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Sunday, July 15, 2018

The Ox-Bow Incident - 1943 की एक गंभीर अमेरिकन फ़िल्म

कुछ फिल्में हमें वर्तमान घटनाओं से कुछ यूं जोड़ देती हैं कि लगता है जैसे ये अपने आसपास की ही बात हो। ऐसी ही एक अमेरिकन फिल्म है 1943 की The Ox-Bow Incident. फ़िल्म एक कस्बे की कहानी कहती है जहाँ शराबखाने में कुछ लोग जमा होते हैं और शराब के दौर में हाल फिलहाल में हुई पशुओं की चोरी पर गुस्सा जाहिर करते हैं। वहीं शराबखाने के बाहर एकाध शख़्स ऐसे भी होते हैं जो ताक में रहते हैं कि कोई मुफ़्त की पिला दे। माहौल हंगामाखेज़ रहता है कि सूचना मिलती है कि करीब ही रहने वाले एक पशुपालक किनकेड की हत्या हो गई है। उसके सभी पशु गायब हैं। लोग एकदम से बिफ़र पड़ते हैं कि ये सब क्या हो रहा है।

   लोग समझ पाते कि तभी एक घुड़सवार 
तेजी से आकर सूचना देता है कि कुछ लोग किनकेड के जानवरों के साथ करीब ही देखे गये हैं। तुरत फुरत शराबखाने में मौजूद लोग एक भीड़ की शक्ल ले लेते हैं जो बदला लेने के लिये उतावली है। उसी भीड़ में एक शख़्स ताकीद करता है कि बदला लेने से पहले देख लें कि क्या ये वही लोग हैं जिन्होंने किनकेड के जानवर चुराये हैं ? ऐसा ना हो कि कोई गलत आदमी पकड़ा जाय। इस बीच एक मोटी महिला घुड़सवार भी इस भीड़ में शामिल हो जाती है और उन हत्यारों को पकड़ कर फांसी देने की मांग करती है। इसी दौरान दो लोग कस्बे में मौजूद जज के पास जाते हैं ताकि वह उन लोगों के साथ चल कर अपना फैसला सुना सके। जज इस मामले में यह कह कर अपनी असमर्थता जताता है कि उन्हें पकड़ना शेरिफ का काम है। जब वे लोग उनके सामने लाये जायेंगे तो वह जरूर फैसला करेगा। दिक्कत तब और बढ़ जाती है जब पता चलता है कि शेरिफ कहीं बाहर गया हुआ है। ऐसे में भीड़ का संचालन वहीं मौजूद एक आर्मी मेजर टेटली करने लगता है। सभी अपने घोड़ों पर सवार हो उन पशु चोरों का पीछा करना शुरू करते हैं जहाँ उनके होने की सूचना मिली थी।

     काफी दूर आगे जाने पर उन्हें किनकेड के जानवर दिख जाते हैं। वहीं पास ही तीन लोग सोते नजर आते हैं। उन लोगों को घेर कर बंदूक की नोक पर जगाया जाता है। पूछताछ करने पर पता चलता है कि ये तीनों घुमन्तू लोग हैं। एक मैक्सिको का जुआरी है। दूसरे दो पशुओं के व्यापारी हैं। इनका काम पशुओं को खरीदने बेचने का है। जब पूछताछ की जाती है कि किनकेड के पशु उनके पास कैसे आये तो वे बताते हैं कि उन्होंने उसे किनकेड से खरीदा है। रसीद के बारे में पूछने पर ना में जवाब मिलता है। बिना रसीद किनकेड के जानवर इनके पास होने से उन लोगों पर शक गहराता जाता है। भीड़ अब तुरत-फुरत उन्हें फांसी देने की मांग करती है। रस्सियों का फंदा तैयार किया जाता है जिसमें वह आवारा शख़्स बहुत आतुर नजर आता है जो शराबखाने के बाहर इस लिये चक्कर लगाता रहता है कि कोई मुफ्त की पिला दे। कुछ ऐसे लोग भी अब इन तीनों के लिये फांसी की मांग करने लगते हैं जो सामान्यत: शांत और समझदार माने जाते हैं। मौके पर मौजूद मेजर टेटली इस भीड़ के हिसाब से तुरत-फुरत उन तीनों को फांसी पर लटकाने का आदेश देते हैं। वे तीनों बार-बार कहते हैं कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। ये जानवर खरीदे गये हैं लेकिन कोई उनकी बात नहीं मानता।



