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Sunday 9 March 2014

IRCTC की मनोहर जहमतें !


इन दिनों IRCTC की वेबसाईट से टिकट बुक कर ले जाना यानि वर्ल्ड कप पा लेना है। न जाने कितनी आँखें सुबह आठ बजे से पहले ही ब्राऊजर पर टिकी रहती हैं। साईट के फूलने, पचकने से लेकर उसके कांखने तक सारा कुछ क्षण प्रतिक्षण टकटकी बांध कर निहारा जाता है। फिर एक दो मिनट जाते न जाते तमाम आँखें आशा छोड़ने लगती है। उन्हें एहसास हो जाता है कि आज भी टिकट मिलने से रहा। अब मिला भी तो वेटिंग मिलेगा या आरएसी। और जब तक परिणाम नजर आये पता चलता है Service not available या Session timeout. यदि सौभाग्य से यह चीज स्क्रिन पर न दिखी तो PQWL / WL 24, 25 जैसी शब्दावली तो दिख ही जायेगी, जिसका तात्पर्य है कि अगले दिन लोग फिर हुमाच बांध कर बैठेंगे कम्प्यूटर स्क्रिन के सामने। अगले दिन फिर वही धमाचौकड़ी मचेगी।

  लेकिन एक वह भी समय था कि 'बम्बई' से गाँव जाने के लिये लोग तीन-तीन चार-चार दिन तक कतार में लगकर रेल्वे आरक्षण लेते थे। फिर तीन महीने पहले से टिकट निकालना होता था। जिस दिन का टिकट बुक करना होता था दिन से दो-चार दिन पहले से लोग लाईन में लग जाते थे। दोपहर, शाम, रात वहीं उठते, बैठते, सोते, टहलते बिताते और सुबह शंटिंग-चंटिंग और धक्का-धुक्की के बीच बासी मुंह टिकट लेने के लिये तैयार दिखते। ऐसे में परिचितों के जरिये कुछ लोग शिफ्ट वाइज कतार में लगते थे।  जिसकी सुबह की शिफ्ट होती वह शाम के समय छुड़ाने आ जाता, जिसकी शाम की शिफ्ट होती वह सुबह को पहुंचता। ऐसे में किसी-किसी का खाना घर से आता तो कोई वहीं आस-पास का वड़ा-पाव वगैरह खाकर किसी तरह समय बिताता। जिस किसी को जरूरी काम के चलते लाईन में से हटना पड़ जाता वह कह कर जाता कि भाई मैं आता हूं लौट कर। मेरा नम्मर याद रखना। यदि लाईन जस की तस रही तो ठीक वरना धक्का-मुक्की होने पर वापस उसका वह नम्बर मिलना मुश्किल। जिसे बोलकर बंदा गया होता यदि वो शरीफ किस्म का हुआ तो ठीक वरना फिर से कतार में लगो। फिर वही धक्का-मुक्की, फिर वही शंटिंग चंटिंग।

 तब 'बम्बई वीटी' में रेल्वे आरक्षण केन्द्र के पिछवाड़े से लाईन लगते-लगते हरी मस्जिद तक कतार चली जाती। वहीं पास ही काठ के ढेर सारे बक्से पड़े होते। टाट में लिपटे किसी बक्से में मछली गंधा रही होती तो किसी में से पानी रिस रहा होता। कहीं मक्खियां भिनभिनाती दिखतीं तो कहीं कुत्ता सोया नजर आता। उसी माहौल में लोग इमारत की छांव में पेपर बिछा बैठते, बोलते-बतियाते कभी वीपी सिंह को चंहेटते, कभी मुलायम को, कभी कल्याण को तो कभी लालू को। मुद्दा ज्यादातर राजनीतिक ही रहता।  सुबह ग्यारह बजते-बजते जब तेज धूप हो जाती तो लोग छांह ढूंढने लगते। कहीं खिड़कियों के ग्रिल में अखबार फंसा छांव किये हैं तो कहीं गमछा फैलाकर हाथ से ताने हैं। तिस पर आरक्षण केन्द्र की किसी फूटी पाइप से बाथरूम का पानी गिरता रहता। ऐसे ही हौलनाक माहौल में लोग लाईन में लगे रहते। उसी दौरान कभी-कभार कोई हंसी-पड़क्का वाला डॉयलॉग बोल देता। ऐसे ही एक शख्स की कुछ बातें याद आती हैं जिसके कहने का तात्पर्य था कि - "घर से तो महाराज अच्छे से कपड़ा ओपड़ा पहनकर निकले होंगे कि जा रहे हैं 'टिकस' लेने, यहां आकर धूप में छांह करके पड़े हैं, मछरी गन्हा रही है, माछी भिनभिना रही है, कुकुर औ बिलार चाट-सूंघ रहे हैं, धक्का-मुक्की में पुलिस की लाठी खा रहे हैं, शर्ट फटी जा रही है और घर पर मलकिन कहती होंगी कि आज मोरे बालम खीरा लेकर आने वाले हैं"।  

