सफेद घर में आपका स्वागत है।

Thursday, December 18, 2008

बहुत समानता है देहाती औरतों के झगडे और आमिर-शाहरूख के झगडे में :)


कभी आपने देहाती औरतों को लडते हुए देखा है - हाथ चमका-चमका कर झगडा करेंगी और साथ ही साथ अपना काम भी करते जाएंगी । इस झगडे मे धीरे-धीरे आस पडोस की अन्य औरतों के नाम आते जाएंगे और झगडा करने वालियों की संख्या बढती जाएगी, कभी कोई कहेगी - तू अपने वाले को क्यों नहीं देखती, दिन भर दीदा फाड कर यहां वहां आने-जाने वालियों को देखा करता है तो दूसरी कहेगी - और जो तेरा वाला झिंगुरी की बहुरिया से लटर-पटर करता है, वो -उसे कौन कोठार में तोपेगी। बस इतना कहना होगा कि झिंगुरी की बहुरिया मैदान में हाजिर, फिर क्या - ऐसे-ऐसे देसी घी में तले हुए शब्द सुनने मिलेंगे कि बस , आप सुनते जाईये, लेकिन एक बात जो देखने मिलेगी वो ये कि इनका काम कभी नहीं रूकता, उसी हाथ को चमका कर झगडा भी करेंगी, उसी हाथ से बच्चों के नाक को भी पोछती रहेंगी और उसी हाथ से जरूरत पडने पर एक दूसरे के बाल पकडकर झोटउवल भी कर लेंगी, लेकिन इनका काम नहीं रूकेगा। एक दो दिन की मुह फूला-फूली के बाद खुद ही मेल-मेलौवल भी कर लेंगी।
कुछ यही हाल आपको बॉलीवुड में भी देखने मिलेगा, एक फिल्म स्टार दूसरे को गरियाता ही दिखेगा, कभी शाहरूख, अमिताभ को कुछ कहते सुने जाएंगे , तो कभी आमिर अपने को शाहरूख से आगे बताएंगे। अभी हाल ही में आमिर और शाहरूख ने अपने आप को नंबर वन घोषित मानते हुए एक दूसरे पर छींटाकशी की है, इस बीच सलमान ने झगडे में कूदते हुए आमिर के शर्ट उतार कर गजनी में एक्टिंग करने पर चुटकी ली है - ठीक झिंगुरी की बहुरिया की तरह जो दो लोगों के झगडे में फट् से कूद गई और अपने मन में उठते डाह को सार्वजनिक करने से नहीं चूकी। अभी कुछ दिन पहले सलमान और अमिताभ में ठनी थी। दोनों एक दूसरे को देखना या आमने-सामने पडने तक से बचते दिख रहे थे, पता चला दोनों में बाद में मेल-मिलौवल हो गया है और दोनों ही एक फिल्म - गॉड तुस्सी ग्रेट हो - में एक साथ काम किये, यानि इनका काम कभी नहीं रूकता, चाहे जितना आपस में सिर-फुटौवल कर लें।

इस बीच ये सिर-फुटौवल कभी-कभी दिखावटी भी होती है - फिल्म को प्रमोट करने के लिए, राखी जैसी तो इस मामले में उस्ताद महिलाएं है ही - कभी मिका को लेकर हलकान रहेंगी तो कभी किसी टी वी शो को लेकर, और रह रह कर इनके काम करने के रेट बढते रहते हैं, यानि फिर वही बात - काम नहीं रूकना चाहिए, क्योंकि काम रूक जाएगा तो झगडा किस लिए करेंगे।
कभी-कभी सोचता हूं कि इन लोगों से अच्छी तो देहाती औरते हैं जो मन लगा कर झगडा करती है, इन लोगों की तरह झगडा करने के पैसे तो नहीं लेतीं।
:)

- सतीश पंचम


( आमिर-शाहरूख और सलमान के बीच चली बतकूचन पर यह पोस्ट कुछ परिवर्तनों के साथ फिर से प्रकाशित )



Saturday, December 13, 2008

बच्चों के स्कूल में चल रही महिलाओं की एक बतकूचन (वाकया)


कभी-कभी आस पास खडे लोगों की बातें सुनने से भी ज्ञान-चक्षु खुलते हैं। ऐसा ही एक वाकया हुआ है। अक्सर शनिवार के दिन मैं ही बच्चों को स्कूल से लाने और ले जाने का काम निपटाता हूँ , जो कि अक्सर श्रीमती जी ही करती हैं। हफ्ते में पाँच दिन की वर्किंग होने पर शेष दो दिनों में से एक दिन पत्नी के हवाले ही सही :) खैर, जब भी स्कूल जाता हूँ तो बडा अजीब लगता है। ज्यादातर महिलायें ही अपने बच्चों को लाने ले-जाने के लिये आती हैं। पुरूष कम ही दिखते हैं, ज्यादातर अपने Duty time पर होने की वजह से ही शायद । ऐसे मे थोडा अलग हट कर खडा होना पडता है, एक तो जगह कम उपर से अगल बगल बतकूचन करती महिलाओं की बातें सुनों तो हँसी रोके न रूके। कोई अपनी सास की निंदा करती है तो कोई अपनी साडी के इतिहास को बयान करती है - ये वाली दादर से ली है पल्लरी शो रूम से....उधर बहुत महंगा मिलता है। जाने पर ठंडा एसी एकदम कूल कर देता है। कोई कहती है मेरा लडके का कपडा कल Cambridge ( शो-रूम) से लिया था कहते वक्त यह भाव होता है जैसे कि बेटा Cambridge में ही पढ रहा है :) यदि ऐसी ही ढेरों बातें सुनते रहें और पकने की क्षमता हो तो और भी गूढ बातें पता चलें पर जल्द ही मैं ऐसी बातों से पकने लगता हूँ।

बच्चों के स्कूल से ही सटा एक कॉलेज भी है। वहाँ पर शायद कोई साडी डे मनाया जा रहा था। लडके कोट पैंट पहने आये थे, लडकियाँ साडी पहने। जिस जगह मैं खडा था वहाँ बगल में ही कोई घर था। उसके सामने ढेरों कॉलेज की लडकियाँ जमा थीं। एक भीतर जाती तो दूसरी बाहर इंतजार करती। दूसरी निकलती तो तिसरी....इस तरह लडकियाँ जा-आ रहीं थी। थोडा ध्यान देने पर पता चला कि आज साडी डे है, कई लडकियों को साडी बाँधने नहीं आती, सो वे इस घर की नई बहू के द्वारा ढंग से साडी पहन रही हैं। कई लडकियों के इस तरह आ जाने से शायद उस घर की मालकिन यानि उस महिला की सास को अच्छा नहीं लग रहा था कि बार-बार लडकियाँ आयें और इस तरह घर में भीड-भाड हो। खैर, जैसे तैसे इस मची हुई बमचक को झेल रहा था कि तभी आस पास खडी महिलाओं के बीच चली चर्चा ने ध्यान खींचा।

मेरे बगलवाली के बच्चे लोग बडे स्कूल में पढते है, उधर भी ऐसे ही कुछ न कुछ डे वगैरह रहता है। उन लोगों की शनिवार-रविवार को छुट्टी रहती है।

इन लोगों को भी देनी चाहिये छुट्टी।

हाँ क्यों नहीं, छुट्टी होने से सबको लगेगा तो सही कि बडा स्कूल है।


यह कहकर वे सभी आपस में हँस पडीं। मुझे यह नई बात पता चली कि यदि Five day working हो तो वह संस्थान बडा माना जाता है। बच्चों को स्कूल से ले वापस लौटानी में काफी देर तक मैं उस महिला की बात को मन ही मन घोंट-पीस रहा था - क्या नायाब नुस्खा है.....हफ्ते में दो दिन की ऑफिशियल छुट्टी रखो और बडे बन जाओ :)

- सतीश पंचम

Saturday, December 6, 2008

फाफामऊ वाली पतोहू और सकलदीप की माई


अचार बनाते समय रमदेई ने फाफामऊ वाली पतोहू को तनिक हाथ धोकर ही छूने-छाने को क्या कह दिया, फाफामऊ वाली तो आज उधान हो गई है। रह-रहकर अपना काम करते समय सामने आ जाती है और तीखे व्यंगबाण छोडती है -

कुछ काम तो है नहीं, बस राबडी देवी की तरह तर्जनी अंगुरी उठा कर लहकारे रहेंगी कि, छू-छा मत करो.....हाथ धो लो.....हुँह, जैसे हम कोई छूतिहर हैं, बेटा को हमसे बियाहे बेला नहीं देखा था कि साफ सुथरी हैं कि नहीं, आज आई हैं हमें सफाई दिखाने।

रमदेई भी क्या करें, जब तक जांगर था अपने हाथ की कर-खा लेती थी, अब तो जब खुद की देह ढल गई है तब औरों को क्या दोस दे। सदरू अलग इस रोज-रोज की किच-किच से परेशान रहते थे। खैर, जैसे तैसे दिन बीत रहे थे, यह मानकर संतोख कर लेते कि, जहाँ चार बासन होंगे वहाँ पर आपस में बजेंगे ही। सदरू यही सब सोचते अपने दरवाजे पर बैठे हुए थे।

उधर फाफामऊ वाली पतोहू आँगन में एक बोरा बीछा कर उस पर बैठ अपने छोटे लडके को उबटन लगा रही थी। उबटन साडी में न लग जाय इसलिये घुटनों तक साडी को उपर भींच लिया था, दोनों पैरों को सामने की ओर रखकर, उसके उपर बच्चे को लिटाकर उबटन मलते हुए तो फाफामऊ वाली को कोई नहीं कह सकता कि यह झगडालू है, उस समय तो लगता है कि ये सिर्फ एक माँ है जो अपने बेटे को उबटन लगा कर, मल-ओलकर साफ सुथरा कर रही है। इधर बेटा अपनी मां को देखकर ओठों से लार के बुलबुले बनाता अपनी बुद् बुबद् .....बद्....की अलग ही ध्वनि निकाले जा रहा था। तभी दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई।

कौन.....बिमला....आओ आओ।

अरे क्या बेटवा को उबटन लगा रही हो......और देखो तो कैसे मस्त होकर उबटन लगवाये जा रहा है......बिलकुल मेरे सकलदीप की तरह।

सकलदीप की तरह, हुँह आई है बडी जोड मिलाने वाली......कहाँ मेरा लल्ला और कहाँ इसका नाक चुआता सकलदीप। मन ही मन भुनभुनाते हुए पतोहू ने कहा - अम्मा उधर रसोई में हैं।

फाफामऊ वाली के इस तेवर से बिमला समझ गई आज लगता है खटपट हुई है घर में। फिर भी थोडा सा माहौल को सहज करने की कोशिश करते हुए कहा - अरे हैं तो हैं, क्या हो गया, क्या मैं तुमसे ही मिलने नहीं आ सकती..........आई बडी अम्मा वाली।

पतोहू को अब जाकर थोडा महसूस हुआ कुछ गलत हो गया है.......भला क्या जरूरत बाहर वालों के सामने अपना थूथन फुलाये रखने की। संभलते हुए बोली - अरे नहीं, उबटन से मेरा हाथ खराब है न सो मैंने सोचा कोई लेने देने में तुम्हें अनकुस न लगे, तभी अम्मा की ओर बताया था। बैठो-बैठो, और कहो - क्या हाल है घर ओर का।

बिमला को अब दिलासा हुई कि चलो अभी थोडा ही गदहा खेत खाया है। बैठने के लिये लकडी की छोटी पीढी को अपनी ओर खींचती हुई बिमला ने अपने घर की बिपदा बयान करनी शुरू की। अरे क्या कहूँ बहिन - मेरी सास तो एकदम आजकल भगतिन हो गई है, कहती है बरतन ठीक से माँजो, तनिक साफ-सफाई का ख्याल करो....... हाथ धो-धाकर ही अचार छुओ।

फाफामऊ वाली का जी धक् से हो गया - हाथ धो-धाकर ही अचार छुओ........ये क्या कह रही है। यही बात तो आज के झगडे की जड बना है। और ये बडकी सहुआईन वही कह रही हैं जो मेरी सास ने कहा। अरे अभी सुन लें तो मेरे घर में फिर महाभारत मच जाय। सोचेंगी न समझेंगी बस, यही कहेंगी कि ऐसे घर-फोरनियों के ही कारन सब घर बिगडते जा रहे हैं। खुद कुछ काम न करेंगी और दूसरों के घर काम बिगाडने चल देंगी। पतोहू ने सोचा अब कोई दूसरी बात करू नहीं तो ये अपना रूदन लेकर बैठी रहेगी और सुनना मुझे पडेगा।

अच्छा सकलदीप कैसा है

वो तो ठीक है, उसको क्या होगा.....जो होगा मेरी अम्मा को ही होगा.......उसे देखकर कहती हैं कि कितना खाता है रे घोडमुंहा.....पेट है कि मडार।

इधर पतोहू सोच में पड गई - फिर वही सास की बात, अभी अम्मा रसोई में सुन ले तो हाथ में जलती लुक्की लेकर दौडेंगी। इसे अब सीधे-सीधे दूसरी बात करने के लिये कहूँ वही ठीक होगा।

अच्छा अब दूसरी बात करो, क्या वही पुरानी-धुरानी लेकर बैठी हो.....और सुनाओ......छुटकी का क्या हाल है।

पुरान-धुरान बात.......... बिमला को अब भी पतोहू के असली मंतव्य का पता न चल रहा था कि किसी तरह बात सास से हटकर किसी और मुद्दे पर आ जाय लेकिन वह माने तब न। कुढते हुए बोली - अरे इसे पुरान-धुरान बात कह रही हो......ये तो अब पुराना होने से रहा......रोज ही ऐसी और कई बातें नये ढंग से मेरे घर में होती हैं, वो तो मैं हूँ जो संभाल ले जाती हूँ......मेरी सास का चले तो........।

बिमला की बात अधूरी रह गई......रसोई से बाहर निकलते रमदेई ने कहा - ए सकलदीप के माई,.... तनिक हाथ लगा दो तो छत पर सूखते मकई को उतार लूँ।

फाफामऊ वाली पतोहू समझ गई........ अम्मा जान गई हैं कि मैं बात टाल रही हूँ और ये बतफोरनी मुझसे बार-बार सास-बेसास करे जा रही है, उसे चुप कराने के लिये ही अम्मा ने अपने काम में उसको लगा दिया है। ये बतफोरनी काम में लगी रहेगी और बात बदल जायगी। आज पहली बार अपनी सास पर मन ही मन गर्व हो रहा था फाफामऊ वाली को.....झगडा और झगडे की जड को कैसे ढंका-तोपा जाता है यह कोई रमदेई अम्मा से सीखे।

उधर सदरू आँगन से बाहर बैठे अपने बडे पोते बड्डन के साथ खेल रहे थे - बड्डन ने दो चुंबक अपने हाथ में लेकर उन्हें चिपकाने की कोशिश कर रहा था। दोनों चुंबकों के समान ध्रुवों के N-N पोल को जोडता, लेकिन वो दूर भागते....जैसे ही N- S पोल को जोडता, वह चिपक जाते। सदरू यह सब बडे मगन होकर देख रहे थे - उन्हें लग रहा था - सकलदीप की माई बिमला और मेरी पतोहू इस N-N पोल की तरह हैं, जितना ही सास का नाम लेकर सकलदीप की माई चिपकने की कोशिश करती, पतोहू उतनी ही जोर लगाकर बात बदलने की कोशिश करती है। जैसे ही रमदेई और सकलदीप की माई का संवाद चला, विरोधी ध्रूव जुड गये, N-S पोल की तरह। जरूरी नहीं कि आपस में विचार मिलते हो तो घनिष्ठता बढे ही......इसका उल्टा भी हो सकता है, ठीक चुंबक की तरह।
उधर छत के उपर से रमदेई सूखी मकई कि चेंगारी भर कर पकडा रही थी,सकलदीप की माई बिमला नीचे खडी अपने दोनों हाथों से चेंगारी थाम रही थी। तभी चुंबक से खेलते हुए पोते ने कहा - दद्दा ये देखो....एक चुंबक उपर है, उससे चिपका दूसरा नीचे से लटक रहा है, गिरता भी नहीं। सदरू ने देखा....उपर वाले चुंबक का N पोल, नीचे वाले चुंबक के S पोल से जुडा था ।

- सतीश पंचम

Sunday, November 30, 2008

देश के हालात पर एक दुकान में हुई चर्चा ( वाकया)


( इस चर्चा में भले ही अश्लील शब्दों का कहीं-कहीं जिक्र आया है, लेकिन इस चर्चा की पकड को समझने के लिये शायद यह जरूरी भी है कि ऐसे शब्दों को जस का तस कुछ ढके छिपे तौर पर सामने रखूँ। उम्मीद है, आप लोग इस चर्चा को सहज ढंग से देखेंगे। )

