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Saturday 13 September 2014

मछली, मकड़ी और पीपल

   कहीं सुदूर वन-प्रांतर में नदी किनारे पीपल के पेड़ की झुकी टहनी से पत्तियां पानी से ऊपर हिल-डुल रही हैं। चांदनी रात की झिलमिल में मछलियां, घोंघे उस हिलती-डुलती परछाईं को संशय की नजर से देख रहे हैं। पहले भी कई बार शुभ्र, उज्जवल रातों को इस तरह की परछाईयां सतह के करीब दिखाई दी हैं लेकिन ये वाली परछाईं तो कुछ ज्यादा ही गहरी लग रही है।

उधर नई-नकोर मछलियों के एक झुण्ड ने मन बना लिया है कि सतह के करीब पहुंच कर उस चीज को पकड़ा जाय। काफी देर तक कोशिश करने के बाद भी सिवाय परछाईं पीने के वे कुछ कर नहीं पा रही थीं। उधर पीपल की टहनी उन मछलियों की इस नादानी पर हंस रही है। उसके पत्ते हवा में यूं लहरा रहे थे मानों ताली बजा रहे हों

उधर दूसरी टहनी से लटकती मकड़ी हवा में हिल डुल रही है। वह भी परेशान थी। जाला तो बरगद के पेड़ पर बना रही थी लेकिन पीपल और बरगद इतने सटे थे कि पता ही न चला कब बरगद खत्म हुआ और कब पीपल शुरू ? ऐसे में उलझे पेड़ों की परवाह न कर मकड़ी ने जाला बुनना शुरू किया और अब हाल यह है कि तेज हवा में बरगद तो वैसे ही रहा लेकिन पीपल ने साथ छोड़ दिया। जरा सी हवा चली नहीं कि हिलने-डुलने खड़खड़ाने लगता।

इसी हालात की मारी मकड़ी एक तांत पकड़े-पकड़े सतह से कुछ ऊपर लटक रही है और नीचे मछलियां ऊभ-चूभ हो रही हैं। मकड़ी ऊपर को जाना चाहती है लेकिन तेज हवा से ठहरना पड़ रहा है। पीपल की झुकी टहनी लहरा कर मकड़ी की ओर जाते हुए उसे ऊपर लेने का मन बना रही है लेकिन मकड़ी बार-बार हवा में लहरा रही है। तांत अब टूटा कि तब टूटा।

और तभी अचानक पानी में बहती किसी बड़ी झाड़ी से मकड़ी टकराई। सहारा पाते ही मकड़ी ने तांत छोड़ दिया और बहती झाड़ी पर धीरे से उतर गई।

भीतर पानी में तैरती मछलियां बहती झाड़ी को कोस रही थीं। कहां तो टकटकी बांध कर परछाईं पी रही थीं, मकड़ी को लटकते उसका करतब देख रही थीं और एक बहती झाड़ी ने अचानक सारा कुछ बिगाड़ दिया।

- सतीश पंचम

( मेरे फेसबुक पेज की  #कल्पना सीरीज़ पोस्ट) 


फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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