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Monday, August 18, 2008

विनोद दुआ और प्रणव रॉय के कान काटते दुकानदार(फुलकारी)



कल्लन अपने कान खुजाता मुशरर्फ की ईस्तीफे वाली स्पीच टीवी पर सुन-देख रहा था और बाकी अन्य लोग उसका मन चाहा मतलब निकाल रहे थे जिनमें धन्नू कसाई, लल्लन हलवाई, असलम टेलर, लुल्लुर हज्जाम सभी थे। उनके विश्लेषण विनोद दुआ और प्रणव रॉय तक के कान काट रहे थे।



मुशरर्फ ने कहा - मैनें अपने मुल्क के लिये जो कर सकता था वो किया।

ईतना सुनना था कि धन्नू कसाई बोला - मियां मैं भी तो सुनूं क्या-क्या किये हो, एक ठो बकरीया तो हलाल नहीं कर सकबो, मुलुक खातिर करबो की बात करते हो। तोहरी तो हिम्मत हम तबही जान गये थे कि तोहरा में गोस कितना है और हड्डी केतना जब तुम करगिल कांड किये रहे, करबो की बात करते हो।

धन्नू की बकबक सुन कर असलम टेलर बोले - अमां यार बडे वाहियात किसिम के हो, सुन तो लो क्या कह रहा है, पहले ही गला, अस्तर, अचकन का नाप ले रहे हो।

इतने में मुशरर्फ ने कहा - मैं अपने किये हुए कामों को मुल्क की हिफाजत के लिये ठीक समझता हूं, दहशतगर्दी से अपने मुल्क को आजाद करना ही मेरा मकसद था।

ये सुन कर लुल्लुर हज्जाम बोल पडे - ई का कह रहा है - दहशतगर्दी से अपने मुलुक की आजादी याने आखिर पट्ठा मान गया कि दहशतगर्द उसके यहां ही थे, बडे दिन बाद हलक से सच बोल रहा है।

आगे की बात धन्नू कसाई ने पूरी की - लुल्लुर मियां जब आखरी टेम होवे है ना तो बडे बडे बकरे लेंड गिरा देते है, ई तो बस हलक से मिमिया के रह गवा है।

अब तक चुप कल्लन जो अपने कान खुजा रहा था, सीधे होकर बैठ गया और लगभग हकलाते हुए बोला - ई...ई मुसरर्फ दद्दा चल गईल का।

और नहीं तो क्या देख नहीं रहे कैसे था...में बोल रहा है......किया था......लिया था......ससुर था माने अब चला चली वाली बात हो रही है - लल्लन हलवाई ने पहली बार मुंह खोलते हुए कहा।

असलम टेलर से रहा नहीं गया, बोले - अरे अब सब तूम ही लोग बोलोगे कि कुछ उस की भी सुनने दोगे, बिना मतलब पचर....पचर बोले जा रहे हो कनवा कल्लू की तरह......ऐसे ही वो भी पचर.....पचर बोलता रहता है..........तूम लोगन पर उसकी छाया तो नहीं पड गई।

अब सब लोग चुप हो गये.....और फिर सुनने लगे।

मुशरर्फ ने कहा - अब पाकिस्तान की आवाज सुनी जाती है, पहले कभी पाकिस्तान की आवाज नहीं सुनी जाती थी, वो मेरे किये काम थे जिन्होंने पाकिस्तान को पहचान दिलाई।

अब असलम टेलर खुद ही बोल पडे - हां...हां क्यों नहीं....क्यों नही.........हमारे कनवा कल्लू की भी पहले कोई नही सुनता था, पर अल्ला कसम जब से उसने शेखू चचा की भैंस के बारे में बताया, सब लोग उसकी सुनने लग गये।

