
चिखुरी की पतोहू ने एक साडी क्या बदल कर पहनी, सास कह रही थी क्या खुद को गृहमंत्री समझती है जो बार-बार कपडे बदल रही है। चिखुरी को भी बडा अजीब लग रहा था कि आखिर जब घर में ही है तो बार-बार कपडे बदलने का क्या तुक......ईधर चिखुरी का बेटा सोभई अलग नाराज कि एक साडी ही तो बदल कर पहनी है, उसमें इतना बवाल करने की क्या जरूरत है, लोग गृहमंत्री होने का ताना अलग दे रहे हैं। लेकिन हाय रे कौवा-मझान, पतोहू के बारे में कोई नहीं सोच रहा कि वो क्या सोच रही है, उसके मन में क्या चल रहा है......सब उसी को कह रहे हैं कि क्यों गृहमंत्री के तरह बार-बार कपडे बदल रही है, यह नहीं देखते कि झिंगुरी की पतोहू दिन में चार बार सीसा-कंघी लेकर दरवाजे पर जा बैठती है, ओठलाली लगाती है, रह-रहकर एक नरम रूई जैसी गद्दी से गले पर पौडर की फुहार करती है, उसे कोई कुछ नहीं कहता, सब उसे ही क्यों कह रहे है.......वो रामदीन की बिटिया.......ब्याह हो गया......पति बाहर देस कमा रहा है......लेकिन खुद नैहर में टीप-टाप से रहती है.....क्या मजाल जो एक दिन बिना ओठलाली लगाये दिख जाय, बिसाती आता है चूडी-कंघा लेकर तो घंटो मोल-भाव करेगी, यह कितने का.....वह कितने का.....हँस-हँसकर उससे बतियाएगी.....चूडी लेगी तो उसमें भी चार घंटा लगा देगी......वह सब किसी को नहीं दीख रहा है.....और वो फाफामऊ वाली छोटकी पतोहू.....दिन मे चार बार कहेगी कि मुन्ना ने गीला कर दिया इसलिये कपडे बदल रही हूँ......कह लो......मैं भी कभी यही कहकर मन की अहक पूरी करती थी, आज बच्चे बडे हो गये तो क्या.....अपनी साध पूरी करने के लिये मैं बच्चों के नाम का सहारा क्यों लूँ.....मैं तो खुलेआम दिन मे चार बार कपडे बदलूँगी....देखती हूँ कोई क्या कहता है......अरे यही तो दिन है मेरे, अब न पहनूँगी तो कब पहनूँगी......बुढौती में गृहमंत्री कपडे बार-बार बदलकर पहन सकते हैं तो मैं क्यों नहीं, आखिर मैं भी तो आज न सही कभी तो सास-ससुर के बाद गृहमंत्री बनूँगी ही.....तब आज ही क्यों न अहक पूरी कर लूँ.....फिर कल को क्या पता सरकार ही बदल जाय.....और गृह मंत्रालय छिन जाय, छोटा देवर भी तो आजकल अपने माँ-बाप का दुलारा बना फिर रहा है। अभी पतोहू यह सब सोच ही रही थी कि पतोहू के बडे बेटे ने आकर कहा - अम्मा भूख लगी है....खाना दो। पतोहू के मन मे तूफान मचा था और इधर ये नासपीटा खाना मांग रहा है.....भभककर कहा - क्या खाना-खाना लगा रखा है.....अभी तो दिया था ईतनी जल्दी भूख लग गई......पेट है कि मडार.....भरता ही नहीं है। बेटा अवाक्.....कहे तो क्या कहे.......सुबह को खाया था......अब जाकर शाम को माँग रहा है......उसपर भी दुर-दुर हो रही है......कहा - कहाँ अम्मा, सुबह दिया था......उसके बाद नहीं......। बाहर चिखुरी बैठे सुन रहे थे.....कहा - कैसे देगी.....कपडे बदलने से फुरसत मिले तब न........अरे जब ईसका बाप मेरे यहाँ रिस्ता लेकर आया था.....तभी मना कर दिया होता तो काहे को ईतना भोगना पडता........गृहमंत्री बनी फिर रही है........। सास क्यों चुप रहती......वह भी मैदान मे कूद पडी - अरे गृहमंत्री भी ईतने तेजी से कपडे नहीं बदलते जितना तेजी से ये छछन्न करती है......अभी कोई साडी वाला बिसाती आ जाय तो देखो......एक पैर पर दौडी चली जाय.....यहाँ लडका भूख से मर रहा है उसकी फिकर नहीं है.......इंतजार कर रही है बिहार के उस नेता की तरह .......फीता काट कर घाटन करे तब जाकर भोजन दे......कुलअच्छिनी कहीं की। अभी यह सब चल ही रहा था कि बाहर बर्फ गोले वाला आया.......बेटे ने खाना छोड बर्फ का गोला लेने की दौड लगाई......ईधर चिखुरी को किसी ने आकर कहा......सरपंच बुलाये है.....कोटा पर मिट्टी का तेल आया है जल्दी पहूँचो नही खत्म हो जायगा......सास ने सुनते ही दौड लगाई कि वह मिट्टी के तेल वाला डब्बा ढूँढ लूँ........नहीं मिलते-मिलते तेल ही न खत्म हो जाय........उधर पतोहू मन ही मन कह रही थी..........अब तक तो आराम से दिन मे एक दो साडी बदल लेती थी ......कोई कुछ कहता भी था तो दूसरे को लगाकर कहता......अब तो खुलेआम कह देते हैं........क्यों गृहमंत्री की तरह बार-बार कपडे बदल रही हो, गृहमंत्री भी तो जितेन्द्र की तरह सफेद जूते पहन कर ईठलाते रहते हैं......हाय ये बुढापा जो न कराये.......बार-बार कपडे बदलो, कंघी करो, सफेद जूते पहनों....लोग मर रहे हों तो अपनी साध पूरी करो कि मैं तो साफ सुथरा रहना पसंद करता हूँ.....अरे बात गाँधी की करोगे लेकिन भूल जाते हो कि उन्होंने एक धोती के सिवा कुछ और पहनना ईसलिये स्वीकार नहीं किया कि मेरे देश के लोगों को कपडा नहीं मिल पा रहा तो मैं क्यों ढेर सारा कपडा पहनूँ....अब कभी गाँधी की मूर्ति के आगे से गुजरना तो मन में यह जरूर सोचना कि वह आदमी सिर्फ धोती क्यों पहने है....लेकिन तुम जैसे लोगों में अब सोचने की शक्ति ही कहाँ रही....सारी शक्ति तो कपडों की खूबी में समाई है.....लानत है तुम जैसे लोगों पर...........और आखरी बात सुन लो.....दो अक्टूबर नजदीक ही है....हम सभी देखना चाहेंगे....कि तुम उस दिन गांधीजी की प्रतिमा पर जब सभी सांसदों के साथ फूल मालाएं अर्पण करोंगे तो उस समय तुम्हारे मन में क्या चल रहा होगा.......तुम्हारे हावभाव कैसे होंगे.....दो अक्टूबर...नजदीक ही है।
- सतीश पंचम


6 Comments:
दो अक्टूबर दूर नहीं.. :)
मगर है गहरा कटाक्ष!!
सतीश जी हमेशा की तरह बेहतरीन और शान दार रचना !
धन्यवाद !
चलो एक नाम तो आया गृहमन्त्री के लिये - चिखुरी बहु!
बड़ा मस्त लिखा है।
हाय रे दो अक्टूबर.....एक ओर झकास लेख...
इंतजार है हमें भी दो अक्टूबर का!
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