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Tuesday, April 7, 2015

'आकाशवृत्ति'.....उनके लिये, जो नहीं जानते कि ओले पड़ना आखिर क्या होता है !

    और ठीक उसी समय उत्तर –पश्चिम के कोने में एक गम्भीर गड़-गड़ाहट हुई। किसानों के चेहरे मारे भय के खिंच गये। पश्चिम ओर आँख उठायी तो रोयें खड़े हो गये। काले-काले, भरे-भरे, उड़ते-उमड़ते हुए दानवाकार बादल छाये चले आ रहे हैं। हवा बन्द हो गयी। तीन बजे अँधेरा-सा हो गया। सरेहि पर धुएँ के पहाड़-सी उठती सजल बादलों की सकल हरीतिमा पर छा गयी। एक मनहूस क्षण था वह जो भारी दहशत से भर गया।

    फिर एक बार घटाओं में खड़खड़ाहट हुई और बूंदें छूट गयीं। सामने के खेत के पौधे सिहर उठे। किसान जब तक अपने बैलों को घर में ले गये तब तक खपरैलों पर से खट्...खट्....पट्....पट् की तेज आवाजें आने लगीं।

   भयानक खड़खड़ाहट के साथ आसमान टूट-टूट कर धरती पर पड़ने लगा लोग त्राहि-त्राहि कर उठे।
 अब मैं सोचता हूँ कि कल मेरी आँखों के सामने वह क्या था ? और आज सफ़ेद-सफ़ेद, छोटे-छोटे, बड़े-बड़े, अविरल, एक पर एक जहर के फूल। गद्द-गद्द धरती पर बैठते गये। बिछते गये। किसानों के कलेजों में गड़ते गये। छाती को दलते गये। गाँव थरथरा उठे। प्राण-प्राण काँप गया। घोर अंधकार ! गर्जन-तर्जन ! अन्धवात् !  उपलवृष्टि प्रकृति का कोप। जान अब नहीं बचेगी।

  सीतल चिल्लाया, अरे भाई मेरा तो घर ही नहीं दिखाई पड़ता है। क्या हो गया ? क्या हो गया ?”
लोगों ने समझाया कि पत्थर पानी से ऐसा घना अन्धकार हो गया है कि छिप गया है। उड़ नहीं गया है। तब तक एक बड़ा सा पत्थर खपरैल छेदकर बैठक में आ गिरा। पानी का घड़ा चूर-चूर हो गया। सीतल ने दौड़कर उसे उठा लिया। बोला – इतना बड़ा ! अब प्राण नहीं बचेगा !”  और तब तक हाथ से वह छूट गया। ऊपर सिर पर खपरैल कोई लाठी से पीट रहा है और सामने धरती पर सफेदी का चबूतरा बन  गया है। सीतल ने खेतों की ओर देखा। देखता रह गया। देखने में डूब गया। सुध बुध खो गयी।

  बाद की एक जोरदार खरखराहट से ध्यान भंग हुआ तो बोला – फसल कट कर गिर रही होगी

हाँ, सब कटकर बरबाद हो जायगी, एक ने कहा।   
कुछ बचेगा नहीं ?”
 कुछ नहीं ।
सब बरबाद हो जायगा ? ”
अब हम लोग कैसे जीयेंगे ? ”
भगवान हैं ! ”

   सीतल क्षण भर चुप रहा। अचानक चिल्ला उठा – सर्वनाश हो गया। भगवान कहाँ हो ? कहाँ हो ? ” और कुछ लोगों के पकड़ते-पकड़ते ही झटकार कर बाहर निकल गया। उपलवृष्टि में धँस गया।
 अब भारी मुसीबत आ गयी। पत्थर वैसे ही भरभरा कर गिर रहे हैं। कौन बाहर जाय ? कैसे जाय ?
 कुमार बाबा बोले – जाओ...जाओ...देखो......पकड़ो....मर.....जायगा....अरे खाँची ओढ़ लो.....पनिहा सिर पर डाल लो.....कम्बल....डालो.....डालो....जल्दी करो ।
  
   तीन चार आदमी दौड़े। पत्थरों की ढेर में पैर धँस-धँस जाते हैं। चार-कदम पर सीतल गिर गया। जर्जर शरीर पर दैवी पत्थरों की बौछार गरीब की ठठरियों पर भगवान का आघात !
  जिस समय खींच-खाँचकर किसी प्रकार सीतल बैठक में लाया गया उस समय बेहोश लोगों की संख्या एक नहीं पाँच थी।