क्या बताया भैंस के बारे में - कई आवाजें एक साथ आईं।

अरे कुछ नही, उसने कई बार मजाक किया था कि असलम मिंया आपकी बकरी रस्सी तुडाकर चौधरी के खेत में चर रही है....जाकर देखा तो बकरी जहां थी वहीं बंधी थी, समझ गया कि मजाक कर रहा है ये नामुराद। कई दिन ऐसे ही मजाक करता था तो कोई उसकी सुनता ही नहीं था।
अगल-बगल लोगों में अब आगे की बात सुनने की ईच्छा बढने लगी कि देखें आगे क्या बताते हैं असलम मियां। सभी थोडा आगे सरक आये।
असलम टेलर ने थोडा खंखार कर कहा - तो हुआ यूं कि एक दिन यही कनवा कल्लू बोला - आपके खेत में मजहरू मियां की भैंस चर रही है, हमें लगा कि ये फिर मजाक कर रहा है......हम नहीं गये देखने, और मजे की बात देखीये कि हम सही थे........कोई भैंस नहीं चर रही थी........कल्लू ने मजाक किया था।
तब.......
तब क्या, हम ने जान लिया कि कभी ईसकी बात को सही नही मानेंगे।
फिर........
फिर क्या, एक दिन कहने लगा कि आपके खेत में शेखू की भैंस नहीं है।
मैने कहा नहीं है तो नहीं है, ईससे तुझे क्या.......?
तो जानते हो क्या कहा उसने ?
क्या ?

उसने कहा कि........मैं फिर कहता हूं तुम्हारे खेत में शेखू की भैंस नहीं चर रही।

मैंने कहा .........जाने क्य़ा बात है जो बात को नहीं मे बता रहा है, जाकर देखा.......तो क्या देखता हूं की सचमुच शेखू की नहीं, लेकिन मजहरू की भैंस जरूर खेत में खडी फसल चर रही है........बस तब से हम कल्लू की बात मानने लगे, कि जब वो नहीं कहे तो समझो है और है कहो तो समझो नहीं है, लेकिन मानते है जरूर।

बस वही समझ लो जब मुशरर्फ मियां हां कहें तो उसका मतलब न से है और न कहें तो उसका मतलब हां से है। सभी लोग हां में सिर हिलाने लगे।

तभी मुशरर्फ ने कहा - कश्मीर हमारी रगों में है।

आस-पास बैठे सभी लोगों ने कहा- है......कह रहा है, है.... यानि ......नहीं है।

धन्नू कसाई बोला -चलो .....जाते-जाते ऐक और सच कबूल गय़ा.....मैं न कहता था.......आखिरी बखत बडे-बडे बकरे लेंड करते हैं।

कल्लन बोला - और जब कट रहे हों, तो कहते हैं - कश्मीर हमारी रगों में है,..... माने नहीं है।

:)






- सतीश पंचम

10 comments:

Anil Pusadkar said...

bahut badhiya .badhai

संजय बेंगाणी said...

है की नहीं है ? :)

अनुराग said...

सही काट दिये ओर पूरे काट दिये है भाई

दुविधा said...

शानदार व्यंग्य है। आखिरी वक्त में सब ऐसे ही लेंड गिराए फिरते हैं। पर शुरुआत में डेमोक्रेसी की ऐसी तैसी कर देते हैं। जाने कब पाकिस्तान का पीछा इस दुर्भाग से छूटेगा... तब तक तो सब ऐसे ही काटते गिराते रहेंगे...

P. C. Rampuria said...

बहुत शानदार और सटीक व्यंग !
बधाई और शुभकामनाए !

Udan Tashtari said...

सटीक व्यंग !!!!बेहतरीन!

राज भाटिय़ा said...

मान गये सतीश जी,यह मुश का सटीक व्यंग , मजा आ गया धन्यवाद

Rajesh Roshan said...

धारदार

महामंत्री-तस्लीम said...

सही कहा आपने। हँ ये अलग बात है कि इनकी बात गली मुहल्लों तक ही रह जाती है।

हर्षवर्धन said...

बढ़िया बकरा काटा है।

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