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Monday, August 11, 2008

ये है एन डी टीवी को मिले २५ पुरस्कारों का राज




NDTV को 25 पुरस्कार मिलने का आख़िर राज क्या है - जानना चाहेंगे आप , जरूर बताऊंगा , लेकिन पहले एक नजर आज के चलताऊ किस्म के न्यूज़ चैनल की अमूमन देखाए जाने वाले प्रोग्रामों की ओर देखिये - सुबह ६ या ६.३० बजे किसी बाबा का प्रवचन , सात बजे - समाचार, जिसमे ज्यादातर तड़क भड़क के साथ रात भर मे कोई ऐसी घटना को ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप मे दिखाया जाए जिसमे कोई बार पर या रेव पार्टी पर छापा पड़ने की ख़बर हो और कैमरा बार - बार उन बार-बालाओं के पुलिस वैन मे चढ़ते उतरते इन लोगों के क्लोस-अप चेहरे दिखाए , या फ़िर रेव पार्टी के लोगों को इस तरह कैमरा कवर करे जिसमे कोई ख़ूबसूरत लड़की अपना चेहरा छुपा कर बैठी हो और रिपोर्टर इस ताक मे हो की इसका चेहरा भर दिख जाए तो बाकी लोगों से वह बाजी मार ले जायेगा और शायद उसकी रिपोर्टिंग को ज्यादा धारदार माना जाए । दिन चढ़ते ही इन चलताऊ किस्म के चैंनेलों पर खबरें थोक के भाव आने लगती हैं - फलां जगह सांप ने मन्दिर मे डेरा जमाया , एक बाबा हैं जो केवल चिमटे से इलाज करते हैं , एक और बन्दर देखिये जो शराब पीता है , कौवा जो अक्सर कांव - कांव करता है , और न जाने ढेरों ऐसी खबरें .....जिनकी फेहरिस्त लेकर बैठूं तो आप भी शायद उस लिस्ट को पढ़ते - पढ़ते ही सो जाएँ ।



अब जरा NDTV की ओर देखिये - सुबह भी वही खबरें मिलेंगी जो शायद आप को रात मे देखने मिली हों , एकाध ख़बर रात की हुई घटनाओं की ताजा - खबर कहकर दिखेगी भी तो थोडी देर बाद ही न्यूज़ रीडर ख़ुद ही कह देगी - अब बढ़ते हैं अगली ख़बर की तरफ , यहाँ भी आप को अक्सर कोई नई ख़बर तो नहीं मिलती लेकिन वो अगली खबर होती है , यानी जो भी खबरें बताई जा रहीं हैं वो होती तो बासी खबर ही हैं लेकिन उन्हें सारंगी की तरह देर तक रेतते नहीं रखा जाता , टुकडों मे बदल दिया जाता है , कभी कभी तो रात की ख़बर की पूरी रिकॉर्डिंग ही सीधे पेश की हुई लगती है, लेकिन यहाँ थोडी गहराई मे सोचें - इन खबरों मे सांप बिच्छू की खबरें नहीं होती , इनमे बाबाओं की चमत्कारी शक्तियां नहीं दिखाई जातीं , इनमे दिखती है तो एक बौद्धिकता , इनमे दिखती है एक प्रकार की विचार करने की शक्ति , और यही वो बात है जो इस चैनल की विश्वसनीयता बढ़ा देती है । सिर्फ़ नयी खबरें दिखने की आड़ मे कुछ भी दिखाते जाना शायद इस चैनल ने सीखा ही नहीं है । आगे बढ़ते हैं - जब सभी चैनेल मार काट की खबरें दिखाते हैं जो की होती तो हैं लेकिन उन्हें खिंच कर लंबा कर देने की पूरी कोशिश होती है तो ये चैनल गुड मोर्निंग इंडिया दिखाता है , ठीक पूरी ताजगी के साथ । मैं यह तो नहीं कह रहा की हिंसा की खबरें नहीं दिखानी चाहिए , लेकिन उसमे भी एक प्रकार की तारतम्यता होनी चाहिए , उसमे भी लोगों को समझदारी भरे ढंग से दिखाने की जरूरत होती है , ये नहीं की एक ही द्रश्य बार बार दिखाओ और उसके असर से बात बनने की बजाये और बिगड़ जाए । गुड मोर्निंग इंडिया के बाद एक दुसरे प्रोग्राम जिसमे की लोगों की बहस चलती है तो लगता है असली संसद तो यही है , लोग अपने विचार बखूबी रखते हैं, कभी माहौल ख़राब भी हो जाता है तो पंकज पचौरी वहीं अपनी एडी लगा के कहेंगे - हम....हम ......अभी इसी... इसी मुद्दे पर बात करेंगे, आप कहीं न जाइये , और प्रोग्राम एक दो विज्ञापन दिखा कर फ़िर उसी मुद्दे पर लौट आता है - यह है एंकरिंग का तरीका जो लोगों को बांधे भी रखे और खुला बोलने भी दे , वहीं बरखा दत्त की एंकरिंग भी पूरे उफान पर होती है - Lets look at the matter what Mr Farrookh has to say ....... और इसी बीच कोई टोक देता है Listen ......Listen to me first और तब बरखा कहती हैं- yes but he had to say and please........please first I want to listen from him and then I will come back to you और यहीं वो एंकरिंग की अधिकार पूर्ण चेतावनी दिखती है की यह बहस है , इसे यूँ ही जाया मत कीजिये । एक और प्रोग्राम आता है विनोद दुआ के साथ - जायका इंडिया का - गजब की जानकारी मिलती है । यूँ तो हम सभी जानते हैं की किस इलाके की क्या ज्यादा नामी चीज है लेकिन विनोद दुआ द्वारा उसे पेश करने का तरीका ही उसे अलग करता है , कभी बनारस की ठंडाई को लेकर बताएँगे कहीं सूरत की उन्दिया , इन्ही सब के बीच चलते जायेंगे और बताते जायेंगे । उधर कमाल खान को जब कोई रिपोर्टिंग करते देखते हों तो आप को उनके बोलने मे साहित्य की झलक दिखती होगी , कुछ शायराना अंदाज मे किसी चीज की रिपोर्टिंग करते हुए यह कह देना की फिराक ने कहा था .......या कभी हम ने सोचा था .........और यही वह सोच है जो कमाल को भीड़ से अलग करती है ।

