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Saturday, May 31, 2008

नागार्जुन की कहानी सच साबित हो गयी

बिहार के समस्तीपुर मे फ़िर एक बार नागार्जुन का लिखा उपन्यास बलचनमा सच साबित हो गया जब मजदूरी मांगने गए मजदूर को बांस्वारी से बाँध कर मारा गया और बगल मे ही उसकी पत्नी अपने बच्चों को लेकर बिलख रही थी। ये तस्वीर कई जगह दिखाई गयी है और यदि नागार्जुन के १९३६ मे लिखे उपन्यास का अंश पढ़ें तो लगता नही की बिहार बदल रहा है । अंश देखिये - ......... मेरे बाप को एक खभेली से कसकर बाँध दिया गया था। जांघ, चुतर , पीठ और बांह - सभी पर बांस की कैली के निशाँ उभर आए हैं। चोट से कहीं कहीं खाल उधड़ गयी है और आंखों से बहते आंसुओं के ट्घार गाल और छाती पर से सुखाते हुवे नीचे चले गए हैं ..........माँ रो रही है, और मैं भी रो रहा हूँ। मेरी छोटी बहन की तो डर के मारे हिचकी बंध गयी थी। ..........- ये शब्द शब्दशः सच दिख रहा था १९३६ मे भी और २००८ मे भी । क्या देश को बदलने मे इतना समय कम पड़ रहा है , नागार्जुन जी ने शायद ये न सोचा हो लेकिन सच तो यही लगता है , बलचनमा - कब तक लिखा जाता रहेगा और कब तक साबित होता रहेगा कौन जाने ?

2 comments:

गिरिजेश राव said...

यह मनोवृत्ति बिहार ही नहीं, सर्वत्र है।
बिहार तो बस बदनाम है।

अनूप शुक्ल said...

यह तो सन १९३६ की लिखी बात है। सैकड़ों साल पहले की बातें भी होते देखते हुये लगता है कि अभी भी बहुत कुछ जस का तस चल रहा है!

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