ओ पैणचो मंत्री लोकी की करदे ने, हुण पता लगिया ।

ओ पता तां पैलां ही सी, पर अद्दे जाके दिसदा पिया वे।

ये वो संवाद थे जो मुंबई के किंग्स सर्कल से सटे पंजाबी कॉलोनी में एक दुकान पर चल रहे थे। तीन लोगों के ये हिंदी-पंजाबी मिश्रित संवाद इतने रोचक थे कि मैने इनकी कुछ बातें अपने अदने नोकिया 2626 पर रिकॉर्ड कर लिया लेकिन अगल बगल उठ रहे ट्रकों और काली-पीली टैक्सियों के उठते शोर के बीच सब कुछ दब गया। अपने एक मित्र के साथ एक दुकान पर कुछ काम से गया था, वहीं पर ये रोचक संवाद सुनने मिले। ये रोचक संवाद जरा आप Text में देखें ।

पहला - ओ साले मंत्री अपणी मां ** रहे सी, पैण चो कर (घर) विच् टांगा विच टांगा डाल के पये होणगे मां दे लौ* ।

दूसरा - उन्ना नु लोकां नाल की मतलब, माचो खुद ते ऐश-उश करांगे पांवै ( भले) इधर पबलिक दे लो* लग जाण।

तीसरा - ओ पैंचो मिडिया वाले वी अपणी मां *** पै ने । एक नू हत्थ नाल खून रिसदा पिया वे ते माचो मु विच्च माइक पा के दस्सदे पये ने - ये देखो कितना खून निकल रहा है - ओ मांचो कून (खून) नहीं निकलेगा ते के चाशनी निकलेगी....... मां दे दीने।

पहला- ओ लौंडा( पकडा गया एक आतंकी) टुटण लगिया वे, ओन्नु चंगी तरह कुटणा चहीदा, पैणचो हुणे टंग नाल बाल नहीं निकलिया, माचो अटैक करन चलिया सी, मां दे दीने नु पुन्न के रखणा चहिदा ए ऐसे लोकां नुं।

दूसरा - ओ बीबीसी वाले आतंकवादीयां नुं टेररिस्ट नहीं बोलदे.....उन्ना नुं गनमैन बोलदे ने ......इन्ना दे तराह ( भारतीय मीडिया की तरह) ढाम-ढूम मूजिक-व्यूजिक ला के चिल्ला के नई बोलदे - आतंकवादी यहाँ अपनी मां चु* रहा है।

( तीनों ने जोरदार ठहाका लगाया)

पहला - ओ तैनु पता ऐ I B वालियां ने उन्नी तरीक नु ( उन्नीस तारीख को) एन्ना नु बोलिया सी कि तुहाडे ताजमहल होटल विच खतरा हैगा। पर ऐ मंत्रीयां नु मां *** नाल फुरसत मिले तां ना।

तीसरा - इस देश दा हुण की होउगा, पता नी यार।

दूसरा - ओ विलासराव, लैके गिया सी रामगोपाल वरमा नुं ......ऐ के तमाशा विखाण वास्ते लै गिया सी के.......नाल अपणे मुंडे नुं वी लै के गिया सी के नां है उसदा.....?

पहला - रीतेश देशमुख....।

दूसरा - हां....रितेश.....के लौड ( जरूरत) पै गई सी ओन्नु लै के जाण दी। हुण के अपणें मुंडे वास्ते लोकेशन वेखण गिया सी कि देख लै बेटा - तैनु इधरे शुटिंग करनी है।

तीसरा - देश दा तमाशा बना के रख दित्ता है होर कुछ नहीं।

अभी ये बातें चल रही थीं कि उन लोगों का ही कोई परिचित एक मोना पंजाबी अपने साथ एक बैग लेकर वहीं से गुजर रहा था। उसे आवाज देकर बुलाते हुए एक ने कहा -

ओए.....बैग वैग लै के कित्थे कोई अटैक उटैक करने जा रिहा है के।

सत श्री अकाल जी।

सत श्री अकाल ( तीनों ने सम्मिलित जवाब दिया)

पास आ जाने पर उस युवक से उन लोगों की बातचीत चल पडी।

कित्थे जा रिहा है।

ओ कल मनजीते दी बर्थडे पार्टी है, उस लई कुछ सामान-सुमून खरीदीया है।

पहला - ओ इधर अटैक-शूटैक हो रिया वे .....ते तुस्सी पार्टी शार्टी कर रहे हो।

( एक हल्की हंसी इन चारों में फैल गई)

उदरों ही आ रिहा वां ( उधर से ही आ रहा हूँ) , लोकी सडकां ते आ गये ने बैनर-शुनर लै के ( लोग सडक पर आ गये हैं, बैनर वैनर लेके )।

सडक ते आणा ही है यार, बंबे दी पब्लिक चूतिया थोडे है.....सैण दी वी लीमट हुंदी ए ( सहने की भी लिमीट होती है)।

यह बातचीत और लंबी चली होगी। लेकिन इधर मैं अपने मित्र के काम निपट जाने पर दुकान से निकल आया....... जब कि इच्छा थी की अभी और इन लोगों की बातचीत सुनूं।



- सतीश पंचम

( ये वो गुस्सा है जो गालीयों की शक्ल में आम लोगों के बीच से फूट रहा है, हमारे नेताओं के लिये, हमारे कर्णधारों के लिये, अब भी वक्त है कि वो समय से चेत जाएं,वरना जनता जानती है कि अपना गुस्सा किस तरह निकालना है)


Thursday, November 27, 2008

आतंकवाद की जडों में मट्ठा डालने में देर हो गई है।


मुंबई के आतंकी घटना के मूल में हमारा भ्रष्ट राजनैतिक इतिहास रहा है। आडवाणी को आज कहते सुना कि ये 1993 का ही Continuation है, लेकिन आडवाणी शायद भूल गये कि 1993 की जड में वही राममंदिर था जिसके दम पर उन्होंने सरकारी सुख भोगा था। और आगे बढें तो उस राममंदिर के मूल में हिंदू-मुस्लिम फसाद था जो आजादी के वक्त बहुत कुछ हमारे राजनितिज्ञों की दूरदृष्टि में कमी की वजह से पनपा था। फसाद के जड में यदि शुरूवात में ही मट्ठा डाल दिया जाता तो ये आतंकवाद का विषवृक्ष पनपने न पाता।
रही बात अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद की, तो वह भी इसी तरह के जैसे मसलों की उपज है। बस उसके जडों में मट्ठा डालने में देर हो गई है। अब ये आतंकवाद का वृक्ष कब तक फले-फूलेगा, समझ नहीं आ रहा।

- सतीश पंचम


( मुंम्बई में रहते हुए गेटवे ऑफ इंडिया कई बार जा चुका हूँ , लेकिन अब वहाँ कर्फ्यू सा माहौल है, बगल में ही ताज घायल है....कभी टैगोर ने आगरा के ताजमहल के बारे में कहा था वक्त के गाल पर ठिठके आँसू......आज यह आँसू लोग मुंबई के ताज में देख रहे हैं)



Wednesday, November 26, 2008

राम-नाम जपने का एक नया साधन


मुंबई की लोकल ट्रेन में अक्सर कुछ लोगों को माला जपते हुए देखता हूँ। हाथ में एक कपडे की थैली बाँधे, उसी के भीतर माला फेरते लोग अपने में ही मस्त होते हैं, कोई परिचित दिख भी जाता है तो अपने जप को जारी रखते हुए हाथ जय हो की मुद्रा में उठ भर जाते हैं और फिर वही जप शुरू । ऐसा कई बार लोकल ट्रेन में देखा है। लेकिन कल एक शख्स के हाथ में माला की बजाय Hand Tally Counter देखा। वह शख्स लगातार एक विशेष क्रम में उस काउंटर को दबाते जा रहा था और अपने इष्टदेव का नाम जप रहा था।

देखकर थोडा अचरज हुआ कि अब तक तो सिर्फ लोगों को तुलसी की माला या रूद्राक्ष आदि की ही माला लेकर जाप करते देखा था, लेकिन ये तो पूरी तरह का आधुनिकता से लबरेज नये किस्म का नाम जपने वाला साधन है। लोग बस अपने काउंटर को अंगुली से दबाते रहें और सारा आँकडा सामने दर्ज होता रहे। कुछ अलग सा लगा।
मैने इसके पहले किसी के हाथ में Hand Tally counter को परेल के Big Bazaar में गेट पर खडे सुरक्षाकर्मियों के पास देखा था। जैसे ही कोई व्यक्ति Entrance गेट से अंदर जाता, उस गेट वाला कर्मचारी खट से वह हैंड काउंटर दबा देता। इसी तरह Exit गेट पर भी जब कोई बाहर निकलता तो वहाँ भी काउंटर ऐसे ही दबा कर संख्या निर्धारित की जाती कि कितने लोग अंदर गये और कितने बाहर गये।

उस शख्स द्वारा बटन दबाकर नाम जपने की क्रिया देख मुझे कबीर वाणी भी अचानक ही याद आ गई -

मनका फेरत जुग गया, गया न मन का फेर ।
कर का मनका छाडि दे , मन का मनका फेर।।

खैर ये तो दुनियादारी की बातें हैं, आजकल तो लोग इंटरनेट के जरिये Online दर्शन कर प्रसाद तक पा लेते हैं, ट्रेन में ही कहीं-कहीं तो लोगों को नाम जपने के लिये एक विशेष प्रकार की डायरी भी लिखते देखा हैं जिसमें कि कई आयताकार खानों में अपने इष्टदेव का नाम लिखा जाता हैं।

मैंने पोस्ट लिखने से पहले थोडी छानबीन की तो पता चला कि यह काउंटर कीडें-मकौडों को गिनने, जानवर , पेड गिनने, सर्वे आदि के लिये बनाये गये थे। कुछ जगह गोदामों में सामान की काउंटिग वगैरह के लिये भी इसका इस्तेमाल बताया गया है। लेकिन उनके बनाये इस काउंटर का उपयोग राम-नाम जपने में होगा यह शायद इस काउंटर को बनाने वालों ने भी न सोचा हो ।
- सतीश पंचम

Thursday, November 20, 2008

आप जब भी नाई से बाल कटवाएंगे, शायद इस पोस्ट को याद करेंगे (हास्य-वाकया )


क्या कभी नाई से बाल कटवाते समय आपको हँसी आई है। अगर कभी हँसी आती भी है तो लोग अपने ओंठों को बरबस दबाकर हँसी रोकने का प्रयास करते हैं ताकि हिलने- डुलने से उस्तरे से कान न कट जाए। कुछ ऐसा ही वाकया गाँव में एक बार हुआ था जब घुमन्तू नाई ने मेरे बाल काटना शुरू किया। यहाँ आपको बता दूँ कि, घुमन्तू नाई वह नाई होता है जो घूम-घूमकर बढे बाल वाले लोगों को ढूंढता है, और कहीं छाँह वगैरह देखकर वहाँ बैठाकर उनके बाल काटता है।

तो हुआ यूँ कि नाई अपने उस्तरे से मेरी 'कलम'/'खत' ठीक कर रहा था कि तभी बगल से एक भैंस भागती हुई निकली, उसके पीछे उसकी पूँछ पकडे एक आदमी भाग रहा था, साथ ही साथ गाली भी देते जा रहा था - छिनारी, जाएगी वहीं गेनू के भैंसे के पास, इस गाँव के भैंसों से रांण का जी नहीं भरता।

एक तो वह आदमी भैंस की पूँछ पकडे भाग रहा था, दूजे उसकी गाली कुछ विशेषणों से जुडी थी.....जिसकी बैकग्राउंड हिस्टरी यह थी कि गेनू के भैंसे ने जब कभी इस भैंस को गाभिन ( गर्भ धारण) करवाया, हमेशा पाडा ( Male child) ही हुआ, और दुधारू पशुओं में विशेषत: भैंस आदि में Male Child होना अर्थात पाडा पैदा होना आर्थिक दृष्टि से ठीक नहीं माना जाता। लोग दूध वगैरह के लिये ही ऐसे पशु पालते हैं, उस दूध को बेचकर कुछ अर्थलाभ करते हैं, ऐसे में यदि पाडा हो तो नुकसान होता है, इसलिये वह आदमी अपनी भैंस को गेनू के भैंस के पास जाने से रोक रहा था और भैंस थी कि फिल्मी हिरोईन की तरह विद्रोह पर उतारू थी। आगे-आगे भैंस भागे , पीछे-पीछे उसकी पूँछ पकडे वह आदमी। खैर, जैसे तैसे अपनी हँसी को जब्त किया और अपने बाल कटवा कर बाद में जो थोडी बहुत हँसी बची थी, उसी को फेंटता रहा। सोच रहा था कि, मनुष्य तो मनुष्य यहाँ तो जानवरों पर भी रोक टोक है कि वह किससे संबंध बनाये, और किससे नहीं। आस पास के लोग अभी तक हँस कर दोहरे हो रहे थे ।

अभी हाल ही में फणीश्वरनाथ रेणु जी के आत्मसंस्मरण पढ रहा था, तो मुझे उनकी लिखी बातों से वह बाल कटवाते समय आई हँसी याद आ गई।

फणीश्वरनाथ जी लिखते हैं -

मुझे याद है, खूब धूमधाम के साथ मेरा मुंडन संस्कार हुआ था। लेकिन , उस हँसी-खुशी के दिन मैं दिन-भर रोता रहा था - बलिदान के छपागल की तरह !...मुंडन के कई महीने बाद पहली बार अपने गाँव के नाई ने मेरी ऐसी हजामत बनाई कि उसके बाद नाई और कैंची और खूर यानी अस्तुरा के नाम सुनते ही मैं घर छोडकर - गाँव से बाहर किसी पेड की डाली पर जा बैठता। ...मेरे गाँव का बूढा...... भैलाल हजाम........उसके मुँह और नाक से निकलने वाली दुर्गन्ध को किसी तरह बर्दाश्त किया जा सकता था - सिर झुकाकर । मगर, उसकी कैंची एक बाल को काटती और हजारों को जड से उखाडती थी। और वह हाईड्रोसील माने उसका फोता .....इस कदर बढा हुआ था कि गाँव में कई भैलालों में वह अँडिया भैलाल के नाम से प्रसिध्द था । ............ सिर पर भैलाल की कैंची का अत्याचार सहन करना आसान था मगर सिर झुकाकर हँसी को जब्त करना बहुत मुश्किल । और भैलाल के इस वर्धित-अंग पर हँसने की मनाही थी । हमें डराया गया था कि हँसनेवाले का भी वैसा ही हो जाएगा । अत पहली हजामत के बाद से ही भैलाल की परछाई देखकर ही भाग खडा होता । तीन चार महीने बाद कभी पकडा जाता । दो-तीन आदमी हाथ-पैर पकड कर मुझे बेकाबू कर देते । कभी-कभी जमीन पर पटक भी देते । भैलाल की कैंची के साथ मेरे मुंह से असंख्य अश्लील गालियाँ , आँख से घडों आँसू, नाक से महीनों की जमी हुई सर्दी .....।

यूँ तो यह पोस्ट बाल कटवाते समय हँसी को केंट्रोल करने पर है लेकिन कई और क्रियाकलाप भी हैं जब आपको हँसी रोकनी पडेगी, जैसे दाँत निकलवाते समय Dentist के पास,कचहरी में गवाही देते समय जज के पास, और सबसे बढकर किसी के मरने पर शोक सभा में....वरना आप जानते हैं, अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती.....फिर चाहे वह हँसी किसी स्वर्गवासी पर हो या भैलाल हजाम के फोते पर।


- सतीश पंचम

( संस्मरण अंश - रेणु जी के लेख 'अथ बालकाण्डम्' से साभार- रेणु की हास्य व्यंग्य कहानियाँ , वाणी प्रकाशन, सम्पादक भारत यायावर)


Sunday, November 16, 2008

ब्लॉग, साहित्य या लेख लिखने के लिये पूरा कच्चा माल इस Website में है


उत्तर प्रदेश के जिलेवार लोकवाणी वेबसाईट्स एक तरह से साहित्य के लिये कच्चे माल की तरह है, जिसे यदि कोई चाहे तो पढकर ढंग का एक उम्दा उपन्यास लिख सकता है। कई बातें, कई शिकायतें ठेठ देहाती भाषा में ही लिखी गई हैं, मसलन - मेरी खेत की मेड पर पत्थर नसब करवाते समय लेखपाल ने जमीन लालता प्रसाद की ओर दाब दी है.......

मुझे बिला वजह (बिना वजह) दबंगई का शिकार होना पड रहा है....

मेरी मडैया में बकरी लाकर बाँध देते हैं......

मेरी साईकिल को जानबूझकर पंक्चर किया गया......

कोटेदार सीनाजोरी करता है, कोटे पर आया मिट्टी का तेल नहीं मिलने पाता....पहिले ही बिलेक कर देता है......

प्रार्थी कन्या विद्या धन हेतु पात्र है किंतु साजिशन गाँव के परधान और दबंग लोगों ने मिलकर लेखपाल द्वारा हमारे पिताजी की आय ज्यादा दिखा दी और हम अपात्र घोषित की गयीं है.....