   उसी समय बनवारीसिंह के घर की औरतें चिल्ला उठीं। घर में कुहराम मच गया। कुछ समझ में नहीं आया कि क्या बात है। खिड़की के रास्ते कूद कर एक लड़का आया और बोला कि तमाम घर में पानी ठेल दिया है। पूरा आँगन पत्थरों से भर गया है। पनाला बन्द हो गया है। पत्थर घर के भीतर छाजन छेद-छेद कर गिर रहा है।
  
   कुमार बाबा आग बनाने के लिए हैरान हैं। कुछ नहीं मिला तो पुआल फूँका जाने लगा। आग बनी। ठिठुरे लोगों को तपाया गया। सीतल को होश आ ही नहीं रहा है। आवे भी तो कैसे। वर्षों की साध क्षण भर में बरबाद हो रही है। वर्षों पहले शादी में एक-हजार कर्ज लेना पड़ा, दो बीघा बढ़िया खेत गिरवी रख देना पड़ा। इस वर्ष फसल उमड़ आयी तो लोगों ने कहा कि इस साल यदि महाजन नहीं फिर गया तो जनम-भर में नहीं फिरेगा। बात सीतल के दिल में बैठ गयी। एक जून खाने लगा। रूखे-सूखे पर दिन काटने लगा। धोती-कुरता नहीं बना। पुराने में पैबन्द लगा कर चल रहा है। घर के लोगों को एकदम जरूरी चीजें ही खरीदता है। तमाखू इधर-उधर घूमकर पी लेता है। सुर्ती मांग कर खा लेता है। पाई-पाई जोड़ता है। नमक चाटकर जीता है। अब तक साग पर खरची चली, अब मटर की फलियों ने दुख दूर करने की झण्डी दिखा दी। रोज हिसाब लगाता है। भाव जोड़ता है। किसी प्रकार बारह सौ का अनाज हो जाता तो एक हजार कर्ज दे देता। पचास रूपया मालगुजारी में जाता। सौ रूपया इधर का ऋण चुकाता। पच्चीस में कपड़े लत्ते और शेष में और काम। किसी प्रकार खेत छूट जाता फिर भगवान् दिन लौटाता। आज सब सोचा-समझा, बरफ में गल गया तो सीतल को कैसा लगा होगा !
  
   सीतल के शरीर पर राख मली जा रही है। इसी खींचा-खांची में जीर्ण धोती एकदम फटकर बेकाम हो गयी, दूसरी धोती लपेटी गयी। भीगा कुरता जो पचीसों जगह पैबन्द लगा और एकदम उड़ सा गया है, किसी प्रकार शरीर से अलग किया गया। कम्बल से शरीर ढाँका गया। उधर ओले की रफ्तार में कमी नहीं प्रतीत होती। सारा संसार उपल स्तूपों से चमकने लगा। गली-गली में पत्थर। वह पास का पेड़ जैसे ठूँठ गो गया। पत्तियाँ नीचे जमा हो गयीं। पत्तियों के ऊपर पत्थर जैसे कलेजे में आग।
  
  थोड़ी देर में सीतल ने आँख खोल दी। हड़बड़ाया-सा बोला – देखो महेश ! हमारे उत्तर-पट्टी वाले खेत में गदरा हो गया है, तुम उधर रहते हो। नुकसान न होने पावे 
  
   उपस्थित लोगों ने विषादपूर्ण नज़रों से एक दूसरे को देखा, सीतल को क्या हो गया ?
तुम क्या कह रहे हो दादा ?”  महेश ने कहा ।        
पानी बरस रहा है ?”  सीतल ने उठने की चेष्टा करते हुए कहा, बनवारी ! घुघुनी बनवाओ । जरा लहसुन-मिरचा उसमें तेज करा देना। जल्दी करो। खूब मजा आयेगा....हा...हा...हा.. अब क्या बात है ? पानी बरस रहा है.....घुघुनी बनेगी......भरपेट खायेंगे......गायेंगे....दुख हरो दुआरिकानाथ सरन मैं तेरो.....।

   “चुप रहो सीतल भाई, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है। बाहर देखो, ओले पड़ रहे हैं। कुमार बाबा ने कहा।

   “ओले पड़ते हैं....पड़ने दो.....हा....हा...हा....भगवान हैं......अभी तो एक हजार चुकाना है......मालगुजारी देना है.....घर की मरम्मत कराना है......ए कुमार भाई। हमारी चारपाई टूट गयी है। मत फूँको पुआल जी ! हमें माँग कर ले जाना है....रघुपति राघव राजा.......।
   
