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Sunday, December 21, 2014

बांसपत्र, नागकेसर, चील दम्पत्ति.....प्रकृति यात्रा

 
 बोटानिकल गार्डन में घूमते हुए बांस के झुरमुटों पर नजर पड़ी तो मन लहक गया। बचपन से ही हरे-हरे बांस मुझे बहुत लुभाते हैं। उनके झुरमुटों के बीच कभी सांप-बिच्छुओं से बचते-बचाते घुस जाओ तो मन हरियर हो जाता है। कहीं कोई नन्हीं सी चिड़या उन बांस के झुरमुटों के बीच फुदकती नजर आती है तो कभी कोई अनचिन्हे किस्म का पक्षी छहांता नजर आता है। पक्षी न दिखें तब भी उन झुरमुटों में किसी न किसी तरह की आवाजें आती ही रहती है। न भी हों तो बांस के सरसराते पत्ते तो हैं ही। दुपहरी में जब तेज हवा चलती है तो ये बांस ही हैं जो उनके आने की सबसे पहले सूचना देते हैं। फिर ये बांस भी सीधे नहीं उगते। टेढ़े-मेड़े, झुके-लदे, आपस में फंसे-कसे जैसे उनमें रगड़-धगड़ सी चलती रहती है। कभी दो बांस आपस में टकराना शुरू करते हैं तो जो आवाजें निकलती हैं, वे कभी-कभी उनके आपसी मनमुटाव का आभास देते हैं। रह रहकर चिर्रर-चूं...कर्र-चूं की ध्वनि। फिर बांसों की इन लगातार रगड़ से लकड़ी का तापमान बढ़ता जाता है, हरे बांस धीरे-धीरे एक ही जगह रगड़ खाकर सुलगना शुरू करते हैं। गर्मी के मौसम में तेज लू वाले थपेड़ों के बीच कई बार इन बांसों के कारण ही आग लगते देखा गया है। नीचे गिरी सूखी पत्तियां तो हैं ही इस दावानल में घी का काम करने के लिये। सो देखते ही देखते समूचा जंगल चट् चट् की ध्वनि करता धधक उठता है।

    इधर गाँवो में अब बाँस सिर्फ शादी-ब्याह, मरनी-करनी या किसी फूस की मड़ैया आदि के लिये ही काटे जाते हैं वरना एक समय था कि दरवाजे पर लगी चचरी से लेकर छत तक में बांस ही बांस नजर आता था। कच्चे घर के भीतर पहुंचते ही नये कटे बांसों की टटकी महक से मन सुरभित हो जाता था। मकानों के निर्माण में आज भी बांस का इस्तेमाल होता है लेकिन कम। पहले की तरह नरिया-थपुआ वाला जमाना नहीं रहा। अब तो गर्डर पटिये का जमाना है, एक तरह से अच्छा है। इसी बहाने हरियरी बची रहेगी। लेकिन उतने से ही बांसों का कहां छुटकारा होगा। अब तो बांस ही नहीं बचते। जहां थोड़ी सी जगह मिली नहीं कि वहां कुछ निर्माण कर दिया गया। ऐसे में बांसों की हरियरी दिख जाय तो मन खुद ब खुद उनमें अटक जाता है। फिर यहां बंबई में तो इस नजारे को देखना और दिलचस्प बना देता है। ऊपर से उन बांसों में लटकते ढेर सारे चमगादड़। उनके खुलते, बंद होते पंखों को देख ऐसा लगा जैसे बांस की सरसराती पत्तियों के साथ वे भी ताल दे रहे हों। 

