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Sunday, December 14, 2014

कुमकुम, गम्बोज, बिब्बा, महुआ संग प्रकृति विहार

       इस बार मुंबई के बोटॉनिकल गार्डन में जाने का मेरा एक खास उद्देश्य था। मन
कुमकुम का खोखला पेड़
में था कि कुमकुम के पेड़ पर लदे सिंदुरी फूलों को देखा जाय। इसके पीछे राहुल सिंह जी का वह फेसबुक स्टेटस था जिसमें उन्होंने अपने यहां सिंदुरी फूलों के खिलने का चित्र दर्शाया था। उसे देखते ही लगा कि ये कुमकुम के पेड़ की बात हो रही है। पूछ-पछोर के बाद मन बना लिया कि अगले दिन जाकर मुंबई के बोटॉनिकल गार्डन में देखा जाय कि यहां वाले पेड़ में भी फूल खिले हैं या नहीं ? जाने पर निराशा हाथ लगी। उसमें एक भी फल-फूल नहीं था। हां, कुछ पत्तियां थीं वो भी पेड़ के बिचले हिस्से में। ऊपर फुनगी के सभी पत्ते झड़ चुके थे। वैसे भी वह कुमकुम का पेड़ खोखला था। उम्मीद कम ही थी, सो ज्यादा निराश नहीं होना पड़ा। फिर इस प्रकृति को निहारते समय जब-जब उद्देश्य लेकर पहुंचा हूं, प्रकृति ने चौंकाया ही है। जिस पेड़ को बिल्कुल बेजान समझ कर ध्यान नहीं देता था, अगली बार जाने पर वही पेड़ फलों-फूलों से लदा नजर आता था। जिसे बहुत फलदार, फूलों वाला मानता था वह अगली बार बेजान नजर आता था। ऐसा कई बार हो चुका है, इसलिये किसी भी पेड़ को बेकार, बहुत फलदार या जंगली मानने को अब जल्दी दिल नहीं चाहता। जानता हूं कि समय आने पर उसमें भी फल लगेंगे। फूलों की बहार होगी। अभी सिर्फ पत्ते नजर आ रहे हैं, तो आ रहे हैं। फिर ऐसे भी पेड़ों से पाला पड़ा जिसमें कई-कई महीनों तक एक पत्ता तक नजर नहीं आया था। मणिमोहर ऐसा ही पेड़ है। उसे जब देखा बिना पत्तों के देखा। न उसमें फूल खिलता न कुछ...सिर्फ ठूंठ सा खड़ा रहता तब भी जंगली लतायें, उसे घेरे रहतीं। कई महीनों तक उसे यूं ही नजरअंदाज कर निकलता रहा। एक दिन देखा उसमें छोटी छोटी पत्तियां निकल रही हैं। तब बहुत हैरानी हुई थी। लेकिन अब नहीं होती।
ऑप्टिकल ब्राईटनेस से लबरेज़ पत्तियां
       
  आगे बढ़ा तो मैसूर गंबोज के पेड़ से पाला पड़ा। उसका कच्चा फल नीचे जमीन पर गिरा था। सुबह का समय होने से अभी तक झाड़ू मारने वाले कर्मचारी वहां तक नहीं पहुंचे थे। वैसे भी बोटॉनिकल गार्डन में सुबह के एक घंटे के समय को मैं गोल्डन हॉवर मानता हूं। उस एक घंटे में जमीन पर गिरे पत्ते, फलियां, फूल, टहनी बहुत सी जानकारी देते हैं। जिन फलों तक हाथ नहीं पहुंचता या फूलों को सूंघने के लिये मशक्कत करनी पड़ती है वे जमीन पर गिरे मिलते हैं। जिन पत्तों को मसल कर उनकी महक, उनके स्पर्श का अनुभव लेना होता है वह आसानी से मिल जाते हैं। गिरे हुए डंठल को हाथ में लेकर उसकी नमी, उसका भार या खुरदरेपन का अंदाजा बखूबी मिल जाता है वरना किसी पेड़ के पत्ते को छूने भर से वहां मौजूद कर्मचारी नाराजगी जताते हैं। फिर सुबह के समय माहौल भी खुशनुमा रहता है। सूरज की तिरछी रोशनी में पक्षियों की चह-चह जमकर होती है। ताजी हवा में फूल-पत्तों की महक खूब मिलती है। तब तिरछी धूप में पेड़ों के पत्ते विशेष अंदाज में चमकते नजर आते हैं। ऑप्टीकल ब्राइटनेस उफान पर होता है। फिर ऐसे समय में पत्तों के झड़ने में भी एक खास किस्म की विशेषता नज़र आती है। दिन भर तो पत्ते एक-एक कर झड़ते ही रहते हैं लेकिन सुबह के समय यह रफ्तार तेज होती है और उसी समय उनके गिरने, घूमकर जमीन को स्पर्श करने, झरझराकर एक साथ ढेर सारे पत्तों द्वारा टहनी छोड़ने का अंदाज देखने लायक होता है। ऐसे ही समय में पहुंचा था, सो जमीन पर गिरे मैसूर गम्बोज के कच्चे फल मिल गये।

