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Wednesday, September 3, 2008

फिल्म तीसरी कसम और न्यूक्लीयर डील (फुलकारी)



हीरामन अपनी चार साल पुरानी टप्पर गाड़ी मे न्युक्लीअर डील को लिए चले आ रहे हैं , रस्ते मे कोई गाँववाला मिल जाता है और पूछता है - कहाँ जा रहे हो भाई। हीरामन ने कहा - छ्त्तापूर - पचीरा । ई छ्त्तापुर - पचीरा कहाँ पड़ता है । अरे कहीं भी पड़े , तुम्हे उससे क्या, इस गाँव के लोग बहुत सवाल - जवाब करते हैं, देहाती भुच्च कहीं के - हिरामन ने कुढ़ते हुए कहा । वैसे आप लोगों को बता दूँ की हिरामन को सभी लोग हीरे से तुलना करते हैं कि अरे ये आदमी तो हिरा है हिरा , देखा नहीं , जब बाघ को यहाँ से वहां ले जाने कि बारी आई तो सभी गाडीवानों ने इनकार कर दिया कि हम नहीं ले जायेंगे बाघ - फाग , तब यही हीरामन था जिसने आगे बढ़ कर सभी गाडीवानों कि लाज रख ली, आज भी लोग उन्हें हीरे जैसे मन वाला कहते हैं।

