फ़िर बस थोड़ा और आगे बढती है तो एक बस स्टाप पड़ता है जिसके लोहे के पाईपों पर प्रेमी जोड़े बैठे रहते हैं। कोई गलबहियां डाले बैठा है तो कोई गालों को सहला रहा है, तब फ़िर सभी की नजरें उसी बस स्टाप पर जा बैठती हैं ,कई बार यहाँ रहने वाले लोगों ने चाहा की उनके इलाके के बस स्टाप पर से ये प्रेमी जोड़े हट जाएँ, उनके रहने से घर के बच्चों पर बुरा असर पड़ता है , लेकिन ये जोड़े नहीं हटते और फ़िर आ बैठते हैं। एक बार तो हद हो गयी , लोगों ने उन लोहे के पाईपों पर ग्रीस लगा दिया जिससे की जोड़े न बैठ पायें, जोड़े आते और मन मसोस कर आगे की ओर बढ़ जाते, कुछ देर यही सिलसिला चला, आसपास के लोगों ने सोचा चलो , जान छुटी, अब ये यहाँ नजर नहीं आयेंगे। अगले दिन देखा सभी जोड़े उन लोहे के पाईपों पर अखबार बिछा कर बैठे थे और आसपास के लोग अपना माथा पीट रहे थे।
वैसे इस इलाके के बारे में म्यूनिस्पेलिटी को भी पता है , उन देखरेख करने वालों ने देखा की सीमेंट के जो लंबे लंबे सोफेनुमा सीटें बनी हैं उन पर जोड़े अक्सर ज्यादा ही खुलेपन का इजहार करते हैं और कोई कोई तो उस पर आराम से सो जाता है और लोगों को बैठने की जगह नहीं मिलती , इसी उपक्रम मे प्रेमी जोडों को अलग अलग बैठने के लिए उद्यान अधिकारीयों ने उन सीमेंट के बड़े बड़े सोफेनुमा सीटों को हटवाकर सीमेंट का ही ढेर सारा सिंगल चेयर लगवा दिया जिससे की एक सीट पर सिर्फ़ एक ही व्यक्ति बैठे लेकिन यहाँ भी जोडों ने उन्हें फेल कर दिया , अब दोनों ही प्रेमी प्रेमिका उस सिंगल चेयर पर और भी सटकर बैठने लगे और कोई कोई तो एक दुसरे के गोद मे बैठने लगे और अधिकारी अपना सर नोचते रहे ।
अब इससे ज्यादा डिटेल बताने लगूंगा तो अश्लीलता का आरोप लग सकता है , इसलिए अब ये चर्चा यहीं समाप्त कर देता हूँ।
हो सके तो टिप्पणियाँ दे कर हमारा मनोबल बढाये , ताकझांक के लिए नहीं भाई , आगे भी ऐसी फुलकारी लिखने के लिए :)


9 Comments:
सीन तो पूरा किया नहीं,
फिर...
टिप्पणी काहे बात की ?
दिल्ली में भी कुछ जगहें ऐसी हैं। लेकिन अधुरी बात लिखना
अपराध है।
पूरी बात बताने से तात्पर्य यदि उन जोडों के बेहद करीबी क्रियाकलापों से है तो क्षमा करें ये थोडा मुश्किल है, घर के बच्चे कल को मेरा ब्लाग पढेंगे तो कहेंगे - पापा यही सब करते होंगे तभी ईतनी तफ्सील से वहां की बातें बता रहे हैं :)
उनमें से कोइ कल ब्लाग लिखेगा तो कहेगा - मेरे पापा और उनका ब्लाग.......पापा के Freinds भी उनसे फाईव गार्डन की बातें पूछते थे...यानि वो भी पापा की तरह ही यायावर थे और यहां वहां ताकझांक करते फिरते थे :)
कुछ उनके कोण से भी सोचा जाये। घर में प्राइवेसी नहीं; शहर में पहचान का डर नहीं। आदमी/औरत यह नहीं करें तो क्या करें। हर व्यक्ति संयम का पुतला तो हो नहीं सकता।
दया के पात्र हैं ये सब।
नानावटी हॉस्पिटल में ८ महीने गुजारे है ओर गुजरात में १० सल् ...सूरत शहर की यूनीवेर्सिटी रोड पर जाइये ये द्रश्य आम मिलेगे .अब तो सुना है वहां बसावट हो गई है.....मुंबई वैसे भी भीडभाड वाला शहर है भाई......
हमारे यहां तो एक पार्क का नाम ही एकांत पार्क है। इस एकांत का लाभ कोई और लेता उससे पहले ही इन कबूतरों ने मौका पहचान लिया।
पहली बार आपके ब्लाग पर आना हुआ। अच्छा लगा।
kolkata ke halat bhi kuchh alg nahi.whan to aksar kanun ke rakhwale bhi pahunch jate hain par dekhne ke liye nahi paise lene ke liye.
अरे भाई जहा हम रहते हे, वहा तो थोडी गर्मी पडी नही कि बस ... हमारे भारत से आने वाले मित्र हमेशा इधर ही घुमना पसंद करते हे,इस लिये किस किस पार्क का नाम लू
सीमेंट की सीटें तोड़ने के बजे नगर निगम को फुटपाथ सुधारने के बारे में सोचना चाहिए. हिंसा के झंडेबरदार तो सारे मुल्क में बेखौफ़ घूम रहे हैं, कोई कोना प्यार करने वालों के लिए भी छोड़ दिया जाए तो कैसा रहे? पहले ही हिजडे, पुलिस वाले और कहीं कहीं तो (अ)धार्मिक संगठन भी अपने-अपने फ्रस्ट्रेशन लेकर इन बेचारों के पीछे पड़े हैं. वे किसी का कुछ बिगाड़ नहीं रहे. कहीं भी दंगा, बंद, आगज़नी, पथराव नहीं कर रहे है. कृपया उन्हें चैन से बैठा रहने दें.
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