ऐक जगह तो अजीब शिकायत देखने मिली -

दरखास है कि प्रार्थी ने उर्वरक व बीज ऋण लिया था, उक्त ऋण की वसूली हेतु अमीन श्री XXXX पुत्र श्री XXXXX, ग्राम XXXX, मौजा XXXXX, तहसील XXXXX मेरी अनुपस्थिती में मेरे घर आये, उस वक्त प्रार्थी घर पर नहीं था, प्रार्थी का लडका था, उसी से अमीन पूछताछ किये और चले गये......शाम को दुबारा आये और वही मेरा लडका मिला तब वे मेरे दरवाजे पर रखी गई कुल्हाडी स्वंय उठा ले गये और चार बोरा गेहूँ, चावल लगभग 50 किलो, सरसों लगभग 50 किलो, मटर लगभग 20 किलो, जो लगभग.......एक साईकिल, 2000 ईंट तामडा, बांस की दो टोकरी, तथा एक बैग ........मेरे सगे भाई श्री ........के यहाँ रखवा दिये । जब मैं दूसरे दिन घर आया तो सारी बातों की जानकारी हुई, तब अमीन के घर गया पूछा तो कहा पहले सब बकाया रू0 जमा कर दिजिए.....तब मुझसे बात करिये, मैं तब घर आ गया और अगले दिन ......प्रदेश चला गया.....मेरा लडका सब बकाया धीरे-धीरे जमा कर दिया लेकिन मेरा सामान आज तक वापस नहीं मिला......अतः श्रीमानजी से प्रार्थना है कि प्रार्थी का सामान वापस दिलाया जाय.........।

दूसरे एक रोचक शिकायत में तो और भी चीजें हैं मसलन,

प्रार्थी को दौरान सर्वे वोटर लिस्ट मृत घोषित किया गया जिससे प्रार्थी मत देने के अधिकार से वंचित रह गया है, जबकि प्रार्थी बहयात ( + जीवित) है और दौरान चुनाव अंतर्गत धारा 107 /116 CRPC जमानत भी दिनांक XXMarch2007 को कराया है । प्रार्थी के गाँव के चन्द मुखालफीन द्वारा इस प्रकरण का कृत्य किया गया है जो अवैधानिक है । इस प्रकरण की जाँच होकर दोषी कर्मचारी को सजा दिया जाना आवषुक( आवश्यक) है । प्रार्थी किसान है और सदैव घर पर ही रहता है। इसकी जाँच नितान्त आवषुक है, क्योंकि मृतक घोषित होने पर प्रार्थी मताधिकार से वंचित किया गया है।

उपर लिखे Application letter की भाषा को आप देखेंगे तो इसमें आपको बहुत कुछ समझ में आएगा, इसमें संस्कृत के शब्दों के अलावा उर्दू का भी इस्तेमाल किया गया है, कुछ ठेठ खडी बोली जैसे आवषुक को देखकर लगता है कि कहीं गाँव देहात की कचहरी में कोई फर्रा पढ रहा है......और जिस संदर्भ में यह लेटर लिखा गया है वह भी काफी मजेदार है कि प्रार्थी अपना मताधिकार उपयोग करने के लिये जिवित रहना चाहता है, इस लिये वह अपनी CRPC के अंतर्गत किये गये किसी अपराध वगैरह में जमानत भी पा चुका है ...........यानि Full Proof, मय सबूत कि मैंने आपराधिक मामले में जमानत पाई है, इसलिये मैं जिंदा हूँ :)

Example -

http://jaunpur.nic.in/lokvani/

http://allahabad.nic.in/lokvani/



दूसरे जिले का नाम देखने के लिये जिलेवार लिंक में बदलाव कर Defaulters list पर क्लिक करें उसके बाद संबंधित अधिकारी या शिकायत संख्या पर क्लिक करें। कई जिलों में शिकायतों की संख्या जब ज्यादा होती है तो पेज खुलने में थोडा सा ज्यादा समय लगता है, लेकिन एक बार आप पढना शुरू करेंगे तो गाँव-देहात में चल रहे जमीनी हकीकत को देख पाएंगे, कि वहाँ के झगडे किस प्रकार के हैं, वहाँ के लोग किस तरह आपस में व्यवहारिक हैं, उनके मनमुटाव का मुद्दा क्या है, एक तरह से पूरा रिसर्च मैटेरियल ही समझें।

मेरे विचार से यदि किसी समाज या प्रदेश को देखना-परखना या समझना हो तो पहले उन लोगों के आपसी झगडों को, उनके बीच होने वाली अनबन को ध्यान से देखा पढा जाय, जीवन के सभी रस उसमें मिल जाते हैं, चाहे वह करूण रस हो, हास्य रस हो, या फिर रौद्र, हर एक रस इन्हीं झगडों में मिल जाता है। प्रश्न यही है कि हम ऐसी बातों को, ऐसे मनमुटाव को किस नजर से देखते हैं।




- सतीश पंचम


Saturday, November 15, 2008

कतरन झूठ न बोले

हाल ही में New York Times में एक लेख छपा था जिसमें भारतीयों के बढते वर्चस्व को लेकर एक महत्वपूर्ण बात कही गई, कि भारतीय बच्चे अमरीकीयों के लिये एक नये किस्म की चुनौती बनते जा रहे हैं। मेरे पास इस लेख की कतरन एक E-Mail के जरिये आई है, आप भी जरूर उस कतरन को देखें।

- सतीश पंचम




"When we were young kids growing up in America, we were
Told to eat our vegetables at dinner and not leave them.
Mothers said, think of the starving children in India
And finish the dinner.'


And now I tell my children:
'Finish your homework. Think of the children in India
Who would make you starve, if you don't.'?"

ग्लोबल मंदी को हास्य के जरिये बताती चंद लाईनें - चाचा कैसे हो :)


एक E-mail के जरिये प्राप्त यह चंद पंक्तियाँ, ग्लोबल मंदी की सारी हकीकत हास्य के जरिये बता रही हैं।


चाचा कैसे हो ?

अब क्या बताउं,

बडा बेटा Share Broker है,

दूसरा बेटा Jet Airways में है

तीसरा बेटा Investment Banking में और

चौथा Software क्षेत्र में है......
'
'
'
सबसे छोटा पानवाला है..........बस वही घर चला रहा है।

Thursday, November 13, 2008

लोक-लाज के कारण छुट्टी का कारण बताते शर्म जो आ गई ( वाकया)


क्या कभी ऐसा भी हुआ हैं कि लोक-लाज के कारण छुट्टी का कारण आप नहीं बताना चाहते। ऐसा ही एक वाकया जानकर मैं थोडा अचंभित हुआ हूँ। दरअसल बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने में कई महिलाओं की आपस में मित्रता स्कूल के प्रांगण में यूं ही बन जाती है, उनमें बतकूचन भी खूब होता है, कभी बच्चों को लेने स्कूल जल्दी पहुँच गईं तो बतकूचन का दौर लंबा भी हो जाता है, हास-परिहास का दौर तो चलते ही रहता है।

अभी हाल ही में श्रीमतीजी ने एक इसी तरह की महिला की बात बताई जोकि स्कूल में अपने छोटे बच्चे को लेने आती हैं, उस महिला की उम्र लगभग चालीस-पैंतालीस के आसपास होगी। बातचीत के दौर में पता चला कि उन महिला की एक बडी बेटी है जिसकी अभी जल्दी ही अगले महीने शादी होने वाली है, इस कारण अपने बच्चे को, जो कि पहली कक्षा में पढता है, शादी के दौरान अपने साथ गाँव ले जाना है । लेकिन मुसीबत ये है कि छुट्टी मांगे तो कैसे, टीचर सोचेगी कि इनकी बेटी की शादी होने जा रही है और लडका पहली कक्षा में पढ रहा है, इतनी उम्र में ये सब ?

पहले तो मैं भी माजरा नहीं समझ पाया कि आखिर इसमें लाज की क्या बात है, कइयों के बच्चे शादी के काफी दिनों बाद होते हैं तो इसमें असमंजस कैसा.....लेकिन फिर पता चला कि अभी उनकी कुल पाँच बेटियां है, लडके के इंतजार में एक के बाद एक लडकियां होती गई और जब बडी उम्र में छठे पर लडका हुआ तो जाकर खुशी का ठिकाना न रहा, लेकिन यह खुशी यह असमंजस भी ले आएगी, ऐसा उन्होंने न सोचा था।

बातचीत के दौर में अन्य महिलाओं ने हंसते हुए उस महिला को सलाह भी दी कि ,बता दो सही कारण, इसमें इतना शर्माने की क्या बात है, लेकिन उन लोगों की मित्रवत हंसी भी उस लाज को ढंक न सकी और अंत में एक दूसरे उपाय के तहत बात बनाते हुए कारण दिया गया कि घर में किसी और की शादी पड गई है इसलिये जाना पड रहा है।

खैर, अभी तक यह पता चला है कि बच्चे को स्कूल से ले जाने की छुट्टी मिल गई है औऱ वह महिला अब तक स्कूल में अन्य महिलाओं के बीच बतकूचन का मुद्दा बनी हुई है, खुद भी हास-परिहास में शामिल यह कहते हुए कि - इतनी उम्र में....यह सब :)



- सतीश पंचम

Tuesday, November 11, 2008

सदरू भगत और उनके पोते


रमदेई ने नमक के डिब्बे में देखा तो नमक नहीं था, अब क्या हो....उधर सदरू हुक्के को चारपाई के पाये से टिकाकर रख दिये थे जो उनके अब भोजन तैयार होने पर लाने का इशारा था। इधर रमदेई अलग सोच में थी, इस नमक को भी अभी खत्म होना था.....ये बच्चे भी तो नहीं दिख रहे जाने कहाँ चले गये, किससे मंगाउं। तब तक बडी बहू का लडका बड्डन दिख गया।

ए बड्डन, जा नंदलाल साह के यहाँ से नमक लेकर आ।

अभी रमदेई ने अपनी बात पूरी भी न की थी कि जाने कहाँ से छोटी बहू का लडका छुट्टन आ पहुँचा।

पैसे दो, हम ले आते हैं नमक।

बड्डन को अचानक छुट्टन के इस तरह आ जाने से अपने अरमानों पर पानी फिरता लगा। नमक लाने के बहाने जो पैसे मिलते हैं वह अक्सर एक दो रूपये जयादा ही मिलते हैं, न जाने नमक का दाम ही बढ गया हो। अब जो एक दो रूपये अलग मिलते थे उस पर कोई अलग कब्जा कर ले यह बड्डन कत्तई न मानेगा। दौडकर पास आता बोला- अरे तू क्यों जाएगा नमक लाने, दादी ने मुझे कहा है नमक लाने तो मैं ही जाउंगा, तू नहीं।

छुट्टन भी अड गया - मैं पहले पहुँचा, इसलिये मैं ही नमक ले आउंगा.......छुट्टन ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, जैसे बड्डन के इस दुनिया में अपने से पहले पहुँच जाने का प्रतिकार कर रहा हो।

नहीं, दादी ने मुझे कहा है सो नमक मैं ही लाउंगा।

दोनो के बीच विवाद बढता जा रहा था कि नमक कौन लाये, आखिर उपर की कमाई का सवाल था जो नमक मंगाने के बतौर मिलते। सदरू अलग सोच में पडे थे, कितने सेवाभावी पोते हैं......सेवा करने के लिये आपस में लड रहे हैं।

रमदेई से और न देखा गया - डांटते हुई बोली - तुम लोग क्या आपस में ही लड खप रहे हो, आज से पहले तो कभी इतनी सेवा के लिये तुम लोगों में मारपीट होते न देखा था।

अब सदरू ने खंखारते हुए गला साफ किया, बोले- इन दोनों की लडाई देखकर मुझे तो आजकल के नेताओं की याद आ रही है।

वो कैसे ?

वो ऐसे कि - आजकल चुनाव के लिये पार्टी दफ्तरों में टिकट पाने के लिये नेता लोग आपस में ही मारपीट कर रहे हैं.....क्या भाजपा, क्या काँग्रेस.....सब पार्टी ऑफिस में वही हाल है। हर कोई जनता की सेवा करना चाहता है, और मजे की बात तो यह है कि आपस में इतनी जोर से लडते हैं कि लगता है किसी दुश्मन से लड रहे हैं।

इस लडाई में एक दूसरे की कार पहले तोडी जाती है - माने कारसेवा और फिर नंबर आता है गमले का।

गमला क्यूँ ?

गमला इसलिये क्योंकि जो टिकट पा गया है वह दूसरे के लिये गम लाता है माने गमला।
अब जो टिकट नहीं पाया है वह अपना गम उस को देना चाहता है जिसे टिकट मिल गया है यानि मेरा गम ले - फिर गमला निशाना बनता है। इस गम ले और गम ला के चक्कर मे पार्टी ऑफिस के सारे गमले टूट जाते हैं.....वह भी सिर्फ सेवा के नाम पर, जैसे ये दोनों आपस में सेवा के लिये लड रहे हैं।

अभी ये गमले और गमला की चर्चा चल ही रही थी कि, दोनों लडके आपसे में लडते हुए बगल में पडे चारे के लिये रखी घास की टोकरी से जा टकराये और पूरी घास जमीन पर गिर गई ।

सदरू ने हँसते हुए कहा - लगता है ऐसे ही होते हैं ग्रास रूट लेवल के कार्यकर्ता.....जमीन से जुडे हुए....जिस घास को जमीन से उखाड कर लाया था, उसी को फिर जमीन पर गिरा आये......वाह रे बांके सेवक और धन्य है तुम्हारी सेवा।

घास गिर जाने से दोनों पोते आपस मे समझ गये कि अब रमदेई दादी छोडेगी नही, जरूर पीटेगी। दोनों ने आव देखा न ताव, चले भाग....अब दोनों के भागने में भी होड लगी थी।
लेकिन मूल समस्या अब तक ज्यों की त्यों बनी थी - नमक कौन लायेगा ?


- सतीश पंचम

Sunday, November 9, 2008

एनडीटीवी के अंग्रेजी प्रोग्राम 'जस्ट बुक्स' की तरह हिंदी किताबों पर कोई प्रोग्राम क्यों नहीं


NDTV के अन्य चैनलों जैसे NDTV 24x7 या NDTV GOOD TIMES पर आपने एक प्रोग्राम देखा होगा JUST BOOKS, जिसमें काफी अच्छे तरीके से अंग्रेजी किताबों के बारे में बताया जाता है, लेखकों के Interviews दिखाये जाते हैं कि कैसे उन्होंने ये किताब लिखी, किताब की खासियत क्या है, लोगों की उनकी किताब के बारे में प्रतिक्रिया कैसी है। लेकिन अफसोस यह JUST BOOKS सिर्फ अंग्रेजी की किताबों के बारे में बताता है, हिंदी में NDTV के पास ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं है जो हिंदी किताबों के बारे में बताये।

कुछ दिनों पहले मैने कहीं किसी चैनल पर एक चर्चा देखी दी जिसमें बताया गया था कि जिस तरह अंग्रेजी किताबों को प्रचार मिलता है, उस तरह की मीडिया कवरेज हिंदी किताबों को नहीं मिलती। यह बात मुझे काफी हद तक सच लग रही है। आपने गौर किया होगा कि अरविंद अडीगा के बुकर जीतने के बाद सारा मिडिया एक सुर से White tiger के बारे मे बोलने लगा, लेकिन वही मिडिया किसी हिंदी किताब को भारतीय पुरस्कार मिलने पर चूँ तक नहीं करता। अभी कुछ महीने पहले अमरकांत जी की किताब 'इन्हीं हथियारों से' थोडी बहुत चर्चा मे आई थी, वह भी साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिलने के बाद, लेकिन जब मै बडे से बडे बुकसेलर के पास गया तो पाया कि उन्हें तो इस लेखक के बारे मे ज्यादा मालूम ही नहीं है। खैर, ये तो हालत है साहित्य पुरस्कार विजेता एक लेखक की हमारे समाज में।

जहाँ तक मेरा अनुमान है यदि कोई चैनल इस बारे में पहल करता है, ऐसा कोई प्रोग्राम बनाता है जो कि हिंदी के किताबों के बारे मे परिचर्चा आयोजित करे या हिंदी लेखकों के बारे मे बताये, तो संभव है उस चैनल को एक अलग पहचान मिल सकती है जोकि साँप, मदारी, जादू टोना जैसे प्रोग्राम दिखाने से लाख गुना अच्छी पहचान है। ऐसे में नया दर्शक वर्ग भी जुड सकता है जो ऐसे बेहूदा प्रोग्रामों से तंग आकर चैनल बदलने पर मजबूर है।

उम्मीद है चैनल्स इस ओर भी सोचेंगे और ऐक नया दर्शक वर्ग अपने से जोडने मे कामयाब होंगे।



क्या आज के चलताउ साँप,मदारी,बंदर, ज्योतिषी वगैरह के प्रोग्रामों को जहाँ रोज दो दो घंटे तक चैनलों पर समय दिया जाता है, तो वहाँ हफ्ते में ही सिर्फ आधे घंटे का भी प्रोग्राम हिंदी साहित्य पर नहीं बन सकता ?