ऐसा नहीं है की सब कुछ अच्छा ही लगता है, रात बाकी जैसे कार्यक्रम पर पेज थ्री की छाप दिखती है तो सोचता हूं ये अभिजात्य वर्ग का एक और चेहरा है जिसे पता नहीं क्यूं दिखाए जा रहे हैं।

ईसके अलावा बाकी सारे लोग हैं और ढेर सारे प्रोग्राम्स हैं जो NDTV को सबसे अलग करते हैं। कभी कभी मुझे इस चैनल पर दूरदर्शन की झलक दिखती है । सोचता हूं कहीं तो है कुछ बात जो इस चैनल से जोड़े हुए है । दूसरे चैनल भी कुछ सीख लेते हुए अपने आप को बदलें तो एक स्वस्थ प्रतियोगिता देखने में मिलेगी जो दर्शक और इन न्यूज़ चैनलों को जोडे रखेगी, वरना केवल सांप-बिच्छू दिखाने से तात्कालिक रूप से लोग भले आकर्षित हो जांय, अंत में यही कहेंगे - यार ये तो हमेशा यही सांप, नाग, बंदर, बाबा और चमत्कार ही दिखाता है- बदलो चैनल , और यहीं पर विश्वसनीयता सीधे तौर पर घटने लगती है।

उम्मीद है सूरते-हाल बदलेगी , वरना अब भी लोग भारत को यदि सांप-बिच्छू का देश माने तो ईसमें आश्चर्य कैसा।

11 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

जी हमें भी NDTV अच्छा लगता है।

अजित वडनेरकर said...

सही विश्लेषण । हालांकि सब न्यूज़ चैनल बिगड़ चुके हैं इसलिए एनडीटीवी उनमें आदर्श लग रहा है। वैसे एनडीटीवी औसत से बेहतर नहीं है। अभी उसे वो सब करने की हिम्मत दिखानी है जो दूरदर्शन कर चुका है। आखिरकार पुराने दिनों को याद करें तो एनडीटीवी की नींव में डीडी ही है। आज अगर यह स्वतंत्र चैनल है तो इसलिए है क्योंकि इसने बड़ी कमाई दूरदर्शन के लिए प्रोग्राम बनाकर ही की है।

और बेचारा दूरदर्शन....तब उसे सरकारी कह कर कोसा जाता था। आज के पिज्जा-बर्गर टीवी से जब लोगों का हाज़मा बिगड़ा तो दूरदर्शन का पथ्य याद आ रहा है।
हमदूरदर्शन के शैदाई हैं। कभी विस्तार से पुराने दिनों को याद करेंगे। अपने ब्लाग पर। अच्छी पोस्ट।

Suresh Chiplunkar said...

वाकई अंधों में काना राजा है NDTV, चाहे वह कितना ही कांग्रेसपरस्त और "श-र्मनिरपेक्षता" का पक्षधर हो… :) :) एक समय ऐसा भी आयेगा जब लोग कहेंगे कि "ये तो कांग्रेस, सपा और मुसलमानों का चैनल है…"… बधाई तो दे ही देते हैं बेमन से ही सही… आखिर पुरस्कार की "जुगाड़" करना इतना आसान भी नहीं होता… :) :)

अनुराग said...

