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Friday, August 15, 2008

फिल्म नया दौर से बेहद मिलते-जुलते हालात (विश्लेषण)


फिल्म नया दौर का वो सीन याद है जब सडक बनाने को लेकर विवाद हो गया था, विलेन (जीवन) किसी भी हालत में सडक बनने नहीं देना चाहता था क्योंकि इससे उसके विरोधी तांगे वालों को रोजगार मिल सकता था और उसकी खुद की चल रही बस की सवारी कम हो सकती थी, यदि आप फिर वही सीन याद करें तो हूबहू आज के ताजा हालात से मेल खाते दिखाई देंगे, यहां तक की फिल्म के डॉयलॉग तक अकल्पनीय रूप से ऐसे लगेंगे जैसे आज की परिस्थतियों को देखकर कहे जा रहे हैं - पेश है इसी मुद्दे पर मेरी ओर से एक विश्लेषण।

    सडक न बनाने के लिये विलेन(जीवन) ने अपने साथी पंडित को इस काम पर लगा दिया, उस पंडित का कमाल देखिये, एक देवी मां की मूर्ति ठीक उस जगह जमीन खोद कर गाड़ दी जहां से सडक गुजरने वाली थी, बस फिर क्या था, अगले दिन जब सडक बननी शुरू हुई तो बीच सड़क देवी मां की मूर्ति निकल आने से सभी गांव वालों में हडकंप मच गया, सभी लोग हतप्रभ रह गये, किसी को देवी मां का चमत्कार लग रहा था तो कोई कह रहा था अब यहां मंदिर बनेगा, और इस मंदिर बनाने के लिये जोरदार आवाज उठाने वालों में वह विलेन और उसका साथी पंडित बढचढ कर बोल रहे थे, विलेन तो देवी मां के मंदिर बनाने के लिये बंदूक तक तान बैठा। कई लोगों को लगा यहां मंदिर ही बनाना चाहिये नहीं तो देवी नाराज होंगी, इस हंगामे को बढते देख लोगों ने बीच बचाव किया, जुम्मन चाचा जो कि मुसलमान थे , उन्होंने फिल्म के हीरो शंकर (दिलीप कुमार) को मनाया कि रहने दो बेटा, लडाई झगडा मत करो , मंदिर ही बन जाने दो, हम कोई और रास्ते से सड़क बना लेते हैं।

अब शंकर का कहना था कि, मंदिर और शिवाला लोगों को रास्ता दिखाने के लिये बने हैं, ना कि रास्ता रोकने के लिये. लेकिन अब क्या किया जाये.......वो सामने वाली जमीन गोपाल की है जिसका हमसे बैर चल रहा है, वो भला क्यों दे सड़क बनाने के लिये अपनी जमीन ।

    तब किसी तरह मौके पर मौजूद पत्रकार जॉनी वॉकर पहल करते हैं कि चलो मैं शुरू करता हूं सडक बनाना, पहले कुछ शुरूवात तो करो,........ लेकिन अभी पत्रकार महोदय ने शुरूवात ही की, कि एक लाठी बज गई....... गोपाल ने पत्रकार को रोक दिया, साथ ही ताकीद भी कर दिया ,  अगर किसी ने यहां से एक कदम भी मेरी जमीन पर रखा तो लाशें बिछ जाएंगी , तब शंकर (दिलीप कुमार) आगे बढ कर कहते है.- गोपाल, घर के लोग आपस में भले ही झगडा करें लेकिन जब कोई बाहर वाला आता है तो दोनों उससे मुकाबला करने के लिये एक हो जाते हैं......बस्ती की ईज्जत तुम्हारे हाथ में है गोपाल। और फिर क्या था, गोपाल ने परिस्थितियों को देखते हुए , रोजगार आदि के हालात को समझते हुए न सिर्फ शंकर के गले मिल लिया बल्कि, सडक के लिये ये तक कह दिया -मेरी जमीन से बनाओ सडक, देखता हूं कौन रोकता है...........और सडक को जब गोपाल की जमीन से बनाया जाने लगा तो पहले वाली सड़क के मुकाबले इस सड़क की दूरी और कम हो गई......यानि दिल और जमीन दोनों की ही दूरियां घट गई।