मैसूर गम्बोज का पीला-चिपचिपा दूध
    उन्हें उठाकर हाथ में लिया, दबाया, सूंघा...कुछ खास पता नहीं चल रहा था। तभी नाखूनों से थोड़ा सा हिस्सा कुचला तो भीतर से गाढ़े, पीले रंग का चिपचिपा दूध निकल आया। उस दूध को सूंघा तो उसमें भी कोई महक नहीं। हिम्मत करके दांत से फल को चीर दिया। कसैला स्वाद। पके फल का स्वाद कुछ और होता होगा। फिलहाल तो कच्चा था, सो उसी तरह का स्वाद भी होना लाजिमी है। एकाध फोटो शोटो खेंचकर फल को वहीं फेंक आगे बढ़ा। हाथ में चिपचिपाहट बनी रही। उधर लोगों का आना जाना शुरू हो गया था। किसी स्कूल के बच्चों की पूरी कतार आ गई। उन्हें आगे का रास्ता देकर इत्मिनान से आसपास का नजारा लेता रहा। येलो वुड ट्री की लकड़ियां काली-पीली रंगत लिये नजर आईं। देवरस के  पेड़ से लटकते झालरों से छोटे-छोटे लाल फूल झड़ते दिखे। नोनी के फल छोटे-कच्चे नजर 
आ रहे थे।
Marking Nut (बिब्बा / भिलांवा / भल्लातक) के बीज


    आगे जाने पर  नजर मार्किंग नट / बिब्बा जिसे हिंदी में भल्लातक (भिलावा) भी कहा जाता है, के पेड़ पर गई। उसके पत्तों के बीच कुछ फल सा नजर आया तो तुरत-फुरत करीब पहुंचा। इससे पहले उसमें फलियां लगे नहीं देखा था। एक तो उसकी बनावट ऐसी कि बगल में खड़े सागौन के वृक्ष और उसमें ज्यादा फर्क नजर नहीं आ रहा था, दूसरे उसे जब देखा तब ठिगना, अलसाया सा ही देखा है। न ज्यादा हरकत न कुछ। उसमें लगी फलियां थोड़ी उंची थीं, सो जमीन पर नजर दौड़ाई। घास में एक सूखी फली दिख गई। उसे उठाया, खोला, पंखुड़ी अलग की, रेशे साफ करते-करते उसके महीन कण मैसूर गम्बोज से निकले पीले चिपचिपे दूध वाले हाथ में लग गये और फिर रगड़ते ही हाथ साफ। अब चिपचिपाहट का नामो निशान नहीं। आनंद आ गया इस तकनीक पर। फिर ध्यान दिया मार्किंग नट के बीजों पर। उसके रेशों को कुरेदते-कुरेदते भीतर से आँवले के बीज सरीखा एक सख़्त हिस्सा निकला। संभवत: उसी सख़्त बीज को किसी प्रक्रिया द्वारा काम में लाया जाता है। पहले धोबी उसी बीज से कपड़ों पर निशान बनाते थे इसलिये भी उसे मार्किंग नट कहा जाता है। 

महुआ
  वहां से आगे बढ़ा तो अपने उस कैंडल ट्री को देखता गया। सफ़ेद, गंधहीन फूल उसमें से अब भी निकल-निकल कर चू रहे थे। दो कौवे उसकी टहनी पर नजर आये। मेरे करीब पहुंचते ही उड़ गये। वहां से तेजी से चलते हुए महुए के पेड़ के पास पहुंचा। पता चला कि अभी-अभी उसके नीचे सफाई हो चुकी है। थोड़ा आस-पास नजर दौड़ाने पर सूखे महुए का हिस्सा मिला। मसल कर उसकी महक लिया तो दिल खुश ! एकदम टटकी महुआ महक। कई साल हो गये महुए की महक लिये। आज फिर उस खुशबू से रूबरू हुआ। वहीं खड़े होकर आसपास देख ही रहा था कि सेमल की रूई जमीन पर अटकी दिखी। तुरंत उठा लिया। 
   
सेमल का फरफराता बीज
फरफराते, महीन रेशे देखकर लग रहा था जैसे उस सेमल के बीज में जान हो। छोड़ा तो उड़ जायगा। उस बीज को वहीं उंगलियों से मसला तो सारे रेशे सिकुड़ कर बत्ती बन गये। अब रेशों में वह हरकत न रही। शांत हथेली पर पड़े रहे। नीचे जमीन से उठाकर दूसरे सेमल बीज को हथेली पर रखा, उसे भी मसला तो वह भी बत्ती। कुल मिलाकर उनका आकार कुछ यूं हो गया कि दिये में बाती के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके।
सेमल बाती

जारी....


- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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