- सतीश पंचम

Saturday, November 1, 2008

प्रदीप बिहारीजी की सशक्त रचना 'उजास'


धार्मिक स्थानों पर स्नान करती महिलाओं को, उनके उघडे तन को कुछ लोग रसभरी निगाहों से देखने के इच्छुक होते हैं और अपने इसी प्रयोजन से वह घाट और घटोली तक छान मारते हैं कि कहीं कोई महिला उघडी हुई दिख जाय। जब ऐसे लोग उन महिलाओं को निहारते हैं तो महिलाओं के घरवाले सबकुछ जानते समझते हुए भी कुछ कह नहीं पाते, ऐक यह भावना भी होती है कि कहीं झगडा-टंटा करने से धार्मिक कार्य मे विघ्न न पड जाय, लेकिन उनके अंदर ही अंदर मन बेचैन जरूर रहता है कि कम्बख्त मेरे घर की मरजाद को घूर रहा है और मैं कुछ कह नहीं पा रहा।

इस मुद्दे पर हाल ही में लेखक प्रदीप बिहारी की कहानी उजास पढी, जो कि छठ पूजा के दौरान होने वाले ऐसे ही क्रियाकलापों पर आधारित है। काफी अच्छी और सशक्त लेखनी का परिचय दिया है प्रदीपजी ने।

कहानी का साराँश कुछ इस प्रकार है कि -

रामभूषण बाबू के दोनों बेटों की शादी हो गई थी, लेकिन दोनों के कोई बच्चा नहीं था, सो रामभूषण बाबू की पत्नी ने मनौती मांगी थी कि यदि उन्हे पोता हुआ तो छठ पूजा के दौरान वह अपने आँचल पर नटुआ( नचनिया) नचवाएंगी। कुछ समय बाद बहू के पैर भारी हुए, पर इससे पहले कि पोता हो, रामभूषण बाबू की पत्नी चल बसी।

अब पोते के जन्म के कुछ साल बाद रामभूषण बाबू को सबने याद दिलाया कि पत्नी की उस मनौती को बहू पूरा करे जिसमे पोते के जन्म के बाद अपने आँचल पर नटुआ नचवाने की बात थी, वरना जरा भी उंच नीच हुई नहीं कि छठ मईया का प्रकोप सामने होगा। रामभूषण बाबू काफी दुविधा में थे क्योंकि जवान बहू को कोई कैसे हजारों लोगों के सामने बेपर्दा होकर बैठने दे। बात आँचल पर नटुआ के नचाने की थी, लेकिन इस उपक्रम मे बहू को साडी को आधा ही पहनना पडता और इससे जाहिर था कि उसका बदन उघाड हो जाता, लोग मजे ले-लेकर देखेंगे यह सोचकर ही रामभूषण बाबू परेशान थे। खुद की पत्नी जो बूढी थी, यदि वह आँचल पर नचवाती तो ठीक था, लोग उस गंदी नजर से न देखते , लेकिन किसी तरह धार्मिक मनौती भी तो पूरी करनी थी।

काफी अनमने ढंग से वह घाट की ओर चले, रास्ते मे लोगों की बातें सुनकर तकलीफ भी होती रहीं।

कोई कहता- " पहले नटुआ नाचता था बुढिया के आँचल पर, आज नाचेगा युवती के आँचल पर"

वहीं जब नटुआ आ गया तो बहू भी असमंजस मे थी कि इतने लोगों के बीच कैसे नहाये और कैसे अपने आँचल को पसार कर आधा शरीर खुला रखे। ईधर नटुआ को लेकर लोगों मे अलग ही चर्चा थी -

यह बात जानकर कि नटुआ आज यहाँ रूकेगा नहीं और अभी नाच कर कहीं और जाएगा नाचने के लिये तो कुछ लोग कहते हैं - " ठीक है । तो साले को अभिए नचाते-नचाते गां* फार देते हैं।"

अभी ये चर्चाएं सुनाई दे रही थीं कि फिर किसी की आवाज आई -

" आँचल पर नटुआ नाचेगा कैसे ? "

" सो क्यों, घाट पर आँचल पसार देगी और उस पर नटुआ नाचेगा।"

" तब तो देह-दशा साफ- साफ दिखाई पडेगी"

"यही तो मजा है यार"

" आज तो साला नटुआ भी तर जाएगा"

ये सब सुनते-सुनते रामभूषण बाबू ने अपने मानसिक संतुलन को किसी तरह बनाये रखा।

तभी उस पोते ने रामभूषण बाबू को बताया कि लोग नटुआ नाचने से पहले पटाखा फोडने कह रहे हैं। रामभूषण बाबू ने कहा- तो जाओ फोडो पटाखा, पटाखा नहीं है क्या?

पोते ने कहा - पटाखा तो है मगर....

मगर क्या ?

फोडने के लिये पन्नी खोलेंगे तो हिरोईन उघार हो जाएगी।

पोते ने पटाखे के पैकेट के उपर छपे महिला की तस्वीर की ओर इशारा किया। रामभूषण बाबू को लगा कि उनके सामने उनका पोता नहीं दादा खडा है।

उधर नटुआ नाच नहीं रहा था, आँचल के पास खडा था। लोगों ने इस पर भी चुटकी ली - " ईनफिरिएरिटी कॉम्पलेक्स है। इतनी कीमती साडी पर पाँव रखने की हिम्मत नहीं हो रही"

कहानी के अंत में रामभूषण बाबू ने न सिर्फ अपने मानसिक संतुलन को बनाये रखा, बल्कि इस आँचल पर नटुआ नचाने की कुप्रथा के खिलाफ एकाएक विद्रोह भी कर दिया।

इस हिदी मे अनुवाद की गई मैथिली कहानी 'उजास' को पूरा पढने के बाद महसूस होता है कि हमारा क्षेत्रीय साहित्य कितना सुघड है और उसमें कैसे-कैसे सशक्त रचनाकार हैं। प्रदीप बिहारीजी को उनकी इस सशक्त मैथिली रचना के लिये बधाई देता हूँ। यह कहानी पढकर शायद ऐसे लोगों को भी बुध्दि आए जो अपने कुत्सित कार्यों से धार्मिक स्थानों तक को नहीं बख्शते।

- सतीश पंचम

( मैने यह कहानी नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाओं के हिंदी अनुवाद 'मैथिली कथा संचयन' के जरिये बताई है। आप भी यह किताब जरूर पढें। फिलहाल यह 'मैथिली कथा संचयन' मुंम्बई के जीवन प्रभात पुस्तकालय में उपलब्ध है - पता है - जीवन प्रभात पुस्तकालय, A-4 / 1 , Kripa Nagar, Irla Bridge, Mumbai - 56, Phone no. - 022-26716587 । सफेद घर की ओर से ऐसा प्रयास जारी रहेगा जिसके जरिये आप लोगों तक इस तरह की रचनाओं की जानकारी दी जाए।)

Saturday, October 25, 2008

भारत ऐक बेंजीन (C6H6)




बेंजीन (C6H6) का नाम सुना होगा आपने- बहुत ही ज्वलनशील पदार्थ है, कहते हैं जब वैज्ञानिक उसकी रासायनिक संरचना का चित्र बनाना चाहते थे तो उसकी संरचना समझ ही नहीं आ रही थी, हर बार कहीं न कहीं कमी रह जाती। ऐक बार केंकुले नाम के वैज्ञानिक ने अर्धनिद्रा मे देखा एक साँप अपने ही पूंछ को निगल रहा है, बस यही वो क्षण था जब केंकुले को बेंजीन की संरचना समझ आ गई और उसने उसे आकार दे दिया- एक ज्वलनशील पदार्थ की संरचना दुनिया के सामने आ गई।

अब भारत की ओर देखा जाय, क्या आप को नहीं लग रहा कि एक साँप अपनी पूँछ को ही खाये जा रहा है, उसकी संरचना और प्रकृति ठीक उस ज्वलनशील पदार्थ बेंजीन की तरह है , इस संरचना को समझने के लिये किसी Day-dream की जरूरत नहीं है। किसी केंकुले नाम के वैज्ञानिक की जरूरत नहीं है...पर सबसे दुखद तो यह है कि हम ऐसी संरचना को समझते बूझते हुए भी अंजान बने हुए हैं और ऐसे एक नहीं हजारों साँप हैं, कोई भाषा के नाम पर जहर उगल रहा है, कोई धर्म परिवर्तन के नाम पर तो कोई अलगाववाद के नाम पर , सभी साँप इस क्रिया कर्म में लगे हैं और सब के सब इतने ज्वलनशील हैं कि सारा देश अब उसकी आँच महसूस कर रहा है।

क्या भारत के संविधान में ऐसे किसी नेवले का प्रावधान नहीं है जो इन ज्वलनशील बेंजीन साँपों की काट बन सकें ।

- सतीश पंचम

Thursday, October 23, 2008

जानना चाहोगे क्यों बिहारी छात्र आगे हैं नौकरीयों में - ये लो, खुद ही देख लो।

लोग सवाल उठा रहे हैं कि सरकारी पदों पर या रेल्वे वगैरह में बिहारी लोग ज्यादा क्यों हैं, क्या बात है कि बिहारी ही ज्यादा नौकरी पाये दिखते हैं, इस मुद्दे पर ज्यों-ज्यों गहराई मे सोचा, त्यों-त्यों कुछ चीजें शीशे की तरह साफ होती गई। दरअसल पहले बिहार की डेमोग्राफिक स्थिति और लोगों के बीच पनपे नौकरी के रूझान को देखा समझा जाय तो आप को खुद-ब-खुद इसका उत्तर मिल जायगा, इसके लिये कोई भी आँकडेबाजी की जरूरत नहीं है।

दरअसल बिहार में कोई मजबूत मेन्युफैक्चरिंग या निर्माण उद्योग पहले से ही नहीं है,झारखंड मे जो कुछ था वह खनन आधारित ही ज्यादा था जिसके दम पर कभी बेस इंडस्ट्री बिहार में बनाने की कोशिश ही नहीं की गई। ऐसे में लोगों को नौकरीयों की उम्मीद सिर्फ सरकारी क्षेत्र से ही थी जिसमें कि जाने से पहले लोगों को प्रतियोगिता परीक्षा देनी जरूरी थी, और यही वो ट्रेंड था जिसने बिहार मे एक प्रतियोगिता परीक्षाओं को एक समानान्तर उद्योग का दर्जा दे दिया, कम्पटीशन पत्रिकाओं की खपत बढने लगी, कोचिंग संस्थाओं की संख्या बढने लगी, लेदेकर ऐसा माहौल बन गया कि लोकगीतों में भी कम्पटीशन का माहौल दिखाई देने लगा। आपको शूल फिल्म के उस गीत की याद होगी जिसमें विलेन बने नेता को एक कैसेट लाकर दिया जाता है , उसके बजाते ही जो बोल निकलते हैं वो होते हैं - M. A. मे लेके एडमिसन....कम्पटीसन.....देता SS......मतलब लोग यहाँ वहाँ जरूर अपने कॉलेज की पढाई पूरने के लिये एडमिशन लेते हैं लेकिन अपना लक्ष्य कम्पटीशन को ही मानते हैं.....कोई पूछता भी है कि आपका लडका क्या करता है तो लोग अक्सर यही बताते हैं कि कम्पटीशन दे रहा है......यानि तैयारी कर रहा है। और सबसे बडी बात तो ये है कि ये प्रतियोगिता परीक्षा मे जिस पद की कामना की जाती है वह हमेशा IAS, IPS, PCS जैसे पदों से ही शुरू होती है। लोगों का ये मानना होता है कि सबसे कडी परीक्षा यानि UPSC को साधो तो सब बाकी प्रतियोगिता परीक्षाएं अपने आप सध जाती हैं.......और काफी हद तक यह बात सच भी है.......छात्र परीक्षा की तैयारी IAS, PCS लेवल की करते हैं....एक साल- दो साल अपने को मांजते रहने के बाद इन छात्रों का स्वाभाविक है कि IQ लेवल कुछ हद तक उपर हो जाता है......लगभग वही सवाल जो UPSC में पूछे जाते हैं......कुछ सरल ढंग से रेल्वे आदि की परीक्षाओं मे भी पूछे जाते हैं......ऐसे मे चयन स्वाभाविक रूप से ऐसे ही छात्रों का होता है जो ऐसे परिवेश को लेकर चलते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या बाकी राज्यों के छात्र कम काबिल हैं या उनमें वह माद्दा ही नहीं है.....नहीं ऐसा नहीं है....बाकी राज्यों के छात्र भी काबिल होते हैं....उनमें माद्दा भी होता है कि कम्पटीशन को भेद सकें.....लेकिन वह छात्र अपने राज्य से बाहर नहीं निकलते......उन्हें जरूरत ही नहीं पडती या पडती भी है तो कम, क्योंकि एक दो बार असफल होने पर वह बैकअप के तौर पर अपने ही राज्य में अन्य निजी/ प्राईवेट नौकरीयों में लग जाते हैं जो कि सरकारी के मुकाबले थोडी आसानी से मिल जाती हैं......फिर वे अपनी नौकरीयों में ऐसा रम जाते हैं कि कम्पटीशन वाली परीक्षाएं लगभग न के बराबर अटेंड करते हैं, जबकि बिहार के छात्र अपने राज्य मे प्राईवेट नौकरीयों तक की कमी के चलते उसी कम्पटीशन वाले माहौल को लेकर चलते हैं। ऐसे मे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि क्यों उन बिहारी छात्रों का ही चयन ज्यादा होता है सरकारी पदों पर। वैसे कई लोग सिफारिश या पहुँच को भी कारण मान सकते हैं लेकिन यह हालत तो हर राज्य मे है, अब हर जगह तो बिहारी ऐसे नहीं हो सकते कि सिफारिश, पहुँच या अन्य गलत तरीकों से ही नौकरी पा लें।

दूसरी बात ये आरोप लग रहे हैं कि रेल्वे ने अपने विज्ञापन महाराष्ट्र के स्थानीय भाषा के समाचार पत्रों मे नहीं दिये जिससे कि यहाँ के लोगों को पता चल सके कि ऐसी कोई वेकेंसी निकली है। तो मैं ये कहना चाहूँगा कि ऐसे विज्ञापन कहीं निकले या न निकले, रोजगार समाचार या Employment News मे तो निकलता ही है, जिसे कि यहाँ और अन्य राज्यों मे कम ही पढा जाता है क्योंकि जब निजी क्षेत्र की जहाँ बहार हो वहाँ सरकारी क्षेत्र की कौन पूछे जिसके मिलने को अब सपना मानने लगे है लोग, यही कारण है कि जो रोजगार समाचार बिहार आदि राज्यों मे खूब मन से पढा जाता है, और लगभग हर न्यूज स्टॉल पर आसानी से मिल जाता है, वही अखबार मुंम्बई जैसे शहर मे लेने के लिये यहाँ- वहाँ ढूँढना पडता है क्योंकि उसकी यहाँ ज्यादा माँग नहीं है। वहाँ बिहार मे हालत तो ये हो जाती है कि लोग निजी तौर पर साइक्लोस्टाईल्ड फॉर्म दस रूपये में लिफाफे सहित जगह-जगह दुकानों पर बेचते हैं जबकि यहाँ मुम्बई मे वह केवल रेल्वे स्टेशनों पर ही उपलब्ध हो पाता है। ऐसे में आप सहज रूप से अंदाजा लगा सकते हैं कि बिहार और मुम्बई या देश के अन्य राज्यों के बीच Competitive Exams का माहौल कैसा है और किन लोगों का ज्यादा चयन हो सकता है।

उधर उत्तर प्रदेश मे भी कमोबेश हालत लगभग यही है लेकिन वहाँ कुछ हद तक निजी क्षेत्र की उपलब्धता के चलते Competitive Exams के प्रति माहौल बिहार के मुकाबले कुछ हद तक सीमित सा लगता है, या माहौल है भी तो उस हद तक जोश और जज्बे को बरकरार नहीं रख पाता जो बिहार के छात्र अपनी नौकरीयों की जरूरतों के कारण बनाये रखते हैं,और ऐसे मे जबकि लोकगीत तक Competition मुद्दे पर बनने लगे तो आप समझ सकते हैं कि वस्तुस्थिति क्या है।

- सतीश पंचम
( मैं खुद उत्तर प्रदेश से हूँ....लेकिन बहुत हद तक इस माहौल से परिचित होने के कारण ही बिहार के बारे में यह पोस्ट लिख रहा हूँ , यदि कहीं मेरी जानकारी मे त्रुटि हो तो कृपया जरूर बता दें)

Sunday, October 19, 2008

पुतिन की कुतिया से परेशान भारत का देहात (हास्य)


सदरू भगत चाहते हैं कि रमदेई के शरीर में भी वह GPS नेविगेशन यंत्र लगा दिया जाय जिसे कि रूसी पुतिन ने अपने कुतिया के गलेवाले पट्टे पर लगाया था, ताकि पता चल सके, उस कुतिया की तरह रमदेई कहाँ-कहाँ जाती है, किसकी किसकी चुगलखोरी करती है, क्या क्या करती है।

घर मे सदरू भगत आ तो गये लेकिन तय नहीं कर पा रहे थे कि चर्चा कहाँ से शुरू करें। तब तक रमदेई खुद ही ओसार मे आते हुए बोली -
आ गये नेताई छाँट कर, काम न धाम बस इसके यहाँ बैठो, उसके यहाँ बैठो....बस यही काम रह गया है इ बुढौती मे।

अरे तो क्या तेरे आस पास बैठ कर रखवाली करता रहूँ.....बडी आई पूछताछ करने वाली। अरे मैं भी जानता हूँ तू कहाँ-कहाँ जाती है। कभी हरखू के यहाँ जाएगी वहाँ उसकी पतोहू से बतकूचन करेगी, कभी मटरू के यहाँ जाएगी वहाँ चार-बात करेगी, औरतों का तो काम ही यही है......जहाँ चार जनी मिल गई तो बस न घर का ख्याल न बेटे पतोहू की चिंता......भैंस धोने-धाने  के बाद अभी भी धूप मे खडी है......ये नहीं कि उसे छाँव में लाकर बाँध दे......बस कभी उसके यहाँ तो कभी उसके यहाँ ।

रमदेई ने सदरू भगत का ये रूप देखा तो दंग रह गई, आज फिर कहीं से गाँजे का दम लगा लिया लगता है।

संभलकर बोलीं - क्या कहते हो, आज लगता है फिर से कहीं बैठकी हुई है।

बैठकी की बात करती है, ठहर तेरे सरीर मे भी GPS सिसटम न लगवा दिया तो कहना, तू कहाँ जाती है क्या करती है सब पता चलेगा।


क्या.....क्या......क्या लगा दोगे तो क्या होगा.....ई जीपीस फीपीस क्या बक रहे हो.......लगता है कुछ ज्यादा चढा ली है आज।

अरे जीपीएस एक मसीन है जो किसी के सरीर पर लगा दो तो पता चलता है कि वह कहाँ गया है, किधर है....सब पता चलता है। उ पुतिनवा है न, उसने अपने कुतिया मे वह जीपीएस लगाया है, वह कुतिया जहाँ जाती है पता चलते रहता है कि अब कहाँ जा रही है, क्या कर रही है।

तो मैं कुतिया हूँ.....ठहरो तुम्हारे जीपीएस को तुम्हारे ठौर मे न पहुँचा दिया तो कहना - कहते हुए रमदेई सामने पडे सिलबट्टे को उठाने को झुकी ही थी कि सदरू भगत चले भाग। एक बार जो भागना शुरू किया तो फिर पीछे मुडकर नहीं देखा। आगे आगे सदरू भगत, पीछे पीछे रमदेई।

तभी रास्ते मे लल्ली चौधरी मिल गये - भागते हुए सदरू से पूछा - अरे क्या हो गया कहाँ भागे जा रहे हो ?

