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Sunday, June 29, 2008

मुंबई लोकल मे गद्दी विवाद (रेल-वाकया)

सफर के दौरान कभी कभी different अनुभव भी होते हैं। मुंबई के लोकल डिब्बे मे भी ऐसा ही कुछ कल हुआ था और जरुरी है की उसे आप लोगों से शेअर करूं ,दरअसल बात ये हुई की अक्सर लोकल मे भीडभाड रहती ही है , और सुबह या शाम का पीक हावर हो तो कहना ही क्या , कल भी ऐसा ही कुछ हुआ था , अँधेरी जाने वाली लोकल के फर्स्ट क्लास के डिब्बे मे चढा तो देखा सीटें फुल हैं, वहीं कुछ लोग दो सीटों के बीच मे खड़े हैं ताकि अगला जब उठे तो उसे ही पहले बैठने मिले, कुछ लोग इस बैठने के चक्कर मे न पड़कर मान लेते हैं की अब सीटें न मिलेंगी और खड़े होकर जाना पड़ेगा इसलिए अपना बैग या जो कुछ लैपटॉप वगैरह होता है उसे छत से लगे कैरिअर पर रख कर बगल मे खड़े हो जाते हैं। अब होता ये है की जो बन्दा दो सीटों के बीच जाकर इसलिए खड़ा हो जाता है की उसे पहले बैठने मिले , उसे ही अक्सर उन लोगों के बैग ले लेकर रखने होते हैं जो अपना बैग कैरिअर पर रखना चाहें क्योंकि कैरिअर के सबसे नजदीक वही होता है और दुसरे किसी को उस जगह पर पहुँचने भर की जगह नही होती , और जब कोई उतरना चाहे तो उस बन्दे को ही बैग उतारकर देना भी पड़ता है और बदले मे प्लीज या थैंक्स उसे मिलते रहते हैं । तो हुआ यूँ की एक यात्री ने अपना बैग प्लीज कहते हुए उस करिअर के नजदीक वाले बन्दे को थमा दिया , अब उसने बैग लेकर रख तो दिया लेकिन मुह बना कर अपने बैठे हुए साथी यात्री को कहा , ये जगह पे खड़ा होने पे यही तकलीफ है, बैग लो बैग दो , बस यही करते रहो। उस यात्री ने जिसने अपना बैग पकडाया था बिल्कुल बुरा नही माना और चहकते हुए कहा - अरे यार ये तो Royal Opportunity है Royal opportunity. इस पर कैरिअर के पास खड़े बन्दे ने कहा - तो आप इस Royal Opportunity को क्यों नही ले लेते , आ जाओ आप ही , take this Royal Opportunity. तब उस यात्री ने कहा - see, I don't want to accept that Royal Opportunity ,because I am not opportunistic।
उस यात्री का इतना कहना था की सभी के चेहरे पर थोडी मुस्कान आ गयी। फ़िर उस यात्री ने विस्तार से बताना शुरू किया , I say Royal opportunity because - आप को सभी लोग प्लीज और थैंक्स कहते हैं , आजकल कौन किसी को प्लीज बोलता है , और दूसरी बात - आप जहाँ खड़े हैं उस हिसाब से कोई सीट खाली हुई तो पहले आप को उस गद्दी पर बैठने मिलेगा फ़िर कोई दूसरा बैठेगा , इस हिसाब से आप राजकुमार हैं, प्रिंस हैं, आप साक्षात् राजा के होने वाले अवतार हैं। अब तो सभी लोग जो दबी दबी हंस रहे थे खुल कर हंसने लगे , और वो बन्दा जो नाराज हो रहा था की कहाँ आकर फंस गया इस बैग दे बैग ले वाली जगह पर , वो भी हंसने लगा। तब तक अगला स्टेशन आ गया और नए यात्रियों की भीड़ अन्दर आ गयी। अब कुछ नए लोग उस घटना स्थान के आसपास जमा हो गए थे , तभी एक यात्री अगले स्टेशन पर उतरने के लिए अपनी सीट से उठा और झट से नए आए यात्रियों मे से एक बैठ गया और जो बन्दा कैरिअर के पास खड़ा था वो बस जैसे मन मसोसकर रह गया। तब फ़िर उस बैग वाले यात्री ने कहा कभी - कभी गद्दी हथिया भी ली जाती है, उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए, ये सुनकर सभी फ़िर एक बार मुस्कराए , तभी एक बैठा हुआ यात्री खड़ा हुआ और उस खड़े यात्री से बोला - have a seat yaar. तब फ़िर वो बैग पकडाने वाला बोल पड़ा , ओह तो यहाँ तो भरतजी भी हैं जो मिली हुई गद्दी छोड़ रहे हैं , बस फ़िर क्या था डिब्बे मे जोरदार ठहाका लग गया।

10 comments:

Raviratlami said...