   वहीं एक अजीब बात यह भी होती कि रात के एक बजे या दो बजे के आसपास एक नम्बरों वाला आरक्षण फार्म मिलता था जिसपर उस वक्त ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारी का सिग्नेचर होता। उस नम्बरों वाले फॉर्म को पाने का मतलब था कि लोग अब कतार छोड़ कर जा सकते थे, सुबह आठ बजने से पहले इस फॉर्म पर पड़े नम्बर के हिसाब से कतार में लग जाना होता। उस फॉर्म को लेने के लिये ही खूब जोर की धक्का मुक्की चलती। दरअसल जितना पहले नम्बर वाला फॉर्म मिलता, टिकट की संभावनाएं उतनी ही ज्यादा होतीं वरना फिर अगले दिन कतार में लगो चौबीस घंटों के लिये। ठीक उसी समय दलालों का भी जुगाड़ होता। एक ओर से पुलिस वाले लोगों को कतार में लगने का दिखावा करते, लोहे की रेलिंग पर डंडा फटकारते और दूसरी ओर से धक्का मुक्की में दलाल घुसते चले जाते। ऐसे में  जिस शख्स को लगता कि उसका नम्बर को पचहत्तरवां है और कुल चार सौ फॉर्म बंटने के हिसाब से उसे टिकट मिलना तय है तो पता चलता कि धक्का -मुक्की में न जाने कैसे वह पीछे हो गया और नम्बर मिला दो सौ पन्द्रह। ऐसे में आश्चर्य होता कि बाकी के दो सौ से ज्यादा लोग कहां से आ गये, कहां से नम्बर इतना पीछे हो गया। फिर अगले दिन वही होता। लाइन फिर लगती। अबकी बार वह शख्स बीसवें या बाईसवें स्थान पर होता लेकिन उसके मन में अब भी डर समाया रहता कि रात में धक्का मुक्की होने पर वह फिर से पीछे हो जायगा। और धक्का मुक्की भी मामूली न होती। एक पुलिसिया लोहे की रेलिंग पर डंडा फटकारता तो सभी लोगों में शंटिंग शुरू। क्या पता अब क्या हुआ। न जाने नम्बरों वाला फॉर्म कहीं अभी तो नहीं बंट रहा। क्या पता बंट ही रहा हो। दरअसल इस आशंका के पीछे उस पुलिस वाले का हाथ होता जो धक्का मुक्की से बचाने के नाम पर रात की बजाय दोपहर में ही फॉर्म बांट देता कि इसे लेकर चुपचाप बैठो, ज्यादा शोर मत करो। रात में ऐसे ही नम्बर मिलेगा।

  लोग उस फॉर्म के दम पर चाय पीने निकल जाते, खा पीकर लौटते। कुछ वहीं बैठे रहते, कुछ घर जाकर नहा धोकर आते। शाम के सात आठ बजते बजते फिर वही रस्साकशी। कतार में दलाल घुसा दिये जाते। जिस किसी को एक फॉर्म मिल चुका होता पता चला उसी नम्बर के और भी फॉर्म है। कौन कहां कैसे वाले मामले में पुलिस वाले की ड्यूटी बदलती और रात वाला पुलिसिया आ डटता। दोपहर में बंटे फॉर्म को खारिज कर रात में एक बजे बंटने वाले फॉर्म को मान्य करता हुआ कुर्सी लगाकर बैठा नजर आता। लोग कुढ़कर रह जाते। कहां तो इतनी मेहनत से कतार में लगे थे अब सब फिर आगे-पीछे हो गये। रात में फिर वही शंटिंग। जो अखबार बिछाकर सोया रहता वह जागता तो पता चलता कतार तो कहां की कहां चली गई है, अब उसे कोई कतार में घुसने भी नहीं दे रहा। पुलिस अलग फटकारती, कतार वाले अलग फटकारते। उस समय कोई कड़ा होकर कहे कि ये मेरा नम्बर है जिसे जो करना हो करे तो उसकी बात मान भी ली जाती थी लेकिन जो नरम पड़ा वह गया आखिर में।   