सदरू ने भागते-भागते ही कहा -  भाग चलो नहीं तो आज खैर नहीं।

क्यों क्या हुआ ?

GPS प्रणाली   फेल हो चुकी है और वह परीक्षण स्थल से छूटकर सीधे यहीं आ रही है :)

 


- सतीश पंचम

Saturday, October 18, 2008

उपवास के नाम पर ऑफिस में नंगे पैर (विश्लेषण)


क्या कभी अपने ऑफिस मे नंगे पैर गये हैं आप, नहीं न.......लेकिन यहाँ मुम्बई में यह हुआ है और ऐक दो नहीं...कई लोग अपने ऑफिस नंगे पैर पहुँचे। हुआ यूँ कि अंधेरी स्टेशन पर उतरते ही किसी महिला की गाली देती हुई चीख सुनाई दी।

मेल्या....मुडद्या......दिसत नाई का ( मुर्दे.....दिख नहीं रहा क्या )

थोडा ध्यान दिया तो पता चला कि वह महिला नंगे पैर थी और किसी का जूता उसके पैरों पर पड गया था। पल भर में सारा मामला समझ मे आ गया कि आज बहुत सी महिलायें करवा चौथ का वृत रखने के कारण अपने ऑफिस नंगे पैर पहुँचती हैं।

ऐसा अक्सर नवरात्र के समय भी कई बार देखने मे आया कि कई महिलायें बिना चप्पल पहनें अपने ऑफिस पहुँची और बॉस के पूछने पर खिलखिलाते हुए बताती - वो मेरा आज उपवास है न। अब दिन भर क्लाएंट्स आते रहे.....मिस वृतादेवी को देखते और जिज्ञासावश पूछ लेते - क्यों क्या बात है, आज Bare foot, नंगे पैर। तब फिर वही जवाब - आज मेरा उपवास है न।

दिन भर मे न जाने कितनी बार लोगों को वह ये जवाब देते रहीं और धीरे-धीरे ऐसे लगने लगा जैसे कि उनका उपवास मे नंगे पैर ऑफिस आना ही एक उपवास की जरूरी विधि है जिसे बिना पूरा किये उपवास अधूरा रह जायेगा। शाम की चाय के वक्त जहाँ लोग दिन भर शेयर मार्केट की बातों पर जूझते रहे.......तो वहीं इनकी सहेलियाँ उनके उपवास पर मगन रहीं। कॉफी वेंडिंग मशीन अच्छी भली काम कर रही थी पर अचानक ही बंद पड गई, तब वृतादेवी की सहेलियों ने ही कहा - (ध्यान रहे पुरूषों ने नहीं) - लगता है आज इस कॉफी वेंडिग मशीन का भी उपवास है।

यहाँ एक बात देखने मे आई है कि सडक पर नंगे पैर चलना भी एक प्रकार से गंदगी को अपने साथ बटोरते चलना है। लोग सडक पर थूकते हैं...खंखारते है.....और भी न जाने कितनी गंदगियां पडी होती हैं जो हमें अपने से लपेटे मे ले लेती हैं। चप्पल या जूता पहनने से कम से कम वह गंदगी हमारे शरीर को तो न छू पाएगी। और यदि छूती भी है तो उस चप्पल और जूते को जिसे कि हम मंदिर के बाहर ही उतार देते हैं.....ताकि साफ पैरों से प्रसन्न भाव से भगवान के मंदिर मे दर्शन कर सकें।

नंगे पैर सारे दिन रहकर जब मंदिर जाएंगे तो उसी गंदे जूतेनुमा पैर को लेकर ही जाएंगे, क्या तब हमारी आस्था और प्रगाढ होगी, क्या तब ही हम अपने को बडा भक्त मानेंगे। मैं लोगों की आस्था पर प्रश्न नहीं उठा रहा पर कहीं तो कुछ है जो कचोट रहा है कि ऐसे उपवास विधि का क्या तुक जो किसी का पैर पड जाने भर से गाली देने को तैयार हो। उस अंधेरी स्टेशनवाली महिला का रोष देख कर तो लगता है कि उसका उपवास निर्बाध होता यदि वह चप्पल या इसी तरह की कोई चीज पहने होती, तब शायद उसे उस शख्स को गाली देने की जरूरत ही न पडती जिसका पैर गलती से उसके पैरों पर आ गया था।

- सतीश पंचम


( इस लेख को लिखते समय कुछ असमंजस मे हूँ..... क्योंकि ज्ञानजी और सुरेश चिपलूनकरजी के ब्लॉग पर पढ चुका हूँ कि हिंदू धर्म के उपर कुछ लिखने से आपको बेकार मे ही अटेंशन मिलता है.....याकि लोग ज्यादा जानते हैं, उसी असमंजस भरी परिस्थ्तियों मे ये पोस्ट लिख रहा हूँ...यदि किसी की भावनाये मेरे इस लेख से आहत हों तो मैं आप लोगों से क्षमा चाहता हूँ)

Tuesday, October 14, 2008

मानो तो वादी नहीं तो आतंकवादी


अभी ऐक आतंकवादीजी रास्ते मे मिल गये - मैने पूछ लिया - कहाँ जा रहे हो ?

मौसियाने जा रहा हूँ।

मतलब ?

अरे यार अपने खाला के घर जा रहा हूँ, कुछ बम-वम फोडना है कि नहीं।

मैने कहा यार समझ नहीं आ रहा कि ये तेरा कौन सा मौसीयाना है।

तो बोला - अरे हमारी माँ कई बहने हैं, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भारत.......सब अपुन की माँ की बहने है, तो क्या है कि अपनी एक माँ को छोड बाकी अपुन की मौसी लगेंगी। तो अभी जा रहा हूँ....मौसीयाने बम फोडने। तूम आते हो तो चलो।

मैं सकपका गया.....मैने कहा - यार मैने ये तो सुना था कि आतंकवादीयों ने यहाँ अपनी खाला का घर समझ रखा है, लेकिन नहीं जानता था कि....इतनी शिद्दत से तुम इसे अपनी खाला का घर मान बैठे हो।

मानना क्या है - मानों तो वादी नहीं तो आतंकवादी।

वादी मतलब ?

वादी शब्द बहुत सारे बोरबचन का पर्यायवाची शब्द है - जैसे उदारवादी,समतावादी,समाजवादी,संघर्षवादी,जनवादी,राष्ट्रवादी।

तो तुम्हें ये सब बोरबचन लग रहे हैं।

नहीं बोरबचन तो अपने गुरू श्री लादेन को लगता था, मुझे तो ये वादी वाले शब्दों से लगता है कि कहीं लोकतंत्र के हसींन वादीयों मे घूम रहा हूँ। कोई कुछ बोलने वाला नहीं, कोई कुछ कहने वाला नहीं। कभी कोई बाटला-फाटला जैसी मुठभेड हो जाय तो हमारे हमदर्द भी यहीं से निकल आते हैं ये कहते हुए कि हमें मुठभेड पर शक है। लोकतंत्र मे ये वादी शब्द कितना अच्छा लगता है सुनने मे है न।
मैं सोच मे पड गया - सचमुच आजकल ये इतने सारे लोकतंत्र के पवित्र नामों वाले वाद जैसे राष्ट्रवाद, समाजवाद,जनवाद आदि उन्होंने अपना अर्थ और महत्व किस तरह खोया है, और उस अर्थ को खोने मे हमारे ही लोगों का कितना बडा हाथ है, चाहे वह अमर सिंह जैसे बकबकीया नेता हों या फिर कोई और हो,फिर इतने सारे आतंकवादीयों को ये देश आतंक के लिये हसीन वादी क्यों न नजर आये।

- सतीश पंचम

Sunday, October 12, 2008

सफेद घर : कभी ऐसे भी सोचो, कि किसी के सोचने पर सोचना आए (Micropost)


जंगल के बीच वीरान जगह पर कहीं एक हिरनी ने एक बच्चे को जन्म दिया , जन्मते ही बच्चे पर जमीं पतली झिल्लीदार चीज को हिरनी ने चाट चाट कर अलग कर दिया। बच्चा अब भी लडखडाता रहा,उठने की कोशिश करता रहा पर उठ नहीं पा रहा था। तभी अचानक जाने कैसे बच्चे के पैरों में हल्की ताकत सी आ गई , थोडा ईधर-उधर लडखडाने के बाद बच्चे ने अपना मुँह हिरनी के थनों के पास ले जाकर लगा दिया और शुरू किया पीना अपने माँ के थनों को।

मैं सोचता रहा - किसने बताया उस अभी-अभी जन्मे बच्चे को कि तुम अपना मुँह वहीं ले जाना, जहाँ पर थन है, वहाँ तुम्हें दूध मिलेगा।

किसने बताया होगा उसे।


- सतीश पंचम

Sunday, October 5, 2008

ये है एक अच्छे ब्लॉग की जरूरी खुबियाँ जिन्हें आप अपने ब्लॉग में जरूर देखना चाहेंगे।


एक अच्छे और Standard ब्लॉग की क्या-क्या खुबियाँ होती हैं ये आप लोग जरूर जानना चाहेंगे। आईये देखते हैं आप के ब्लॉग में ये खुबियाँ क्यों और कैसे होनी चाहिये।

1- पेज जल्दी लोड हो - यह किसी ब्लॉग की पहली शर्त है कि वह जल्दी लोड हो और विसिटर को ज्यादा समय ना लगे। यह समस्या भारत जैसे देश जहाँ कि नेट कनेक्टिविटी ईतनी तेज नहीं है, और गंभीर हो जाती है, और जहाँ डायल-अप कनेक्शन हो वहाँ की आप कल्पना कर सकते हैं। पेज लोडिंग के बारे में कुछ चीजों पर हमारा नियंत्रण नहीं हो सकता है और अगर हो भी तो काफी खर्चीला साबित होता है जैसे कि - प्रोसेसर की क्षमता और सर्वर की उपलब्धता। प्रोसेसर की क्षमता धीरे धीरे घटती रहती है और जिसका असर लोडिंग पर और हमारे कम्प्यूटर के और क्रियाकलापों पर पडना लाजिमी है। आप ने ध्यान दिया होगा कि नये पीसी पर तो तेज काम होता है लेकिन एकाध साल गुजरते ही कुछ कमिया देखने मे आने लगती है जैसे हैंक हो जाना या कहीं स्लो डेटा प्रोसेस करना आदि ये सब कम्प्यूटर के अन्य अन्य पारट्स के अलावा प्रोसेसर की क्षमता मे आई कमी के कारण होता है। अब रोज-रोज तो प्रोसेसर बदलने से रहा सो इस पर ध्यान दें।

जहां तक सर्वर की उपलब्धता की बात है वह भी हमारे हाथ मे न के बराबर है, बढते ब्लॉग संख्या, वेबसाईट्स के ईस दौर मे आगे भी सर्वर पर लोड बढने ही वाला है सो हमे अभी से अपने ब्लॉग्स या वेबसाईट्स को ऐसा बनाकर रखना होगा जिससे कि आगे कभी हमारे पेज लोड होने मे ज्यादा समय न लगे। सर्वर पर लोड बढाने वाली चीजों मे बडी ईमेज फाईल्स, heavy data , आदि का मुख्य रोल होता है। सो कोशिश करें कि बडे ईमेज या फाईल्स को अपने वेब पेज या ब्लॉग पर न रहने दे या रखे भी तो उन्हें पहले ही अपने पीसी पर छोटा आकार देकर pixels आदि कम कर दे और तब अपलोड करें।

इसके अलावा Unnecessary Widgets को भी न रहने दे जो कि बिना मतलब के ज्यादा उपयोगी न होते हुए भी वक्त खाते हैं।

ज्यादा चटकदार और आकर्षण के चक्कर में कहीं-कहीं ब्लॉग पर Flash का भी उपयोग किया जा रहा है जो यदि जरूरी न हो तो हटा दें।

ध्यान रखें कि कोई अगर आपकी लेखन शैली को पहले से जानता है, Dedicated visitor है या आप से प्रभावित है तो वह जरूर आपके ब्लॉग के लोड होने मे लगे वक्त को सहन कर लेगा लेकिन जो First Time Visitor है उसके पास इतना धैर्य नहीं होता कि आपको पढने के लिये इतना वक्त लगाये। सो चुनाव आपके हाथ मे है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच जुडना चाहेगे या फिर अपने कुछ परिचित बलॉगर्स के बीच ही रहना जोकि ब्लॉगजगत और आपके लेखन के लिये उचित नहीं प्रतीत होता।

2- कम से कम नेविगेशन रखें - याद रखें आप के ब्लॉग पर आनेवाले लोग किसी ब्लॉग एग्रीगेटर या फीड के जरिये ही ज्यादा आते हैं, सीधे आपके ब्लॉग पर आने वालों की संख्या कम होती है या होती भी है तो परिचित ब्लॉगरों की। सो अपने ब्लॉग पर Unnecessary hyperlinks न रखें जिससे कि user का ध्यान न बंट पाये । User को किसी भी पेज पर आने जाने मे असुविधा या ज्यादा ढूंढना न पडे इसका ध्यान रखना भी जरूरी है। परिचित ब्लॉगर रास्ता ढूँढ लेगे लेकिन उनका क्या जो पहली बार आ रहे हैं। सो ईस बात का हर मामले मे ख्याल रखें की ब्लॉग पर कोई भी चीज रखते या लिंक देते समय First Visitor आपके अवचेतन मन मे होना चाहिये।

3- अच्छे Content को हमेशा पेज के साईडबार मे उपर की तरफ रखें। ऐसा करने के लिये कुछ Psychology का उपयोग किया जा सकता है कि जब आप दुकान में कोई कपडा खरीदने जाते हैं तो अच्छे कपडे या ध्यान खींचने वाले कपडे दुकानदार शो-केस मे सजा कर रखता है और उसे देखकर ही आप अंदाजा लगाते हैं कि क्या कुछ हो सकता है दुकान मे। इसके अलावा एक बात और देखने मे आती है कि जो कपडा आपको पहली नजर मे दिखता है या अचानक भा जाता है उसके बाद दुकानवाला कोई भी कपडा दिखाता है तो वह कम जंचता है। बस यही Psychology यहाँ भी उपयोग मे लाई जा सकती है। पहले उन Contents को रखें जो लगे कि वास्तव मे अच्छे हैं या बाँटने लायक हैं, बाद में अन्य सभी पोस्ट्स।

आप लोगों को अचरज हो सकता है कि ये क्या कोई दुकानदारी है जो शो-केस वगैरह की बाते हो रही हैं.......नहीं यह कोई दुकानदारी नहीं है लेकिन एक प्रकार से अपने आपको और अपने ब्लॉग को प्रस्तुत करने का तरीका भर है। याद रखें आपका ब्लॉग आपको ही पेश कर रहा है चाहे वह विचारों के जरिये हो या फिर Contents के जरिये।

