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Tuesday, July 22, 2008

ऐ जी, मुह उठा के कहाँ चले , संसद ? (फुलकारी)

ऐ जी सुबहिये सुबहिये कहाँ जा रहे हैं मुह उठा के - नेताईन ने नेताजी से पूछा ।
अरे औऊर कहाँ, यहीं जरा संसद तक तनिक टहल आते हैं, दोस्तन से मिल आते हैं औऊर कुछ नहीं तो तनिक सो आते हैं।
सोने काहें संसद मे जा रहे हैं, घरवा नहीं है का ।

अरे तुम का जानों संसद मे सोने का मजा । जब चारों और ऐ बे तू बे लगा हो तब अपनी आँख बंद कर केवल सुनने भर से अध्यात्म लाभ मिल जाता है , लगता है जैसे पंडितजी कथा बांच रहे हैं और हम सुन रहे हैं , श्रोता लोग पंचामृत लेने के लिए मन मे नारायण का जाप कर रहे हैं और पंडितजी जल्दी जल्दी कथा बांच रहे हैं की जल्दी से सब ख़त्म करूँ और सीधा- पिसान जो मिले बाँध बूंध के चलूँ।

लेकिन ऐसन माहोल होता है संसद मे की अध्यात्म मालुम पड़े।

अरे अध्यात्म की बात कर रही हो वहां साक्षात् नारायण के दर्शन हो जाते हैं, भिन्न भिन्न रूप मे दर्शन होता है, कभी नगद नारायण के रूप मे, कभी कौनो निगम के चेरमन के रूप मे त कबहू मंत्री पद के रूप मे ।
अच्छा...... इ बात है तो लोग तीरथ करने संसदे काहें नहीं चले जाते।
जाते हैं, बहुत लोग जाते हैं, और कोई कोई के तो नसीब मे नहीं होता की इ तीरथ करें, गोविन्दावा को देख लो,
धर्मेंद्रवा को देख लो , इ सब को तीर्थ का महात्मे मालुम नही है । पता नहीं कब जान पाएंगे इ लोग।

इतना बाबा लोग सुबह सुबह टीबी पर आते हैं, कभू केहू नही बताया की एहो एक तीरथ है ।

अरे तू का जानो, एक समय रहा जब इ लोकतंत्र का मन्दिर रहा, हर तीरथ से बढ़कर, हर महातम से बढ़कर । समय बदल गया और इ लोकतंत्र के मन्दिर नगद नारायण के मन्दिर बन गवा है , हर कोई अब मुह उठा के खुल के मांग रहा है, कौनो लाज सरम नही, कौनो लिहाज नहीं, और मजे क बात इ की इहाँ लाज लिहाज करे वालन के कुछ नही मिल पाता , मिलता है तो केवल नंगई करने वालों को।

अच्छा तभी तो कहूँ की अपने धरम मे साधू बाबा लोग नंगे या अधनंगे क्यों रहते हैं। अब जा कर समझ आया है।
धन्य है ई मन्दिर और धन्य है ई मन्दिर के साधू बाबा लोग।

- सतीश पंचम

13 comments:

Udan Tashtari said...

सही रहा....समझ तो आ गया. :) बेहतरीन.

महेंद्र मिश्रा said...

बेहतरीन.......

Gyandutt Pandey said...

इ बात है तो लोग तीरथ करने संसदे काहें नहीं चले जाते।
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वाह! अस्थि विसर्जन को लोग संगम नहीं, संसद जाया करें! :)

अनुराग said...

आज ६ बजे तक वही रहियेगा ....शायद कुछ मिल जाये

जगदीश त्रिपाठी said...

जबसे हमने है सुना, भइया पंचम राग
ब्लाग भगत हम हो गए,काम धाम सब त्याग
काम धाम सब त्याग,देखते उनकी माया
एमपी हैं वे धन्य,मिला माया का साया

महामंत्री-तस्लीम said...

बहुत खूब। आपने अच्‍छी चुटकी ली है।

विक्रांत शर्मा said...

बहुत खूब पंचम बाबू.

राज भाटिय़ा said...

इ लोकतंत्र के मन्दिर नगद नारायण के मन्दिर बन गवा है, पंचम बाबू सची कहत हे जी,अजी अंखिया से टी वी पर देखित रहेन, राम राम
पंचम बाबू जी आप का धन्यवाद

pallavi trivedi said...

badhiya raha...

Ila's world, in and out said...

खूब चुटकी ली आपने देश के नेताओं की.बेहतरीन व्यंग्य.

Smart Indian said...

bilkul sahee kahaa aapne.

vipinkizindagi said...

achcha likha hai...

P. C. Rampuria said...

धन्य है ई मन्दिर और धन्य है ई मन्दिर के साधू बाबा लो

भाई पंचम जी आपने जो व्यंग किया है वो तो अपनी
जगह सोलह आने सही है ! पर मुझे तो आज आपकी
भाषा और लेखन का मजा पहली बार मिला ! और
इससे पहले यहाँ आना नही हुआ इसका अफ़सोस भी
बहुत हुआ ! आपकी शैली का आनंद लेने यहाँ आते
रहना पडेगा !

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