अभी कुछ दिन पहले निकिता मामले पर ओर शनिवार को या कल अमरनाथ विवाद पर एक स्वस्थ बहस हुई थी.....देखकर भला लगता है ...बस जब कोई फ़िल्म प्रमोशन पर ndtv पर आती है ओर उसके कलाकार उसके मंच पर तब दिल दुखता है ...रजत शर्मा जी तो लगता है पगला गये है ...देश का सबसे तेज चैनल भी झाड़ फूंक करवा रहा है....ऐसी उम्मीद है ndtv अपनी इस कसौटी को बरकरार रखेगा....

Nitish Raj said...

एनडीटीवी इस लड़ाई में अपने आप को बरकरार रख जाए ये बहुत ही बडी बात होगी। लेकिन ये भी मानता हूं कि इतने पुरस्कारों का राज कांग्रेसपरस्ती नहीं है। हर साल एनडीटीवी करीब करीब इतने ही परस्कार जीतता है।
http://nitishraj30.blogspot.com
http://poemofsoul.blogspot.com

Rajesh Roshan said...

सही विश्लेषण.... NDTV Dr. Roy के नाम पर चलता है.... ये सारे Instruction उनके बनाये हुए हैं

Anwar Qureshi said...

भारतीय मीडिया में अगर किसी का विस्वास किया जाये तो वह ndtv है ... जिसने अभी तक अपनी विश्वसनीयता नहीं खोई है ... २४ घंटे के न्यूज़ चैनल में हर वक्त ताजा खबरें आप के लिए नहीं परोसी जा सकती है ... शुक्र है इस देश में ndtv है , नहीं तो आप को ..बीप.. भुत ..और ..भाबुत ... से ही काम चलाना पड़ता ...

Shiv Kumar Mishra said...

आपका विश्लेषण बिल्कुल सही है. एनडीटीवी बाकी हिन्दी समाचार चैनलों से कुछ तो अलग है. सबसे अच्छी बात यह है कि इस चैनल के पास बहुत अच्छे और विद्वान् पत्रकार हैं जो एंकर, संवाददाता वगैरह की भूमिका बखूबी निभाते हैं.


अजित भाई की बात से सहमत हूँ.

राज भाटिय़ा said...

मे तो देखता ही नही टी वी वगेरा,क्योकि आज कल ऎसा आता हे कि बच्चो के साथ देख पाना मुझे मुस्किल लगता हे चाहे न्युज ही क्यो नो हो जो उस मे विग्यापन आते हे तोबा तोबा,फ़िर बाकी न्युज भी जेसे जादुगर के झोले से निकाल कर दिखा रहे हे, धन्यवाद इस ओर धयान दिलाने का

सतीश पंचम said...

इतनी बारीकी से मेरी पोस्ट पर टिप्पणी करने के लिये आप सभी का शुक्रिया, दरअसल इस मुद्दे पर जितना चाहो उतना लिखा जा सकता है, लेकिन पोस्ट ज्यादा लंबी न हो, बोझिल न हो, इसलिये काफी सस्ते में पोस्ट को निपटा दिया था, पर अनुमान नहीं था कि ईस पर इतनी अच्छी बहस चल निकलेगी। वहीं यार दोस्तों के फोन आने लगे कि यह पोस्ट मिडिया कर्मियों मे चर्चा का विषय बन चुकी है तो समझ नहीं पाया कि इसमें एसा क्या लिख दिया है....कई बार अपनी पोस्ट को पढा....लेकिन समझ न आया, अंत में एक बात मेरे मित्र अनुज ने बताई की यही विश्लेषण किसी मिडया हाउस या सर्वे एजेंसी से करवाया जाता तो शायद पैसे लगते, शायद यह भी एक कारण हो चर्चा में रहने का, लेकिन मैं तब सोच में पड गया कि यह तो कोई भी आम दर्शक बता सकता है जो कुछ मैने लिखा था....NDTV आदि की विशेषता आदि....ईसमे सर्वे वगैरह की बात कहां से आती है, ईतना तो खुद चैनल वाले भी जानते हैं ,पर बात दरअसल यह है कि यह विश्लेषण ब्लाग पर हुआ था , और यही बलॉग विश्लेषण इस पोस्ट की ताकत बन गई.....उम्मीद है आगे भी मेरे ईस तरह के विश्लेषण कुछ ईसी तरह की अच्छी बहस को जन्म दे सकेंगे।

अंत में यही कहूंगा कि ब्लॉगजगत की एक और ताकत का पता चला।

Binod Jee said...

इतने पुरस्कारों का राज कांग्रेसपरस्ती ही है अगर नहीं तो पंकज पचौरी या विनोद दुआ आदि का कर्यक्रम देख लें.केन्द्र सरकार मे इतने घोटाले होने के बाद भी कांग्रेस के नेता जब कुतर्क पे कुतर्क एवं झुठ पर झुठ बोलते रह्ता है लेकिन शायद ही कभी क्रास क्वेश्चन करता हो लेकिन जैसे ही भाजापा या बिपक्ष के नेता हो तो फीर तीर पर तीर छोड्ते है लेकिन कंग्रेस के सामने सारे तीर कमान चला जाता है.

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