ये तो बढ़िया, मनोरंजक लघुकथा हो गई!

chavanni chap said...

local ke aur kisse post karen.yah rochak hai.
http://chavannichap.blogspot.com/

अनुनाद सिंह said...

ऐसे हंसी मजाक होते रहें तो यात्रा का मजा चौगुना हो जाता है। बढ़िया चर्चा सुनने को मिली।

Gyandutt Pandey said...

मनोरंजक। भरत जी भी मिल गये।
अगली बार खर दूषण त्रिशिरा और बाली भी ढ़ूंढ़ियेगा। सब मिलेंगे मेट्रो में!

Udan Tashtari said...

दिलचस्प-यूँ ही इस तरह के किस्सों को शब्द देते रहें. आसपास बहुत मनोरंजक घटनाऐं होती रहती है. बहुत उम्दा.

siddharth said...

यही सब देख सुनकर स्व. शरद जोशी जी कहा करते थे असली हिन्दुस्तान की झलक देखनी हो तो रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में यात्रा करें। पूरा इंद्रधनुष दिखता है। मजेदार पोस्ट…

Dr.Mahesh Parimal said...

मुमबई की लोकल ट्रेन हमेशा कुछ न कुछ सिखाती ही हैं। बस नजरिया चाहिए। आपने उस बात को सहजता से लिया और एक लघुकथा ही बन गई। आपको विश्वास नहीं होगा, मैंने अपनी पीएचडी का विषय मुम्बई की लोकल ट्रेन से जुड़ी एक घटना से उठाया। हुआ यूँ कि एक यात्री जल्दबाजी में ट्रेन से गिर गया। किसी ने जुमला कसा। 'उड़ गया स्साला, रुमाल का माफिक'। मुझे लगा कि इनमें संवेदना नाम की कोई चीज है या नहीं? एक मौत पर इस तरह का जुमला। मुझे आश्चर्य हुआ। उस वक्त तो मैं हतप्रभ रह गया, जब शाम के किसी अखबार ने भी कुछ इसी तरह के जुमले के साथ खबर लिखी। याने मौत के साथ भी सेंसेशन का खेल।
काफी दिनों दिनों तक विचार विमर्श चला। तब समझ में आया कि जहाँ जिंदगी पूरी रफ्तार के साथ दौड़ती-भागती हो, वहाँ संवेदना को ताक पर रखना ही पड़ता है। उस यात्री ने यह जुमला इसलिए कसा कि एक मौत के कारण ट्रेन आधे घंटे लेट हो गई। उस आधे घंटे में केवल वही नहीं, बल्कि उस ट्रेन के सैकड़ों यात्रियों का समय बरबाद हुआ। एक झटके में हजारों घंटे की बरबादी। यह जुमला उन घंटों की बरबादी के कारण उस यात्री के मुँह में आया। इसका संवेदना से कोई संबंध नहीं है। ािचार का क्रम आगे बढ़ा, तो लगा कि अखबारों में लिखे समाचारों के शीर्षक कैसा रहेगा, पीएचडी के लिए? गुरुदेव डॉ. रमेश चंद्र महरोत्रा को भी पसंद आया। फिर क्या था पाँच वर्ष के अनथक प्रयास के बाद हो गई थीसिस तैयार।
तो समझा भाई आपने कि किस तरह से मुम्बई की लोकल ट्रेन की एक घटना ने मुझे डॉक्टर ऑफ फिलासफी की उपाधि दिलवाई।
डॉ. महेश परिमल
parimalmahesh@gmail.com

Vipin Kumar said...

bahut hi behatareen rachna hai ..chehre pe muskaan aa gayi kahani khatam hotey hotey :)

Vivek Rastogi said...

वाह ऐसे रोचक वाकये तो रोज ही देखने को मिलते हैं, और भी किस्से पोस्ट करते रहें।

अनूप शुक्ल said...

रामायण काल के बाद महाभारत के भी कुछ किस्से होंगे। ऊ भी आने चाहिये।

डा.महेश परिमल की पी.एच.डी. के बारे में जानने का मन हुआ है।

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