हाँ तो हीरामन जी नयूक्लीअर डील की लदनी लादे आगे बढे, रास्ते मे बैलों को यानी जनता को रह रह कर तेज चलने के लिए उनकी पूँछ के नीचे पेईना (छड़ी/दुआली) से कोंच लगा देते या खोद- खाद देते जिससे बैल हरहराकर कुछ कदम तेज चलते, लेकिन महंगाई की मार झेल रहे बैल आख़िर कितना तेज चले खैर अभी थोड़ा आगे बढे थे कि देखा एक जगह भीड़ लगी है - एक आदमी जो कोई नेता- फेता लग रहा था , किसी मकान की छत पर चढा है और कुछ बक बक कर रहा है, उसे देखने वालों की भीड़ लगी है और उस भीड़ की वजह से रास्ता जाम है, अब हीरामन टप्पर गाड़ी निकाले तो कैसे निकाले , उस आदमी से कहा - अरे भाई छत से उतर क्यों नहीं जाते, देखते नहीं गाड़ी रुकी हुई है।
उस आदमी ने कहा - अरे छत से क्यों उतरूं, क्या अपनी टप्पर गाडी छत के उपर से ले जाओगे। खैर जैसे तैसे लोगों ने ही रास्ता छोडा और टप्पर गाडी आगे बढी । हीरामन मन में सोचने लगे - वह आदमीबडा लटपटीया मालूम पडता था, मुझे पहले ही उस आदमी से बात नहीं करनी चाहिए थी, सीधे लोगों से कहा होता तो वो खुद ही रास्ता छोड देते।
ईधर बैल फिर अपनी पुरानी चाल पर चलने लगे, हीरामन ने उन्हें अब छडी से मारने के लिए हाथ उठाया ही था कि टप्पर गाडी में पीछे से आवाज आई - मारो मत। धीरे धीरे चलने दो, ईतनी जल्दी क्या है। हीरामन सोचने लगे कि मैं अपने बैलों को मारता हूं तो इस न्यूक्लीयर डील को तकलीफ होती है, कितना भला सोचती है ये डील। और सचमुच ये बैल भी कितना तेज चलें, पहले से ही महंगाई का बोझ ढो रहे हैं, जातिवाद, संप्रदायवाद, उधारवाद और भी न जाने कितने सारे वाद-विवाद झेल रहे हैं मेरे ये बैल। ईस डील के जरिए ये सभी प्रकार के वाद एक झटके में दूर हो जाएंगे। और फिर मुझे लालटेन लेकर चलना भी नहीं पडेगा, सस्ती न्यूक्लीयर उर्जा मिलने से मेरी टप्पर गाडी में भी बल्ब लग जाएगा। इधर रास्ते में हीरामन के साथी लालमोहर और पलटदास (पलटा) भी मिल गए। हीरामन के दोस्तों के नाम फनीश्वरनाथ रेणूजी ने जाने क्या सोचकर लालमोहर और पलटा रख दिया था, कि आज भी उस नाम का असर हैकि लालमोहर अपने नाम के अनुसार लाल रंग को अच्छा समझता है, कम्यूनिस्टों सी बातें करता है। और पलटदास,वो भी कुछ कम नहीं, आज ईधर तो कल उधर, पलटना जारी रखता है, जाने कौन जरूरत पड जाय।तभी तो हीरामन एक जगह कहता भी है - जियो पलटदास.......जियो। ईधर न्यूक्लीयर डील को देख लालमोहर को शंका हुई, पूछा - इस डील की लदनी लादे कहां से चले आ रहे हो,इसके आने से हमारे उन्मुक्त स्वतंत्रता में बाधा होगी, हम ठीक से गा नही पाएंगे कि - उड उड बैठी ई दुकनिया, उड उड बैठी उ दुकनिया......जब हम गाएंगे तो ये डील कहेगी कि उसी को देखकर ये लोग गा रहे हैं, बोली ठोली बोल रहे हैं......ना ना बाबा नाहम तो ये डील नहीं मानेंगे, जिंदगी भर बोली-ठोली कौन सुने..... इसे तुम वहीं छोड आओ जहां से लाए हो।तब हीरामन लालमोहर को समझाने लगे, देखो इसके फलां फलां फायदे हैं, और सबसे बढकर ये हमें पास भी तो दे रही है। पास का नाम सुनकर लालमोहर और पलटा थोडा सतर्क हो गए, पूछा - पास...कैसा पास ।हीरामन ने कहा - अरे कोई अईसा वईसा अठनिया दर्जा वाला पास नहीं, न्यूक्लीयर दर्जा वाला पास।लालमोहर दर्जा का नाम सुनते ही उखड गया, लाल - लाल होते बोला - दर्जा की बात करते हो, यहां हमसभी को एक समान दर्जा की बात करते हैं और तुम एक और दर्जा बढाने की बात करते हो, लानत है तुमपर।अभी ये बातें हो रही थीं कि लालमोहर ने देखा - पलटा कहीं नजर नहीं आ रहा है।अरे ये क्या, पलटा तो उधर डील की चरणसेवा कर रहा है , जाने ईस डील ने कौन सा मंत्र मार दिया है।लालमोहर ने पलटा की बांह पकड कर झकझोरते हुए कहा - तू यार हमेशा यही करता है, जरा सा कुछ हुआ नहीं कि पट से हाथ जोड चरणसेवा करने लगता है, और आज तू सेवा कर रहा है न्यूक्लीयर डील की,तेरा तो उन लोगों जैसा हाल है कि - आज न्यूक्लीयर टेस्ट किया, कल वहीं जाकर उस जमीन से माथे पर तिलक लगा लिया, पता चला अगले दिन माथे पर फोडा हो गया। इधर पलटा मन ही मन सोच रहा था - तूम क्या जानों मैं क्यूं चरणसेवा कर रहा हूं , मेरे घर पर माया का कब्जा हो गया है, मेरे बैल पगहा तोड कर भागे जा रहे है, ले दे कर एक ही सहारा था, सो मायामोह में ढहाया जा रहा है, अब तूम ही बताओ लालमोहर कि, मै कुछ गलत कर रहा हूं।लालमोहर क्या बोले, हीरामन को ही बोलना पडा - अब पलटा तुम एक काम करो, जाकर जरा अपने जानपहचान वाले उस पनवाडी से अपने हरे हरे पान ले आओ,वैसे भी हरा रंग तुम्हें ज्यादा पसंद है,और देखना उस लहसनवा को भी लेते आना। लालमोहर बोला - कौन लहसनवा, उ दलबदलू । हां हां वही - पलटा तपाक से बोला। ईधर ये बातचीत चल ही रही थी कि- लहसनवा खुद ही बोल पडा - ऐ मालिक......लालमोहर बोला - चोप....तू कहां चला आ रहा है बडे लोगों के बीच में। ऐक जोरदार रसीद कर दूंगा, तबियत हरी हो जाएगी। लहसनवा बोला - तबियत हरी हो जाए तो होने दो हरी ....... हम तो हैं ही हरित प्रदेश वाले। तब तक पलटा हरे हरे पान ले आया। पान खाकर हीरामन ने देखा - ई हमरे सफेद कुर्ता पर लाल दाग कैसे लग गया, ईसके पहले तो कभी नहीं लगा था। ईसके पहले तूमने कभी लाल पान भी तो नहीं खाया था, लालमोहर ने हंसते हुए कहा। तभी लालमोहर ने देखा न्यूक्लीयर डील उन चारों की ओर देख रही है। लालमोहर ने चहकते हुए कहा - देख रहे हो कैसे देख रही है ।पलटा - कौन ।लालमोहर - अरे वही.पलटा - किसको लालमोहर - और किसको.......उसे मालूम पड गया है कि मेरा पावर हीरामन से ज्यादा है। ईधर लहसनवा झोला झक्कड उठाने की प्रैक्टिस कर रहा था क्योंकि अक्सर ईस तरह की डील के बाद झोला वगैरह वही उठाता था, उधर हीरामन पलटा के हरे पान चबा रहा था, लाल छींटे अब भी पड रहे थे, तभी सब की नजर सामने चल रही नौटंकी मंच पर एक साथ पडी। मंच पर न्यूक्लीयर डील नाच गा रही थी, बोल थे -पान खाये सईंया हमार..... मलमल के कुर्ते पर छींट लाल लाल.....पान खाये सईंया हमार..... मंच के उपर लगे झालरों के उपर बडे - बडे अक्षरों में लिखा था - द ग्रेट भारत नौटंकी कंपनी ।


