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Saturday, August 9, 2008

अब काली गाय कहाँ ढूँढू (फुलकारी)

काली गाय को पके आलू खिला देना , सफ़ेद- काले कुत्ते को पपीता खिला देना , तुम्हारा काम बन जायेगा, हो सके तो दो केले दान मे दे देना , किसी को चीकू या ऐसा ही कोई फल पूर्व दिशा की और मुह करके दान करना , तुम्हारा काम बन जायेगा । ये कुछ मंत्र हैं जो आजकल रोज गणेश जी के नाम पर एक न्यूज़ चैनल पर दिमाग खाने आ जाता है, बच्चे मजे लेते हैं की पापा वो देखो बौड़म महाराज आ गए । आप लोगों की जानकारी के लिए बता दूँ की ये बौड़म महाराज राशि के हिसाब से सब को कोई न कोई मन्त्र बताते जायेंगे , ऐसे ऐसे लच्छेदार भाषा बोलेंगे मानों सीधे गणेशजी से ही मिल कर आ रहे हैं। तुम ये करना , तुम वो करना , हो सके तो ये भी करना ........समझ नहीं आता की क्या करूँ की ये बौड़म महाराज को न देखना पड़े, रिमोट लेकर बदलना चाहता हु तो बच्चे कहते हैं , नही हमें ये ही देखना है । मैंने कहा कोई कार्टून वगैरह देखो तो कहते हैं इससे बड़ा कार्टून कहाँ मिलेगा , तंग आकर मैं कुछ पढने लगता हूँ तो ठीक से पढ़ा भी नहीं होता की तभी इन बौड़म महाराज की साक्षात् वाणी सुनाई देती है - अब ये दान देना ...........चीकू दो हो सके तो तीन दान देना - वगैरह- वगैरह और इस वगैरह के चक्कर मे पढने से मन उचट जाता है और मैं भी मूर्खों की तरह टुकुर -टुकुर इन बौड़म महाराज को देखता रहता हूँ । ये महाराज इतनी चमकीली और लिजलिजी ड्रेस पहनते हैं की अमीबा भी देखे तो अपने लिजलिजी देह पर शर्मा जाए ........ ऊपर से हाथ चमका -चमका कर ऐसे प्रवाह मे बोलेंगे लगेगा - मुह से कोई आवाज का फव्वारा निकल रहा है ।

मैं समझ नहीं पा रहा ये न्यूज़ चैनल वालों को आख़िर हो क्या गया है, कहीं ये भी तो बौड़म महाराज नहीं बनते जा रहे हैं , जिस चैनल पर देखो वहीं ईस प्रकार के बौडम महाराज दिख जाते हैं। सुबह प्रवचन करते दीखते हैं बाद मे उसी चैनल पर ये अपराध भी करते दीखते हैं , कहीं जमीन हथियाने के रूप मे तो कहीं किसी केस में । अब सोचता हूँ की उन्ही बौड़म महाराज के पास जाकर उनसे ही मुक्ति का उपाय पूछूं , लेकिन जानता हूँ , वो कहेंगे - काली गाय को पपीते का बीज खिला देना , सब ठीक हो जायेगा , अब मैं इस शहर मे काली गाय कहाँ से ढूँढू। :)

- सतीश पंचम

12 comments:

Nitish Raj said...

मियां काली गाय को बिना ढूंढे तो काम बनेगा नहीं।
रोज दोपहर २.२० पर देख कर गाय ढूंढने निकलते हैं या फिर सुबह ही निपटा लेते हैं। सतीश जी फिर बताऊंगा इस के पीछे का राज़। लेकिन देखते रहिए गणेशवाणी।

Lovely kumari said...

अंधविश्वास के मारे, हम बेचारे.

vipinkizindagi said...

काली गाय काले कुत्ते को ढूँढने तो निकल जाते है लोग मगर ये पता नही रहता की मन भी काला ही रखते है

राज भाटिय़ा said...

आप का लेख पढ कर मजा आया, लेकिन बच्चो को बताना चाहिये यह सब बकवास हे हमारे यहा भी ऎसे बहुत से बौड़म महाराज ओर महारानिया आती हे, हाथो मे अंगुठिया ओर वो भी बडी बडी, ओर वेसे तो हम इन्हे कभी देखते ही नही, कई बार नींद ना आये तो इसे देखने लगते हे, ओर जल्दी ही नीद आ जाती हे,
धन्यवाद

अनुराग said...

vajib mushkil aor vazib savaal hai guruvar....

Udan Tashtari said...

बिना काली गाय ढ़ूंढ़े मुक्ति नहीं मिलेगी. लगे रहो..हा हा!!!!

Udan Tashtari said...

काली गाय न मिले तो सफेद भैंस को खिला दोगे तो भी मुक्ति मिल जायेगी. बौडम महाराज बता रहे थे.

योगेन्द्र मौदगिल said...

