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Tuesday, October 11, 2016

खुला मैदान नॉट अवेलेबल !

मेरे घर के करीब हर साल जलने वाला रावण धीरे-धीरे ग्लेशियर की तरह खिसकता जा रहा है। पहले हर साल दशहरे के दिन मेरे स्कूल के बड़े मैदान में जलाया जाता था। बरसात खत्म होते साथ हरी-हरी घास के बीच जब अक्टूबर में चारों ओर टिड्डियां नज़र आने लगतीं, हेलिकॉप्टर वाले कीड़े उड़ते, हल्की-हल्की ठंड शुरू होती तब बड़ा सा पिंक कलर का रावण अवतरित होता और रस्सी तान कर उसे खड़ा किया जाता। धीरे-धीरे स्कूल के उस बड़े मैदान को फुटबॉल मैदान के रूप में बदल दिया गया। हरी घास को इस तरह कटिंग की जाने लगी मानों पोलो मैदान हो। अब भी वहां पहुंच जाओ तो दिल खुश हो जाता है। याद आता है कि कड़ी धूप की परवाह किये बगैर यहीं टिफिन खोल कर गोल घेरा बना खाना खाया जाता था। फुरसत मिली तो यूं ही बैठे-ठाले घास तोड़ कर उसे दातों तले दबा लिया।
इस बीच स्कूल प्रबंधन ने मैदान खराब होने का कारण बता वहाँ रावण जलाने पर रोक लगा दी। अगले साल से रावण बगल ही सटे दूसरे मैदान में जलने लगा। वह मैदान देख रेख के मामले में थोड़ा खराब था। म्युनिस्पेलिटी का था। चारों ओर गंदगी। कहीं बियर की बोतल तो कहीं घूरे। तब भी बच्चे वहाँ क्रिकेट खेलते रहते। फुटबॉल या ऐसा ही कुछ गेम यदा कदा हो जाता। ऐसे ही माहौल में रावण को लाकर जलाया जाता था। इधर सरकारी महकमे ने थोड़ी नज़रें इनायत की और मैदान में घास उगाई गई। मिट्टी-खाद डाल कर कुछ पेड़-पौधे लगाये गये। माहौल खुशनुमा हुआ। चारों ओर एक सीमेंट का गोल दायरा बना कर वॉकिंग के लिये इंतजाम किया गया। अब वहाँ सुबह शाम वॉक के लिये लोग आते हैं। बच्चों का क्रिकेट खेलना बंद हो गया है। उन्होंने जगह बदल कर थोड़ी दूर पर एक दूसरे मैदान में खेलना शुरू कर दिया है। इस बीच सरकार ने निर्णय लिया है कि अब से रावण यहाँ नहीं जलेगा। मैदान खराब होता है। लोगों की भीड़ पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाती है। इसलिये अब इसे दूसरी जगह जलाया जाय।
अब नई जगह के बारे में पता चला यह वही थोड़ी दूर वाला मैदान है जिसमें बच्चे म्युनिस्पैलिटी वाले मैदान से छिटक कर खेलने आते थे। फिलहाल यह वाला मैदान देख रेख की कमी के चलते उबड़-खाबड़ है। यह भी सरकारी मैदान है। घूरे, गड्ढे, कंकड़, बजरी ज्यादा है लेकिन एक तरह का कामचलाऊ मैदान तो है जिसमें रावण भी जलाया जा सकता है और बच्चे क्रिकेट भी खेल सकते हैं।
देखा जाय तो आगे-आगे क्रिकेट और पीछे-पीछे रावण....इसका उलटा भी कहा जा सकता है कि आगे-आगे रावण, पीछे-पीछे क्रिकेट। एक हिसाब से हरियाली और रावण के बीच छत्तीस का आंकड़ा लग रहा है। जितना लोग सभ्य होकर वॉक करेंगे, गार्डन-शार्डन बनवायेंगे,उतना ही रावण वहां से खिसकता जायगा।
उसके जलने की संभावना वहीं बची रहेगी जहाँ बच्चे क्रिकेट खेल रहे हों या कोई खुला मैदान हो। अब इसमें कोई विकासवाद ढूंढे, डार्विन का सिद्धांत ढूंढे तो अलग बात है वरना सच तो यही है कि सभ्यता-फूल-फव्वारे के नाम पर बच्चों के लिये मैदान कम होते जा रहे हैं। वैसे भी आजकल बच्चों को कहाँ समय मिलता है। वे कहीं मोबाइल में लगे हैं तो कहीं क्लासेस जा रहे हैं। माँ-बाप भी खेलने अब कम ही भेजते हैं। हाँ, एकेडमी वगैरह हो तो वहाँ तगड़ी फीस देकर भेजेंगे। तब बात अलग हो जाती है। इस बीच ओलंपिक मेडल का रोना भी बदस्तूर जारी रहता है। हिप्पोक्रेसी में तो हम सब आगे हैं ही। उसका मेडल तो बेमांगे मिल जाना चाहिये लेकिन पता नहीं चल रहा कि उसकी एजेंसी किसके पास है।
- सतीश पंचम
स्थान - वही, जहाँ साल-दर-साल रावण ग्लेशियर की तरह खिसकता जा रहा है।
समय - वही, जब अपनी गेंद रावण के करीब जाते देख बच्चा कहे - "ए रावण, खड़ा-खड़ा दांत क्या दिखा रहा है - बॉल फेंक !"

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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