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Friday, April 29, 2016

AIPMT और NEET से जुड़ा फैसला : बुद्धिमत्तापूर्ण किन्तु विवेकहीन !

   हाल ही में AIPMT और NEET परीक्षाओं से जुड़े न्यायालय के फैसले को देखा जाय तो ऐसा लगता है जैसे फैसला देने में न्यायालय ने बुद्धिमत्ता तो दिखाई लेकिन उस फैसले में एक किस्म की विवेकहीनता हावी रही। सुनने में यह बात अटपटी लग सकती है कि बुद्धिमानी और विवेकहीनता दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं लेकिन ऐसा ही हुआ है। इस बारीक फर्क को समझने के लिये व्यापारी और उसके बच्चों वाले दृष्टांत से मामले को समझना चाहिये।
  
    दृष्टांत कुछ यूं है कि एक व्यापारी जो अपने चार बच्चों को लेकर पैदल ही कहीं जा रहा था कि उसके रास्ते में नदी पड़ी। नदी को पार करने के लिये कोई साधन न देख व्यापारी ने उस पार जाने के लिये अपनी बुद्धि लगाई और नदी की गहराई नापना शुरू कर दिया ताकि बच्चों समेत वह नदी पार कर सके। नापने के लिये उसने एक लकडी ली और नदी की धार में घुस गया। एक जगह लकडी से गहराई नापा तो वह सबसे छोटे लडके के बराबर गहरा था। आगे एक जगह लकडी नदी मे डालकर गहराई नापा तो वह स्थान बडे लडके के उंचाई के बराबर गहरा था। कुछ और नापा तो गहराई एक दो फीट से ज्यादा नहीं थी। यानि सबसे छोटे लडके के कमर और घुटने तक। व्यापारी ने और दो चार जगह लकडी डुबा डुबाकर पानी की गहराई नापी। नदी से बाहर आकर व्यापारी ने उस लकडी से नापी गई गहराईयों का average निकाला। इसके बाद व्यापारी ने अपना और अपने बच्चों की उंचाई नाप कर उसका Average निकाल दिया। बच्चों और उसकी खुद की उंचाई का औसत नदी की गहराई से ज्यादा था। सो व्यापारी ने मान लिया कि बच्चे यदि नदी में उतरते भी हैं तो नहीं डूबेंगे क्योंकि नदी की गहराई बच्चों की औसत लंबाई से कम है। 
   
    व्यापारी ने अपने बच्चों को नदी में उतार दिया और उस पार चलने का आदेश दिया। लेकिन व्यापारी के देखते ही देखते उसके बच्चे नदी मे डूब गये। व्यापारी ने बाहर आकर सोचा कि ये कैसे हो गया ? उसने औसत तो ठीक ही निकाला था। बुद्धि तो लगाई थी। तभी अचानक व्यापारी को भान हुआ कि उसने गणना करने में बुद्धि तो लगाई लेकिन उस गणना को मानने या न मानने का विवेक नहीं लगाया। यदि विवेक लगाया होता तो उसके बच्चे न डूबते। 
    
    ठीक यही हाल AIPMT और NEET परीक्षाओं से जुड़े फ़ैसले का है। पहली नज़र में देखने से लगता है जैसे फैसला बच्चों के हित में है मसलन तमाम तरह की परीक्षाओं को खत्म कर केवल एक ही परीक्षा देने की सुविधा। न्यायालय ने इस मुद्दे से जुड़े सरकारी अमले से जानकारी मांगी कि यदि इसी सत्र से इसे लागू किया जाय तो सब कैसे और किस हिसाब से होगा। जवाब में बाबू लोगों ने बता दिया कि फलाना फलाना तारीख को पहला फेस माना जाय, फलाने में जो शामिल न हों, वो अलाने तारीख में शामिल हों। तीस सितंबर तक प्रक्रिया निपटाई जा सकती है वगैरह वगैरह। न्यायालय ने भी बात मानते हुए इसी सत्र से लागू करने का मन बना लिया। देखने-सुनने में,तो यह बड़ा अच्छा लगता है कि न्यायालय ने सक्रियता दिखाई, त्वरित निर्णय दिया लेकिन ध्यान से देखने पर यही फैसला अधिकतर छात्रों के लिये फौरी तौर पर असुविधाजनक और नुकसानदेह है। 
  
    इससे सबसे ज्यादा असर उन बच्चों पर पड़ेगा जिन्होंने AIPMT के लिये फॉर्म तो भर दिया था लेकिन तैयारी वे मुख्य रूप से राज्य स्तरीय परीक्षाओं का कर रहे थे जिनमें अधिकतर बारहवीं के पाठ्यक्रम से जुड़े सवाल पूछे जाने थे जबकि AIPMT में ग्यारहवीं के पाठ्यक्रमों को भी बहुतायत में पूछा जाता है। अब इन बच्चों को राज्य स्तरीय परीक्षाओं के खत्म किये जाने से केवल AIPMT ही देना पड़ेगा और उसकी तैयारी भी सिर्फ़ दो दिन में ग्यारहवीं के पाठ्यक्रम पढ़कर करनी होगी। हांलाकि जिन बच्चों ने केवल राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिये ही फॉर्म भरे थे उनके लिये AIPMT के दूसरे चरण में तीन महीने बाद 24 जुलाई को परीक्षा देने की सुविधा है लेकिन जिन्होंने पहले से ही AIPMT के लिये फॉर्म भरा था उनके लिये अब बेहद मुश्किल हो गई है। यह मुश्किल तब नहीं होती जब NEET को अगले सत्र से लागू किया जाता। तब छात्रों के पास पर्याप्त समय होता और उसी हिसाब से वे तैयारी करते लेकिन अब हालत यह है कि ऐसे छात्र परेशान हैं और सिर्फ दो दिन में ग्यारहवीं के पाठ्यक्रम समेटने का तनाव उन पर हावी है। हांलाकि कई राज्य सरकारों ने इसमें पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का मन बनाया है लेकिन बेहद कम समय को देखते हुए इस पर क्या कुछ होगा कहना मुश्किल है।

 -    सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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