   महेश ने मुँह बन्द करना चाहा । सीतल के बूढ़े शरीर में न जाने कहाँ का बल आ गया। जोर लगाकर चिल्लाता हुआ उठा- अरे डाका पड़ गया है जी.....ई.....ई......ई चलो दौड़ो.....औ.....औ..... और भागने की चेष्टा में पकड़ते-पकड़ते फिर बेहोश हो गया। लोगों ने उठाकर भीतर चारपाई पर लिटाया।
  
   मैंने घड़ी की ओर देखा। चार बज रहे थे। सीतल दादा को पागल बनाकर ओले कम हुए। धीरे-धीरे उनका पड़ना बन्द हो गया। कुछ देर में पानी भी रूक गया। हवा का वेग कम हुआ। बादलों के बीच से कहीं कहीं नीला आकाश झाँकने लगा जैसे घनघोर निराश से भग्न हृदय में आशा की लकीर । थोड़ी देर में पश्चिम का आकाश एकदम साफ हो गया। यहाँ तक कि सूरज ने अपनी किरणें पृथ्वी पर फैला दीं। डरती, सहमती और सकुचाईं किरणें आईं। तब तक दुनिया बदल चुकी थी। अभागी किरणों के हरे भरे संसार को कोई महाक्रूर दैत्य आकर बुरी तरह रौंद गया था। जीवन तहस-नहस हो गया था और सर्वनाश के बीच संसार अवाक् था।

  कोई किसी से नहीं बोलता है। चेहरे पर स्याही पुत गयी है। आँखों में गहरी उदासी और निराशा छा गयी है। धीरे-धीरे लोग घरों के बाहर होते हैं। पत्थरों के ढेर को देखते हैं। खेतों की मेंड़ पर जाकर खड़े होते हैं। कलेजा बैठ जाता है। दिल में आग लगी है। खेतों में धुआँ उठ रहा है। लपटों में सारा संसार जल रहा है। खेतों को यह कौन करइत डँस गया। विष फैला नहीं वे चित्त पड़ गये। अब क्या हो ?

आँसू बहाया जाय ? सिर पीट लिया जाय ?

   कुमार बाबा की बैठक में धीरे-धीरे अन्धेरा छा गया। उसने गाँव घेर लिया। श्मशान जैसी शांति में कोई अपनी हानि की सूची बताता है तो सुनने वाला सुन लेता है। चिराग नहीं जले। घरों में धुएँ का चिन्ह नहीं मिला। गुमसुम बैठे लोग जैसे जीवविहीन हो गये हैं। सात बजे रात को ही आधी रात का सन्नाटा हो गया। सर्वनाश के गहरे अँधेरे की गोद में विमूर्छित गाँव आँखें कब लगीं और कब खुली, इसको कोई आदमी ठीक-ठीक नहीं बता सकता।
  
  आज सवेरे ज्यों ही गाँव से बाहर आया हूँ लोगों ने बताया है कि सैकड़ों गाँवों की यही दशा है और खेतों में अब कुछ बाकी नहीं है।
  
   मेरी कल्पना को भारी ठेस लगी जब देखा कि सचमुच खेतों में कुछ नहीं है। एक किसान ने सीतल दादा के गेहूँ वाला खेत दिखाया।

   ओफ् !  यह वही रहा जिसकी मेड़ पर खड़े होकर क्षणमात्र के लिए समाधिस्थ हो गया था। आज इसे क्या हो गया ? आदमी के बराबर उपजी इसकी फसल क्या हुई ? कहीं पर बालियों का पता नहीं। एक-एक बित्ते घुनी हुई डंठल खड़ी है। शेष पौधे जमीन में गड़ गये हैं। किसी राक्षस ने जैसे इन्हें बलात् रौंद कर पाँव में पटक कर मर्दित कर दिया है। पहचान में नहीं आते। अजीब शकल हो गई है। साध का श्रृंगार आज चिता पर सो गया। अन्न-ब्रम्ह की विजय वैजयन्ती आज झुक कर लटक गयी है। धरती माता के पुत्रों की लाश पर आज बरसने वाले आँसुओं को पोंछने वाला कोई न रहा।
  
