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Saturday, August 23, 2008

समलैंगिक विवाह और पंडित केवडा प्रसाद (फुलकारी)


मुंह दिखाई के समय दूल्हन का घूंघट हटा कर जैसे ही जलेबी फूवा ने मुंह देखा, चौंक कर पीछे हट गईं - हाय दईय़ा....दुल्हन को तो दाढी-मोंछ है। कौन गांव की ले आया रे........अरे नासपीटे..........तैने ईतना भी पता न चला कि लडके को ही दुल्हन बना कर ले आया। तभी मैं कहूं..दुलहिन ईतनी तन कर क्यों चल रही है।
उधर घरातीयों में अलग चर्चा चल पडी - अरे यार ये दोनों लडका की आपस में ही शादी .......... कुछ समझ नही आ रहा।
कल्लू काका बोले - अरे कुछ ना समझो तो ही अच्छा है..........ससुरे न जाने आजकल के छोरे कौन खेल.....खेल रहे हैं कि सब खेल ही गडबड हो गया है, सुनील की शादी अनिल के साथ, रमेश की शादी उमेश के साथ और तो और पहलवान विजयलाल की शादी पहलवान अजयलाल के साथ.........अब जाने ई लाल लोग कौन पहलवानी करेंगे कि एक और लाल रचेंगे।
ईधर हलवाई जो अब तक अपना माल असबाब लौटने के लिये समेट चुका था, मजदूरी की राह तकता उकडूं बैठ कर लोगों की बातें सुन रहा था, उसके बगल में ही बाजा बजाने वाले बैठे कान खुजा रहे थे मानों कह रहे हों - लडके-लडके की शादी हो या लडकी-लडकी की, अपने को तो बस बजाने से मतलब है। हलवाई के मन में अलग शंका घर कर रही थी - शादी तक तो ठीक है....मिठाई बनाने का आर्डर मिल गया, लेकिन पहले जो किसी बच्चे - ओच्चे के जन्म होने पर नामकरण वाला आर्डर मिलता था वो तो अब मिलने से रहा, जाने कौन विधी से विवाह करा लाये कि लडके-लडके की शादी हो गई......हूंह।
ईधर पंडित केवडा प्रसाद को घेरकर गांव के लडके अलग मजाक कर रहे थे....और पंडित थे कि बस हें...हें करके खींस निपोर रहे थे।
दीनू बोला - पंडित चच्चा, ई बताईये कि आप तो हर विवाह में यही कहते हो कि - प्रण करो कि मैं एक पत्नी के रूप में पति का साथ निभाउंगी........तो ये बताओ उन दोनों में पत्नी कौन था और पती कौन।

सुनकर पंडित केवडा प्रसाद बोले - अब मैं का जानूं कौन पती था और कौन पत्नी, उन दोनों में जिसको अपने आप को पती समझना हो पती माने, जिसे पत्नी मानना हो वो पत्नी माने, हमको तो जो कहा गया वही करे हम......और एक बात कहूं.......तूम जो ईतना भचर-भचर कर रहे हो, कल को का पता तुम ही कोई लडका ले आओ और कहो कि पंडितजी ईस हरिप्रसाद की शादी मुझ दीनूलाल से करवा दो तो हम मना थोडे करेंगे।
सुन कर दीनू थोडा पीछे हटा तो झटकू आ पहुंचा, उसने अपनी टांग खुजाते हुए कहा - लेकिन ये बताओ कि - उन दोनों के बीच क्या-क्या होगा ?
क्या होगा माने ? अब पंडित जी को दूसरी शंका हुई कि न जाने अब ये चर्चा कौन तरफ ले जाना चाहते हैं........अब यहां से चलना चाहिये.......लेकिन क्या करें, अभी तक घराती लोगों की तरफ से विदाई दक्षिणा नहीं मिली है।

