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Sunday, January 24, 2016

लकीर.....पपीता....गूलर....!

   जीभ लपलपाते काई के पास रेंगते गिरगिट ने काई का स्वाद जानने की कोशिश की, थोड़ा सा आगे बढ़ कर एक-दो बार और काई तक जीभ पहुंचाने के बाद करीब ही जमीन पर पड़ी फफूंद लगी गूलर को एक नज़र देख आगे बढ़ गया। गूलर के भीतर अभी भी कुछ कीट मौज़ूद थे। सामने जमीन पर पिछले कई दिनों से गिरे पपीते पर भी फफूंद लगने लगी थी। उसके गल चुके पिचके हिस्से पर मक्खियों ने भनभनाना शुरू कर दिया था। गिरगिट रेंगते हुए उसकी ओर भी देखा लेकिन न जाने क्या बात थी कि उसकी ओर भी एक निगाह अनमने देख वह आगे बढ़ चला। पीछे भद् की आवाज के साथ जमीन पर किसी फल के गिरने का अंदेशा हुआ। नज़र उठा कर देखने पर पता चला कि कौवे ने जान बूझ कर चोंच मारते हुए एक पपीते को गिरा दिया था। पपीते से दूध अब भी रिस रहा था। एक बार गिरगिट का मन हुआ कि जाकर गिरे पपीते के दूध का स्वाद चखे लेकिन कौवे की मौज़ूदगी चिंता वाली बात थी। अभी पिछले दिनों कौवों द्वारा खदेड़ा जाना वह भूला नहीं था। किसी तरह झाड़ियों में पहुँच कर उसने अपनी जान बचायी थी। फिर एक जरा से दूध का स्वाद जानने के लिये जान जोख़िम में डालना ठीक न था। 

   उधर कौवा पपीते के पेड़ से नीचे आकर जमीन पर बैठ चुका था। सड़ चुके फफूंद लगे पपीते में एक दो चोंच मारने के बाद कौवा अपने द्वारा गिराये कच्चे पपीते की ओर लपका। दूध अब भी रिस रहा था। ऊपर पेड़ से भी नीचे पपीते से भी। चोंच बढ़ाते हुए कौवे ने नीचे गिरे पपीते के दूध को चखा, चोंच कटकटाया और दूसरी ओर उड़ गया। गिरगिट ने थोड़ी देर इंतजार किया। आशंका थी कि कहीं कौवा लौट न आये। आखिर हिम्मत करके पपीते की ओर बढ़ चला। करीब पहुंचने पर ध्यान धूल में अंटे दूध पर गया।

     एक चींटी रिसते दूध में फंस चुकी थी। गिरगिट ने जीभ लपलपा कर चींटी की ओर बढ़ाया ही था कि कौवे का हमला हो गया। तेजी से करीब की झाड़ियों में भाग कर गिरगिट ने जान बचाई। चींटी अब भी पपीते के दूध में सनी हाथ पैर मार रही थी। राहत न मिलते देख धीरे-धीरे उसने खुद को भाग्य के भरोसे छोड़ दिया। कौवे ने कच्चे पपीते को देख एक दो चोंच मार उस पर दायें-बांये होते अपनी चोंच साफ की, इधर-उधर देखा और सामने नीम के पेड़ पर जा बैठा। गिरगिट ने हिम्मत करके झाड़ियों से बाहर आना चाहा लेकिन नीम के पेड़ पर बैठे उधमी कौवे के चलते हिम्मत छूटी जा रही थी। इधर हवा का झोंका आया और धूल ने पपीते के दूध पर पपड़ी बना दी। चींटी ने एक जोर अपनी ओर से लगाया और एकाएक धूल की परत चीरते बाहर निकली। लड़खड़ाते कदमों के साथ एक छोटी महीन दूध की लकीर बनती गई। फफूंद लगे सड़ चुके पुराने पपीते ने उस दिन को याद किया जब ऐसे ही एक चींटी उसके दूध की गिरफ़्त से भागी थी। दूध की छोटी सी महीन लकीर तब भी बनी थी।   
 
   उधर गूलर का पेड़ मन ही मन मना रहा था कि चींटी उसकी ओर न बढ़े। वहाँ पहले से उसकी खरोंचों से दूध रिस रहा था। अबकी उसके दूध में सनी तो फिर निकल न पायेगी। इस बीच चींटी सीधे उन झाड़ियों की ओर बढ़ चली जहाँ गिरगिट ने आश्रय लिया था।

  दूध की बजाय अब ज़िंदगी की लकीर पीछे छूटती जा रही थी।



- सतीश पंचम

 #कल्पना


फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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