   आँख उठा कर देखता हूँ, कोसों दूर जहाँ हरियाली का सागर उमड़ता हुआ दिखाई पड़ता था वहाँ अजब सफ़ेदी छाई है। ऐसी ही सफेदी एक बार चैत में कटिया के बाद छा जाती है। ......तो सोचता हूँ कि अब कटिया क्या होगी ?  काल की महाकटिया के बाद किसान अब क्या काटेगा ? खेतों में है क्या कि काटेगा ? पंक में गड़े हुए पौधों को उलटता-पलटता हूँ। कहीं अन्न का दाना नहीं है। छीमियाँ कट गयी हैं। जो सही सलामत नजर आती हैं उनके भीतर का दाना कुम्हला कर गल गया है। जिनके ऊपर पत्थरों की अविरल बौछार घण्टों हुई उनकी और क्या गति होगी ?  बेचारे कोमल पौधे आखिर कब तक कठिन कठोर पत्थरों से युद्ध करते। धराशायी हो गये, कट गये, बिखर गये, और ऊपर गंज गयी पत्थरों की चट्टान जो घण्टे-दो-घण्टे नहीं पूरे तीन घण्टे बाद तक गली नहीं। मैं देखता हूँ, आज भी ये मनहूस पत्थर दुनिया को बदरंग बनाकर खेतों में पड़े सड़ रहे हैं।
  
   सरसों की फुलवारी क्या हो गयी ? तीसी की क्यारी कहाँ चली गयी ? तितलियों की फौज-सी फूली मटर की बहार किस घाट लगी ? मसूर की मुस्कान कैसे मटियामेट हो गयी ? ओफ् लोग कहते हैं रूपये बोये हैं। भाव आ गया तो बस जायेंगे। वह जमीनवालों की आशायें थीं और यह आसमान वालों का इन्तजाम है। कितना अन्तर है।

   देखते बनता नहीं। मेंड़ पर मूड़ी पटक देने की इच्छा होती है। भारी अन्धेरा सा लग रहा है। आदमी है, मवेशी हैं, बच्चे हैं। इनके लिये अब इन गाँवों के लोग अब क्या करेंगे ?  पत्थर में दबकर निष्प्राण बन गया है वर्तमान नहीं, किसानों का भविष्य। अगला साल अभागा है कितना ? अभी बाढ़ का घाव भरा नहीं था, अभी पिछले वर्ष के प्राकृतिक कोप से टूटी कमर सीधी भी नहीं हो पायी थी कि यह नयी चोट आकर बहुत बेमौके भरपूर बैठ गयी। बैठ गया सारा उल्लास, सारी उमंग और जीवन की आशा।
  
   यह बगीचा। पत्तियों, टहनियों और डालियों के टूटने के अजब विध्वंसलीला हुई प्रतीत होती है। चूहे मरे पड़े हैं। चिड़ियों, सियारों की लाशें यत्र-तत्र पड़ी हैं। यह अरहर का खेत मानों किसी शत्रु ने बड़े श्रमपूर्वक तोड़-ताड़कर ध्वस्त कर दिया । यह ईख तो पहचान में ही नहीं आती। किस देश के बीज की पौध है। पत्तियाँ नाम मात्र के लिए भी नहीं। सारी दुनियाँ बदल गयी। कल का कुछ पहचान में नहीं आ रहा।
   
   यह रास्ते पर कौन खड़ा है ? क्या कर रहा है केवल खड़ा है ? जी हाँ ! चुपचाप खड़ा है। एकदम चुप। कुछ देख रहा है। बहारों की राख में जीवन खोज रहा है। उजड़े चमन में घोंसले के बिखरे हुए तिनकों को देख रहा है। यह कौन है ? गाँव का ही आदमी पहचान में नहीं आ रहा।

कौन है भाई ?” मैंने बगल से पूछा।

  उसने मेरी ओर देखा और जब तक मेरे मुँह से निकला कौन, महेश भाई ?”  वह दौड़कर चिपट गया और फफक-फफक कर रोने लगा।

  “कुछ बचा नहीं, भइया। अब जीयें कि मर जायें  महेश ने कहा। और उसी समय सीतल दादा की तस्वीर मेरी आँखों के आगे नाच गयी।

  मैंने धीरज बँधाने की कोशिश की। बोला – अरे, क्या मन छोटा कर रहे हो, भइया ! यह एक साल की बात है ? सर्वनाश का यह नगाड़ा तो हम किसानों के सिर पर जीवन-भर बजता है। विपत्ति है, धैर्य रखो। कट जायेगी।

  आगे बढ़ा तो लगा जैसे कल का जवान किसान आज अचानक बूढ़ा हो गया। सच है, बूढ़ा वह है जिसके आगे जीवन नहीं। जिसके आगे जीने के सामान नहीं।


-    विवेकी राय
( 'आकाशवृत्ति' कहानी अंश) 
कालचक्र (कहानी संग्रह), राजीव प्रकाशन, अलोपीबाग, इलाहाबाद          

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