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Wednesday, September 10, 2008

खेत की मेड और प्रलय चर्चा (फुरहरी)


खेत की मेड पर रामधन पाल और झिंगुरी यादव के बीच उस मशीन की देसी ढंग से जमकर चर्चा हो रही थी जिससे प्रलय आने की संभावना है। झिंगुरी ने मेड पर उकडूँ बैठे हुए कहा - अब देखिये पालजी .... ई जो बुधई अपने खेत की सीमा दिखाने के लिये लेखपाल से पत्थर नसब करवाये हैं, अब वो किस काम का रहा....प्रलय आने के बाद.... क्या पत्थर..... क्या पानी, सब बराबर। पाल ने हुमकते हुए कहा - सही कह रहे हो भईया......अब जब प्रलय आ ही जायेगी तो क्या करेंगे कानूनगो.......क्या करेंगे लेखपाल और क्या करेंगे तहसीलदार.........सब के सब देखना वहीं टंगे मिलेंगे - बरम बाबा के पास। तभी दोनों ने देखा पंडित केवडा प्रसाद जल्दी-जल्दी कहीं जा रहे हैं, झिंगुरी ने भेदिया मुस्की मारते हुए कहा - जब से ई प्रलय मशीन के बारे में टीवी पर दिखाया जाने लगा है, पंडित जी की तो बन आई है....हर कोई को कथा सुनाते फिर रहे हैं और खूब बटोर रहे हैं दान-दक्षिणा। यहाँ तक कि दूसरी जाति की पतोहू लाने के लिये जाति बाहर किये गये संकठा के यहाँ भी कथा बाँच आये हैं, कह रहे थे- परासचित कर लो दान ओन देकर, सब चलता है.......हमहूँ सोच रहे हैं चन्नन टीका लगा के एक पोथी बगल में दबा के पंडित बन जांय। रामधन पाल ने कुछ रूक कर कहा - अरे तुम कहाँ रंगा सियार बनने की बात कर रहे हो, रंगे सियार तो बने हैं अपने टीवी वाले, ससुरे जान खा गये हैं कि प्रलय मशीन आ गई है, बन गई है.....और बलेक होल न जाने क्या-क्या बनाएगी, अरे हम पूछते हैं.....जब प्रलय की तुमको ईतनी ही असंका होती तो अपना कैमरा-कुमरा छोड-छाडकर पहले ही भाग खडे होते, ईहाँ बताने के लिये थोडी रूके होते कि भागो मशीन चालू हो गई है, प्रलय आ गई है.......अरे धाय-धाय कहे जा रहे हैं कि प्रलय मशीन दुनिया की सबसे बडी मशीन है, ये है,वो है..........हम तो कहते हैं कि सबसे बडी मशीन कौनो अगर है तो वह है आदमी का पेट, न जाने कितने सालों तक उसे भरा जा रहा है, लेकिन मजाल है जो कभी भरा हो.......खेत के खेत उसी पेट में चले जा रहे हैं, बाग-बगइचा, हल फाल और न जाने क्या-क्या उसी पेट में समा गया, लेकिन कहीं कोई उस मशीन की चर्चा नहीं कर रहा है। इतने मे चिखुरी गोसाईं आते दिखे........ईन दोनो को खेत की मेड पर बैठकर चर्चा करते देख उन्हीं के पास बढ आये......कहो चिखुरी दादा कहाँ से - पाल ने दूर से ही पूछ लिया। चिखुरी ने पास आते कहा- बस यहीं नंदलाल साह की दुकान से आ रहा हूँ , जरा बैलों के लिये पगहा लेने गय़ा था, कल रात गोलूआ बरधा पगहा तुडा लिया था.......वहाँ नंदलाल साह के यहाँ गया तो क्या देखता हूँ कि फिरतु चमार, बिजेलाल कोंहार और जियालाल प्रधान टीबी पर प्रलय मशीन देखने में जुटे है.......मुझे देखते ही नंदलाल साह बोले.....अरे चिखुरी क्यों नाहक बैल बेचारे के लिये पगहा-उगहा का इंतजाम कर रहे हो.......देख नहीं रहे प्रलय आ रही है......छोड दो बैल को , जाए चरे खाये जो एक दो दिन का खाना बदा हो उस बैल के भाग में.........हम तो साफ बोल गये.....अरे ईतना ही प्रलय का डर है तो तुम क्यों नही अपने दुकान का सामान सेत में ही सबको बांट देते.....बिल्कुल फोकट..... तो जानते हो क्या कहा नंदलाल साह ने........कहा - हम तो बांट दें......लेकिन सब लोग नहीं लेंगे.......सब कह रहे हैं मरते बखत कौन एहसान लेकर मरे कि फोकट में सामान पाकर मरे है। झिंगुरी यादव ने कहा - अच्छा....तो नंदलाल साह भी आजकल बोली-ठोली बोलना सीख लिये हैं......लगता है दुकान अच्छी चल रही है....... पैसा मिल रहा हो तो सब की बोली बदल जाती है......चाहे टीवी चैनल हो या नंदलाल साह। तभी किसी ने कहा - अरे झिंगुरी चाचा.......गेनु लाला की भैंस आपके पोखरे वाले खेत में पड गई है.....जल्दी जाईये नहीं तो सारा खेत सफाचट् हो जायगा। झिंगुरी ने आव देखा न ताव झट भैंस को अपने खेत से बाहर निकालने दौड पडे, जाते जाते कहने लगे - हमारे लिये तो भईया अब ये भैंस ही प्रलय है, न पहूँचू तो अभी आधा खेत चर-चुर के साफ कर दे, रामधन पाल भी उठकर चल दिये कि जाकर खेत से चरी काट लाएं, चिखुरी दादा भी चल पडे कि बैलों को पगहा बाँध दूँ.........रह गया वो खेत की मेड पर नसब किया हुआ पत्थर........बिल्कुल शांत......मानो कह रहा हो......मैं प्रलय से ही जन्मा हूँ........प्रलय को देखकर............सबको सीमाएं बता रहा हूँ कि वो तुम्हारा खेत है......वो तुम्हारा.......लेकिन किसी को यदि उसकी सीमा नहीं बता पा रहा हूँ तो वह है मीडिया........न जाने उसकी सीमा होती भी है या नहीं।