4- Scrolling - अपने ब्लॉग लेआउट मे स्क्रीन साईज / page size का ख्याल रखें। वह स्क्रीन से बाहर न जाने पाये। याद रखें कि Web मे कई प्रकार के सर्वमान्य नियम खुद-ब-खुद माने जाते हैं कि Horizontal Scrolling की बजाये Vertical scrolling को तवज्जो देनी चाहिये। Horizontal Scrolling से User/ Visitor का ध्यान बंटता है जो उचित नहीं है।

5- Content - ऐक मुख्य बात का भी ध्यान रखें कि आपके Contents अच्छे और रोचक हों। कुछ भी आँय-बाँय लिखने से केवल अपने मन को संतुष्टि मिलती है लेकिन वह खोखली न हो इसका भी ख्याल रखें। अगर लिखना ही है अपने मन का तो एक डम्मी ब्लॉग बना सकते हैं जिसे कि आप और केवल आप ही देख सकते हैं। सेटिंग्स के जरिये उसे सर्च इंजिनों की नजरों से दूर भी रख सकते हैं। गुगल ने शायद ऐसे आयँ-बाकीयों की चाहत पहले ही भाँप ली थी सो यह ऑप्शन सेटिंग्स में ऱखा गया है कि आप अपने तक ही ब्लॉग सीमित रखें।

ऐसा नहीं है कि मैं सिर्फ लोकलुभावन या गुडी-गुडी लिखने को कह रहा हूँ......वरन एक ढंग का लिखने को कह रहा हूँ जो विचार-विमर्श या कहें मुद्दे को सामने रख सके ऐसे लेखन को कह रहा हूँ।

इसी खूबी का ईस्तेमाल आप एक Test Blog बनाने मे कर सकते हैं जहाँ आप रंगो आदि का या Widgets आदि की टेस्टिंग कर सकते है कि क्या ये वाकई मेरे Published Blog पर अच्छा लगेगा या नहीं।

6- Uniquness - आपके ब्लॉग मे वो Uniqueness क्षमता होनी चाहिये जिसे Visitors आसानी से पहचान सकें या दूसरे शब्दों मे कहे तो याद रख सकें जैसे कि पेज कलर या फिर Focussed contents जैसे कोई व्यंग्य पर Focussed हो या फिर कोई Technique पर या कोई कहानी, कविता आदि पर।

अब इतना सब पढने के बाद आप कहेगे भाई आप तो Standardization के नाम पर न जाने कौन से अफलातूनी दुनिया के ब्लॉग लिखने को कह रहे हैं तो मेरा मानना है कि हर कोई ब्लॉग अपने आप मे संपूर्ण होता है, बस पैमाने अलग हो सकते हैं....कोई तकनीक के मामले मे तो कोई कहानी, कविता या विचार के मामले में, सो बिना हिचक बस लिखते रहें, सटीकता खुद-ब-खुद आने लगती है। (अभी मैं भी उस सटीकता को खोज रहा हूँ.....ससुरी न जाने कहाँ खुशहाली बाँटते फिर रही है :)


अंतत: माईक्रो फुल्कारी

फिलहाल गुगल पर बढते सर्वर लोड और पोस्ट की घटती लोडिंग स्पीड को देखते हुए मैं चाहूँगा कि मेरा घर गुगल के Office के बगल मे हो और कोई पोस्ट लिखने के बाद जब अपने गैलरी मे खडे होकर आवाज लगाउं तो वहाँ से किसी की आवाज आनी चाहिये ......... हाँ, पोस्ट पहुँच गई है :D

- सतीश पंचम

Saturday, October 4, 2008

दिन में चार बार पतनी को गले लगाने की चाहत में सदरू भगत (हँसी-मजाक)


जब से सदरू भगत ने खबर सुनी है कि दिन में चार बार पत्नी को गले लगाने से जीवन खुशहाल रहता है, तब से तो जैसे उनके पैर जमीन पर नहीं पड रहे, चल तो रहे थे लेकिन सोचते थे कितनी जल्दी पहुँच जाउं कि गले मिलने को हो। मन ही मन सोचे जा रहे थे कि जब रमदेई मुझे हुक्का पकडायेगी तब गले मिल लूँगा, जब खाना परोसेगी तो फिर गले मिल लूँगा, थोडी देर मे जब बर्तन ओर्तन मांज लेगी तो फिर लिपट लूँगा और फिर होते-होते जब सांझ को मेरे पैर दबायेगी तो फिर क्या कहना, तब तो वो विज्ञानी लोग भी क्या लिपटें होंगे जो ये बताये हैं कि दिन मे चार बार पतनी से गले मिलने से जीवन सुखी होता है ......कुल मिलाकर चार बार ही तो गले मिलना है.......अगर ईतना करने से जीवन खुशहाल हो जाय तो क्या कहना। अभी यह सोचे चले जा रहे थे कि रास्ते में झिंगुरी यादव मिल गये।

कहाँ जा रहे हो उडन दस्ता बने हुए।

अरे कुछ नही बस ये जानो कि आज मुझे पंख लग गये है। आज नहीं बोलूँगा........कल मिलना तो बताउंगा।

ईधर झिंगुरी को लगा आज सदरू जरूर सहदेव कोईरी के यहां गये होंगे.......गांजा का असर दिख रहा है......लगता है खूब बैठकी हुई है आज।

हाँफते-डाफते सदरू किसी तरह घर पहुंचे, देखा पतोहू बाहर बैठी अपने पैरों में लाल रंग लगा रही है.....मौका ताडकर भीतर घर में घुस गये। रमदेई कोठार में से गुड निकाल कर ला रही थी कि कुछ मीठा बनाया जाय। तब तक सदरू को सामने देख पूछ बैठी - क्यों क्या बात है.....ईतना हाँफ क्यों रहे हो।

सदरू ने किसी तरह अपनी साँसों को नियंत्रित करते कहा - आज तुझे खुस्स कर दूंगा।

खुस्स करोगे........क्या आज फिर गांजा पीकर आये हो जो टनमना रहे हो।

अरे नहीं रमदेई....पहिले गले मिल तब बताउं.......कहते हुए सदरू आगे बढे।

हां.......हां .......हां ......अरे क्या आज गांजे के साथ चिलम भी गटक लिया क्या जो जवान की तरह घुटूर - घुटूर गोडे जा रहे हो।

अरे आज कुछ न बोल रमदेई, बस आ जा गले लग जा.........जीवन खुस्सहाल हो जाई।

अब रमदेई को पक्का यकीन हो गया कि ये सदरू भगत के मुंह से गाँजा बोल रहा है।

अच्छा तो गले मिलने का नया सौक पाला है.......रहो, अभी तुम्हारा गले मिलौवल ठीक करती हूँ........कहते हुए रमदेई ने बगल में रखे धान कूटने वाले मूसल को उठा लिया और ईस तरह खडी हो गई मानो कह रही हो - बढो आगे.......देखूँ कितनी जवानी छाई है तुममें।




अब सदरू सोच में पड गये कि ये तो कुछ और ही हो रहा है। संभलकर बोले - अरे विज्ञानी लोग बोले हैं कि दिन में चार बार पतनी को गले लगाने से खुस्सहाली मिलती है, तभी मैं आया हूँ तुझे खुस्स करने और तू है कि ले धनकूटनी मूसल मुझी पर टूट पडना चाहती है।

अरे कौन विज्ञानी है जरा मैं भी देखूं उस मुंहझौंसे को........घोडा के फोडा नहीं तो.......वो कह दिया ये सुन लिये......जरा दिखा दो तो कौन गांव का है वो विज्ञानी-ध्यानी.......आये जरा......न गोबर में चुपड कर झाडू से निहाल कर दिया तो कहना........आये हैं गियानी-विगिआनी की बात लेकर। अरे ईतनी ही खुस्सहाली मिलती गले मिलने से तो वो किरपासंकर सबसे जियादे खुस्स होता.....जो रात दिन अपनी मेहरीया को ले घर में घुसा रहता है, ये भी नहीं देखता कि सब लोग यहाँ महजूद हैं......बस्स ........लप्प से घर में घुस गया.......मेहरीया भी वैसी ही है......न उसको सरम न उसको लाज।

सदरू को लगा रमदेई तो ठीक कहती है......अगर गले मिलने से ही सबको खुसहाली मिले तो कोई काम क्यों करे......सब अपनी अपनी मेहरारू को ले गले मिलते रहें और खुश होते रहें।

तभी बाहर लल्ली चौधरी की शरारत भरी आवाज आई - अरे भगत कहाँ हो.....अंदर घर में क्या कर रहे हो भाई........एतना कौन अरजेंटी आ गया।

रमदेई ने कहा - हाय राम ये कहाँ से आ गये साफा बाँधकर, फट् से बाहर निकलते कहा - अरजेंटी का तो ऐसा है चौधरीजी कि आज ये खुस्सहाली बाँट रहे हैं।

खुस्सहाली बाँट रहे हैं......तनिक हमको भी बाँटो भगत......अरे ऐसी कौन सी खुशहाली बाँट रहे हो कि रमदेई को ही बाँटोगे।

तभी सदरू भी बाहर निकल आये और लगभग चहकते हुए कहा - तुम्हे खुसी बाँटने का अभी बखत नहीं आया लल्ली........जिस दिन बखत आयेगा बता दूँगा....लेकिन एक बात है लल्ली भाई।

क्या ?

वो ये कि आज भी हमारी पतनी को समझ नहीं है कि विज्ञान क्या होता है.....खोज क्या होती है.......और उसके दम खुसहाली कैसे मिलती है।

लल्ली की कुछ समझ में न आ रहा था कि ये सदरू क्या आंय-बांय बके जा रहे हैं.....फिर भी सिर हिलाकर हुँकारी भरी जैसे सब समझ रहे हों।

तभी सदरू ने देखा पतोहू नहीं दिख रही है......अभी आया तब तो पैरों मे आलता वगैरह लगा रही थी।

पूछा - फाफामउ वाली नहीं दिख रही है, अभी जब आया तो यहीं थी।

लल्ली ने कहा- अरे अभी मैं आया तो देखा तुम्हारा बडा लडका रामलाल अपने दक्खिन वाले घर मे जा रहा था.......बहू भी पीछे-पीछे पानी लेकर गई थी......क्या हुआ जो ईतना पूछ ओछ रहे हो।

नहीं कुछ नहीं ऐसे ही पूछ रहा था.......वैसे लगता है आजकल की नई पीढी विज्ञानी लोगों की बात जरा जल्दी मान जाती है......है कि नहीं रामदेई.....।

इधर रामदेई को लगा जैसे उसे ही लगाकर यह बात कही गई है, बोली - हाँ हाँ.....बडे आये नई पीढी की वकालत करने.......अरे वो तो कम से कम खुस्सहाली बाँट रहे हैं मिलजुलकर......लेकिन तुमसे तो वो भी नहीं हुआ......जरा सा मूसल क्या देखा.....लगे बगलें झांकने........ईतना भी नहीं जानते कि सब लोगों का खुसहाली बांटने का तरीका होता है......कोई गले मिलकर खुसहाली बांटता है तो कोई मूसल लेकर........और जो मूसल लेकर खुसहाली बांटता है.....उसकी खुसहाली उ गियानी विगियानी लोगों की खुसी से कहीं ज्यादा होती है।

वो कैसे ?

वो ऐसे कि गले तो सब मिल लेते हैं......मूसल कोई-कोई को खाने मिलता है.......समझे कि बुलाउं कोई गियानी-विगियानी को।

लल्ली चौधरी को अब भी पल्ले नहीं पड रह था कि आखिर य़े किस मुद्दे पर बातचीत चल रही है, सो समझ लिया यहां से हट जाउं वही ठीक रहेगा, सो खंखारते हुए बोले- ठीक है भाई आप लोग खुसहाली बांटो, मैं तो चला अपनी भैंस ढूढने....न जाने कहाँ खुसहाली बाँटते फिर रही है।

लल्ली के जाते ही सदरू लपक कर रमदेई के पास पहुँचे - हाँ तो क्या कह रही थी तू कि मूसल खाने में खुसहाली मिलती है......सच।

अरे अब भी नहीं समझे का.......हम तो राजी थीं खुसहाली बाँटने.......तुम ही भाग आये मूसल की मार के डर से।

तो क्या वो तेरा मूसल उठा कर मेरी ओर झपटना सब नाटक था ?

हाय दईया.......अब तो लगता है सचमुच कोई गियानी-विगियानी बुलाना पडेगा जो ईनको मूसल वाली खुसी समझाये।

बगैर मुसल का डर दिखाये राजी हो जाती तो तुम ही कहते बडी उस तरह की हो.....।

ईधर सदरू लपक लिये रमदेई की ओर यह कहते.........जियो रे मेरी करेजाकाटू .

उधर धान कूटने वाला मूसल जमीन पर फेके जाने के बाद थोडी देर ढुलकता रहा और फिर न्यूटन के गुरूत्वाकर्षण बल से खुद एक ओर स्थिर हो पडा रहा मानो कह रहा हो - ये है न्यूटन का भाई ओल्डटन :)



- सतीश पंचम

Thursday, October 2, 2008

सूटेड बूटेड गृहमंत्री जब गाँधीजी को फूल अर्पित करेंगे।


आज वह मंजर देखने लायक होगा जब बार-बार कपडे बदलने वाले सूटेड-बूटेड गृहमंत्री, सिर्फ धोती पहनने वाले गांधीजी को श्रध्दा सुमन अर्पित कर रहे होंगे .....देखना चाहता हूँ कि उनके मन मे उस वक्त क्या चल रहा होगा ।



- सतीश पंचम

( ब्लॉगजगत की माईक्रो पोस्टों की लडी में एक और कडी)

Sunday, September 28, 2008

टीवी पर मास्टरमाईण्ड शब्द कई बार दिखाने से भडक गये स्कूल के मास्टर लोग (फुरहरी)


चाय की दुकान पर अन्य साथी मास्टरों का गुट जमा देखकर मास्टर दयाराम ने केदारनाथजी से कहा- चलो उस दुकान चलते है, देख रहे हो यहाँ तो जमघट लगा है.....न खुद चाय पियेंगे न दूसरों को पीने देंगे....जो खुद पियो तो इनको भी पिलाओ....। केदारनाथ भी इशारा समझ गये कि ज्यादा खर्चा नहीं करना चाहते मास्टर दयाराम, सो चल पडे नीचे मूड़ी करके मानो उन्होंने इन प्राईमरी के मास्टरों को देखा ही नही है और किसी काम के बारे में कुछ सोचते हुए जा रहे है। बगल में ही मास्टर दयाराम इस तरह चल रहे थे जैसे कोई गंभीर बात सोच रहे हैं और एकांत पसंद हैं। चलते-चलते कुछ दूरी पर शंकर चायवाले की गुमटी आ गई।

और बताओ दयारामजी...क्या हालचाल है - मास्टर केदारनाथ ने कच्ची मिट्टी के बने चबूतरे पर बैठते हुए कहा।

हाल क्या कहें, बस ये कहो कि आजकल रोज टीवी पर मास्टरमाईंण्डवा देखकर दिमाग घूम जाता है।

मास्टरमाईंण्ड ? जरा खुल कर बताओ भाई....।

अरे बताने लायक तो कुछ नहीं है...बस यूं समझिये कि हम प्राईमरी के मास्टरों को रोज टीवी पर गरियाया जाता है रेरी मारकर बुलाया जाता है। कहीं कोई पकडा गया तो कहते है मास्टरमाईंण्ड यही है इस बम के पीछे.....मास्टर माईंण्ड को पकडने के लिये टीमें बनी हैं। एक टीम डिल्ली गई है तो दूसरी कलकतवा गई है तो कोई पंपापुर....... अब बताओ कहां कहां ससूर लोग ढूंढ रहे हैं मास्टरमाईंण्ड को।

लेकिन ये कैसे मान लिया तुमने की वो मास्टरमाईंण्ड शब्द प्राईमरी के मास्टर लोगों को ही कहा जा रहा है - केदारजी ने कुछ माथे पर बल लाते हुए पुछा।

क्यों नही- कभी तुमने सुना है कि कोई सेकंडरी का मास्टर है......जब लोग सेकंडरी को पढाते है तो वो शिक्षक कहलाते है और आगे कक्षा वालों को पढाते हैं तो उन्हें टीचर कहते हैं और आगे बढो तो लेक्चरर, प्रोफेसर.....रीडर......कहाँ तक कहूँ......आप तो खुदै समझदार हैं। केदारनाथजी ने ऐसे सिर हिलाया - जैसे कह रहे हों बस अब कुछ मत कहो मैं समझ गया हूँ ।

तब तक एक आठ-दस साल का लडका कुल्हड में चाय लेकर आ गया.....। चाय का कुल्हड कुछ कच्चा सा रह गया था। एक तरफ चाय ने कुल्हड की बाहरी दीवार गीली कर दी थी, इधर इन लोगों की बातचीत जारी थी....।

मैं तो कहता हूँ एक प्रस्ताव लाया जाय अबकी बार प्राईमरी मास्टरों की मीटींग में.....और कहा जाय कि सभी न्यूज चैनल आज से कोई भी धमाका होने के बाद मास्टर माईंण्ड शब्द का ईस्तेमाल नहीं करेंगे क्योंकि एक तो पहले ही मास्टर लोगों का माईंण्ड प्राईमरी के बच्चे चर जाते हैं और जो माईंड बचा-खुचा रहता है उसे घर जाते है तो पत्नी चरती है कि कुछ टिउसन उसन करिये.....ऐसा कब तक चलेगा......। क्लास में प्रिंसिपल अलग कहते हैं कि मास्टरजी अपनी क्लास को माईंण्ड करिये, अब मास्टर ही तो है कहाँ तक माईंण्ड करें....उपर से ये न्यूज चैनल वाले रट लगाये रहते हैं मास्टर माईंण्ड - मास्टर माईंण्ड।

दयारामजी ने कहा - ये आप ठीक कह रहे हैं.....अबकी मिटींग में यह प्रस्ताव पास होना ही चाहिये।

तबतक कच्चे कुल्हड से चाय की बूंदे एक-एक कर रिसने लगीं, मास्टर दयाराम की धोती पर एक दो बूंदें गिरते ही उन्हें महसूस हुआ चाय गर्म है। फट् से चाय के कुल्हड को दार्शनिक अंदाज मे देखते हुए बोले - आप जानते हो केदारनाथजी कि मैं यहाँ उस दुकान को छोड इस दुकान पर क्यों आया हूँ ?

