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Sunday, July 20, 2008

तो मुर्गा इतना बड़ा है (फुलकारी)

अमिताभ की उस फ़िल्म का एक द्रश्य याद है आप को जिसमे अमिताभ बच्चन अदालत मे एक झूठी गवाही देते हैं की फलां तो बहुत अच्छा है। उसके बारे मे तरह तरह की बातें बताते हैं, लेकिन जब वकील उनसे पूछता है की क्या आप उन शख्स की कद काठी बता सकते हैं की वो कितने बड़े या छोटे हैं, तो अमिताभ ने कठघरे मे खड़े खड़े ही फट से अपना एक हाथ जमीन से करीब पाँच या छह फीट की ऊँचाई पर लाकर रोक दिया और कहा इतने होंगे जनाब। तब वकील ने कहा -क्या आप को पता है की जिस की आप गवाही देने आए हैं वो एक आदमी नहीं एक मुर्गा है और यह मुकदमा मुर्गों की लडाई से समन्धित है तो अमिताभ ने तपाक से कहा ठहरिये, अभी मैंने अपना दूसरा हाथ लगाया नहीं और आप लोग शुरू हो गए, कहते कहते अमिताभ ने अपना दूसरा हाथ अपने पहले हाथ के नीचे इतनी दूरी तक सटा दिया जितने मे की एक मुर्गा अंट जाए , और तब जाकर मुकदमे मे गवाही पूरी हुई की हाँ मुर्गा इतना ही बड़ा था और अमिताभ जो बयान दिए उसमे सच्चाई है। कुछ यही हाल आजकल नुक्लीअर डील पर हो रही बयानबाजियों की है, सुबह तक एक नेता सपा मे था दोपहर होते होते बसपा मे चला गया , यानी ठीक दोपहर की पैदाईश कह सकते हैं , सुबह तक ख़ुद शाहिद सिद्दीकी जो नई दुनिया के संपादक है सभी पत्रकारों को कह रहे थे की आप लोग बिना सर पैर की बात करते हो, कहीं कोई नेता सपा से या कहीं से नहीं जा रहा है , बिना मतलब ख़बर चलाना बंद करो , मैं सपा मे हूँ, और सपा के लिए हूँ,यह शायद उनका पहला हाथ था ,लेकिन यह क्या वही शाहिद सिद्दीकी दोपहर तक नई दुनिया बसाते हुए बसपा मे चले गए और कहा की मेरे अपने लोगों का मुझ पर भारी दबाव था , मैं नुक्लीअर डील को मुसलमानों के ख़िलाफ़ मानता हूँ , तब लगा की शाहिद सिद्दीकी ने अपना दूसरा हाथ लगाया है और तब जाकर पता चला की मुर्गा इतना बड़ा है। वाह रे माया और वाह रे राजनीती।
उधर पत्रकारों से रामविलास पासवान कह रहे थे की सरकार स्टेबुल है यानी सरकार के बुल स्टे की स्थिति मे हैं स्टेबुल । और शिबू सोरेन से पत्रकार जब पूछे की प्रधानमंत्री के यहाँ आप लोग केवल डिनर वगैरह के लिए जा रहे हैं की कुछ विचार मंत्रणा भी करेंगे तो मैंने सोचा की सीधे सीधे पत्रकार यह क्यों नही पूछता की आप लोग खाना ही खाने जा रहे हैं की बाद मे दिमाग भी खाने की उम्मीद मे हैं , वैसे भी कब कौन नेता क्या खाने लगे कहा नही जा सकता ठीक वैसे ही जैसे पप्पू यह नही कर सकता , पप्पू वह नही कर सकता और पप्पू है की सब करता जाता है , जेल से बाहर आकर वोट भी डालने आ जाता है, वोट डालने से पहले बयान भी दे जाता है और बयान देकर , वोट देकर वापस पप्पू अपने निवास स्थान पर भी चला जाएगा यह हम सब जानते हैं ।

उधर पप्पू यह भी गा रहा है - ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है , ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है..........मैं रखता हूँ दुनिया को ठेंगे पर अपने , ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।
- सतीश पंचम

6 comments:

Gyandutt Pandey said...

अमिताभ के दोनो हाथ, मुर्गा और डील - वाह, क्या दृष्टांत दिया है। बहुत जमा!

अनुराग said...

kamal hai aap rajnetayo ki bat itni seroiusly lete hai,amar singh ko bhool gaye kya kahte the ,kal ke times if india ke front page par 5 maharathiyo ki tasveer thi,jo is desh ki sarkar ka nirdharan karege.isse bada durbhagya aor kya hai?

राज भाटिय़ा said...

अगर लोक तन्त्र यह हे,तो लुट तन्त्र कोन सा होगा, जनता भी वेवकुफ़ हे जो इन उल्लु के पट्टो को फ़िर से चुन लेती हे,एक रोटी चुराने बाले को मार मार के जान ले लेती हे यह जनता, ओर लोगो की रोटी ओर जान लेने वाले को बार बार चुनती हे यह जनता.

Udan Tashtari said...

क्या सही तुलना की है भई..:)

pallavi trivedi said...

bahut sahi...

P. C. Rampuria said...

वैसे भी कब कौन नेता क्या खाने लगे कहा नही जा सकता !

बहुत बेहतरीन लिखा ! आपको पुन: धन्यवाद !

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