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Thursday 18 September 2008

टीवी पर दिखे टोटके से परेशान बूधन महतो (फुरहरी)


आम के पेड के नीचे बैठे बूधन महतो अपनी जाँघ पर सुतली को बर(मरोड) रहे थे जिस्से रस्सी बना सकें, कि तभी खदेरन और झिंगुरी हल बैल लेकर जाते हुए दिखे..... इतनी दोपहरीया में ई लोग कहाँ जोताई करने जा रहे हैं जबकि गर्म लूह और तपिश के मारे बाहर मुँह निकालने में पतँग पडी है। बूधन महतो ने दूर से ही पूछा - कहाँ जा रहे हो जोडी-पाडी मिलकर। पेड की छाँह देख पास आते झिंगुरी ने कहा- देख नहीं रहे हो....हल-बैल लेकर जा रहे हैं तो खेत में ही जा रहे हैं......कहीं कोई ईनार-कुआँ खोदने थोडे जा रहे हैं....हल लेकर। अरे तो कोई टैम होता है हल जोतने का.........सभी किसान लोग सुबह ठंडे-ठंडे जोत लेते हैं कि बैलों को भी आराम रहे....औऱ खुद भी बीमार होने से बचें.......नहीं तो सीत-घाम .......ठंडी-गर्मी......मार डालेगी कि जीने देगी.......आये हो बडे हल जोतुआ - बूधन महतो ने कुछ नाराजगी भरे स्वर ने कहा। खदेरन ने कहा - टैम देखकर ही तो जोताई करने निकले हैं.....अभी-अभी राहु खतम हुआ है.....सो चल पडे हल बैल लेकर। राहु खतम हो गया है.....कब.....कैसे......अभी कल ही तो साईकिल से अपने मामा के यहाँ जा रहा था- बूधन महतो ने कुछ अचरज भरे स्वर में कहा। झिंगुरी बोले - अरे उ राहुला बनिया नहीं.......आप को तो केवल राहुल नाम के बनिये का पता है सो लगे हो राहु ......राहु जपने.........राहु माने गिरह....नछत्र वाला राहु.....उ राहु जब होता है तो कोई ढंग का काम नहीं करना चाहिये....देख नहीं रहे.....बडे बडे नेता लोग भी अब राहु को बचा कर चलते हैं......पाटी का कारकरम हो तो उसे भी जोतखी और ओझा-सोखा से समय ज्ञान लेकर करते है। बूधन महतो बोले - समय ज्ञान लेकर ......इ कौन नया परपंच है भाई। ........आज तक तो नहीं सुना था। झिंगुरी ने कहा - अरे कैसे सुनोगे.....खुद तो कभी टीबी-फीबी देखते नहीं हो.......अरे बंगलोर नाम का कोई जगह है जहाँ भाजपा पाटी का कोई कारकरम है......सब लोग बता रहे हैं कि टोटका-ओटका खुब हुआ है......मँच की दिसा बदल दी गई है.........झँडे मे कमल का रंग पीला कर दिया है और समय को ध्यान मे रखकर कहा गया कि कौन कब बोलेगा.......कौन कब बोलेगा। अब खदेरन ने मोर्चा संभालते हुए कहा - अरे जब ऐतना बडमनई लोग समय दिसा का ईतना ख्याल रखते है तो हम लोगों को तो रखना ही चाहिये.......क्या कहते हो । बूधन महतो ने मुस्की मारते कहा - जहाँ तक समय दिसा की बात कर रहे हो तो एक बात जान लो......हम आजतक केवल दिसा उसा का ख्याल किये हैं तो केवल दिसा मैदान के समय........और सच कहूँ तो तुम भी ईस खटकरम मे काहें अपना बखत खराब कर रहे हो........अरे ई कुल टीम-टाम......गिरह.......नछत्र उन लोगन के लिये है जिनके पास कौनो काम नहीं है......जिनके पास बहुत टाईम ओईम है, उनके लिये है...........तुम लोग कहाँ इन लोगों के चक्कर मे पड रहे हो। कल को कहेंगे कि समय ठीक नहीं है.......फलाना नछत्र चल रहा है........बोवाई चार दिन बाद करो तो क्या तुम उनका कहा करोगे कि अपना काम करोगे... बरखा-बूनी तो कौनो टैम-टूम देखकर तो नहीं बरसेंगे, ...........लडिका - बच्चा कल जब रोटी मांगेगे.....तब क्या कहोगे कि नछत्र ठीक नहीं था ईसलिये समय पर बोवाई न हो सकी, अरे जाओ......सुकर मनाओ कि अभी थोडा ही गदहा खेत खाया है.....कल को बाढ राहत का सामान भी गिरह-नछत्र देख कर बंटेगा .....खदेरन और झिंगुरी केवल सिर हिलाने का काम कर रहे थे कि तभी कोई राही अपनी साईकिल पर जाता दिखाई दिया,धूप और लू से बचने के लिय़े अपने सिर और मुँह को कपडों से कसकर बाँधे हुए, बगल में रेडियो लटकाए अपने में ही मगन वह राही चला जा रहा था......रेडियो पर कोई फिल्मी गीत बज रहा था.... तोहे राहु लागे बैरी, मुस्काये है जी जलायके......। खदेरन ने झिंगुरी से कहा....तो क्या कहते हो....चलें वापस....हल लेकर घर से आ रहा था तो दग्गू की माई भी कुछ ऐसा ही गा रही थी..... मोरा गोरा अंग लेई ले :)

- सतीश पंचम

7 Comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

बहुत सुंदर और सच्ची सीख देती कथा।

Udan Tashtari said...

बेहतरीन कथा:

मोरा गोरा अंग लेई ले :)

-प्राण ले लोगे क्या, महाराज!!

Gyandutt Pandey said...

खदेरन, चिखुरी, बूधन, राहू, गरह-नखत ... भैया अंग्रेजियत ने सब दूर कर दिया था। आपके ब्लॉग ने उनसे जोड़ दिया।

ताऊ रामपुरिया said...

तोहे राहु लागे बैरी, मुस्काये है जी जलायके......।

भाई बहुत ओरीजिनल ...!

राज भाटिय़ा said...

एक उम्दा ओर सुन्दर कहानी शिक्षा प्रद... मजा आ गया गीत के बोल पढ कर.
धन्यवाद

डॉ .अनुराग said...

bas aaj to padh liya hai bhai....guruvar ne comment kar hi diye hai.

भवेश झा said...

bas comment dene se rah nai paya, dhnyabad...

बातें, जो जाने की जल्दी मचा रही हैं.....

कुछ बातें जल्दी मचाती हैं कि मैं जा रही हूँ......मैं न रूकूंगी। समय भी उन्हें ऐसा करने के लिये उकसाता रहता है कि कह दो कि देर हो रही है.......बहुत रूक लिये......हम जा रही हैं........अब न रूकेंगी.............ऐसी ही बातों को देखने पढने के लिये इस राह से गुजर सकते हैं जहां समय को एकबारगी धकियाया जा सकता है कि समय तुम बीत गये तो क्या हुआ ? ठहरने की सांकल तो अब भी खटखटायी जा सकती है......

ऐसी ही बीते-अनबीते पलों को इन लिंक्स के जरिये देखा जा सकता है ।

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