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Saturday 6 September 2008

ईनके पिताजी घाटन किये थे - चाकू भाला लेकर


बाढ राहत केंद्र में मधेपुरा के बोदर ने अपनी टांग खुजाते हुए कहा - ससुर पेट चुरूर मुरूर कर रहा है, कुछ बांट ओंट नही रहे हैं। सहरसा से आये रामलवट यादव ने कहा - जी तो हमारा भी ठीक नहीं है......आज चार दिन हो गया पेट में एक दाना नहीं गया है, जाने का कर रहे हैं ई राहत उहत वाले कि अभी तक किसी को अंदर केंद्र में जाने ही नहीं दे रहे। इतने में शोर हुआ कि नेताजी आय गये हैं - अब सब कोई अपना पत्तल - कुल्हड, गिलास- उलास संभाल लिजियेगा, कोई किसी को धक्का उक्का न दे, और हाँ जैसे ही नेताजी फीता काटें तो सब लोग ताली जरूर बजाइयेगा।

रामलवट समझ गये कि क्या होने वाला है.......मन ही मन बोले.......अरे तोरी बहिन क भकभेलरू ले जाय........ससुर अबहीं घाटन करेंगे तब जाकर दाल ओल बंटेगा। बोदर की समझ में न आया कि आखिर ये फीता-कटन्नी क्यों हो रही है, और हो रही है तो नेता ही क्यों काट-कूट रहा है.......आज तक तो न सुना था कि कभी बडे लोग कोई गत का काम किये हों। रामलवट यादव के कान के पास मुंह ले जाकर बोला - ई फीता उता काहे काट रहा है? और काट रहा है तो दाल ओल उसके काटने के बाद ही मिलेगा ऐसा क्यूँ , क्या फीता काट कर उसी दाल में डालेगा क्या। रामलवट ने बोदर की बात पर हल्के से मुस्कराते हुए कहा - अरे तुम नहीं जानते- ये घाटन नेता हैं, हर जगह कैंची लेकर चलते हैं, जहां देखते हैं कोई नया काम हो रहा है, फट से घाटन करने के लिये फीता काट देते हैं। बगल में खडे लालराज कोईरी जो थोडा पढे जान पडते थे, बोले - अरे भाई घाटन नहीं, उदघाटन कहो। रामलवट ने लालराज की बात को फटाक से खतम करने की ईच्छा से कहा - हाँ वही....वही घाटन । ईधर लालराज सोच में पड गये कि ये निरा चुघ्घड तो नहीं है क्या...........बता रहा हूँ उदघाटन तो कह रहा है हाँ वही घाटन....लालराज ने चुप रह जाना ठीक समझा।

रामलवट जारी थे........तो ऐसा है कि चाहे कैसा भी काम हो, यहां तक कि सौचालय भी खुलवाना हो तो ये घाटन नेता से ही खुलवाये जाते हैं, इधर फीता काटा उधर नया काम सुरू। बोदर को अजीब लगा.....ये क्या कि लोग एक तो पहले से ही परेशान हैं....बाढ....पानी....बरखा-बुन्नी से, उपर से ये घाटन महाराज और तुले हुऐ हैं कि पहले फीता काटेंगे तभी सबको भोजन मिलेगा। बोदर ने गाली देते हुए कहा - मालूम पडता है ऐनके बाप जब ईनको पैदा कर रहे थे तो हाथ में चाकू भाला लिये हुए थे......ससुर क नाती.....आये हैं घाटन करने......अरे पूछो ये भी कौनो बात हुई कि लोग भूख से बेहाल हैं.....आंते कुलबुला रही हैं, ठीक से खडे नहीं रहा जा रहा और ये नेता लोग होटिल से खा पीकर अच्छे से चले हैं कि अब तनिक ईत्मिनान से बाढ राहत केंद्र का उदघाटन किया जाय.......अरे जा घोडा क सार.......कबहूँ तुम पर भी पडेगी......इतना अनेत कर रहे हो तो समझ लो कि उपर वाला भी जब तोहार रसलील्ला खतम करेगा तो फीता काट कर ही करेगा।

तभी नेताजी ने भाषण देना शुरू किया - भाईयो....जब बच्चा जन्म लेता है तो उसके नाभी का फीता काटने के लिये दाई आती है.......बस आप मुझे वह दाई समझ लेना कि जो ये फीता काटकर कुछ सहयोग दे रहा हूँ, आप लोग नाराज न होना.....बात ये है कि ईस तरह फीता काटने से मीडिया और आप लोगों के द्वारा सब को पता चलता है कि यहाँ बाढ राहत सेन्टर खुल गया है ईसलिये हम ये फीता काटन किये हैं वरना हम तो ये न करते.......।इतने में भीड का धैर्य जवाब देने लगा ...... किसी ने चिल्ला कर कहा - अरे ये फीताक्रमी को हटाओ यार...... बहुत पढे हैं बिज्ञान में फीताक्रमी.....गोलक्रमी......सभी ससुरे कीडे होते हैं पेट के........ये भी एक पेट का ही कीडा है जो हमें भूखा रख रहा है......।

इधर लालराज ने मन ही मन कहा - शरीर को तो पेट के कीडे वाले रोग से मुक्ति मिल जाती है लेकिन इस फीताधिराज से जाने कब मुक्ति मिलेगी जो हमारे मरने में भी सहयोग करना चाहता है...............फीता काट कर ।

- सतीश पंचम

*फीताक्रमी = Ribbon Worm (पेट का एक प्रकार का कीडा)

11 Comments:

ताऊ रामपुरिया said...