    उन बांसों को निहारते हुए क्षण भर बीता कि नजर बाँस के इर्द-गिर्द अटके सूखे चौड़े पत्तों पर पड़ी। ऐसा लगा जैसे बाँस किसी साँप की तरह केंचुल उतार रहे हों। नीचे गिरे एक सूखे चौड़े पत्ते को उठाकर छुआ तो बहुत मोटा और कड़ा लगा। उसका आकार और रंग देखकर एकबारगी सूखे भोजपत्रों का एहसास हुआ। चूंकि इसे सामने ही बाँस में अटके देखा था सो पता था कि बाँस का छिलका है वरना अचक्के में देखने पर भोजपत्र तो कह ही सकता था। नाखूनों से दबाया तो सूखा पत्ता चटक गया। जाहिर है अंदर की नमी सूख गई थी वरना बाँस इसे अपने से अलग क्यों करता ? कुछ ऐसा ही स्वभाव इंसानों में भी होता है। जब तक रिश्ते में आपसी नमी बनी है, तब तक स्नेह से जुड़े हैं, जहाँ शुष्कता आई कि विलग हो लिये इस बाँसपत्र की तरह।

  उधर बाँस के झुरमुटों के करीब ही नागकेसर के ढेर सारे पेड़ नजर आये तो उनकी ओर बढ़ लिया। नागकेसर, जिसे Ceylon Iron Wood भी कहा जाता है में सफ़ेद फूल खिले थे। भीनी-भीनी खुशबू वाले वे फूल बहुत तो नहीं लेकिन इक्का-दुक्का कहीं नजर आ रहे थे। उनके पास ही ढेर सारे नागकेसर के फल भी दिखे। कुछ ऊंचाई पर होने से जब हाथ न लगे तो नीचे जमीन पर ढूंढा। घास में एक जगह उसके बीज दिख गये। हरा फल भी दिखा। उस हरे फल तो दांतों से चीर दिया तो स्वाद कुछ कसैला लगा। भीतर तीन बीज आपस में चुक्की-मुक्की मारे बैठे थे। जमीन पर गिरे बीज कत्थई रंग के थे। ये वाले सफ़ेद हरियरी लिये थे। शायद पक जाने के कारण बीज कत्थई हुए हों। एक बार P N Subramanian जी ने बताया था कि इस नागकेसर की लकड़ी बहुत कड़ी और मजबूत होती है। इसे काटने-छीलने के लिये भी विशेष धार और मजबूती वाले औजार लगते हैं। छोटा सा नागकेसर लकड़ी का बना हाथी भी दस बारह हजार का मिलता है। इस लिहाज से देखा जाय तो एक भरा-पूरा नागकेसर वृक्ष लाखों की कीमत  रखता होगा। नेट पर चेक किया तो एक छोटे से हाथी की कीमत 599 डॉलर दिखी। कुछ और नन्हे आकार के दिखे जिनके कीमत 60 डॉलर के आसपास दिखी।

  पास ही एक पेड़ पर तोतों की टांय-टांय सुनाई दी। ढेर सारे तोते किसी पेड़ पर जमा थे। न वहां कोई फल था न फूल, कुछ नहीं। सिर्फ जमा होकर टांय-टांय करे जा रहे थे। पास ही एक बरगद के ऊंची फुनगी पर चील बैठती दिखी। उसे देखने से लग रहा था जैसे वह ठीक से जगह न मिलने के कारण बैठ नहीं पा रही हो। हवा में कुछ देर पंखों को फैलाये रखने के बाद फड़फड़ाते हुए चील उड़ी तो पता चला वहां चीलिन बैठी है। अनजाने में चील दम्पत्ति की रतिक्रिया देख बैठा। उधर से नजरें हटाया तो सामने सप्तपर्णी के पेड़ पर किसी अनजानी चिड़िया की आवाज सुनाई दी। कुछ देर देखने के बाद भी कहीं कुछ पता न चला कि कौन सी चिड़िया है, किस ओर से बोल रही है। मन ही मन हंसा कि चिड़िया मेरा ध्यान खेंच रही है ताकि चील दम्पत्ति पर दृष्टिपात न कर सकूं। उधर चील महाराज आसमान में एक गोल दायरा बनाकर धीरे-धीरे उड़ रहे थे, चीलिन अब भी बरगद की फुनगी पर बैठी थी।

जारी....

- सतीश पंचम

    

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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