झोटे और साण्डों ने क्या बिगाड़ा है इन बौड़मों महाराजों का ?
भई पंचम जी,
मेरी राय में तो
लाल झोटा (husband of Bhains)
चितकबरा साण्ड (husband of Gaay)

की सेवा जल्दी फल देती है

Gyandutt Pandey said...

चकमक सभ्यता के पीछे आदमी है - भ्रमित, पगलाया, ऊबा और सतही!
तभी इन सब तरह के चैनलों-बाबाओं की चल रही है।
और निकट भविष्य में परिदृष्य बदलने वाला नहीं।

P. C. Rampuria said...

भई पंचम जी आपका दुःख ताऊ से देख्या नही जावे सै !
म्हारै पास काला कुता भी है और काली गाय और भैंस भी
है ! और बाबा ने जो जो बताएं है वो सब हैं ! तो आपको जो
भी दान धर्म करना हो हम करवा देंगे ! हमको याद कर लेना !
पर अंत में एक सलाह की -- भूल कर भी थाने मत जाना !
यार लोगो का क्या है ? मजे ले रहे हैं ! अब हम तो दयालु
बाबा हैं ! सो लेने दो मजे इनको भी ! :) :) :)

सतीश पंचम said...

आप सभी का शुक्रिया जो ईतने दिल लगा के मेरी समस्या सुन रहे हैं...वैसे तो मैं कभी अपने कमेंट सेक्शन में शुक्रिया..धन्यवाद नहीं व्यक्त करता , क्योंकि ईस तरह के शब्द लिखने के बाद आगे आने वाले टिप्पणीकार मेहमानों को लगता है कि यहां तो पहले ही डेरा-डम्मर उठ चुका है, धन्यवाद .....शुक्रिया कहा जा चुका है....अब यहां क्या टिपियाया जाय , चलो कहीं और डेरा-डम्मर देखते हैं....सो मेहमाननवाजी के फेर में अपना भंडारा (मेहमानखाना) चौबीसों घंटे खुले रखते हैं, ईसलिए आप लोग मेरे द्वारा धन्यवाद आदि न लिखने पर बुरा न मानें :)
तो बात हो रही थी समस्या के बारे में....यहां हालत ये है कि रामपुरियाजी के पास वे तमाम साधन मौजूद हैं जिन्हें खिलाने-पिलाने से सारी समस्या हल हो जाती है...मैं सोच रहा हूं..फिर तो रामपुरियाजी की कोई समस्या ही नहीं होनी चाहिए...रोज ही बिना बौडम महाराज के कहने से पहले ही गाय...कुत्ते..भैंस को कुछ न कुछ खिलाते होंगे और पुण्य कमाते होंगे....सारे काम ईनके बनते चले जा रहे होंगे :) रामपुरियाजी, अब आप तैयार हो जाईये अपना डेरा-डम्मर लेकर क्योंकि जब किसी को कोई समस्या हुई वो सीधा आपके यहां कूच करेगा। :)

अब थोडा समस्या के बारे में गंभीरता से सोचा जाय ...यदि गाय और भैंस को ही खिलाने से सारे काम बन जाते हैं तो क्यों देश के किसान आत्महत्या कर रहे हैं , जिनका कि काम ही यही है...किसान दिन रात इसी मे जूझता रहता है, गाय-भैंसों को पानी-सानी देता है...खाना खाने बैठता है तो अपनी रोटी में से ऐकाध टुकडा कौरा के रूप में सामने आ बैठे कुत्ते को दे ही देता है, फिर क्यूं उसके दिन नहीं बहूरते, फिर क्यूं वो हमेशा बदहाल रहता है.....यहां मुंशी प्रेमचंद के शब्द याद करना चाहूंगा कि...भारत का किसान अभावों में जन्म लेता है...अभावों में ही जीता है और अभावों में ही मर जाता है.....ऐसे समय में जाने क्यूं ईन बाबा लोगों पर कोफ्त होती है कि फिजूल की उलूल-जूलूल बातों से लोगों को भरमाते है ...और उससे बढकर ईन न्यूज चैनल वालों पर गुस्सा आता है जो ऐसे कार्यक्रम जारी रखते है....और आजतक जैसे चैनल (जिसपर ये महाराज आते हैं) इस मामले में आग में घी का काम करते हैं.....शायद यही वजह है कि NDTV ने ऐकसाथ 25 पुरस्कार लेकर ऐसे चैनलों को आईना दिखाया है कि लो देख लो अपने आपको और अपने बाबा लोगों को. शायद बाबा ही बताएं की अपनी घटती विश्वस्नीयता की समस्या से छूटकारे के लिए किस गाय को किस ओर मुह करके स्टूडियो मे क्या खिलाएं और कहां बैठाएं। :D

pallavi trivedi said...

बहुत अच्छा मुद्दा आपने बड़े हलके फुल्के ढंग से उठाया....चैनल वाले अंधविश्वासों को दूर करने में सहायक हो सकते हैं लेकिन इनकी भूमिका सिर्फ जनता को भ्रमित करके टी.आर.पी. बढ़ने में है बस...

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