- सतीश पंचम

(यह पोस्ट हाल ही में चल रहे न्यूक्लीयर डील के टिकटिम्मा आलोक में पुनर्प्रकाशित की गई है)

8 comments:

Gyandutt Pandey said...

अब हमे लग रहा है कि हीरामन के बैलों के गोबर से थोरियम और मूत्र से हैवीवाटर का उत्पादन होगा!
सम्भावना क्यों नकारी जाये!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

कमाल कर दिया आपने तो! बहुत ही सुंदर!

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said...

बहुत अच्छी तुलना है। लिखा भी बहुत बढ़िया है। पढ़कर मजा आ गया। कड़वा सच शायद यही है कि हीरामन को न तब कंपनी की बाई मिली थी और शायद ने अब मिलेगी

Udan Tashtari said...

५ दिन की लास वेगस और ग्रेन्ड केनियन की यात्रा के बाद आज ब्लॉगजगत में लौटा हूँ. मन प्रफुल्लित है और आपको पढ़ना सुखद. कल से नियमिल लेखन पठन का प्रयास करुँगा. सादर अभिवादन.

दिनेशराय द्विवेदी said...

जियो, पंचम जी जियो।
बहुत दिनों बाद एक शास्त्रीय संगत पढ़ने को मिली। सीधे हिरदे में घुसत जात है।

गोबर का थोरियम और गउमूत्र का हैवीवाटर तो बहुत है पहिले से ही हमरे देसवा मे। जे नूकलियर डीलवा की का जुरूरत थी?

अनुराग said...

बैलगाडी ससुरी अकेली चल रही है बिना हेरोइन के ?ऐसा क्यों ?नुक्लियर डील में ऐसी भी कोई शर्त है क्या ?

राज भाटिय़ा said...

अजी यह हीरा मन तो बहुत ही ईमान्दार हे, मे नही लोग कहते हे, मुझे तो...
ओर यह हीरा मन की हीरोईन आज साथ दिखाई नही दे रही, उस के बिना तो हीरा मन जी .... बेचारे
सजन रे झुट मत बोलो शायद यह गीत भी इन्ही हीरा मन के लिये बना था,
बहुत अच्छी लगी आप की यह बेल गाडी,

राज भाटिय़ा said...

धन्यवाद करना भुल गया था.
धन्यवाद

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