.इतना अनेत कर रहे हो तो समझ लो कि उपर वाला भी जब तोहार
रसलील्ला खतम करेगा तो फीता काट कर ही करेगा।

भाई सतीश पंचम जी आज की आपकी पोस्ट करारा व्यंग है ! और
आपका लेखन तो पढ़ कर ऐसा लगता है की किसी बिहार के दूरस्थ
ग्राम में पहुँच गए हैं ! कमाल की वाक्य रचना है ! आप बुरा मत
मानियेगा , आपको पढ़ते २ हँसी साथ साथ चलती है चाहे जितनी
भी गंभीर मसला क्यूँ ना हो ! ऐसे ही लेखन करते रहिये !
शुभकामनाएं !

संगीता पुरी said...

बाढ़ में राहत सामग्री बांटने के फीते काटने जैसा जश्न क्यों मनाया गया , समझ में नहीं आ रहा है। पर आपके प्रस्तुत करने का ढंग इतना बढ़िया है कि लगा मै वहां पहुंच ही गयी हूं। ऐसा ही लिखते रहें ।

Gyandutt Pandey said...

नेता बिरादरी टेपवार्म है। परजीवी!
और रोज बहुत सी राहत सामग्री जा रही है सहरसा। मैं आशा करता हूं कि सब टेप काटने के बाद रामलवट छाप को मिल रही होगी - कोई छोटा बड़ा टेपवार्म उसे कॉर्नर नहीं कर ले रहा होगा।

सतीश पंचम said...

ज्ञानजी, ऐक गोलक्रमी भी होता है, शायद जो कुछ मिले गोल कर जाता है, आपकी तरह मैं भी उम्मीद कर रहा हूँ कि राहत सामग्री की राह में कहीं कोई गोलक्रमी नहीं मिले।
ताउजी, मैं लिखता ही ईस तरह हूँ कि हंसी को थोडा थोडा लेकर चलूँ ताकि सिर भारी न हो जाय, मुझे खुशी हुई कि इस तरह मुस्कान तो ला सका लेकिन दुख भी हो रहा है कि यह मुस्कान बाढ जैसी विभिषिका के बीच ला रहा हूँ।

राज भाटिय़ा said...

सतीश जी आप का लेख हमेशा की तरह से सटीक ओर सुन्दर हे, इसे कहते हे मल मल मे लपॆट कर जुता मारना,
लेकिन इन सुआरो को घाटन करने मे ही मजा आता
हे, ओर फ़िर उस मे अपना हिस्सा भी तो लेना होता हे, शायस्द घाटन प्र इसी लिये जाते हो ,
धन्यवाद

जितेन्द़ भगत said...

nice

अनुराग said...

आहा .....आपको पढने का एक अलग ही सुख है जो हमेशा मुझे सफ़ेद घर में खीच लाता है.....सटीक लेखन

Udan Tashtari said...

बेहतरीन लेखन-साधुवाद!!


आपका मंच एक सार्वजनिक निवेदन के लिए बिना पूछे इस्तेमाल कर रहा हूँ:


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निवेदन

आप लिखते हैं, अपने ब्लॉग पर छापते हैं. आप चाहते हैं लोग आपको पढ़ें और आपको बतायें कि उनकी प्रतिक्रिया क्या है.

ऐसा ही सब चाहते हैं.

कृप्या दूसरों को पढ़ने और टिप्पणी कर अपनी प्रतिक्रिया देने में संकोच न करें.

हिन्दी चिट्ठाकारी को सुदृण बनाने एवं उसके प्रसार-प्रचार के लिए यह कदम अति महत्वपूर्ण है, इसमें अपना भरसक योगदान करें.

-समीर लाल
-उड़न तश्तरी

सतीश पंचम said...

समीरजी पूछना कैसा...आप बेखटके लिखिये...हमें आप पर पूरा भरोसा है....मैं भी इसी बात का समर्थन करता हूँ कि टिप्पणी करने से न सिर्फ विचारों का ही पता चलता है बल्कि बहस मुबाहिसों के लिये भी जगह बनती है....हाँ ये अलग बात है कि खुद कहीं ज्यादा टिपिया नहीं पाता :)

sab kuch hanny- hanny said...

safed ghar me mera pahla kadam hai . ghar ne chhap chodi hai. bihar baadh ki sthiti par lekhan achcha laga. mein ye janna chahti hu ki wahan ki wartman sthiti agar aapko pata chcle to batate rahiyega

Dr. Nazar Mahmood said...

waqai is tarahan ke netaon per taras bhi aata hai ke inka dimagh kaam hi nahi karta ke inhe kab kya karna chahiye, par kahen kisko inko representative bhi toh hum logon me se hi log banate hain, satish bhai accha lekh hai,,,,, mubarak bad aapko,,,,, aur haan aik baaat apke adesh ke mutabik maine word verification hata diya hai, ab aapko pareshani nahi hogi, aisi aashaa hai,

बातें, जो जाने की जल्दी मचा रही हैं.....

कुछ बातें जल्दी मचाती हैं कि मैं जा रही हूँ......मैं न रूकूंगी। समय भी उन्हें ऐसा करने के लिये उकसाता रहता है कि कह दो कि देर हो रही है.......बहुत रूक लिये......हम जा रही हैं........अब न रूकेंगी.............ऐसी ही बातों को देखने पढने के लिये इस राह से गुजर सकते हैं जहां समय को एकबारगी धकियाया जा सकता है कि समय तुम बीत गये तो क्या हुआ ? ठहरने की सांकल तो अब भी खटखटायी जा सकती है......

ऐसी ही बीते-अनबीते पलों को इन लिंक्स के जरिये देखा जा सकता है ।

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