उधर कुछ पढे लिखे घरातीयों के बीच चर्चा चल रही थी, जब से रामदौस ने समलैंगिकता कानून को कानूनी जामा पहनाने की बात की है, लडके तो जैसे बिगडे ही जा रहे हैं.....क्या किया जाय कुछ समझ नही आ रहा।
मास्टर चंपकलाल बोले - अरे कल मैंने कक्षा में दिनेश को हरिलाल के पास बैठने को कहा तो उसने बैठने से इन्कार कर दिया, कहता है हरिलाल उसे छेडता है। बताओ भला, अब किसको कहां बिठाउं कुछ समझ ही नहीं आ रहा है।
अब तक चुप कनवरीया दद्दा खंखारकर बोले - अरे आप को तो केवल बैठाने-उठाने की चिंता हो रही है, मैं सोच रहा हूं यदि यही हाल रहा तो, अपनी चूडीवाली सुगनी फूवा का क्या होगा, वो किसे चूडी पहनायेगी? समझ नहीं आता क्या किया जाय।

उधर पंडित केवडा प्रसाद मन ही मन सोच रहे थे कि पंडिताईन घर पर दान दक्षिणा का इंतजार कर रही होगी, ईधर ये धत् कर्म चल रहा है, जल्दी दान दक्षिणा देने की कौन कहे, कह रहे हैं .....कुछ समझ नहीं आ रहा , क्या किया जाय।
आस पास बैठे लोगों की देह छू -छू कर बोलने लगे - चंपकलालजी आप......, कनवरीया दद्दा आप और संतलाल यादवजी आप........ये बतावें कि अब क्या हो सकता है, शादी-उदी तो विधी का विधान है, उसमें हम और आप क्या कर सकते हैं......विधान बनाने वाले उ बडे लोग हैं......चाहे संविधान बनायें या बिगाडें...हम आप कुछ नहीं कर सकते....क्योंकि होईहे वही जो राम रचि राखा ।
झटकू ने थोडा खुलकर पूछा - राम रचि राखा माने...........वही सेहत मंत्रालय वाले तो नहीं ?
:)

- सतीश पंचम

8 comments:

Gyandutt Pandey said...

अच्छा; अब हिन्दुस्तान में भी ऐसी वैधानिक लागलसेट होने लगी! यह तो हमारे लिये खबर है।
देखता हूं कि इस पोस्ट को चिठ्ठाजगत ने समाचार में केटेगराइज किया या नहीं! :)

P. C. Rampuria said...

परिवार एवं मित्रों सहित आपको जन्माष्टमी पर्व की
बधाई एवं शुभकामनाएं ! कन्हैया इस साल में आपकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करे ! आज की यही प्रार्थना कृष्ण-कन्हैया से है !

आज की फुलकारी पर्व का आनंद द्विगुणित कर गई !
बधाई !

राज भाटिय़ा said...

आपको जन्माष्टमी पर्व की
बधाई एवं शुभकामनाएं

आप का लेख बहुत ही अच्छा लगा, यह पश्चिम की दी हुई एक ओर बिमारी हे, जिसे आज कल भारत मे भी कुछ वर्ग इज्जत की नजर से देखता हे,उन्हे इस मे कोई बुराई नजर नही आती,ओर वेसे भी हमे पश्चिम की हर बुरी बात बहुत अच्छी लगती हे,क्यो कि आखिर हम पढे लिखे ग्रेजुऎट जो हे,
धन्यवाद यह लेख शायद किसी भटके हुये की आंखे खोल दे,

आपको जन्माष्टमी पर्व की
बधाई एवं शुभकामनाएं

विक्रांत बेशर्मा said...

जन्माष्टमी कि बहुत बहुत शुबकामनाएं |
बहुत ही अच्छा और रोचक लेख है , राज जी ने बहुत सही कहा पश्चिम कि हर बुरी बात को हम आसानी से अपना लेते हैं |

अनुराग said...

गुरुवर..............कहाँ है आपके चरण ?
इस धाँसू लेखन को हमने जरा देर से पढ़ा.........पढ़ा तो बस पढ़ते रह गये ..........क्या कह दिए हो भाई ?गजब......गजब ?
हम फैन हो गये है आपके

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत अच्छा मज़ाक कर लेते हैं आप!

महामंत्री-तस्लीम said...

गजब की कल्पना है और गजब का व्यंग्य। बधाई।

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Satish bhai ,u have said but its our own voice,congrats and thanks.I belong to Pratapgarh and working as asstt.professor in mp govt.
I write poems and stories.Tell me abut u in detail.I will be happy.
Regards
Dr.Bhoopendra

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