     अब जरा आज के हालात को देखा जाय, सेतू समुद्रम के नाम बवाल करने वाली पार्टियां क्या उस पंडित की तरह व्यवहार नहीं कर रही हैं जिसने रास्ता रोकने के लिये भगवान के नाम का सहारा लिया । इसी मुद्दे पर जब इन पार्टियों द्वारा तोडफोड किया जाता है तो उस विलेन (जीवन) की याद आ जाती हैं जिसनें भगवान के नाम पर रास्ता रोकने के लिये बंदूक तक उठा लिया। शंकर का यह कहना कि "मंदिर और शिवाला लोगों को रास्ता दिखाने के लिये हैं रास्ता रोकने के लिये नहीं" - अपने आप में आज की हकीकत को बयान कर रहे हैं,

याद रहे - सेतू समुद्रम के बनने से न सिर्फ रोजगार ही बढेगा (तांगे वालों का तरह) , बल्कि उससे , जहाजों के आवागमन में दूरी भी घटेगी (ठीक नया दौर की सडक की तरह), इससे जहाजों में लगने वाले ईंधन की खपत भी कम होगी, और पर्यावरण को भी नुकसान कम होगा।

एक और मुद्दा यदि इसी फिल्म के आलोक में समझा जाय तो बेहतर होगा -

       अमरनाथ की यात्रा से न सिर्फ लोगों को रोजगार मिल रहा है, बल्कि लोगों की आपसी समझ भी बेहतर होती दिखती है....पूरे देश के लोग ईकट्ठा होकर अपने आप को इस जम्मू-कश्मीर से जोड लेते हैं, यही वह सेतू है जो लोगों को जोडे हुए है, पर्यटन के नाम पर होने वाले जुडाव के मुकाबले यह जुडाव और लगाव कुछ ज्यादा कसा हुआ है........लेकिन यहीं पर मुश्किल शुरू होती है......कश्मीर के आतंकवादी और वहां के नेता क्यों चाहेंगे कि यह जुडाव बना रहे.......वो तो खुद अलगाव की ओर बढना चाहते हैं.......ऐसे मे अमरनाथ यात्रा के लिये दी गई जमीन उनके लिये उस पंडित की देवी मां से कम क्या होगी, बवाल शुरू हुआ और जमीन सरकार द्वारा वापस ले ली गई, ऐसे में न कोई गोपाल नजर आ रहा है, न शंकर, और न जुम्मन चाचा , बल्कि जुम्मा चाचा लोग हैं जो किसी हालत में समझौते की बात नहीं करते। और गोपाल , वो भला क्यों अपनी जमीन दे जब तक कि शंकर सामने से आकर न कहे.......लेकिन यहां शंकर लाठी लेकर मांग रहा है तो गोपाल भी लाठी लेकर उसे रोक रहा है........जाने यह लठैती कब रूकेगी......जाने कब यह दिल से दिल की सडक बनेगी।

- सतीश पंचम

9 comments:

राज भाटिय़ा said...

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाऐं ओर बहुत बधाई आप सब को
सतीश जी, शंकर का यह कहना कि मंदिर और शिवाला लोगों को रास्ता दिखाने के लिये हैं रास्ता रोकने के लिये नहीं
बहुत ही सुन्दर लगा आप का यह लेख पढ कर, काश लोग कुछ सबक ले.
धन्यवाद

P. C. Rampuria said...

वंदे मातरम् !
बहुत सुन्दरतम और शिक्षाप्रद लेख है !
आपको बहुत बधाई और शुभकामनाएं !

योगेन्द्र मौदगिल said...

bhai Wah
kya vishleshan hai ?
badiya........

दिनेशराय द्विवेदी said...

सतीश जी, इस सुंदर विश्लेषण और समझ को आगे बढ़ाने के लिए बधाई। बस ऐसे ही यह समझ आगे बढ़ाते रहें,सतत...


आजाद है भारत,
आजादी के पर्व की शुभकामनाएँ।
पर आजाद नहीं
जन भारत के,
फिर से छेड़ें, संग्राम एक
जन-जन की आजादी लाएँ।

Udan Tashtari said...

स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

Lovely kumari said...

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाऐं.achchha alekh tha iske liye alag se badhayi

Gyandutt Pandey said...

वाह, इस प्रकार दृष्टान्त से सीख समझाना तो विशुद्ध नव प्रयोग है जातक-कथा और पंचतन्त्र शैली का! अच्छी पोस्ट।

अनुराग said...

हमारे यहाँ तो बहुत बार बिल्डर हंस कर कहते है की ....."भाई जमीन कब्जानी है रात को कोई मूर्ति गाड दो...बड़े बड़े पुल तक रास्ता बदल लेते है गर कोई मन्दिर रास्ते में पड़ता है......यही हिन्दुस्तान है.....आपने सही विश्लेषण किया है....

Manish said...

वही बात फिर हो गयी … जो पहले सुना करता था…

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