- सतीश पंचम

10 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

प्रलय खबर दे कर नहीं आता। उस की खबर मिलती है। सुंदर आलेख।

जितेन्द़ भगत said...

बढि‍या लेख।

Anil Pusadkar said...

sateek aur bebak likha hai aapne. media jo kar raha woh wakai sharmanak hai.kabhi pralay,kabhi shani ka prakop ,to kabhi shukra ka,samacharon ki prathmiktayen to har ghante badal jaati hai.

Gyandutt Pandey said...

अरे क्लासिकल पोस्ट!
"सबसे बड़ी मसीन मनई का पेट है" - वाह!
भैया फणीश्वर नाथ रेणू जी को पढ़ने का मजा आ रहा है!

अनुराग said...

पिरलय आयी नही भैय्ये हम तो बाट जोह रहे थे

Rohit Tripathi said...

Pata nahi kyon nahi aayi.. aa jati to sab jhamela hi khatm ho jata

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I don’t want to love you… but I do....

Udan Tashtari said...

लगता है कहीं चक्का जाम में अटक गया..देखो, कब तक आना होता है. बहुत सटीक आलेख.

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आपके आत्मिक स्नेह और सतत हौसला अफजाई से लिए बहुत आभार.

ताऊ रामपुरिया said...

.हमहूँ सोच रहे हैं चन्नन टीका लगा के एक पोथी बगल में दबा के पंडित बन जांय।

भाई पंचम जी आपकी पोस्ट का एक एक वाक्य जैसे चुन चुन कर लगाया है !
पढ़ते में हँसी और सोचे तो अन्दर तक की मार ! शानदार है आपका लेखन !

आज प्रलय तो नही आई पर अभी २ दुबई में भूकंप आया है ! देखिये क्या होता है ? :)

अशोक पाण्डेय said...

वाह, आपने बहुत सुंदर लिखा है।
बात भी सही ही है। मैं खुद आज दिन भर अपने खेतों में पानी चढ़ाता रहा। मेरे लिए तो पानी के अभाव में धान के पौधों का सूखना ही प्रलय था।

राज भाटिय़ा said...

पंचम जी किसी नारी के बारे मे कुछ लिखे फ़िर देखे प्रलय आती हे या नही.
आप का लेख बहुत ही सुन्दर ओर अच्छा लगा
धन्यवाद

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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