  उसी में कभी-कभार शिक्षक विशेष ट्रेन की भी लाईन लगती। पता चलता कि जिस शिक्षक को हम इतनी इज्जत देते हैं, उनके सामने कतारबद्ध हो स्कूलों में चलते हैं, वे भी कतार तोड़ कर धक्का मुक्की में व्यस्त हैं। वे भी हत्त तेरे की धत्त तेरे की करते हुए नजर आ रहे हैं। कभी-कभी जब दोपहर में या रात में जोर की धक्का मुक्की चलती तो देखता था कि कोई कोई गुरूजी पसीने से तर बतर हैं, सीना दबा हुआ है, गर्दन चंपी हुई है, लेकिन मजाल है जो वे आरक्षण केन्द्र के पीछे वाली खिड़कियों में लगी  ग्रिल छोड़ें। पुलिस वाले के आने पर कभी कभी शिक्षक लोग मजाक भी करते कि - कम से कम शिक्षकों  पर तो लाठी मत चलाओ। गुरूजी लोग हैं। ऐसे में पुलिसिया भी पलटकर जवाब देता कि बचपन में आप  ही लोग तो पीटे थे, अब थोड़ा सा आप लोग भी पिट जाओगे तो क्या 'बगद' जायेगा। ऐसे में समझा जा सकता है कि वहां का माहौल कैसा होता होगा। कभी राजनीति, कभी कुकुरहांव, कभी हत्त तेरे की, धत्त तेरे की तो कभी क्या।  

    वह समय अब भी हर साल गर्मियों की छुट्टियों में रेल आरक्षण के दौरान आता है लेकिन एक दो दिन के लिये ही, तब जब कि शिक्षक विशेष मुंबई से छूटने वाली हो। उस रात मुंबई के तमाम उत्तर भारत की ओर जाने वाले शिक्षक गण जमा होते हैं। लेडिज टीचर हुईं तो उनके लिये अलग कतार लगती है। पता चला जिन-जिन की श्रीमती जी टीचर हैं उनके 'वे' पान खाकर मुस्की मारते टहल रहे हैं, पुरूष शिक्षकों को आपस में धक्का-मुक्की करते देख रहे हैं, पुलिसियों को रेलिंग पर डंडा फटकारते देख रहे हैं और उनकी श्रीमती जी साथी शिक्षिकाओं संग - बतकूचन में व्यस्त हैं। अगले दिन पहचान पत्र के साथ पहले महिला टीचरों को छोड़ा जाता है और फिर पुरूष टीचरों को।

   आज हालात यह है कि घर में बैठे-बैठे या सायबर कैफे से लोग आरक्षण करने में लगे हैं लेकिन टिकट नहीं मिल रहा। कभी IRCTC के नखरे तो कभी नेट स्पीड का लोचा। फिर भी गनीमत है। कम से कम आरक्षण केन्द्र की फूटी पाइप से गिरता पानी तो नहीं झेलना पड़ता। फिर वो मछलियों की गंध, कुत्ते बिल्लियों के बीच पेपर बिछा कर सोना, आरक्षण केन्द्र की काली ग्रिल जिसे शायद साफ करने की कभी जरूरत न पड़ती हो। लोगों के द्वारा हाथों-हाथ पकड़े रहने के चलते ही वो साफ हो जाती थी। आखिर सामुदायिक कार्य जो ठहरा। लोग आज भी सामाजिकता निभाते हैं। एक साथ तीन चार लोग मिलकर बुकिंग करते हैं, टिकट निकलवाते हैं, डबल कोटा, सिंगल कोटा, RAC, W/L जैसी शब्दावलियों से दो चार होते हैं। कुछ लोग पहुंच के आधार पर टिकटों का जुगाड़ करते हैं तो कुछ आखिर दम तक ग्रीष्मकालीन विशेष गाड़ियों का चातक पक्षी की तरह इंतजार करते हैं। कभी तो टिकट बुक होगा। 

  आखिर लोगों को 'मुलुक' जो जाना है ! नाते-रिश्तेदारों संग बैठना-उठना है। किसी को बिटिया के लिये रिश्ता ढूंढने जाना होगा किसी के यहां परिवार में कोई शादी ब्याह का मौका आ पड़ा होगा। कहीं किसी को कुछ काम तो किसी को कुछ। IRCTC के सर्वरो, तनिक परदेसी मनुष्यों पर दया करो वरना फिर वहीं आरक्षण केन्द्र की जुटान होगी - फिर वही धक्का मुक्की, धूप, छांह, सीवर की फटी पाईपें, गन्धाती मछलियां, अखबारी बिस्तर और फिर वही अहमक बतियां :-)    

 - सतीश पंचम 

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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