नहीं।

वो इसलिये कि मैं इस दुकान की चाय पसंद करता हूँ और वो आज साबित हो गया है।

कैसे ?

वो ऐसे कि जिस मिट्टी से ये कुल्हड बना है उस मिट्टी ने अपने में काफी छोटे-छोटे रंध्र बना कर रखा, और जब कुम्हार ने इस कुल्हड को आग में पकाया, उस आग ने भी इन छोटे-छोटे कुल्हड के छेदों को बनाये रखा.........और जब चाय बनी तो उस पानी ने जिसमें की चाय बनी , उसने भी मुझसे मिलने के लिये रास्ता इस कुल्हड में खोज ही लिया।

तो ?

तो ये कि आग, पानी, मिट्टी जब सब हमसे मिलना ही चाह रहे हैं तो हम कब तक बचे रहते, हम भी यहीं आ गये और अब देखो धोती पर चाय की बूंदें कैसे पसर कर आराम कर रही है जैसे उन्हे आज मुझसे मिलकर शांति मिली है।

केदारजी मास्टर दयाराम के इस तर्क से काफी प्रभावित लगे कि आग-पानी और मिट्टी इनको चाय से मिलाने के लिये एक हो गये......अभी बातचीत चल ही रही थी कि शंकर के रेडियो पर शाहरूख खान के एक फिल्म ओम शांति ओम का प्रचार आया

- अगर किसी चीज को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने मे लग जाती है।

मास्टर दयाराम अब भी अपनी कुल्हड को देख मगन हो रहे थे और न जाने क्या-क्या सोचे जा रहे थे- आग....पानी.....मिट्टी....कायनात...मिलन...... उधर मास्टर केदारनाथ सोच रहे थे कि प्रस्ताव का शीर्षक रखा जायगा - मास्टर माईंण्ड ।



- सतीश पंचम

Saturday, September 27, 2008

खेत में भैंस पडी और खदेरन चले मानहानि का मुकदमा करने अपने ही भाई पर वह भी अंबानी भाईयों की देखादेखी (फुरहरी)


खदेरन ने जब से सुना है कि अंबानी भाईयों के बीच दस हजार करोड की मानहानि का केस चल रहा है बेचैन हो गये और अपने भाई सुखरन पर मानहानि का मुकदमा दायर करने की ठानी। मुकदमे से पहले राय-बात के लिये सदरू भगत के यहाँ गये, देखा तो सदरू हुक्के को अपनी खटिया के पाये से टिका कर रख दिये और दोनों पैर खटिया पर उपर करके बैठे हैं।
मुदा अब क्यों मुकदिमा करोगे.....बाँट बखरा तो तुम दोनो भाइयों मे हो ही गया है फिर...- सदरू ने सरपंची अंदाज में कहा।

खदेरन बोले - अरे बाँट-बखरा हो गया तो क्या किसी की मुडी काट लेंगे.......मैं तो मुकदिमा करूँगा.....कि ये हमारे खेत में अपनी भैंस जान कर छोडे हैं, मेरी छीछालेदर करना चाहते है, मैं तो नालिश तक करवाने की सोच रहा हूँ ।

सदरू बोले - अरे पड गई होगी अपने आप ही.....भैंस को क्या पता कि ये तुम्हारा खेत है.....वो तुम्हारा......उस भैंस को तो अब भी यही लग रहा होगा कि दोनों खेतों के मालिक एक ही हैं......वो अपने पुरानी जगह ही चर रही थी........ तो चलो मान मलौवल कर लो......काहे एतना जान दे रहे हैं कि मुकदिमा करोगे.....कोरट कचहरी करोगे। खदेरन फिर भी हाँ छोड न कहने को तैयार ही नही...जिद फान ली कि मुकदिमा करूँगा तो करूँगा.....तब सदरू भगत अपने असली रंग में आए....बोले - तुम्हारी बुध्दि घास चरती है क्या......।

माने ?

माने गदहा का वो ......ससुर आये हो मुकदिमा और जाजिम बिछाने......अरे तुम्हारी बुध्दि कितनी चलती है ये तो मैं तब ही जान गया था जब तुम दोनो भाईयों में अलगौजी हुई थी.....। अलगौजी के अगले ही दिन तुम अपने नये घर मे रामायण पाठ करवाये थे कि भाई से पिंड छूटा अब तुम नया जीवन सुरू करोगे.....नया परिवार खडा करोगे.......लेकिन बच्चा भूल गये कि रामायन में भाई-भाई का प्यार बताया गया है....मोह-बिछोह बताया गया है कि एक भाई को अपने भाई के साथ कैसे रहना चाहिये और तुम करवा रहे थे रामायण पाठ......आँख के अंधे और नाम कजरौटा सिंह.....।

खदेरन अब भी चुप बैठे सुन रहे थे....उम्मीद नहीं थी कि सदरू इतना भडक जाएंगे।

सदरू ने आगे कहना जारी रखा - अरे तुम जिनको देख सुनकर मुकदिमा करने का मन बनाये हो वह भी तुम्हारी तरह ही है......उस दिन नंदलाल साह के दुकान पर टीवी देख रहा था तो देखा ये धन्ना सेठ दोनों भाई आपस मे अलगौजी करते समय काफी विवाद किये.....सबसे कहे कि हमारा बाँट-बखरा कर दो....हम दोनो भाई साथ नही रहना चाहते तो जानते हो उस समय बगल में कौन खडा होकर ये सब देखताक रहा था ......एक रामकथा बाँचने वाले प्रसिध्द बापू जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हे ईनके परिवार बहुत मानते है, कोई विवाद हो तो उनसे राय लेते है, .....लेकिन ये बापू यह नहीं कह सके कि मैं तो रामकथा बाँचता हूँ....मैं क्यो भाईयों के अलग होने मे मदद करूँ जबकि रामायण मे भाईयों को एक होते बताया गया है......तब सारी रामायणी धरी रह गई थी........तुम आये हो उन धन्ना सेठो का नकल करने।

ईधर सदरू भगत की पत्नी रमदेई अलग भुनभुना रही थी.......आ गये हैं.......अब चलो इनको चाह - पानी पियाओ..........खुद अपने यहाँ झगडा करेंगे और हमारे यहाँ आकर लहरा लगा देंगे चाह दो......तमाखू दो........हे पानी दो.........।

तभी किसी ने कहा - अरे खदेरन तुम्हारी बकरी तुम्हारे भाई के खेत में पड गई है, जल्दी जाओ न अभी बवाल हो जायगा।

सुनते ही खदेरन उठ कर चल दिये कि जल्दी से बकरी को हटा लूँ न अभी मुझपर ही न मानहानि का दावा हो जाय। इधर रमदेई का भुनभुनाना जारी था.......अरे कैसे तो कहा गया है कि कैसे तो मान और कैसे तो न मान। तभी रमदेई की लडकी रतना ने चुपके से भौजी की उंगली टीपते कहा - अम्मा को बोलना भी नहीं आता, कहती है कैसे तो मान और कैसे तो न मान........ यह नहीं कि कहें - मान न मान मैं तेरा मेहमान।

रतना के कहे शब्द शायद खदेरन ने सुन लिये थे.......खदेरन के मुह से बरबस निकला ........ यहाँ भी मानहानि ।

- सतीश पंचम

Wednesday, September 24, 2008

तुम इतना जो टिप्पणीया रहे हो, क्या कोई पोस्ट लिखा है जिसे सबको बता रहे हो। (हँसी-पडक्का)


तुम इतना जो टिप्पणीया रहे हो,

क्या कोई पोस्ट लिखा जो सबको बता रहे हो।

लंगडी-लूली पोस्ट लिखी बेकार ,
पर मुझे खूब जमा बता रहे हो,

बन जाएंगे लिक्खाड लिखते-लिखते,
ऐसा वहम क्यूं पाले जा रहे हो,

जिन मुद्दों को सबने छोड दिया,
तुम क्यूं उनको छेडे जा रहे हो,

क्या कोई पोस्ट लिखा जो बता रहे हो।

पोस्ट मे लिखते हो खाया मुर्ग-मुसल्लम,
देखा तो दाल भात खा रहे हो

ब्लॉग जगत मे दहाडते हो शेर की तरह,
घर में देखा तुम लात खा रहे हो

टिप्पणीयों का खेल है ब्लॉगिंग,
टिप्पणीयों में ही मात खा रहे हो,

क्या कोई पोस्ट लिखा जो बता रहे हो।
:)
- सतीश पंचम

( कैफी आजमी की नज्म से साभार पैरोडीयाना )

Tuesday, September 23, 2008

एनडीटीवी पर जामिया के वीसी ने ये क्या कह दिया


एनडीटीवी पर रात दस बजे जामिया युनिवर्सिटी के वाईस चांसलर कराहते हुए से कह रहे थे मैं तो अपने उन बच्चों के साथ रहूँगा....उन्हें कानूनी सहायता दूँगा.....एक अभिभावक की तरह मेरा फर्ज बनता है कि मैं अपने युनिवर्सिटी से जुडे बच्चों का साथ दूँ जो आज मुसीबत में फंसे हुए हैं। लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही वीसी कि आज जब वे सारे आतंक के शोहदे स्वीकार कर चुके हैं कि उनका बम विस्फोटों में हाथ था......तो किस बिना पर वीसी ने इतनी बडी बात कह दी......क्या ये विचार रखते समय वीसी ने खुद भी कभी एक बार सोचा था कि इसका अंजाम क्या होगा....युनिवर्सिटी को लोग किस नजरों से देखेंगे..........। जहाँ तक मेरी समझ है.....जब देश किसी गहरे संकट की ओर जा रहा हो तो समझ लेना चाहिये कि किसी पढे लिखे चालाक बुद्धिजीवी ने अपना मुह खोला है या फिर कोई समझदार बुद्धिजीवी अपने काम को करने से जान बूझकर बच रहा है........ऐसा देश के बंटवारे के समय हम देख चुके है। आज फिर वही परिस्थितियां बनती दिख रही हैं.......जम्मू और कश्मीर अलगाव पर तुले ही हैं दूसरी ओर ये तथाकथित मुस्लिम एलीट क्लास इस आग में और घी डाल रहे हैं.......। सरदार पटेल ने बंटवारे पर कहा था कि सिर दर्द से बचने के लिये सिर कटाना हमने बेहतर समझा.......लेकिन मैं ये जानना चाहता हूँ कि अब तो पूरे बदन में आग लगी है.....हर अंग जल रहा है.....दर्द दे रहा है.......कहाँ तक क्या-क्या अंग कटा दें कि दर्द से छुटकारा मिले। तो बात हो रही थी वीसी के दिये बयान की.......आप यकीन मानिये....इस बयान की खनक हमें अगले कई सालों तक सुनाई पडेगी क्यों कि बोलने के लिये भले वीसी बोले हों लेकिन असल में यह कुछ लोगों की मानसिकता बोल रही थी कि चाहे कुछ हो जाय हम इस देश के लोगों से अपना विरोधाभास जारी रखेंगे। यह मानसिकता हांलाकि बहुत कम लोगों में है लेकिन देर-सबेर यह अपना असर दिखा कर रहेगी और दिखा भी रही है.......आखिर आज किसी पढे लिखे बुद्धिजीवी ने अपना मुह फिर खोला है।

- सतीश पंचम

Monday, September 22, 2008

बाँस के बने अंडरवियर से हैरान देहात !


     सामुज यादव ने जब से सुना है कि बाँस के बने अंडरवियर बाजार में आ गये हैं तब से सोच रहे हैं कि लोग उसे पहनते कैसे होंगे.....चुभता तो होगा ही....बाँस जो ठहरा। आम के पेड के नीचे बैठे रहर की सीखचों से खाँची (टोकरी) बनाते सामुज के मन में रह-रह कर यह सवाल आ रहा था....कहें तो कहें किससे.....सभी अपने काम में व्यस्त....कडेदीन अपने खेतों में रहर बो रहे हैं......फिरतू चमार आज रामलखन केवट के यहाँ जुताई कर रहे हैं......मन की बात कहूँ तो कहूँ किससे ? तभी साईकिल से आते मास्टर लालराम प्रजापति दिखाई पडे। दूर से ही सामुज बोले - "अरे कहाँ जान दे रहे हैं ई भरी दुपहरीया में ?....क्या करेंगे इतना रूपया कमाकर ?"

    सामुज की बात को अपने से बातचीत का न्योता समझ मास्टर अपनी साईकिल सीधे आम के पेड के नीचे ले आये। साईकिल से उतरते हुए कहा......"अरे तुम्हारी तरह आम के पेड के नीचे बैठ खाँची बनाने जैसा आरामदेह काम थोडे है कि बस हाथ और मुँह चलाते रहो बाकी सब काम होते रहे"

"अरे तो आप भी तो वही करते हैं - मुँह - हाथ चलाते हैं.....कोई लडका सैतानी किया तो बस हाथ की कौन कहे कभी-कभी पैर भी चलाने लगते हैं" - सामुज ने हँसते हुए कहा।

मास्टर सिर्फ सिर हिलाकर हँसते रहे और साथ ही साथ साईकिल को पेड के तने से सटा कर खडा भी कर दिया।

  सामुज ने धीरे-धीरे बात को मोडते आखिर पूछ ही लिया - "अच्छा ये बताओ मास्टर - कि लोग बाँस की बनी अंडरवियर कैसे पहनते होंगे ?"

 "बाँस की बनी अंडरवियर ?" मास्टर के मन में जिज्ञासा जगी कि ये क्या कह रहे हैं सामुज यादव, भला बाँस का भी अंडरवियर होता है कभी...पूछ ही लिया....."ये किसने कह दिया तुमसे कि बाँस का अंडरवियर होता है?"

