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Tuesday, September 2, 2008

क्या कभी टीवी पर ये सीन देखा है आपने


बाढ में परोसी जा रही एक लोटा गर्म दाल की छींटे जब एक छोटी बच्ची पर पडी तो वह छनछना कर पीछे हट गई, वहीं पास खडे किसी ने उसे वही लोटा फिर संभाल कर थमाते कहा - ले पकड...पकड ले...और मुझे वर्ल्ड- वार से जुडी वह फिल्म याद आ गई जिसमें गर्म उबले हुए आलू दिये जा रहे थे, लोग एक-एक कर आते जाते और अपने कटोरे में उबले आलू लेकर आगे बढ जाते, कि तभी एक छोटा बच्चा भी कटोरा लेकर आगे आया, और जैसे ही उसके कटोरे में गर्म आलू डाला गया, कुछ गर्म पानी भी उसमें गिर गया जिसके छींटे उस बच्चे के हाथों पर पड गये और वह बच्चा भी ठीक ईस बच्ची की तरह छनछनाकर पीछे हट गया, गर्म आलू और गर्म पानी जमीन पर बिखर गया जिसे लेने आसपास खडे बडे लोग टूट पडे। यहां दोनो घटनाओं में जो चीज अलग दिखी वह थी आस पास खडे लोगों का आचरण। बिहार का वह आदमी जो बच्ची को फिर से गर्म लोटा संभालकर पकडवा रहा था उसके मुकाबले यूरोप के लोग बौने साबित हो रहे थे, यहां आग्रह था तो वहां दुराग्रह, यहां बच्ची को भीड से अलग नहीं कर दिया गया, बल्कि उसे फिर से दाल दी गई।
अब आते हैं असली मुददे पर। बाढ में एक बात जो परेशान कर रही है, वह नेताओं की उलूल-जूलूल हरकतें, कभी लालू कैमरे के सामने एक बच्चे को लेकर हास्य रस गढ रहे हैं तो कभी नीतीश करूण रस की जुगाली। क्या नीतीश को परिस्थितियों को समझने में इतना वक्त लग गया कि दस-बारह दिन तक हाथ पर हाथ धरे सोचते रहे कि क्या करूं..... क्या न करूं। सेना की मदद ली भी तो तब जब बात हाथ से बाहर निकल गई। न कोई प्लान न मैनेजमेंट, सिर्फ जुगाली और जुगाली कि ....बाढ भयावह है.....इससे पहले ऐसा न हुआ था......आदि..आदि।
ऐसी काहिली की मिसाल शायद कम ही मिले कि जब सामने आफत दिख रही हो, तब भी हाथ पर हाथ धरे बैठे सोच रहे हों .... क्या करें....क्या न करें। राज्य सरकार तो राज्य सरकार केंद्र के मंत्री भी ऐसे में मजाक के मूड में लग रहे हैं, कभी एक बच्चे को लेकर तो कभी कुछ। क्या केंद्र और राज्य सरकार के पास इतनी कम संख्या में नाव और हेलीकॉप्टर आदि थे कि जिसके लिये लोगों को दस-बारह दिन तक इंतजार करना पडता, नहीं.....यदि चाहते तो आसमान को हेलीकॉप्टरों से पाट सकते थे लेकिन चुनाव अभी दूर है और कोसी अभी भी मजबूर है... इसी तरह टूटने के लिये और लोगों को इस टूटन से मारने के लिये, घरबार छोडने के लिये..... हम लोग टीवी पर देख रहे हैं- हजारों की संख्या में बडे-बडे बाल बच्चों वाले नाती पोतों वाले पचास-पचपन की उम्र के लोगों को अपने बच्चों के सामने फूट- फूट कर रोते हुए, बिलखते हुए....क्या इसके पहले कहीं देखा है आपने.......टीवी पर बडों को बच्चों की तरह रोते हुए।


- सतीश पंचम

8 comments:

Anil Pusadkar said...

sach kaha Satish jee chunav abhi door hai,shayad isiliye.......... bahut kadua sach likha aapne,aapki bebak lekhani ko salam

सागर नाहर said...

सतीश जी
भगवान करे ऐसे सीन (और दिन भी) फिर कभी टीवी पर या कहीं और किसी को भी देखने पड़े।

आशीष कुमार 'अंशु' said...

कल डीयू के सोशल वर्क स्कूल से छात्रों की एक खेप सहरसा के लिए रवाना हो चुकी है। सफर,डीयू और दूसरे संस्थाओं के लोगों ने आज बैठक की है और बहुत जल्द ही दूसरी खेप जानेवाली है.आप सबसे अनुरोध है कि आप जिस रुप में मदद करना चाहें, समपर्क करें-
राकेश कुमार - 9811972872..

जामिया (दिल्ली) के भी कुछ साथी बाढ़ राहत में लगे हैं,
यदि आप चाहें तो उनसे बात कर सकते हैं -

महताब आलम - ०९८११२०९३४५
रोहित वत्स - ०९८६८०७६८६५
अफरोज आलम साहिल- 09891322178

अनुराग said...

दरअसल हिन्दुतान अब काहिली ओर निकम्मेपन का एक अनूठा देश है जहाँ के प्रबुद्ध पढ़े लिखे I A .S भी किसी अनपढ़ ओर जाहिल नेता के आगे हाथ बांधे खड़े नजर आते है ...मनेजमेंट की अपनी सोच की जबान वे खोलते नही ....इसलिए बाद के दिनों में सोचना छोड़ देते है ओर उनके दिमाग कुंद पड़ जाते है.....ओर रहे राजनेता ..बिहार के भूखे नंगे गरीब लोग उनके लिए मोहरा भर है अपनी राजनीती का...

जितेन्द़ भगत said...

आपकी चि‍न्‍ता जायज है। जि‍नके पास पावर है,उन्‍हें इन सबकी परवाह नहीं, जि‍न्‍हें परवाह है, उनके पास संधाधन नहीं।
(डीयू,जामि‍या के साथि‍यों का हौसला बना रहे।)

Lovely kumari said...

इनसब की जड़ में वो ही निगोडी राजनीती है.नदी का रास्ता बदलना तो प्रकृति का कोप है,पर बचाव कार्य में बरती जा रही अनियमितता का क्या करें?



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एक अपील - प्रकृति से छेड़छाड़ हर हालात में बुरी होती है.इसके दोहन की कीमत हमें चुकानी पड़ेगी,आज जरुरत है वापस उसकी ओर जाने की.

राज भाटिय़ा said...

अगर इन नेताओ क कोई अपना बेटा , बेटी या परिवार का इस बाढ मे मर जाता तो क्या यह तब भी ऎसे ही नाटक करते, जब आये वोट मांगने सालो को जुत्ते मारॊ.
हम ने यहां बिहार का हाल देखा ओर इसे देख कर शेतान भी रो पडे,जागो ओर अपने वोट की किमत पहचानॊ मत दो इन बाजी गरो ओर चोर उच्च्को को अपना वोट बदल डालो इन दुनिया, जो हमारे दुख मे काम नही आते आज बिहार का यह हाल हे कल हमारा भी तो हो सकता हे???

sab kuch hanny- hanny said...

aapki tappani jayaj hai. bihar me har saal aati hai baadh. kitne log lachar ho jate hain. bura to ye v laggta hai ki hum unke liye kuch kar nahi paate bas kuch paise bhej dete hain. par wahan paise ka alawa kriyanwayan ki v jarurat hoti hai.mein to bachpan se aaj tak jakar kuch karne ko tarasti hi rah gai.

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