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Sunday, June 22, 2008

कौन सा पाप उदित हुआ की शिक्षक हो गया - विवेकी राय

समाचारों मे देखा की हमारी राष्ट्रपतिजीं कह रहीं थी की शिक्षक राष्ट्र का भविष्य होते हैं, उन्हें गुरु का दर्जा प्राप्त है , शिक्षकों को चाहिए की वे बच्चों को शिक्षित करने से पहले अपने आप मे उन गुणों को आत्मसात करें। सुनते ही मेरे सामने एक दिन पहले बताये उस समाचार की क्लिप घूम गयी जिसमे बताया गया था की कैसे पश्चिम बंगाल मे एक शिक्षक पिछले पैंतीस सालों से केवल बाईस रुपये तनख्वाह पा रहा है । उस शिक्षक ने अपनी तनख्वाह बढ़ने के लिए अदालत का दरवाजा भी खटखटाया और उसे जीत भी मिली , इसके बावजूद न जाने शिक्षा विभाग ने उस शिक्षक की फाइल कहाँ दबा दी की अब तक उसे उसका बकाया नहीं मिला है । सवाल ये उठता है की क्या सारे प्रवचन केवल शिक्षकों को ही देने के लिए बनाए जाते हैं या सरकार का भी कुछ फर्ज बनता है। घोर गरीबी मे जीने वाला ही यदि शिक्षक का प्रारूप सरकार के दिलो दिमाग मे हो तो कोई क्या कर सकता है । लेखक विवेकी राय के शब्दों मे - न जाने किस जन्म का कौन सा पाप उदित हुआ की शिक्षक हो गया । सारी जिंदगी सवाल हो गयी । सारे भाव सपने हो गए और अभाव ही सत्य हो गए। उल्टी गंगा ऐसी बही की शिक्षक को ही सारी दुनिया शिक्षा देने लगी । सरकार पट्टी पढ़ा रही है। नेता लोग पहाडा पढाते हैं और सरकारी - गैरसरकारी अधिकारी बुझौवल बुझाते हैं। कहते हैं , देश के भावी कर्णधारों के आप निर्माता हैं। जी, बात तो आप सोलह आने सत्य कहते हैं परन्तु आपकी नीयत पर हमें भारी शक है ।

दोस्तों आप लोगों की इस बारे मे क्या राय है ?

9 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

एक व्यक्ति को कहीं नौकरी न मिली और वह शिक्षक हो गया। एक पुरानी नौकरी खत्म होने का मुकदमा लड़ रहा है। विगत दस वर्षों से किसी निजी संस्थान में शिक्षक है। दो माह अवकाश में वेतन नहीं मिलता। अवकाश में पेशी पर आया तो वापसी के लिए पचास रुपए मुझ से ले गया। पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार पर शिक्षक पेंतीस सालों से 22 रुपए पाना कलंक ही है।

Gyandutt Pandey said...

शिक्षक का अवमूल्यन जितना समाज ने किया है, उतना शिक्षक ने भी किया है।
कई शिक्षक/शिक्षिकायें देखे हैं - बहुत विकृत सोच वाले।
खैर दोषारोपण की फैका-फैंकी से बात बनने वाली नहीं है। शिक्षकों की दशा सुधरनी चाहिये, अगर भारत को आगे बढ़ाना है तो।

Satish Yadav said...

मैं ज्ञानजी की ईस बात से सहमत हूं कि-
शिक्षक का अवमूल्यन जितना समाज ने किया है, उतना शिक्षक ने भी किया है , लेकिन यह अवमूल्यन लगभग हर क्षेत्र मे हुआ है चाहे वह क्षेत्र डाक्टरी का हो , वकीली का या सिविल सव्रिसेस का , लेकिन नसीहत केवल शिक्षकों को ही मिलती दिखती है और यहीं विवेकी राय की शंका शायद समूल दिखाई पडती है।

डॉ.सुभाष भदौरिया. said...

शिक्षक होना अभिशाप है और सरकारी तो महा अभिशाप. पिछले 20 साल से अभिशप्त हूँ हाल में चार साल से अटके इंक्रमेन्ट के लिए गुजरात न्यायालय में गुहार लगाई है 12 हेयरिंग में कोई शिक्षा अधिकारी हाज़िर नहीं हुआ मामला बस इतना हि कि सालाना रिपोर्ट में 99 में एक प्राचार्य ने लिख दिया था स्वभाव अच्छा नहीं.रिटायर्ड प्राचार्य तो अमेरिका में गुलछर्रे उड़ा रहे हैं हमारी ऐसी तैसी हो रही है.
ये हाल हमारा ही नहीं राज्य में सैकड़ो शिक्षकों का है. क्या करें जनाब शिक्षक वो बकरी है जिसे जो जब चाहे दुह लेता है जब चाहे सवारी करलेता है में में कर के रह जाते हैं ऊपर से ज्ञानियों के उपदेश.

Satish Yadav said...

शिक्षक वो बकरी है जिसे जो जब चाहे दुह लेता है जब चाहे सवारी करलेता है में में कर के रह जाते हैं- वाह, हास्य का पुट देते हुऐ ऐक नई बात बताई, वैसे जब मतदान के समय पीठासीन अधिकारी बनने की बेला हो या कही पोलियो डोस पिलाने का अभियान, पकड में सबसे पहले यही शिक्षक गण आते है, ईस हिसाब से बकरी कहना गलत न होगा

Udan Tashtari said...

परिस्थियां और युग बदल गया है. बाजारवाद हावी हो गया है. शिक्षा व्यापार हो गई है और शिक्षक व्यापारी. फिर बाकी सारी चीजें उसी से आ जुड़ जाती हैं. किसी का व्यापार बढ़ियां, कोई व्यापरी दुखी, कुछ इमानदार, कुछ ब्लैक मार्केट वाले और कुछ जमाखोर. सब बाजार के हिस्से बन चले हैं.

रश्मि प्रभा said...

shikshak jo zindagi ko dishaa dete hain,unke liye sahi prashn uthaaya aapne.
aalochna karna to ati aasaan hai,par sach ki raah par adig rahna mushkil....

Anonymous said...

Achcha likha

अनूप शुक्ल said...

हर नौकरी के अपने बवाल हैं। अपने रोने हैं। अध्यापकी उनमें से एक है। लेकिन सुभाष भदौरिया जी को तो अब न्याय मिल गया वे प्राचार्य हो गये हैं।

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