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Wednesday, May 28, 2008

रश्मि कुमार की रचना - मन न भये दस बीस

मन न भये दस बीस - पढ़ने के वक्त लगता ही नही की किताब पढ़ रहे हैं, हर एक कहानी जैसे हमारे अगल बगल की ही है , कभी लगता अरे ये तो मेरे साथ हो चुका है, अरे ये तो मैंने देखा है, अरे ऐसा तो मामा जी के घर उस दिन ऐसा ही हुआ था। बस यूं कहा जाय की सारे अनुभव यही मिल जाते हैं।
एक महिला जो चेहरे से ख़राब है, जी तोड़ कोशिश करती है की उसकी वजह से किसी को दुःख नही पहुंचे , लेकिन लोग हैं की दुःख देने के लिए जैसे आतुर रहते हैं, ऐसे मे छोटा सा उसका बच्चा कैसे उसके स्वाभिमान को वापस लाता है वो देखने लायक है, इसी तरह एक कहानी मे पत्नी द्वारा पति का नाम ले कर बुलाये जाने पर नाराज होने वाली सास से किस सहजता से इस मुश्किल का तोड़ निकाला जाता है वह भी काबिले तारीफ है। एक कहानी और थी जिसमे एक शख्स को दुखी दिखाया जाता है क्योंकि उसके बच्चे उसकी नही सुनते। बहुत दुखी माहौल मे ही अचानक कोई पूछता है की आप का रिटायरमेंट फंड तो अच्छा खासा होगा, बस जैसे यही सुनते ही उसकी पीठ सीधी हो जाती है और ऐसे ही न जाने कितनी बातें हैं जिन्हें बस पढ़ते चले जाओ।

मेरे पास रश्मी कुमार का ईमेल आईडी नही है, यदि किसी के पास हो तो मेरी तरफ़ से ऐसी रचना के लिए बधाई जरूर दे दीजियेगा।

मन न भये दस बीस( सत्साहित्य प्रकाशन , २०५ बी , chaavadi बाजार , न्यू दिल्ली - ६ द्वारा प्रकाशित)

1 comment:

अनूप शुक्ल said...

किताब पढ़ी तो नहीं लेकिन अब अगर कहीं दिख गयी तो छोंड़ेंगे नहीं बिना पढ़े!

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