   सामुज ने फट से वो अखबारी कागज निकालकर दिखाया जो हवा से उडते-खिसकते उसी पेड के नीचे आ पहुँचा था जहाँ वो खाँची बना रहे थे- लिखा था - "लंदन में बाँस के रेशों से बनी इकोफ्रेंडली अंडरवियर बनी है जो कि लगभग तीस पाउंड की है....."। मास्टर ने पहले तो उस धूल-धूसरित कागज को ध्यान से देखा.....फिर कुछ सोचने की मुद्रा बनाई और कहा - "इकोफ्रेडली माने - पर्यावरण का मित्र.....तीस पाउंड माने केतना होता है कि......एक गुडे अस्सी माने अस्सी गुडे तीस....माने चौबीस सौ.....यानि अढाई हजार का अंडरवियर.........। हाँ तो सामुज वो अंडरवियर अढाई हजार का है और उससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचता......यही लिखा है इस कागज पर...."।

"तो क्या हम लोग जो पहनते हैं उससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है क्या......ये नई बात सुन रहा हूँ......"।

 मास्टर भी सोच में पड गये कि बात तो ठीक ही पूछी है.......वो जो सन्नी देओल आकर कहता है......चड्डी पहन कर चलो और न जाने क्या-क्या तो ईसका मतलब सब पर्यावरण के खिलाफ ही बोल रहा है क्या, कहीं ये अमीरों के चोंचले तो नहीं हैं।

सामुज बोले - "अरे अढाई हजार की चड्डी कौन पहने......और फिर हम तो वो हैं कि पट्टेदार नीली चड्डी पहनते है..........शकील मिंया की दर्जियाने में दस रूपये में सिला ली......नाप ओप का झंझट नहीं........सालों से जानते है कि मेरा साईज क्या है.....पहनने में भी आसान, खुला और हवादार"।

 मास्टर बोले - "अब खुला और हवादार का बखान मत करो मेरे सामने......उस दिन देख रहा था यहीं इसी पेड के नीचे तुम्हारी आंख लग गई थी......तुम्हारी धोती जरा सा बगल में क्या खसकी......गाँव के लडकों को मानों कोई खेलने का सामान मिल गया........सब तुम्हारी खुले मोहडे वाली चड्डी में देख-देख हँस रहे थे और तुम बेफिक्र सो रहे थे। लडके छोटे-छोटे पत्थर तुम्हारे उस खुले स्थान पर फेंक रहे थे। वो खदेरन का लडका दग्गू एक पतली लकडी से तुम्हारे चड्डी में कोंच न लगाता तो तुम उठते भी नहीं, सोये ही रहते"।

 सामुज ने हँसते हुए कहा - "अरे तो लडके हैं अब शरारत नहीं करेंगे तो कब करेंगे। और जहाँ तक पर्यावरण प्रेमी की बात है तो मैं तो खुले और हवादार में होना पसंद करूँगा वही सबसे ज्यादा ठीक लग रहा है"।

    "तो इस मायने में तो वो अंगरेज लोग ज्यादा ही पर्यावरण प्रेमी होंगे जो चाहे समुदर हो या नदी फट से ओपन हो जाते हैं" - मास्टर ने हँसते हुए ही कहा। तभी झिंगुरी सिर पर बोझा लिये आते दिखे.......मास्टर ने कहा-  "वो देखो कितना बडा पर्यावरण प्रेमी आ रहा है.......आज तक कभी इसने धोती के अंदर चड्डी नहीं पहनी.......अढाई हजार की कौन कहे अढाई रूपये का भी खर्चा नहीं है इस पर्यावरण प्रेम में......न रहे बाँस और न बजे बाँसुरी" :)


- सतीश पंचम

Saturday, September 20, 2008

मुंबई लोकल में दिखा ऐक संताप (रेल वाकया)


कल लोकल ट्रेन में दो लडकों की बातचीत चल रही थी....किसी तीसरे के बारे में.....अरे वो तो कोसी रीवर की तरह है...किधर भी बहता है......जिधर नहीं बहने का उधर भी बहता है.....। सुनकर मेरी जिज्ञासा बढ गई ........ आखिर कोसी के रौद्र रूप को उदाहरण बनाया जा रहा था......तभी एक ने कहा- साला कभी संगीता के पीछे पडता है कभी मनीषा के पीछे......और कभी तो रिया को भी चाय-बी पिलाते रहता है। साले को किसके पीछे पडने का येईच नहीं मालूम। उन लोगों की बातचीत सुनकर आप भी समझ गये होंगे कि आखिर बातचीत की धार किस तरफ चल रही थी । तब तक दूसरे ने कहा - अरे उसको मैं बोला - सीधे से एक को पकड....शादी बना डाल.....लेकिन येडे को अकल नहीं माँ के दीने को.....। और दोनों हंसने लगे.....लग रहा था वही हैं.....दूसरों के होने न होने से उन्हें कोई फर्क नही पडता.....। अभी ये सिलसिला चल ही रहा था कि टिकट चेकर आ गया.....इधर ईन दोनों का हँसना-खिलखिलाना चल ही रहा था। टीसी ने टिकट मांगा तो दोंनों ने आराम से अपने अपने पैंट की पिछली जेब में हाथ डाल कर पर्स निकाला और उसमें रखे मन्थली पास को आगे किया। टीसी ने एक नजर उनके पास पर डाली और आगे बढ गया। दोनों वापस अपनी उसी मुद्रा में आ गये.....कोसी की धारा अब भी उनके मुख से बीच-बीच मे फूट पडती । उनके हँसी-ठिठोली को जारी देख एक बूढा पास आया और बोला....तमारे को कोसी नाम में मज्जा लगता ऐ......उधर ईतना लोग का घर बार गिरेला है अन तमे मज्जा आवी ने....शेम ऑन यू डीकरा.......अरे कबी तो सिरियस होने का.....। बूढे का इस तरह बोलना कुछ ऐसा असर कर गया कि दोनों चुप हो गये और लोग उत्सुक हो देखने लगे कि देखें आगे क्या बोलता है बूढा। लेकिन वो बूढा कुछ नहीं बोला। उठकर ईन लोगों के पास आ जाने के कारण अब उस बूढे की सीट पर कोई दूसरा बैठ गया था। बूढा वहीं पास ही एक जगह खडा रहा। अब जो शख्स उस बूढे की सीट पर बैठ गया था वह उठा और उसने कहा - अंकल बैठ जाओ......। लेकिन बूढा बाहर की ओर देखता रहा....रेल अपनी उसी रफ्तार से जा रही थी......। अगला स्टेशन आया....और बूढा उतर गया। तभी उन दोनों छोकरों में से एक बोला......लगता है सरक गएला है........। दूसरा बोला - देख ना यार.....कुछ जान पेचान नहीं.....तू कौन.......मैं कौन.......खाली पीली आ के सुना डाला। अगले स्टेशन पर वो दोनों भी उतर गये.....और मैं सोचता रहा......उस बूढे के बारे में जो बिहार में आई बाढ की त्रासदी पर मजाक बर्दाश्त न कर सका.....उन लडकों के शब्द अब भी कानों में गूँज रहे थे........लगता है सरक गएला है।



- सतीश पंचम

Thursday, September 18, 2008

टीवी पर दिखे टोटके से परेशान बूधन महतो (फुरहरी)


आम के पेड के नीचे बैठे बूधन महतो अपनी जाँघ पर सुतली को बर(मरोड) रहे थे जिस्से रस्सी बना सकें, कि तभी खदेरन और झिंगुरी हल बैल लेकर जाते हुए दिखे..... इतनी दोपहरीया में ई लोग कहाँ जोताई करने जा रहे हैं जबकि गर्म लूह और तपिश के मारे बाहर मुँह निकालने में पतँग पडी है। बूधन महतो ने दूर से ही पूछा - कहाँ जा रहे हो जोडी-पाडी मिलकर। पेड की छाँह देख पास आते झिंगुरी ने कहा- देख नहीं रहे हो....हल-बैल लेकर जा रहे हैं तो खेत में ही जा रहे हैं......कहीं कोई ईनार-कुआँ खोदने थोडे जा रहे हैं....हल लेकर। अरे तो कोई टैम होता है हल जोतने का.........सभी किसान लोग सुबह ठंडे-ठंडे जोत लेते हैं कि बैलों को भी आराम रहे....औऱ खुद भी बीमार होने से बचें.......नहीं तो सीत-घाम .......ठंडी-गर्मी......मार डालेगी कि जीने देगी.......आये हो बडे हल जोतुआ - बूधन महतो ने कुछ नाराजगी भरे स्वर ने कहा। खदेरन ने कहा - टैम देखकर ही तो जोताई करने निकले हैं.....अभी-अभी राहु खतम हुआ है.....सो चल पडे हल बैल लेकर। राहु खतम हो गया है.....कब.....कैसे......अभी कल ही तो साईकिल से अपने मामा के यहाँ जा रहा था- बूधन महतो ने कुछ अचरज भरे स्वर में कहा। झिंगुरी बोले - अरे उ राहुला बनिया नहीं.......आप को तो केवल राहुल नाम के बनिये का पता है सो लगे हो राहु ......राहु जपने.........राहु माने गिरह....नछत्र वाला राहु.....उ राहु जब होता है तो कोई ढंग का काम नहीं करना चाहिये....देख नहीं रहे.....बडे बडे नेता लोग भी अब राहु को बचा कर चलते हैं......पाटी का कारकरम हो तो उसे भी जोतखी और ओझा-सोखा से समय ज्ञान लेकर करते है। बूधन महतो बोले - समय ज्ञान लेकर ......इ कौन नया परपंच है भाई। ........आज तक तो नहीं सुना था। झिंगुरी ने कहा - अरे कैसे सुनोगे.....खुद तो कभी टीबी-फीबी देखते नहीं हो.......अरे बंगलोर नाम का कोई जगह है जहाँ भाजपा पाटी का कोई कारकरम है......सब लोग बता रहे हैं कि टोटका-ओटका खुब हुआ है......मँच की दिसा बदल दी गई है.........झँडे मे कमल का रंग पीला कर दिया है और समय को ध्यान मे रखकर कहा गया कि कौन कब बोलेगा.......कौन कब बोलेगा। अब खदेरन ने मोर्चा संभालते हुए कहा - अरे जब ऐतना बडमनई लोग समय दिसा का ईतना ख्याल रखते है तो हम लोगों को तो रखना ही चाहिये.......क्या कहते हो । बूधन महतो ने मुस्की मारते कहा - जहाँ तक समय दिसा की बात कर रहे हो तो एक बात जान लो......हम आजतक केवल दिसा उसा का ख्याल किये हैं तो केवल दिसा मैदान के समय........और सच कहूँ तो तुम भी ईस खटकरम मे काहें अपना बखत खराब कर रहे हो........अरे ई कुल टीम-टाम......गिरह.......नछत्र उन लोगन के लिये है जिनके पास कौनो काम नहीं है......जिनके पास बहुत टाईम ओईम है, उनके लिये है...........तुम लोग कहाँ इन लोगों के चक्कर मे पड रहे हो। कल को कहेंगे कि समय ठीक नहीं है.......फलाना नछत्र चल रहा है........बोवाई चार दिन बाद करो तो क्या तुम उनका कहा करोगे कि अपना काम करोगे... बरखा-बूनी तो कौनो टैम-टूम देखकर तो नहीं बरसेंगे, ...........लडिका - बच्चा कल जब रोटी मांगेगे.....तब क्या कहोगे कि नछत्र ठीक नहीं था ईसलिये समय पर बोवाई न हो सकी, अरे जाओ......सुकर मनाओ कि अभी थोडा ही गदहा खेत खाया है.....कल को बाढ राहत का सामान भी गिरह-नछत्र देख कर बंटेगा .....खदेरन और झिंगुरी केवल सिर हिलाने का काम कर रहे थे कि तभी कोई राही अपनी साईकिल पर जाता दिखाई दिया,धूप और लू से बचने के लिय़े अपने सिर और मुँह को कपडों से कसकर बाँधे हुए, बगल में रेडियो लटकाए अपने में ही मगन वह राही चला जा रहा था......रेडियो पर कोई फिल्मी गीत बज रहा था.... तोहे राहु लागे बैरी, मुस्काये है जी जलायके......। खदेरन ने झिंगुरी से कहा....तो क्या कहते हो....चलें वापस....हल लेकर घर से आ रहा था तो दग्गू की माई भी कुछ ऐसा ही गा रही थी..... मोरा गोरा अंग लेई ले :)

- सतीश पंचम

Tuesday, September 16, 2008

चिखुरी की बहू और गृहमंत्री के कपडे (फुलकारी)


चिखुरी की पतोहू ने एक साडी क्या बदल कर पहनी, सास कह रही थी क्या खुद को गृहमंत्री समझती है जो बार-बार कपडे बदल रही है। चिखुरी को भी बडा अजीब लग रहा था कि आखिर जब घर में ही है तो बार-बार कपडे बदलने का क्या तुक......ईधर चिखुरी का बेटा सोभई अलग नाराज कि एक साडी ही तो बदल कर पहनी है, उसमें इतना बवाल करने की क्या जरूरत है, लोग गृहमंत्री होने का ताना अलग दे रहे हैं। लेकिन हाय रे कौवा-मझान, पतोहू के बारे में कोई नहीं सोच रहा कि वो क्या सोच रही है, उसके मन में क्या चल रहा है......सब उसी को कह रहे हैं कि क्यों गृहमंत्री के तरह बार-बार कपडे बदल रही है, यह नहीं देखते कि झिंगुरी की पतोहू दिन में चार बार सीसा-कंघी लेकर दरवाजे पर जा बैठती है, ओठलाली लगाती है, रह-रहकर एक नरम रूई जैसी गद्दी से गले पर पौडर की फुहार करती है, उसे कोई कुछ नहीं कहता, सब उसे ही क्यों कह रहे है.......वो रामदीन की बिटिया.......ब्याह हो गया......पति बाहर देस कमा रहा है......लेकिन खुद नैहर में टीप-टाप से रहती है.....क्या मजाल जो एक दिन बिना ओठलाली लगाये दिख जाय, बिसाती आता है चूडी-कंघा लेकर तो घंटो मोल-भाव करेगी, यह कितने का.....वह कितने का.....हँस-हँसकर उससे बतियाएगी.....चूडी लेगी तो उसमें भी चार घंटा लगा देगी......वह सब किसी को नहीं दीख रहा है.....और वो फाफामऊ वाली छोटकी पतोहू.....दिन मे चार बार कहेगी कि मुन्ना ने गीला कर दिया इसलिये कपडे बदल रही हूँ......कह लो......मैं भी कभी यही कहकर मन की अहक पूरी करती थी, आज बच्चे बडे हो गये तो क्या.....अपनी साध पूरी करने के लिये मैं बच्चों के नाम का सहारा क्यों लूँ.....मैं तो खुलेआम दिन मे चार बार कपडे बदलूँगी....देखती हूँ कोई क्या कहता है......अरे यही तो दिन है मेरे, अब न पहनूँगी तो कब पहनूँगी......बुढौती में गृहमंत्री कपडे बार-बार बदलकर पहन सकते हैं तो मैं क्यों नहीं, आखिर मैं भी तो आज न सही कभी तो सास-ससुर के बाद गृहमंत्री बनूँगी ही.....तब आज ही क्यों न अहक पूरी कर लूँ.....फिर कल को क्या पता सरकार ही बदल जाय.....और गृह मंत्रालय छिन जाय, छोटा देवर भी तो आजकल अपने माँ-बाप का दुलारा बना फिर रहा है। अभी पतोहू यह सब सोच ही रही थी कि पतोहू के बडे बेटे ने आकर कहा - अम्मा भूख लगी है....खाना दो। पतोहू के मन मे तूफान मचा था और इधर ये नासपीटा खाना मांग रहा है.....भभककर कहा - क्या खाना-खाना लगा रखा है.....अभी तो दिया था ईतनी जल्दी भूख लग गई......पेट है कि मडार.....भरता ही नहीं है। बेटा अवाक्.....कहे तो क्या कहे.......सुबह को खाया था......अब जाकर शाम को माँग रहा है......उसपर भी दुर-दुर हो रही है......कहा - कहाँ अम्मा, सुबह दिया था......उसके बाद नहीं......। बाहर चिखुरी बैठे सुन रहे थे.....कहा - कैसे देगी.....कपडे बदलने से फुरसत मिले तब न........अरे जब ईसका बाप मेरे यहाँ रिस्ता लेकर आया था.....तभी मना कर दिया होता तो काहे को ईतना भोगना पडता........गृहमंत्री बनी फिर रही है........। सास क्यों चुप रहती......वह भी मैदान मे कूद पडी - अरे गृहमंत्री भी ईतने तेजी से कपडे नहीं बदलते जितना तेजी से ये छछन्न करती है......अभी कोई साडी वाला बिसाती आ जाय तो देखो......एक पैर पर दौडी चली जाय.....यहाँ लडका भूख से मर रहा है उसकी फिकर नहीं है.......इंतजार कर रही है बिहार के उस नेता की तरह .......फीता काट कर घाटन करे तब जाकर भोजन दे......कुलअच्छिनी कहीं की। अभी यह सब चल ही रहा था कि बाहर बर्फ गोले वाला आया.......बेटे ने खाना छोड बर्फ का गोला लेने की दौड लगाई......ईधर चिखुरी को किसी ने आकर कहा......सरपंच बुलाये है.....कोटा पर मिट्टी का तेल आया है जल्दी पहूँचो नही खत्म हो जायगा......सास ने सुनते ही दौड लगाई कि वह मिट्टी के तेल वाला डब्बा ढूँढ लूँ........नहीं मिलते-मिलते तेल ही न खत्म हो जाय........उधर पतोहू मन ही मन कह रही थी..........अब तक तो आराम से दिन मे एक दो साडी बदल लेती थी ......कोई कुछ कहता भी था तो दूसरे को लगाकर कहता......अब तो खुलेआम कह देते हैं........क्यों गृहमंत्री की तरह बार-बार कपडे बदल रही हो, गृहमंत्री भी तो जितेन्द्र की तरह सफेद जूते पहन कर ईठलाते रहते हैं......हाय ये बुढापा जो न कराये.......बार-बार कपडे बदलो, कंघी करो, सफेद जूते पहनों....लोग मर रहे हों तो अपनी साध पूरी करो कि मैं तो साफ सुथरा रहना पसंद करता हूँ.....अरे बात गाँधी की करोगे लेकिन भूल जाते हो कि उन्होंने एक धोती के सिवा कुछ और पहनना ईसलिये स्वीकार नहीं किया कि मेरे देश के लोगों को कपडा नहीं मिल पा रहा तो मैं क्यों ढेर सारा कपडा पहनूँ....अब कभी गाँधी की मूर्ति के आगे से गुजरना तो मन में यह जरूर सोचना कि वह आदमी सिर्फ धोती क्यों पहने है....लेकिन तुम जैसे लोगों में अब सोचने की शक्ति ही कहाँ रही....सारी शक्ति तो कपडों की खूबी में समाई है.....लानत है तुम जैसे लोगों पर...........और आखरी बात सुन लो.....दो अक्टूबर नजदीक ही है....हम सभी देखना चाहेंगे....कि तुम उस दिन गांधीजी की प्रतिमा पर जब सभी सांसदों के साथ फूल मालाएं अर्पण करोंगे तो उस समय तुम्हारे मन में क्या चल रहा होगा.......तुम्हारे हावभाव कैसे होंगे.....दो अक्टूबर...नजदीक ही है।

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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