   इसी बीच एक बुजुर्ग शख्स भीड़ से गुजारिश करता है कि इन लोगों को पकड़ कर जज के सामने ले जाना चाहिये। वही इनका फैसला करेगा। हम लोग कौन होते हैं इनकी जान लेने वाले ? लेकिन भीड़ पर तो जैसे खून सवार था। वे उसी समय उन तीनों को फांसी पर चढ़ाना चाहते थे ताकि पशुचोरों को सबक मिले। इसी दौरान उन तीनों में से एक शख्स अपनी पत्नी के नाम लेटर लिखता है और उस बुजुर्ग शख़्स के हाथ सौंप देता है इस विश्वास के साथ कि वह उस लेटर को जरूर उस तक पहुँचा देगा। ऐसा इसलिये भी उसे लगता है क्योंकि इस भीड़ में एक वही शख़्स था जिसने न्याय की बात की थी। पूरी प्रक्रिया की बात की थी। बुजुर्ग शख्स उसके हाथ से लेटर ले लेता है और पढ़कर उसे लगता है कि ये लोग वैसे नहीं हैं जैसा हम समझ रहे हैं। वह अपनी बात मेजर टेटली से भी कहता है लेकिन हिंसक भीड़ का नेतृत्व कर रहे टेटली उसे अनसुना कर देता है। बुजूर्ग शख्स वहां मौजूद दो और लोगों से गुज़ारिश करता है कि वे उसका लेटर पढ़ें और तय करें कि क्या सही है क्या गलता लेकिन वे लोग पढ़ने से इन्कार कर देते हैं। इसी बीच मेजर टेटली अपनी ओर से घोषणा करता है कि यहां मौजूद जो लोग चाहते हैं कि इन लोगों को जज के सामने ले जाकर न्यायिक प्रक्रिया पूरी करते हुए सजा सुनाई जाय वो लोग अलग खड़े हो जांय। एक-एक कर कुछ लोग सामने आते हैं जिसमें वह बुजुर्ग शख्स, दो ऐसे लोग जिन्होंने पत्र पढ़ने से इन्कार किया था और कुछ अन्य लोगों के साथ मेजर टेटली का बेटा भी खड़ा हो जाता है। कुल मिलाकर सिर्फ सात लोग चाहते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया का पालन हो। उधर मेजर टेटली के साथ पूरी भीड़ होती है जो चाहती है कि इन्हें अभी के अभी पेड़ से लटका कर फांसी दी जाय। अंतत: मेजर टेटली का फैसला बहुसंख्यक भीड़ के साथ होता है और उन तीनों के लिये फंदा तैयार किया जाता है।
  


   तीन फंदों को पेड़ से लटकाया जाता है। मैक्सिकन जुआरी अपनी अंतिम प्रार्थना के लिये थोड़ा सा हटकर एक ओर बैठ जाता है और पादरी के तौर पर मौजूद एक शख्स से अपने किये गुनाहों को स्वीकार करता है लेकिन वह यह नहीं मानता कि उसने इस घटना में हिस्सा लिया था। वह चोरी करने की बात से इन्कार कर देता है। बाद में लोग उस पादरी से पूछताछ भी करते हैं लेकिन वह कुछ बता नहीं पाता कि मैक्सिकन जुआरी का कहने का क्या आशय था। इस बीच वह शख्स जिसने अपनी पत्नी और बच्चों के नाम पत्र लिखा था बार-बार गुज़ारिश करता है कि उसे छोड़ दिया जाय वह निर्दोष है लेकिन भीड़ उसकी बात नहीं मानती और तीनों को घोड़े पर बिठा कर उनके गले में फंदा डाल दिया जाता है। घोड़ों को चाबुक मारते ही वे आगे बढ़ते हैं और फाँसी की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

   
   अभी वे थोड़ा आगे बढ़ते हैं कि सामने से शेरिफ आ जाते हैं जिनसे सूचना मिलती है कि किनकेड मरा नहीं है बल्कि घायल हुआ है और उस पर हमला करने वाला पकड़ा गया है। यह खबर मिलते ही वहां मौजूद हर शख्स हैरान रह जाता है और अंदर ही अंदर अपने आप को दोषी मानने लगते हैं।
   
   लोग वापस शराबखाने में आ जुटते हैं और उन सबके बीच वह पत्र पढ़ा जाता है जिसे उस शख्स ने अपनी पत्नी को लिखा था। अपने पत्र में उसने अपने आप को निर्दोष बताते हुए उम्मीद की थी कि लोग समझदारी से काम लेंगे और आगे आने वाली दुनिया और बेहतर और न्यायप्रिय होगी। इस पत्र को सुनकर शराबखाने में मौज़ूद जहाँ हर शख्स गमगीन हो गया था वहीं मेजर टेटली अपने इस कृत्य से इतनी शर्मिंदगी महसूस करते हैं कि अपने कमरे में जाकर खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर लेते हैं।
   
  फिल्म के अंतिम दृश्य में दिखाया गया है कि दो लोग वह पत्र और जुटाये गये पाँच सौ डॉलर का चंदा लेकर उस शख्स की पत्नी को देने जा रहे हैं जिसके पति को अफवाहों के चलते फांसी पर चढ़ा दिया गया था।  
Walter Van Tilburg Clark
  
    नेवादा के Walter van Tilburg Clark के लिखे उपन्यास The Ox-Bow incident पर बनी 1943 की फ़िल्म जैसे आज की ही कहानी कहती है। आज भी हम देख रहे हैं कि कैसे लोग हिंसक भीड़ के शिकार हो रहे हैं और मेजर टेटली जैसे लोग उन्हें उकसा रहे हैं। न सिर्फ उकसा रहे हैं बल्कि उन्हें हार पहनाकर उनका स्वागत भी कर रहे हैं। देखा जाय तो 1943 और अब में यही फर्क है कि जहाँ तब के मेजर टेटली हकीकत पता चलते ही ग्लानिवश आत्महत्या कर लेते थे, खुद की नजरों में गिर जाते थे वहीं अब के मेजर टेटली लोगों को और उकसाते हैं, उनका उत्साह वर्धन करने के लिये जेल में जाकर उनसे मिल आते हैं। यह सब हम आज के दौर में देख रहे हैं और अभी न जाने कब तक देखना पड़ेगा।

- Satish Pancham

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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