरक गएला है।



- सतीश पंचम

12 comments:

PD said...

यह पोस्ट बता रहा है कि हमारी भावनाऐं-संवेदनाऐं किधर गई हैं..

ताऊ रामपुरिया said...

लगता है सरक गएला है।

लगता है अभी भी सरके हुए हैं जिनको मानवता का दर्द
महसूस होता है ! धन्यवाद भाई आपके चिर परिचित
अंदाज में इतनी सटीक बात लिखने के लिए !

Sarvesh said...

bhai jee jab Jug suraiya jaisa padha likha aadmi Times Of India me behuda cartoon daal sakta hai to wo to sarka hua insaan the. Jug Suraiya jee ne ek cartoon publish kiya tha ToI me jisme baadh aate hi bikni pahni hui baalaayen aur chaddhi me baalak skiing kar rahe hain aur pidit unako paani ke bhitar se dekh kar rahe hain.

Waise aapka ye lekh ye bhi ujagar karta hai ki log apani local samasyayon ke baare me jyada sochate hain. Unake liye Bihar ka Baadh aur America ke Katrina me jyada farak nahi hai.

डॉ .अनुराग said...

लोग अपनी निजी त्रासदियों से बाहर नही आते है अब ...

Gyandutt Pandey said...

दुखद। कोसी सरकी तो सरकी, ये सारी पीढ़ी सरक गयेली है। :-(

rohit said...

bihariyo ke liye badhiya vicar rakhne ke liye aapko dhanayabad.

अशोक पाण्डेय said...

हमारी संवेदनाएं मर रही हैं। अपना सुख-दुख ही सबकुछ है, दूसरों की पीड़ा मायने नहीं रखती।

जितेन्द़ भगत said...

दो पीढि‍यों का अंतर और आज के जवानों में मरती संवेदना का संजीदगी से खुलासा कि‍या गया है। बहुत मर्मस्‍पर्शी लगी आपकी ये पोस्‍ट मुझे।

Udan Tashtari said...

बिल्कुल सही--संवेदनाऐं जाने कहाँ खो गई!!!

Anil Pusadkar said...

yehi to taqlif hai satish bhai,jo sarak gayele hain unhe sare sarke nazar aa rahe hain. bahut sateek likha aapne ye hai humare desh ke bhavi karndhar

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर, आज के युग मे हमारी भावनाऐं-संवेदनाऐं हे ही नही बस हम हे हम
धन्यवाद आप का लेख पढ कर आंखे भर आई

बालसुब्रमण्यम said...

सब अपने अपने में मस्त हैं। कोसी में बाढ़ आए, कश्मीर में भूकंप किसको चिंता है।

बंबैया हिंदी का बढ़िया नमूना पेश किया है आपने। गुजरात मेल से सफर करते हुए मैंने भी इस शैली की हिंदी को खूब सुना है। बड़ी व्यंजक होती है यह शैली। हिंदी की विलक्षण अभिव्यक्ति क्षमता का यह एक और प्रमाण है।

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